दलित युवक की तस्वीर. पृष्ठभूमि में बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर.
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आईआईटी के सपने पर भारी पड़ने लगी थी जाति की हकीकत, सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत

मुजफ्फरनगर के अतुल कुमार ने जून में जेईई (एडवांस) परीक्षा पास की. जिसके आधार पर उसे आईआईटी धनबाद में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की सीट मिली. तितरिया गांव का 18 साल का यह लड़का अपने परिवार का दूसरा ऐसा सदस्य था, जिसने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास की थी.  

यह उपलब्धि न केवल गुज्जर आबादी इलाके में रहने वाले इस दलित परिवार के लिए बहुत बड़ी बात थी बल्कि पूरे समुदाय के लिए गर्व की बात थी. लेकिन परीक्षा परिणाम आने के दो सप्ताह बाद तक वह  एडमिशन के लिए जरूरी 17,500 रुपये जमा नहीं कर पाया. जिसके कारण वह सीट उसके हाथ से निकल गई. 

अतुल के पिता राजेंद्र कुमार गांव में ही दर्जी का काम करते हैं. उन्होंने तुरंत इस मामले को लेकर एसटी/एससी आयोग, झारखण्ड हाईकोर्ट, मद्रास हाईकोर्ट और अंत में सुप्रीम कोर्ट तक गुहार लगाई. आख़िरकार तीन महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने अतुल के हक में फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा,  “हम ऐसे प्रतिभावान छात्र को जाने नहीं दे सकते.”

राजेंद्र कुमार ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया , “हम लोग उस सीट को वापस  लाने के लिए किसी भी हद तक  जाने को तैयार थे. क्योंकि शिक्षा ही इकलौती ऐसी चीज़ है जिसके सहारे एक दलित इस समाज में अपनी प्रतिष्ठा को वापस पाने का दावा कर सकता है.” 

सीट गंवाने से उसे वापस पाने तक इस परिवार ने क्या कुछ झेला. जानने के लिए देखिए ये वीडियो रिपोर्ट.  

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