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इतिहास में दफ़न, चंबल के भूले-बिसरे दलित क्रांतिकारी
इस स्वतंत्रता दिवस पर हम उन दलित क्रांतिकारियों के बारे में जानने के लिए चंबल के बीहड़ों की यात्रा पर निकले हैं, जिनका अंग्रेजों के विरुद्ध किया गया बेख़ौफ़ संघर्ष गुमनामी के रसातल में दफन कर दिया गया है.
जब इरफ़ान खान फिल्म पान सिंह तोमर में कहते हैं कि "बीहड़ों में तो बागी होते हैं, डाकू मिलते हैं संसद में" तो इस संवाद के माध्यम से वह मुख्य रूप से उन भगोड़ों का जिक्र कर रहे थे, जिन्होंने आज़ादी के बाद के भारत में चंबल के बीहड़ों को अपना ठिकाना बनाया. हालांकि, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्यों से गुज़रने वाली चंबल घाटी के दुर्गम इलाकों ने आज़ादी से पहले के भारत में भी उन विद्रोहियों को पनाह दी है, जो कानून के साथ खिलवाड़ कर गए थे.
1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश सरकार से बचने के लिए दुर्गम बीहड़ पहाड़ों को अपना ठिकाना बनाया था. स्वतंत्रता सेनानियों में अनेक दलित क्रांतिकारी भी शामिल थे, जिनके नाम गुमनामी के अंधेरे में कहीं गुम हो गए.
हमने 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तथा 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के भुला दिए गए (विस्मृत) सैनिकों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए इस क्षेत्र की यात्रा की. दलित क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाएं 955 किलोमीटर लंबी चंबल घाटी में आज भी गूंजती हैं, जिसमें पंचनंद क्षेत्र, कुंवारी, पहुज, यमुना, चंबल और सिंध नदियों का संगम शामिल हैं.
देखिए हमारी ये वीडियो रिपोर्ट.
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