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घट रहे हिमालय के ग्लेशियर, बढ़ता जा रहा विनाशकारी बाढ़ का खतरा
एक हालिया अध्ययन के अनुसार, हिमालय में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण जहां एक तरफ नई हिमनद झीलों का निर्माण हुआ है और वहीं दूसरी तरफ मौजूदा झीलों का भी विस्तार हुआ है, जिससे हिमनद झील विस्फोट बाढ़ यानी GLOF आने का खतरा बढ़ गया है.
जीएलओएफ तब होता है जब हिमनदी झीलों का जल स्तर काफी ज्यादा बढ़ जाता है और इससे बड़ी मात्रा में पानी पास की नदियों और धाराओं में प्रवाहित होने लगता है, जिससे अचानक बाढ़ आ सकती है. इससे निचले इलाकों में रहने वाली आबादी पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है, जिसमें जानमाल का नुकसान, बुनियादी ढांचे को नुकसान और आर्थिक नुकसान शामिल है.
सिविल इंजीनियरिंग विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जम्मू की ओर से दिव्येश वराडे की देखरेख में प्रधानमंत्री अनुसंधान फेलो (पीएमआरएफ) हेमंत सिंह ने इस अध्ययन को किया था. अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि हिमालय क्रायोस्फीयर में जलवायु परिवर्तन ने GLOF और अचानक बाढ़ जैसी कई प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं को बढ़ा दिया है. आईआईटी रूड़की और यूके और भूटान यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भी अध्ययन में मदद की थी.
मई 2022 में शुरू किए गए इस अध्ययन में काराकोरम पर्वतमाला में हुंजा घाटी के मोचोवर और शिस्पर ग्लेशियरों की जांच की गई. इन इलाकों में GLOF से जुड़ा जोखिम साफतौर पर नजर आता है. इसमें पाया गया कि शिस्पर ग्लेशियर के बढ़ने के कारण बनी मौजूदा बर्फ की झील पहले से ही संवेदनशीलता के स्तर पर है और भविष्य की संभावित झील की वजह से इसका खतरा और बढ़ जाएगा, जिससे GLOF का व्यापक प्रभाव पड़ेगा.
अध्ययन में कहा गया है कि हाल के दशकों में, हुंजा घाटी में 11 हिमनद झील के फटने की घटनाएं देखी गई हैं, जिससे यह काराकोरम पर्वतमाला के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक बन गया है. खासतौर पर हुंजा घाटी के हसनाबाद क्षेत्र में शिस्पर बर्फ से क्षतिग्रस्त झील के कारण 2019, 2020 और 2022 में तीन GLOF घटनाओं को देखा गया था.
काराकोरम पर्वतमाला में 1533 से 2020 तक, लगभग पांच शताब्दियों में कम से कम 179 GLOF देखे जा चुके हैं. इनमें से, 156 GLOF पांच प्रमुख घाटियों – हुंजा, शिमशाल, करंबर, शक्सगाम और श्योक में हुए. इनमें से 120 GLOF घटनाएं जून और अगस्त के बीच बर्फ से क्षतिग्रस्त झीलों के कारण हुईं. इन GLOF खतरों में से, लगभग 32% घटनाएं हुंजा बेसिन (हुंजा घाटी, शिमशाल घाटी) में दर्ज की गई हैं, जिसे काराकोरम पर्वतमाला के सबसे GLOF-अतिसंवेदनशील क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है.
अध्ययन के प्रमुख लेखक हेमंत सिंह ने कहा कि पिछले चार दशकों में, जलवायु में बदलाव का हिमालयी क्षेत्रों में अधिक गंभीर प्रभाव पड़ा है. इन प्रभावों को ग्लेशियरों के पीछे हटने, बर्फ के पैटर्न में गिरावट और अत्यधिक वर्षा के रूप में देखा गया है.
सिंह ने मोंगाबे इंडिया को बताया, “ग्लेशियरों के सिकुड़ने का मतलब है कि बर्फ का पिघलना, जिससे नई हिमनदी झीलों के बनने की संभावनाएं बनी रहती हैं. इनमें से कुछ झीले कई कारणों के चलते GLOF घटनाओं के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं, जैसे तापमान में वृद्धि, ग्लेशियरों से बर्फ का पिघलना, झीलों में मलबे का प्रवाह, झील की गंभीर स्थिति, इसकी स्थानिक सीमा और गहराई, झील का ढलान, आदि. GLOFs क्षेत्रीय पर्वतों के आस-पास रहने वाली आबादी को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं. हिमालय के ग्लेशियरों की स्थलाकृति और जलवायु विज्ञान इन झीलों की बढ़ती संवेदनशीलता का एक और कारण हो सकता है.”
उन्होंने कहा कि जो नई हिमनद झीले बन रही हैं और भविष्य में जिनके बनने की उम्मीद है, उनमें से ज्यादातर झीले काराकोरम पर्वतमाला में पाई जाएंगी.
कश्मीर यूनिवर्सिटी के जियो इंफॉर्मेटिक्स विभाग में पढ़ाने वाले और GLOF पर शोध करने वाले इरफान राशिद ने कहा कि हिमनद झील के फटने से आने वाली बाढ़ वनस्पतियों और जीवों के अलावा निचले इलाकों में रह रही आबादी और बुनियादी ढांचे के लिए लगातार खतरा बनी हुई है. राशिद ने कहा, “हिमनद झील से 20 किलोमीटर से भी कम दूरी पर रहने वाली आबादी को एक बड़े खतरे का सामना करना पड़ सकता है. इन क्षेत्रों में किसी भी नुकसान से बचने के लिए उचित निगरानी और योजना की जरूरत है.”
वह कहते हैं कि हालांकि पश्चिमी हिमालय GLOF के लिए हॉटस्पॉट नहीं रहा है, लेकिन पिछले 30 सालों में कई नई झीलों के बनने के साथ कई बदलाव हुए हैं जिनमें विस्फोट की संभावना है.
जीएलओएफ का बढ़ता ख़तरा
हिमनद झील के फटने से आने वाली बाढ़ एक बढ़ती चिंता का विषय है और इससे हिमालय की सेहत पर असर पड़ रहा है. सिंह ने कहा, “हिमालय में पिछले चार दशकों में GLOF की आवृत्ति प्रति वर्ष 1.3 रही है.यहां किसी भी अन्य पर्वतीय क्षेत्र की तुलना में हिमनद झील के फटने की अधिक घटनाएं नजर आईं है. बदलती जलवायु के कारण वैश्विक स्तर पर ग्लेशियरों के सिकुड़ने और हर तरह के नुकसान में वृद्धि हुई है. ये परिवर्तन साफ तौर पर हिमालय के ग्लेशियरों के खराब सेहत का संकेत देते हैं.”
उन्होंने कहा कि विनाशकारी बाढ़ की घटनाएं न सिर्फ जीवन के विनाश का कारण बनती हैं, बल्कि जल धारा के क्रमिक भू-आकृति विज्ञान परिवर्तन के कारण क्षरण और क्षेत्रीय जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र में और बदलाव का कारण भी बनती हैं.
कश्मीर यूनिवर्सिटी के फील्ड बोटैनिस्ट अख्तर एच. मलिक बताते हैं कि GLOF प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय जैव विविधता को प्रभावित कर रहा हैं. उन्होंने कहा, “जब किसी ग्लेशियर झील में विस्फोट होता है, तो उसका पानी बहुत तेज़ गति से निचले इलाकों में बह जाता है. इससे बुनियादी ढांचे के साथ-साथ वनस्पतियों और जीवों को बड़े पैमाने पर नुकसान होता है और क्षेत्र निर्जन हो जाता है या तहस-नहस हो जाता है.” इसके बाद जमीन बंजर हो जाती है. उन्होंने आगे कहा, “जब वर्षा होती है, तो भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा बढ़ जाता है और ज्यादा तबाही होती है.”
सिंह का सुझाव है कि उपग्रह डेटा, ग्लेशियर सीमाओं के निरंतर अपडेशन और हिमनद झील सूची का इस्तेमाल करके हिमनद झीलों की स्थानिक-अस्थायी निगरानी पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है. उनके हालिया अध्ययन के अनुसार, आपदा प्रतिक्रिया और तैयारियों के लिए तत्काल और आवश्यक कार्रवाई की भी जरूरत है. यहां पहले कदम के तौर पर क्षेत्र की जल मौसम संबंधी निगरानी और किसी आपदा की संभावित स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए.
साभार- MONGABAY हिंदी
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