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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी, पूछा- एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट सद्भाव बिगाड़ने का मामला कैसे?
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में ये एफआईआर का अपराध नहीं दिखता है. जिस शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई है, उसमें अपराध की फुसफुसाहट भी नहीं है. सर्वोच्च अदालत ने शिकायतकर्ता से पूछा कि आप बताइए इस केस में आईपीसी की धारा 153 (आपसी सद्भाव बिगाड़ना) का मामला कैसे बनता है? मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने की.
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, “एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया को भारतीय सेना ने मणिपुर बुलाया था. वो गलत और सही भी हो सकते हैं. क्या सिर्फ किसी रिपोर्ट को प्रकाशित करने से आपराधिक मामला हो सकता है?”
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता से पूछा कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द क्यों न किया जाए? इस पर दो हफ्ते में जवाब देने को कहा है. वहीं, जवाब मिलने तक इस मुकदमे में कार्रवाई पर रोक लगा दी गई है और पत्रकारों को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत बरकरार रखी है.
बता दें कि इससे पहले अदालत ने 15 सितंबर तक पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई थी. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एफआईआर रद्द नहीं की जाएगी. बस ये तय किया जाएगा कि मामले को मणिपुर हाईकोर्ट भेजना है या दिल्ली हाईकोर्ट.
वहीं, इससे पहले हुई सुनवाई में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से पेश हुए वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि उनकी टीम स्वैच्छिक तौर पर मणिपुर रिपोर्टिंग करने नहीं गई थी, बल्कि भारतीय सेना के कहने पर गई थी. टीम क्षेत्रीय मीडिया द्वारा पक्षपातपूर्ण और अनैतिक रिपोर्टिंग की जांच करने के लिए मणिपुर पहुंची थी. ये मामला एफआईआर का नहीं है.
मणिपुर सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के सदस्यों को कुछ और समय के लिए सुरक्षा प्रदान की जा सकती है. उन्होंने मामले को मणिपुर हाईकोर्ट भेजने की भी मांग की थी. जिसका गिल्ड के वकील कपिल सिब्बल ने विरोध किया था.
मालूम हो कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने क्षेत्रीय मीडिया पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग करने का आरोप लगाया गया था. साथ ही रिपोर्ट में सरकार और नौकरशाही को भी कुकी समुदाय के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया गया था.
इसके बाद संस्था की अध्यक्ष सीमा मुस्तफा और तीन सदस्यों- सीमा गुहा, भरत भूषण और संजय कपूर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी. मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा था, “संस्था की टीम ने राज्य में मई से जारी हिंसा को भड़काने की कोशिश की. फैक्ट फाइंडिंग टीम दोनों समुदायों (कुकी और मैतेई) से मिले बिना गलत निष्कर्ष पर पहुंची है.”
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