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संभल: मतदाताओं का आरोप, पुलिस ने मुस्लिम इलाकों को चिन्हित कर बनाया निशाना

लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण में 7 मई को 11 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की 93 सीटों पर मतदान हुआ. इनमें उत्तर प्रदेश की 10 सीटें भी शामिल रहीं. उत्तर प्रदेश की इन 10 सीटों में से संभल लोकसभा सीट पर सबसे ज्यादा 62.81 फीसदी मतदान हुआ.

हालांकि, आज संभल ज्यादा मतदान के लिए नहीं बल्कि कथित तौर पर मतदाताओं के साथ पुलिस द्वारा की गई मारपीट और बदतमीजी के लिए सुर्खियों में है. यहां कई गांवों के लोगों का आरोप है कि मतदान के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया. आरोप है कि पुलिस ने मुस्लिम बाहुल्य गांवों को निशाना बनाया ताकि सपा प्रत्याशी के पक्ष में होने वाले मतदान में कमी आए.

न्यूज़लॉन्ड्री के पास ऐसे कई वीडियो उपलब्ध हैं, जिसमें पुलिस की मौजूदगी में मतदाताओं की भीड़ बूथ से भागते हुए नज़र आ रही है. इस दौरान कई मतदाताओं को गंभीर तो कई को मामूली चोटें आई हैं. हमने पुलिस पर लगे आरोपों और मतदान न होने देने की कोशिशों के बारे में जानने के लिए इन गांवों का दौरा किया.

ओबरी गांव: स्कूल से भागते लोगों का वीडियो वायरल

शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित ओबरी गांव में अपने हाथ और पैरों पर चोट के निशान दिखाते हुए रहीम बख्श कहते हैं, “जब हम वोट डालने के लिए बूथ पर लाइन में लगे थे तभी पुलिसकर्मियों के एक झुंड ने हमारे हाथ से आधार कार्ड और मतदान की पर्चियां छीन लीं और लाठीचार्ज कर दिया. इस बीच भीड़ तितर-बितर हो गई. न महिलाओं को छोड़ा न किसी और को, सब पर लाठियां बरसाई गईं.”

अपने हाथ में बंधी गरम पट्टी दिखाते हुए रहीम कहते हैं, “मेरे हाथ में यह डंडा लगा है. काफी सूजन है. दर्द ज्यादा है. पैरों पर भी गुम चोट के निशान हैं.”

मोबाइल में पुलिस लाठीचार्ज का एक वीडियो दिखाते हुए बुजुर्ग जरीना कहती हैं, “जब हम लाइन में लगे थे तब हमें ऐसे पीटा गया है. महिलाएं और बुजुर्ग नीचे गिर गए तब भी उन्हें पीटा गया. किसी को नहीं छोड़ा.”

अपने हाथ पर लगी चोट का निशान दिखाते हुए कहती हैं, “मेरे हाथ में ये डंडा पुलिस ने मारा है, लेकिन मैं फिर भी बाद में जब पिंकी (स्थानीय विधायक) के घरवाले आ गए तब दोबारा वोट डालकर आई हूं. लेकिन मेरे बेटे को फिर भी वोट नहीं डालने दिया गया. इस चक्कर में पोलिंग बहुत कम हुई है.” 

उनका आरोप है कि पुलिस ने ऐसा इसलिए किया है कि ताकि मुस्लिमों के दिलों में दहशत बैठ जाए और वे वोट डालने न जाएं. वे कहती हैं, “हमारी इतनी उम्र आ गई है, ऐसा पोलिंग नहीं देखा जैसा कल हुआ है.”

बता दें कि ओबरी गांव में काफी लोगों को चोटें आई हैं. गांव के ही निवासी ज़रार के हाथ में भी काफी सूजन है. पत्नी गुलशन बताती हैं कि उनके पति घर में अकेले कमाने वाले हैं. 

वह कहती हैं, “हम रोज भट्टे पर मजदूरी करके पेट पालते हैं लेकिन पुलिस ने इतना मारा है कि मेरे पति काम नहीं कर सकते. अब क्या पुलिस हमें खाने के लिए देगी?” 

गुलशन कहती हैं कि उनका आधार कार्ड और पर्ची सब छीन लिया गया जिसके चलते वह वोट नहीं डाल पाई.  

पीड़ितों का कहना है कि इस अकेले गांव में करीब 300 लोगों को चोटें आई हैं. किसी का हाथ तो किसी का पैर टूटा है. तीन बार लाठीचार्ज किया गया है. ज़रार कहते हैं, “सबसे पहले सुबह करीब साढ़े आठ बजे फिर दोपहर में और फिर शाम को पुलिस ने मतदाताओं पर लाठियां बरसाई हैं.”

मोहम्मद फरीद

गांव के ही मोहम्मद फरीद हमें उच्च प्राथमिक विद्यालय लेकर गए. गांव के वोट इसी स्कूल में डाले जा रहा थे. पुलिस ने इसी स्कूल में मतदाताओं पर कथित तौर पर लाठीचार्ज किया. फरीद के बाएं हाथ की कोहनी पर पट्टी बंधी है.  

वह घटना को याद करते हुए कहते हैं, “यहां लोगों की वोट करने के लिए लंबी लाइनें लगी थीं. इस बीच लोहे के इस गेट से 70-80 पुलिसकर्मी अंदर घुस गए और लोगों की पर्चियां और वोटर आईडी कार्ड देखने लगे. फिर यह कहते हुए लाठियों से पीटने लगे कि फर्जी वोटिंग हो रही है. मुझे कोहनी, पिछवाड़े और पैरों पर कई लठ मारे हैं. हमें भागने तक का मौका नहीं मिला. महिलाओं को भी नहीं छोड़ा. साथ ही गंदी-गंदी गालियां दे रहे थे जबकि स्कूल में आठ लाइनों में शांतिपूर्वक मतदान चल रहा था.”

फरीद का आरोप है कि पुलिस वाले कह रहे थे कि ये सब समाजवादी वाले हैं इन्हें मारो.  

लंबी दूरी तय कर हम गांव में एक और पीड़ित के घर पहुंचे. घर के अंदर मोहम्मद अनीस लेटे हैं. चेहरे और हाथ पर पट्टी बंधी है. पैर के घुटनों पर भी चोट के निशान हैं. उनके घावों पर मक्खियां भिनभिना रही हैं. जिन्हें वे बीच-बीच में हटाते हुए नजर आते हैं. 

वे कहते हैं, “कल वोट डालने गए थे, वहां पुलिस ने बहुत मारा है. सर में बहुत तकलीफ है. पुलिस ने हमारे साथ अच्छा नहीं किया.”

आपको याद होगा कि 7 मई को एक वीडियो काफी वायरल हुआ था, जिसमें एक बुजुर्ग बेहोशी की स्थिति में सड़क पर पड़े हैं. उनके पास ही कई पुलिसकर्मी खड़े हैं. दरअसल वे 80 वर्षीय रईस अहमद हैं.

हमने रईस से उनके घर पर मुलाकात की. वे हाथ पर डंडों से आए चोट के निशान दिखाते हुए कहते हैं, “मैं वोट डालकर आ रहा था तो पुलिस वाले मेरे बेटे को पीट रहे थे. मैं बचाने गया तो मुझे भी मारा. मेरा बेटा मोहम्मद आलम पीएसी में सिपाही है. छुट्टी में घर पर आया हुआ है. जब पुलिस उसे पीट रही थी तो उसने बताया भी था कि वह स्टाफ का आदमी है तो उसे ये कहकर और मारा कि फिर छुट्टी कैसे मिल गई.”

रईस की बेटी शबाना के हाथ पर भी सूजन है. वे कहती हैं, “मुझे भी पुलिस ने डंडों से पीटा है. मेरे भाइयों को पुलिस ने बहुज ज्यादा पीटा है. जबकि छोटे भाई को पुलिस सुबह 11 बजे अपने साथ ले गई और फिर उसके बयान दर्ज कर शाम को 7 बजे छोड़ा है.” 

पुलिस द्वारा पीटे जाने की कहानी सिर्फ दो-चार लोगों की नहीं है, गांव में ऐसे काफी हैं, जो लगभग यही कहानी बता रहे हैं और जिन्हें काफी चोटें आई है.

41 वर्षीय शान आलम गांव में ही किराने की दुकान चलाते हैं. वे ठीक से चल नहीं पा रहे हैं. वह कहते हैं, “वोट डालने के लिए लाइन में लगा था. तभी पीछे से पुलिस वाले आकर आधार कार्ड और मतदान पर्ची मांगने लगे. इसके बाद अचानक पर्ची फाड़कर लाठीचार्ज कर दिया. वे कमर और पैरों की चोट दिखाते हैं.” 

शान बताते हैं, “पुलिस लाठीचार्ज के चलते करीब एक से डेढ़ घंटे तक मतदान भी बंद रहा. इस चक्कर में मतदान भी काफी कम हुआ है.”

पत्रकार नासिर हुसैन

अमर उजाला के स्थानीय पत्रकार ने क्या बताया

इस घटनाक्रम हमने स्थानीय पत्रकार नासिर हुसैन से भी बात की. वह अमर उजाला के लिए लिखते हैं. 

हुसैन कहते हैं, “मैं 1990 से पत्रकारिता कर रहा हूं. कल की घटना देखकर ऐसा लगा कि लोकतंत्र खत्म होता जा रहा है. शासन करने वाले लोग चाहते हैं कि यही लोग सत्ता में रहें. कल की घटना में करीब 300 लोग घायल हुए हैं. हमारे क्षेत्र में जहां-जहां मुस्लिम गांव हैं, वहां इस तरह की घटनाएं देखने को मिली हैं.”

आप पत्रकार हैं आपने खबर नहीं लिखी?, इसके जवाब में वह कहते हैं, “मैंने खबर लिखी लेकिन जिस तरह से छपनी चाहिए थी वैसा नहीं हुआ. खबर को कांट-छांट कर छोटा कर दिया गया.”

वह आगे कहते हैं, “घटना के बाद से मुझे काफी फोन आ रहे थे कि मैं यह ख़बर न लिखूं. क्योंकि जिन्हें भी चोटें आई है, उन पर बयान वापस लेना का दवाब बनाया गया. उन्हें कहा गया कि पत्रकारों को कुछ न बताएं. ख़बर को रोकने की काफी कोशिश की गई.”

संभल लोकसभा सीट

संभल में इस बार 62.81 प्रतिशत मतदान हुआ है. जो पिछली बार 64.71 प्रतिशत हुए मतदान से कुछ ही कम है. 

यह भारत की उन चुनिंदा सीटों में शामिल है, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक संख्या में है. इस सीट पर 50 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोटर्स हैं जबकि 40 फीसदी के करीब हिंदू वोटर्स. वहीं, अनुसूचित जाति के करीब 2.75 लाख वोटर्स, यादव बिरादरी के करीब 1.5 लाख वोटर्स और 5.25 लाख वोटर्स पिछड़ा और सामान्य वोटर्स हैं. 

मुस्लिम वोटर्स की संख्या अधिक होने की वजह से भाजपा के लिए यहां पर जीत हासिल करना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है. इस बार भी माना जा रहा है कि मुकाबला भाजपा और सपा में ही है. 

इस सीट से शफीकुर्रहमान बर्क पांच बार सांसद और चार बार विधायक रहे हैं. इस बार इस सीट से शफीकुर्रहमान बर्क के पोते जियाउर्रहमान बर्क सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. जियाउर्रहमान बर्क वर्तमान में संभल जिले की कुंदरकी सीट से विधायक भी हैं. 

इस्लाम की अम्मी शाहजहां और पत्नी नगमा
सकीना
मोहम्मद गुफरान
राजपाल

पुलिस ने तीन युवकों को हिरासत में लिया

ओबरी गांव के बाद हम शहबाजपुर कलां पहुंचे. यहां तीन युवकों इस्लाम, साबिर और अरबाज को 7 मई को पुलिस ने हिरासत में लिया था और 9 मई को छोड़ा है.  दरअसल, इस गांव के राजकीय इंटर कॉलेज शहबाजपुर कलां को मतदान केंद्र बनाया गया था. इन तीनों युवकों के घर इस कॉलेज से सटे हुए हैं. परिजनों का आरोप है कि पुलिस इन्हें इसलिए पकड़कर ले गई कि लाठीचार्ज के दौरान ये तीनों अपने घर की छत से घटना के वीडियो बना रहे थे.

इस्लाम की अम्मी शाहजहां कहती हैं, "मेरा बड़ा बेटा घर पर सोया हुआ था तभी पुलिस वाले घर का दरवाजा तोड़ते हुए अंदर घुस आए और मोबाइल मांगने लगे. हमें गंदी गालियां दीं, मेरी बहू को भी डंडा मारा. बेटे को पीटते हुए यहां से लेकर चले गए. वो बार-बार कह रहे थे कि जिस मोबाइल से हमारे वीडियो बनाए हैं, वो मोबाइल दीजिए."

इस्लाम की पत्नी नगमा कहती हैं, "मुझे गालियां देते हुए मोबाइल मांग रहे थे. मैंने और मेरे पति ने पुलिस के हाथ जोड़े, हमारे तीनों बच्चे रो रहे थे लेकिन पुलिस घसीटते हुए उन्हें अपने साथ ले गई थी."

साबिर के पिता अल्ताफ हुसैन और साथ में अम्मी

क्या कहते हैं साबिर के परिजन

हिरासत में लिए गए साबिर के पिता अल्ताफ हुसैन कहते हैं कि पुलिस घर में घुस आई और मोबाइल मांगने लगी. हमारे मना करने पर बेटे को पीटते हुए अपने साथ ले गई. 

वह कहते हैं, "हमारे साथ बहुत ज्यादती और जुल्म हो रहा है. पुलिस तो इंसाफ के लिए जानी जाती है लेकिन ये खुद जुल्म कर रहे हैं. पुलिस का मकसद था कि पोलिंग बंद हो जाए और मुसलमान वोट न डाल पाएं." 

अरबाज के घर हमारी मुलाकात उनकी पत्नी अलीशा से हुई. वह कहती हैं, "हम लोग घर पर सो रहे थे जबकि बाकी लोग खेत पर गए हुए थे. घर के पास काफी शोर मचा था. हमने दरवाजा खोलकर देखा तो पुलिस हमारे घर में ही घुस आई. मेरे शौहर को पीटते हुए पुलिस अपने साथ ले गई थी.”

इस्लाम, साबिर और अरबाज 9 मई को घर आ चुके हैं. साबिर ने हमें बताया, “पुलिस उन्हें घर से लेकर थाने तक गाड़ी में पीटते हुए लेकर गई थी. इसके बाद असमोली थाने में ले जाकर वहां भी डंडों से पिटाई की. शरीर में काफी दर्द है. मेरी बेरहमी से पिटाई की है. बोल रहे थे कि मैंने उनकी वीडियो बनाई है.”

वहीं असमोली थाना इंचार्ज हरीश कुमार कहते हैं, “हमने इन्हें 151 के तहत हिरासत में लिया था. बाद में उन्हें छोड़ दिया गया है.” 

गांव के लोगों ने क्या कहा 

हमने शहबाजपुर कलां के अन्य लोगों से भी बात की. यहां जमशेद अली अपने हाथ की चोट और बाबू अपने पैर की चोट दिखाते हुए कहते हैं कि पुलिस ने बहुत मारा है.

सकीना भी वोट डालने गई थीं. कहती हैं, “मुझे डंडों से पीटा गया है, ऐसी जगहों पर चोटें आई हैं कि मैं आपको दिखा भी नहीं सकती हूं. उन्होंने सबको बहुत बेदर्दी से पीटा है. हम किराए पर रहते हैं. उपले बेचकर, मजदूरी करके अपना जीवन चला रहे हैं.”

ऐसे ही गांव के भूरे के कंधों और घुटनों पर चोटें लगी हैं. वह कहते हैं कि चलना फिरना मुश्किल हो गया है. 

ग्राम मंसूरपुर

मंसूरपुर के गुफरान कहते हैं कि वह वोट डालने के लिए लाइन में खड़े थे तभी पुलिस ने हमला कर दिया. वोटर आईडी कार्ड छीन लिया और डंडे मारे. 

इसी दौरान घायल हुए हेम सिंह कहते हैं, “पुलिस ने बहुत मारपीट की है. अच्छा नहीं किया.”

पीछे से हेम सिंह की पत्नी परमेश्वरी कहती हैं कि उनके बेटे ऋषिपाल को भी मारा गया है. पहले डंडों से फिर दो लोगों ने लात-घूंसों से पीटा है. जिसके बाद बेटे ने डर के मारे वोट भी नहीं डाला. 

मुबारकपुर बंद 

हम इन तीन गांवों में जाने के बाद चौथे गांव मुबारकपुर बंद पहुंचे. गांव के राजपाल कहते हैं, “पुलिस ने कान पर झापड़ मारा है. अब कान बेकार हो गया है. आवाज आनी बंद हो गई है.”

इन चारों गांवों के तमाम लोगों से बात करने के बाद समझ आया कि सबकी एक जैसी ही कहानी है.

लोग बताते हैं कि वे लाइन में लगे थे और पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज कर दिया. ऐसे में संभल में हुए घटनाक्रम ने पुलिस और प्रशासन पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

क्या कहता है पुलिस प्रशासन

हमने इन आरोपों पर पुलिस का पक्ष जानने की भी कोशिश की. असमोली थाना क्षेत्र के एसएचओ ऐसी किसी भी बात की जानकारी होने से इनकार करते हैं. 

जब हम अखबार में छपी ख़बरों और वायरल वीडियो का हवाला देते हैं तो वह कहते हैं, “पुलिस की टीमें मतदान केंद्रों पर पहुंची थीं, इस दौरान कुछ युवा पुलिस को देखकर घबरा गए और भगदड़ मच गई. इसके चलते ऐसी घटना सामने आईं. पुलिस ने किसी भी तरह का कोई लाठीचार्ज नहीं किया है.”

वहीं, असमोली के सीओ संतोष सिंह लाठीचार्ज के सवाल पर कहते हैं, "ये सभी बातें सरासर गलत, असत्य और मनगढ़ंत हैं. मैं किसी भी घटनास्थल पर नहीं था. इस बारे में आप उच्च अधिकारियों से बातचीत कीजिए जो घटना स्थल पर मौजूद थे.”

कई कोशिशों के बाद भी संभल के पुलिस अधीक्षक कुलदीप सिंह गुणावत ने हमसे बात नहीं की. 

संभल लोकसभा से सपा प्रत्याशी जियाउर्रहमान बर्क

ये संभल को रामपुर बनाने की साजिश है

संभल लोकसभा से सपा प्रत्याशी जियाउर्रहमान बर्क से हमने इस बारे में बात की. वह पुलिस की लाठियों का शिकार हुए घायल लोगों से गांव-गांव में घूमकर मुलाकात कर रहे हैं. 

बर्क कहते हैं, “भाजपा के इशारे पर यहां पुलिस ने मुसलमानों को टारगेट करके लठ चलाया है. संभल में जो हुआ है, वो पूरे देश नहीं दुनिया ने देखा है. इससे देश की छवि धूमिल हुई है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को संज्ञान लेना चाहिए अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं आगे की कार्रवाई के लिए अपने वकीलों से बात कर रहा हूं. हम कोर्ट का रुख करेंगे.”

जियाउर्रहमान बर्क का आरोप है कि संभल के सीओ अनुज चौधरी, असमोली के इंस्पेक्टर हरीश कुमार, अमरोहा में तैनात इंस्पेक्टर रणवीर सिंह और रामपुर के सीओ को साजिश के तहत यहां लाया गया. इन सभी ने मुस्लिम गावों को निशाना बनाकर हमला किया है. 

जिन अधिकारियों का आपने जिक्र किया उन्हें क्यों लाया गया? इस सवाल पर वे कहते हैं, "इन लोगों को यहां के सारे हालात का पता है कि किस-किस जगह पर कौन-कौन लोग रहते हैं. रणवीर पहले असमोली में ही एसओ थे. जो अभी सीओ रामपुर हैं, वो पहले सीओ संभल रहे हैं. जो मौजूदा संभल के सीओ अनुज त्यागी हैं उन्होंने रामपुर में रहते हुए आजम खान को काफी नुकसान पहुंचाया है. ऐसे ही ये सब अधिकरी मिलकर संभल को भी रामपुर बनाना चाहते हैं. इन्होंने जो किया है वो माफी के लायक नहीं है. इन्हें सिर्फ बर्खास्त नहीं बल्कि मुकदमा दर्ज जेल भेजा जाना चाहिए."

इन चारों गांंवों में हुआ मतदान

2024 के चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इन चारों गांवों में हुए मतदान की बात करें तो 2024 के चुनाव आंकड़ों के मुताबिक, शाहबाजपुर कला में 5126 मतदाता हैं और कुल 3679(71.77%) मत पड़े हैं, 2019 में यहां 60.81% मत पड़े थे. 

मंसूरपुर में 2906 मतदाता हैं और कुल 1641 (56.46%) मत पड़े हैं जबकि 2019 में यहां कुल 59.09% मत पड़े थे.

वहीं मुबारकपुर में इसबार 3236 मतदाता हैं और कुल 1972 (60.93%) मत पड़े हैं, 2019 में यहां 59.60% मत पड़े थे. ओबरी में इस बार कुल मतदाता 4522 है और कुल 2712 (59.97%) मत पड़े हैं, जबकि 2019 में यहा 64.07% मत पड़े थे. 

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