Report
जामिया में प्रदर्शन का इनाम: हिरासत, निलंबन और घर तक पहुंच रही धमकियां, ये है पूरी कहानी
बीते कुछ दिनों से जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों और प्रशासन के बीच टकराव चल रहा है. इस बीच छात्रों ने धरना दिया तो दिल्ली पुलिस की मदद से उन्हें कैंपस से हटा दिया गया. लेकिन बात यहीं तक नहीं रुकी पुलिस कार्रवाई के बाद कुछ छात्रों को अब विश्वविद्यालय से ही निलंबित कर दिया गया है.
हमें मिली जानकारी के मुताबिक, कुल 17 छात्रों की जानकारी प्रशासन ने सार्वजनिक की है. जिसमें से 14 से हमने संपर्क किया. इन 14 में से 4 छात्रों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि ये पूरा मामला क्या है. आखिर क्यों प्रशासन और छात्रों के बीच टकराव बढ़ा और कैसे प्रशासन ने एक ऐसा कदम उठा लिया, जिसके बाद छात्रों खासकर महिलाओं की सुरक्षा से खिलवाड़ और निजता के अधिकार का उल्लंघन करने के आरोप भी जामिया पर लगने लगे हैं. और आखिर क्यों छात्रों ने इसका कड़ा विरोध जताया है और इसे विश्वविद्यालय प्रशासन का दमनकारी कदम बताया है.
छात्रों का निलंबन
दरअसल, इस पूरे मामले की शुरुआत दिसंबर में हुई और 10 फरवरी को छात्रों ने इस मामले पर पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी. जिसके बाद जामिया प्रशासन ने छात्रों पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और कैंपस का माहौल बिगाड़ने जैसे आरोप लगाते हुए सख्ती से निपटने का फैसला किया. साथ ही छात्रों के निलंबन जैसा कदम भी उठाया.
14 फरवरी, शुक्रवार को जामिया की ओर से 17 छात्रों की एक सूची सार्वजनिक की गई. सूची में 7 लड़कियां भी शामिल हैं. इस सूची को विश्वविद्यालय परिसर में कई स्थानों जैसे नोटिस बोर्ड से लेकर मुख्य द्वार तक चस्पा किया गया.
इस सूची में फोटो के अलावा छात्रों के व्यक्तिगत विवरण जैसे उनका नाम, कक्षा, मोबाइल नंबर, रोल नंबर और ई-मेल एड्रेस आदि शामिल थे. साथ ही सूची में उनके छात्र संगठन से जुड़ाव की जानकारी का भी उल्लेख है.
ये सूची दरअसल, उन छात्रों की है जिन्हें 13 फरवरी की शाम को जामिया प्रशासन की तरफ से निलंबित कर दिया गया है. सस्पेंशन की यह जानकारी छात्रों को ई-मेल द्वारा भी दी गई. छात्रों के निलंबन के इस आदेश में स्नातक से लेकर शोधार्थी तक शामिल हैं.
मेल में छात्रों को निलंबन का जो आदेश भेजा गया है. उसमें अंग्रेजी में छात्रों पर हुई कार्रवाई के कारण के बारे में बताया गया है. प्रोक्टोरियल विभाग द्वारा जारी इस आदेश में लिखा गया है, “10.02.2025 को आपको विश्वविद्यालय की संपत्ति को नष्ट करने और खराब करने वाले एक अनियंत्रित और उपद्रवी समूह का नेतृत्व करते हुए पहचाना गया था. इसके अलावा 11.02.2025 को, आपने फिर से जामिया परिसर के भीतर एक अनधिकृत और गैरकानूनी विरोध प्रदर्शन में भाग लिया. विश्वविद्यालय के सामान्य कामकाज को बाधित किया और परिसर के अंदर हंगामा किया. जिससे विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को भारी असुविधा हुई. इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान, आपने और अन्य लोगों ने दीवारों पर अपमानजनक और मानहानिकारक नारे लिखकर विश्वविद्यालय की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जैसे कि कमरों के दरवाजों के ताले तोड़ दिए, सुरक्षा सलाहकार, मोहिबुल हसन ब्लॉक आदि में नुकसान पहुंचाया और केंद्रीय कैंटीन की दीवारों को भी खराब कर दिया. इन सबसे आर्थिक नुकसान हुआ और विश्वविद्यालय की बदनामी भी हुई.”
ऐसे शुरू हुआ पूरा मामला
जामिया ने 10 और 11 फरवरी को हुई घटनाओं का हवाला दिया. 10 फरवरी को आखिर क्या हुआ था और क्यों हुआ था इस बारे में सौरभ त्रिपाठी हमें जानकारी देते हैं.
सौरभ त्रिपाठी, हिंदी विभाग में पीएचडी के छात्र हैं. बीते 8 सालों से पढ़ाई करते हुए वह छात्रों के मुद्दों को लेकर जामिया में सक्रिय हैं. निलंबन की कार्रवाई को सौरभ तानाशाही और कैंपस के अंदर प्रतिरोध की आवाज़ को दबाने की कोशिश बताते हैं.
वह बताते हैं कि हर साल जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र 15 दिसंबर को एक संस्मरण मार्च निकाल कर अपना प्रतिरोध दर्ज कराते हैं. यह प्रतिरोध दिल्ली पुलिस की 15 दिसंबर, 2019 की कार्रवाई को लेकर होता है, जब सीएए-एनआरसी प्रदर्शन के दौरान विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में घुसकर पुलिस ने छात्रों के साथ मार-पीट की थी.
सौरभ के मुताबिक, हम यह विरोध इसीलिए दर्ज करवाते हैं ताकि सत्ता को यह याद रहे कि जामिया मिलिया इस्लामिया सीएए-एनआरसी के विरोध में खड़ा था, है और रहेगा. इसके साथ ही हम दिल्ली पुलिस को भी यह याद दिलाते हैं कि उन्होंने जो भी किया वह तानाशाही थी, विश्वविद्यालय के छात्रों पर जुल्म था.
वह आगे बताते हैं, “हम 15 दिसंबर, 2024 को भी प्रदर्शन और मार्च का आयोजन करने वाले थे. जिसके लिए हमने विश्वविद्यालय प्रशासन से इजाज़त मांगी लेकिन मना कर दिया गया. यहां तक कि 15 दिसंबर को रेनोवेशन के नाम पर प्रदर्शन की जगह सेंट्रल कैंटीन और लाइब्रेरी को बंद कर दिया गया. जिसके बाद छात्रों ने 16 दिसंबर को प्रदर्शन किया और मार्च निकाला. उसी दिन शाम को विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे मुझे और ज्योति कुमारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. जिसमें बिना इजाजत कैंपस में प्रदर्शन करने को लेकर सवाल किया गया.”
सौरभ के मुताबिक, उन्होंने इस कारण बताओ नोटिस के जवाब में 7 पेज का उत्तर दिया. इसके बाद फरवरी के पहले हफ्ते में उन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा 25 फरवरी को अनुशासनात्मक समिति (डीसी) के सामने पेश होकर जवाब दर्ज करवाने को कहा गया. उन्हें बताया गया कि प्रशासन उनके कारण बताओ नोटिस के जवाब से संतुष्ट नहीं है.
सौरभ कहते हैं कि हमें यह नहीं बताया गया कि प्रशासन हमारे जवाब के किस बिंदु से असंतुष्ट है. उल्टा हमें अनुशासनात्मक समिति के समक्ष पेश होने को कहा गया. हमने बाकी छात्रों से इस बारे में चर्चा की तो तय हुआ कि समिति के समक्ष पेश नहीं होंगे क्योंकि यह प्रशासन की मनमानी है. कैंपस में इस तरह के छात्र विरोधी कदम सहे नहीं जाने चाहिए.
वह आगे कहते हैं, “इसके बाद समिति के सामने पेश होने की बजाए हमने प्रशासन की मनमानी के खिलाफ अनशन का रास्ता चुना. 10 फरवरी की शाम जामिया के मुख्य द्वार पर प्रदर्शन किया गया. समिति के समक्ष पेश होने के नोटिस को जलाकर विरोध जताया गया और देर शाम सेंट्रल लाइब्रेरी के पास आकर अनिश्चिकालीन धरने पर बैठ गए. पहले दिन 25 से 30 छात्र ही प्रदर्शन कर रहे थे. लेकिन 11 फरवरी तक करीब 400 छात्र इसका हिस्सा बन गए क्योंकि मुद्दा सिर्फ दो छात्रों का नहीं बल्कि कैंपस के भीतर अभिव्यक्ति की आज़ादी का था. धीरे-धीरे इस प्रदर्शन में होस्टल, लाइब्रेरी और अकादमिक मुद्दे भी उठने लगे. दिन में प्रदर्शन में भारी संख्या में छात्र हिस्सा लेते थे. रात में कुछेक छात्र इस अनिश्चितकालीन धरने को जारी रखते थे.”
गौरतलब है कि इसके 13 फरवरी की तड़के 5 बजे के करीब दिल्ली पुलिस ने इन छात्रों को धरनास्थल से हिरासत में ले लिया. दिनभर हुए विरोध के बाद उन्हें शाम को रिहा किया गया. कैंपस में दिनभर हुई उथल-पुथल पर देखिए हमारी ये रिपोर्ट.
क्या कहती हैं हबीबा?
निलंबित छात्रों में हबीबा का नाम भी शामिल है. वह बीए ऑनर्स फर्स्ट ईयर की छात्र हैं और मूल रूप से तेलंगाना की रहने वाली हैं. हबीबा ने बताया कि वह इस प्रदर्शन में सिर्फ इसीलिए शामिल हुई क्योंकि वह संवैधानिक अधिकारों की पक्षधर हैं. उन्हें लगा कि प्रशासन का ये फैसला उन अधिकारों पर आघात की दिशा में बढ़ा कदम है. साथ ही मुझे लगा का इन छात्रों के साथ जो कुछ भी हुआ वो गलत है.
13 फरवरी को दिल्ली पुलिस द्वारा हबीबा को भी हिरासत में भी लिया गया था. हबीबा साफ करती हैं कि वह किसी भी छात्र संगठन का हिस्सा नहीं हैं. वह सिर्फ छात्र होने के नाते इन लोगों के साथ हो रही नाइंसाफी को लेकर आवाज़ उठा रही थी.
निलंबन को लेकर वह कहती हैं कि जामिया के छात्र भगत सिंह की विचारधारा को मानने वाले हैं, हम प्रशासन की इस तानाशाही के खिलाफ झुकेंगे नहीं और न ही किसी तरह की माफी मांगेंगे. प्रशासन द्वारा हमें निलंबित करना हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने और कैंपस के भीतर अभिव्यक्ति की आज़ादी को नियंत्रित करने का एक प्रयास है.
निजी जानकारी सार्वजनिक करने का क्या मतलब?
हिंदी विभाग में पीएचडी की छात्रा ज्योति भी इस प्रदर्शन का हिस्सा थी. उन्हें भी दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिया गया था. निलंबित छात्रों की सूची में उनका भी नाम है. ज्योति बताती हैं कि इस निलंबन के जरिए उन छात्रों को टारगेट किया जा रहा है जो कैंपस में संवैधानिक अधिकारों को लेकर आवाज़ उठाते हैं.
ज्योति बताती हैं कि उनके घर पर भी कुछ अज्ञात लोगों ने कॉल की है. यहां तक कि कोई अनजान शख्स उनके घर तक पहुंच गया और धमकी दे रहा है. दूसरे छात्रों के घर पर भी इस तरह के कॉल जा रहे हैं.
निजी जानकारी सार्वजिनक किए जाने को लेकर ज्योति कड़ा रुख अपनाती हैं. वह कड़े शब्दों इसकी निंदा करती हैं. वह कहती हैं कि प्रशासन ने जिस तरह से हमारी तस्वीर और निजी जानकारी सार्वजनिक रूप से चस्पा की है. उससे हमारी सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है. हमारी लिचिंग या हत्या तक हो सकती है. मोबाइल नंबर सार्वजनिक होने के अपने खतरे हैं. साथ ही ये निजता के अधिकार का उल्लंघन भी है. क्या विश्वविद्यालय को निजी विवरण इसीलिए दिए जाते हैं कि वह उन्हें सार्वजनिक करके हमारी सुरक्षा से समझौता कर सके.
ज्योति की बात की पुष्टि एक और छात्र करते हैं. नाम न छापने की शर्त पर झांसी के रहने वाले यह छात्र बताते हैं कि वह प्रदर्शन में शामिल थे और पुलिस ने उन्हें 13 फरवरी को हिरासत में लिया था. निलंबित कर दिए जाने को लेकर यह चिंतित नजर आते हैं और कहते हैं कि उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. उन्हें लग रहा था कि मामला कारण बताओ नोटिस तक ही सीमित रहेगा. लेकिन अब पुलिस ने उनके घर पर भी कॉल की है.
निलंबित किए जाने और कैंपस से हिरासत में लिए जाने को लेकर हमने जामिया के चीफ प्रोक्टर नबीब जमाल को संपर्क किया. हालांकि, कई प्रयासों के बावजूद भी उन्होंने हमारे फोन कॉल का जवाब नहीं दिया. अगर इस मामले पर उनका कोई जवाब आता है तो उसे इस ख़बर में जोड़ दिया जाएगा.
इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
Also Read
-
Hindutva activists, a ‘crowd at midnight’, and 9 FIRs: The making of TCS Nashik case
-
Indian firms dumped Rs 1,000 crore of unapproved opioid pills into West Africa’s drug crisis
-
Deleted despite documents: Inside West Bengal’s ‘political’ SIR
-
Appellate tribunals or a black hole? Where the Bengal SIR goes to bury a ‘second chance’
-
Tamil Nadu: Who’s winning this election?