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नूंह हिंसा: हरियाणा पुलिस ने नाबालिग आरोपियों को व्यस्कों के साथ जेल में रखा, नियमों की उड़ाई धज्जियां
हाल ही में नूंह सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े गंभीर अपराधों के लिए चार नाबालिगों पर आपराधिक मामला दर्ज किया गया है. इन नाबालिगों को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के मानदंडों का कथित उल्लंघन करते हुए पुलिस हिरासत में रखने की बात सामने आई है.
फिलहाल, इनमें से तीन आरोपियों को अलग-अलग अदालतों के आदेशों के बाद नाबालिग निरीक्षण गृहों में भेज दिया गया. इन आरोपियों को पुलिस ने पहले वयस्क यानी 18 साल से अधिक उम्र के आरोपी के तौर पर पेश किया था.
इसके अलावा गत गुरुवार को चौथे संदिग्ध को नाबालिग माना गया.
कानून के मुताबिक, ऐसे मामले जिनमें आरोपी नाबालिग हैं, उसमें एक स्पेशल जुवेनाइल यूनिट को आरोपी को हिरासत में रखने का अधिकार है. अगर कोई सामान्य पुलिस इकाई किसी नाबालिग को गिरफ्तार करती है तो ऐसी सूरत में पुलिस को जल्द से जल्द हिरासत स्पेशल जुवेनाइल यूनिट को सौंपनी चाहिए.
गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने पेश किए जाने के पहले नाबालिग आरोपी को एक ऑब्जरवेशन होम में रखा जाना चाहिए. नाबालिग के गिरफ्तारी या बोर्ड के सामने पेश करने के दौरान हथकड़ी या किसी तरह के बल के इस्तेमाल की इजाजत नहीं है. साथ ही गिरफ्तारी के तुरंत बाद नाबालिग के माता-पिता को इसकी जानकारी देना अनिवार्य है.
हालांकि, इन चार नाबालिगों के मामले में परिवारों का दावा है कि नाबालिगों के साथ ये नियम और कायदे नहीं बरते गए.
परिवारों के मुताबिक, पुलिस ने कथित तौर पर आरोपियों की उम्र की छानबीन किए बगैर ही गिरफ्तार कर लिया, उनकी पिटाई की और उन्हें हिरासत में भी रखा.
भरतपुर, राजस्थान के 17 साल और नूंह, हरियाणा के 16 साल के एक नाबालिग को कम से कम 11 दिन जेल में गुजारने पड़े. नूंह के ही 17 साल के दो अन्य लड़कों को तीन-चार दिनों तक पुलिस हिरासत में रहना पड़ा.
आइए इन मामलों पर एक नजर डालें.
'पुलिस ने गलत उम्र बताकर पेश किया'
5 अगस्त को नगीना पुलिस थाने में नूंह के एक सरकारी स्कूल के 17 साल के एक छात्र के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गईं.गौर करने वाली बात यह है कि एफआईआर में 17 साल के आरोपी की उम्र 19 साल बताई गई. एफआईआर में लगे आरोपों में हत्या का प्रयास भी शामिल है.
चार दिन की पुलिस हिरासत के बाद फिरोजपुर झिरका की एक अदालत ने 10वीं कक्षा की मार्कशीट को सबूत के तौर पर स्वीकार किया और माना कि आरोपी 17 साल का है. इसके बाद यह मामला डिस्ट्रिक्ट जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को सौंप दिया गया.
नगीना थाने के एसएचओ रतनलाल का कहना है कि गिरफ्तारी के दौरान आरोपी की उम्र की जांच करना जरूरी नहीं था क्योंकि "परिवार बाद में अदालत के सामने आयु सत्यापन के प्रमाण दे सकते थे."
17 साल के इस नाबालिग आरोपी की बहन ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि जब 5 अगस्त को जब उनके घर पुलिस आई तो वह सो रही थी थी.
वह कहती हैं, "शोर से मैं जगी तो मैंने देखा कि पुलिस ने मेरे भाई को कॉलर से पकड़ रखा था और उसे लाठियों से पीट रही थी. मुझे लगा कहीं वो मुझे भी न पीट दें, इस डर से मैं दूसरे कमरे में भाग गई."
वह दावा करती हैं कि उनके भाई ने भागने की कोशिश की तो पुलिस ने उनके भाई को "गोली मारने की धमकी" दी थी.
नाबालिग की मां ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें थाने में उनके बेटे को खाना तक नहीं देने दिया.
उनकी मां कहती हैं, "अगले दिन, जब मैं उसे खाना देने के लिए पुलिस स्टेशन गई, तो वह डरा हुआ और भूखा था."
राजस्थान का रहने वाला आरोपी
नूंह की जिला अदालत ने 17 अगस्त को राजस्थान के भरतपुर के 17 साल के एक आरोपी को नाबालिग बताया लेकिन इससे पहले उसे चार दिन की पुलिस हिरासत और 12 दिन सलंबा जेल में बिताने पड़े.
इस नाबालिग को 1 अगस्त के दिन गिरफ्तार किया गया. नाबालिग पर हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया.
परिवार ने कहा कि उन्हें उनके चाचाओं के साथ गिरफ्तार किया गया था, जब वह अपने घर से लगभग 60 किलोमीटर दूर तावड़ू जा रहे थे. उन्हें उस जगह से गिरफ़्तार किया गया था, जहां उनके चाचा ने अपना ट्रक खड़ा (पार्क) किया हुआ था.
आरोपी के परिवार का कहना है कि वह एक निजी स्कूल में 10वीं कक्षा का छात्र है और अपने ट्रक ड्राइवर चाचा की मदद के लिए उनके साथ चला जाता है. इससे उसे जो पैसे मिलते हैं, उनसे वह मोबाइल फोन के किस्त चुकाता है. परिवार ने बताया कि ये फोन उसने ऑनलाइन क्लास (पढ़ाई) के लिए खरीदे थे.
उनकी मां कहती हैं, "अगर मेरे बेटे पर किस्त चुकाने का बोझ नहीं होता तो आज वह जेल में नहीं होता."
उसके चाचा आरोप लगाते हैं कि उनके भतीजे को टार्चर किया गया. वह कहते हैं, "उसका कोई क्रिमिनल रिकार्ड नहीं था. पुलिस उसे हत्या के आरोपों में कैसे गिरफ्तार कर सकती है?. यह सब एक बच्चे के दिमाग पर कानून और व्यवस्था की गलत छाप छोड़ता है."
17 साल के आरोपी की ओर से अदालत में पेश होने वाले वकील मुजीब खान कहते हैं, "परिवार को जुवेनाइल डॉक्यूमेंट्स पेश करने में एक सप्ताह का समय लग गया. इस वजह से उन्हें दो सप्ताह तक वयस्कों के साथ जेल में रहना पड़ा."
एक जैसे एफआईआर
नूंह के 17 साल के ही एक और नाबालिग को गिरफ्तार किया गया. इस पर भी भरतपुर के नाबालिग जैसी धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई. नाबालिग 10वीं की पढ़ाई छोड़, तावड़ू की एक कंपनी में मजदूर के तौर पर काम करता था.
5 अगस्त को नूंह की जिला अदालत के आदेश के बाद इस आरोपी नाबालिग का केस जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को भेज दिया गया. लेकिन गिरफ्तारी और कोर्ट का आदेश आने के बीच उसे तीन दिन पुलिस की हिरासत में गुजारने पड़े.
'पुलिस ने जांच करने की भी जहमत नहीं उठाई'
10वीं कक्षा में पढ़ने वाला चौथा नाबालिग आरोपी 16 साल का है. वह, तावड़ू में मजदूरी करने वाले नाबालिग का दोस्त है. सदर पुलिस ने उसके खिलाफ भी बाकियों जैसा ही मुकदमा दर्ज किया.
गिरफ्तारी के लगभग दो सप्ताह के बाद, 14 अगस्त को नूंह की जिला अदालत ने उसे नाबालिग माना.
लेकिन इस दौरान उसे दो दिन पुलिस हिरासत और 11 दिन सलंबा जेल में न्यायिक हिरासत में बिताने पड़े.
31 जुलाई को जब नूंह में हिंसा हुई तो तावड़ू में मजदूरी करने वाला नाबालिग दोस्त इसके घर पर ही रुक गया.
16 साल के आरोपी नाबलिग की मां बताती हैं कि पुलिस करीब चार बजे सुबह उनके घर में दाखिल हो गई. वो आरोप लगाती हैं कि पुलिस ने घर में मौजूद दोनों नाबालिगों के साथ बुरा व्यवहार किया और मारपीट भी की. इसके अलावा पुलिस ने उनके तीन अन्य बेटों और पति को भी गिरफ्तार कर लिया.
वो कहती हैं, "उन्होंने (पुलिस) यह जांचने की भी परवाह भी नहीं की कि पांच में से दो नाबालिग हैं."
सदर पुलिस थाने के एसएचओ कृष्ण कुमार से जब दो एफआईआर में तीन नाबालिगों की गिरफ्तारी को लेकर पुलिस द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया के बारे में पूछा गया तो उन्होंने फोन कॉल काट दिया.
इन्हें कानूनी सहायता मुहैया कराने वाले एक वकील ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "पुलिस ने कई नाबालिगों को वयस्कों के तौर पर गिरफ्तार किया है. लेकिन उनमें से सभी आरोपी अपने जन्म प्रमाण पत्र नहीं दे सकते. इन लोगों को पुलिस हिरासत में बुरी तरह से पीटा जा रहा है."
नूंह जिला अदालत में प्रैक्टिस करने वाले वकील अजीज अख्तर कहते हैं, "जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का पालन करना पुलिस का कर्तव्य है. वे नहीं समझते हैं कि पुलिस के ऐसे रवैये के कारण लंबे वक्त तक बच्चों को नुकसान पहुंचता है."
"वयस्कों की जेल नाबालिग आरोपियों के लिए सुरक्षित जगह नहीं है, क्योंकि यहां वे गंभीर अपराधियों के संपर्क में आते हैं. जिससे कि भविष्य में उनके गंभीर अपराधी बनने का खतरा और बढ़ जाता है. साथ ही इस सबके चलते जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत नाबालिगों के सुधरने की व्यवस्था में भी रुकावटें आती हैं."
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सदस्य सुदेश गर्ग इन मामलों को लेकर कहते हैं, "यह जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का स्पष्ट उल्लंघन है क्योंकि गिरफ्तारी के समय पुलिस आरोपियों की उम्र की तफ्तीश करने के लिए बाध्य है, लेकिन इस एक्ट को लेकर वे (पुलिस) पर्याप्त संवेदनशील नहीं हैं."
वे आगे बताते हैं, "मेवात हिंसा के मामलों में ही नहीं, बल्कि अन्य मामलों में हमने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का पालन नहीं करने पर कई बार पुलिस को फटकारा है."
सुदेश गर्ग का कहते हैं कि आयु सत्यापन दस्तावेज को जुटाना पुलिस की जिम्मेदारी है. वे कहते हैं, "अगर वे (पुलिस) ऐसा नहीं करते हैं तो अदालत को पता नहीं चलेगा कि वे नाबालिग हैं या नहीं."
नूंह के एसपी नरेंद्र बिजारनिया ऐसे आरोपों से इंकार करते हैं कि पुलिस ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के प्रावधानों का पालन नहीं किया है.
वे कहते हैं, “सभी प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है. कुछ आरोपियों के परिवार अपने आप को बचाने की नीयत से ऐसा कर रहे हैं. सभी आरोपियों को जांच के बाद गिरफ्तार किया गया है.”
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