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दिल्ली: मुस्लिम मतदाताओं की पसंद ‘आप’ लेकिन एआईएमआईएम के विकल्प बनने का संदेश भी
दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) को करारी शिकस्त देने के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 27 साल बाद सत्ता में वापसी की है. 8 फरवरी को घोषित नतीजों में बीजेपी को 48 जबकि आम आदमी पार्टी को 22 सीटें मिली हैं. ‘आप’ सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल सहित पार्टी के कई दिग्गज नेता अपनी सीट नहीं बचा पाए. वहीं अगर मुस्लिम वोटरों की बात करें तो इन्होंने इस बार भी ‘आप’ पर ही भरोसा जताया है.
दिल्ली की सात मुस्लिम बहुल सीटों में से 6 आम आदमी पार्टी के खाते में गईं जबकि एक सीट बीजेपी जीतने में सफल रही. बाबरपुर से गोपाल राय, सीलमपुर से चौधरी ज़ुबैर अहमद, मटिया महल से मोहम्मद इकबाल, चांदनी चौक से पुनरदीप सिंह साहनी, बल्लीमारान से इमरान हुसैन और ओखला से अमानतुल्लाह खान ने जीत दर्ज की. जबकि मुस्तफाबाद से ‘आप’ के कैंडिडेट आदिल अहमद खान बीजेपी के मोहन सिंह बिष्ट से हार गए.
वहीं 2020 के विधानसभा चुनावों में इन सातों सीटों पर ‘आप’ ने जीत दर्ज की थी. इस बार मुस्तफाबाद सीट हारने के पीछे एक बड़ी वजह असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी है.
एआईएमआईएम फैक्टर
दिल्ली विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने सिर्फ दो सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. मुस्तफाबाद से ताहिर हुसैन और ओखला सीट से शिफा उर रहमान चुनावी मैदान में थे. ताहिर हुसैन ‘आप’ के निगम पार्षद रह चुके हैं. 2020 दिल्ली दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या का आरोप लगने के बाद ‘आप’ ने हुसैन से किनारा कर लिया.
इसके बाद से ताहिर हुसैन जेल में बंद है. वहीं शिफा उर रहमान जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एल्युमिनी एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं और दिल्ली दंगों के आरोप में यूएपीए के तहत करीब पांच साल से जेल में बंद हैं.
एआईएमआईएम ने इन दोनों सीटों से अपने प्रत्याशी खड़े कर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया था. चाहे ताहिर हुसैन हो या फिर रहमान दोनों को लेकर मुस्लिम समुदाय को लगता है कि उन्हें गलत आरोपों में फंसाया गया है. एक तरह से इन लोगों के लिए मुस्लिम वोटरों के मन में सहानुभूति है जिसको भुनाने के लिए असदुद्दीन ओवैसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी. यहां तक की अपने भाषण में ओवैसी दिल्ली दंगों, सीएए- एनआरसी आंदोलन और मुसलमानो की अपनी लीडरशिप की बात करते रहे.
मुस्तफाबाद सीट पर कितना डैमेज
मुस्तफाबाद साल 2020 के दिल्ली दंगों के केंद्र में रहा. इस बार के चुनाव में यहां से ‘आप’ की तरफ से आदिल अहमद खान ‘बीजेपी’ की तरफ से मोहन सिंह बिष्ट, कांग्रेस से अली मेहंदी और एआईएमआईएम से ताहिर हुसैन चुनावी मैदान में थे. यहां पर बीजेपी के मोहन सिंह बिष्ट ने 85215 पाकर जीत दर्ज की जबकि ‘आप’ के आदिल अहमद खान को 67637 वोट मिले वहीं कांग्रेस के अली मेंहदी को 11763 और मोहम्मद ताहिर हुसैन को 33474 वोट मिले. देखा जाए तो बीजेपी और ‘आप’ के बीच जीत का अंतर 17578 वोटो का है जबकि ताहिर हुसैन को 33000 से ज्यादा वोट मिले.
अगर बात 2020 के विधानसभा चुनाव की करें तो यहां से ‘आप’ के हाजी यूनुस जीते थे उन्हें 98000 के करीब वोट मिले थे यानी इस बार से करीब 30000 वोट ज्यादा. यह आंकड़ा लगभग उतना है जितने वोट ताहिर हुसैन को मिले हैं. यानी सीधे तौर पर ‘आप’ के हिस्से का वोट उनके खाते में गया जो ‘आप’ की हार की वजह भी बनी.
ओखला सीट पर कितना डैमेज
ओखला विधानसभा भी मुस्लिम बाहुल्य है. इस साल के नतीजे की बात करें तो यहां पर अमानतुल्लाह खान लगातार तीसरी बार विधायक चुने गए हैं. 2020 के मुकाबले इस बार अमानतुल्लाह खान को कम वोट मिले. एक तरफ उन्होंने 2020 में 70000 से ज्यादा वोटो से जीत हासिल की थी वही इस बार जीत का अंतर केवल 23639 वोटों का रह गया. यहां पर एआईएमआईएम के प्रत्याशी शिफा उर रहमान को 39558 और बीजेपी के मनीष चौधरी को 65304 वोट मिले जबकि कांग्रेस की अरीबा खान को 12739 वोट मिले और अमानतुल्लाह खान को 88943 वोट मिले.
वहीं अगर बात 2020 की करें तो तब अमानतुल्लाह खान को 130367 वोट मिले थे. जबकि बीजेपी के प्रत्याशी ब्रह्म सिंह को 58540 और कांग्रेस के परवेज हाशमी को 5123 वोट मिले थे. ऐसे देखा जाए तो 2025 में बीजेपी के वोटो की संख्या में लगभग 7000 वोटो का इजाफा हुआ है जबकि अमानतुल्लाह खान के वोटो की संख्या में 42000 वोटो की गिरावट देखने को मिली है. यानी अमानतुल्लाह खान के हिस्से के अधिकतर वोट एआईएमआईएम को गए.
क्या रही वजह
दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों का एआईएमआईएम की तरफ झुकाव यूं ही नहीं है. इसके पीछे के मुद्दे- 2020 के दिल्ली दंगों का विरोधी प्रदर्शन और 2020 में लॉकडाउन के दौरान तबलीगी जमात पर लगे आरोप.
जब हमने विधानसभा चुनाव की शुरुआत में मुस्तफाबाद और ओखला का दौरा किया था तो मुस्लिम मतदाताओं ने हमसे खुलकर बात की थी. जिसमें आम आदमी पार्टी को लेकर उनकी नाराजगी एनआरसी आंदोलन के दौरान पार्टी के रवैये से थी. यहां तक की आम आदमी पार्टी ने खुद को इस पूरे आंदोलन के दौरान अलग कर लिया था. अरविंद केजरीवाल ने प्रोटेस्ट के दौरान यह भी कहा था कि अगर दिल्ली सरकार के नियंत्रण में दिल्ली पुलिस होती तो वह शाहिनबाग प्रोटेस्ट को तुरंत हटा देते.
दिल्ली दंगों के दौरान भी ‘आप’ ने मुसलमानों से दूरी बना ली थी. जिसको लेकर मुस्लिम मतदाता मन ही मन ‘आप’ से नाराज भी थे लेकिन बीजेपी के खिलाफ कोई ठोस विकल्प नहीं होने के कारण वह ‘आप’ के साथ गए.
जबकि एआईएमआईएम इन्हीं मुद्दों को लेकर चुनावी मैदान में थी. यहां तक की ओखला से एआईएमआईएम के प्रत्याशी शिफा उर रहमान शाहीन बाग में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान अहम भूमिका निभा रहे थे.
एआईएमआईएम सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी भी करीब 10 दिनों तक दिल्ली में कैंपेन करते रहे उन्होंने ओखला और मुस्तफाबाद की सड़कों पर पदयात्रा की और सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी को मुस्लिम विरोधी बताया. असदुद्दीन ओवैसी के भाषण दिल्ली दंगों, तबलीगी जमात और एनआरसी के आसपास रहे.
दिल्ली में ताहिर हुसैन और शिफा उर रहमान भी कस्टडी बेल पर चुनाव प्रचार कर रहे थे. इन दोनों के चुनाव प्रचार के केंद्र में भी यही तीनों मुद्दे थे और दोनों कैंडिडेट मुसलमानों से अपील कर रहे थे कि जेल का जवाब वोट से दिया जाए.
इसका फायदा भी एआईएमआईएम को मिला. एआईएमआईएम कोई सीट जीतने में सफल नहीं हुई लेकिन इस चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने बड़ा मैसेज दिया.
मुसलमानों का वोटिंग पैटर्न
सीएसडीएस-लोकनीति की इस साल की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद मुस्लिम वोटरों ने उस विपक्षी पार्टी को सबसे ज्यादा वोट दिए हैं जिसमें बीजेपी को हराने की संभावना नजर आ रही थी. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में 77% मुस्लिम मतदाताओं ने महागठबंधन को वोट किया. वहीं 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 75% मुस्लिम मतदाताओं ने टीएमसी को वोट किया. जबकि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 79% मुस्लिम मतदाताओं ने समाजवादी को पार्टी को वोट किया.
इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी मुसलमानों ने लगभग इस तरह से ही वोट किया. आम आदमी पार्टी से तमाम नाराजगी के बावजूद मुस्लिम मतदाताओं ने ‘आप’ को प्राथमिकता दी. लेकिन इसके साथी मुस्लिम मतदाताओं ने यहां एआईएमआईएम को भविष्य में विकल्प बनने का मैसेज भी दिया.
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