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बिहार के लीची किसानों पर पड़ रही जलवायु परिवर्तन की मार
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मुशहरी ब्लॉक में पड़ने वाले मणिका गांव के किसान राजीव रंजन की 10 हेक्टेयर जमीन में लीची का बगीचा लगा है. लेकिन इस साल बारिश नहीं होने और अप्रैल में अधिक गर्मी पड़ने से उनकी फसल को काफी नुकसान हुआ है. मुजफ्फरपुर जिले के हजारों दूसरे किसानों की तरह राजीव रंजन कई दूसरी फसलों की खेती करते हैं, लेकिन लीची उनके परिवार की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है.
राजीव कहते हैं, ‘इस साल शाही लीची की फसल 70 प्रतिशत तक ठीक है, पर चाईना लीची की फसल 20 से 25 प्रतिशत ही ठीक है.’ इसकी वजह बताते हुए वे कहते हैं कि इस बार गर्मी के मौसम में समय पर पानी बारिश नहीं हुई, अब हुई है (25 मई के आसपास ) तो थोड़ी राहत है. वे कहते हैं कि मार्च अंत या अप्रैल के शुरू में बारिश हो जाए तो लीची की फसल के लिए अच्छा होता है और इस तरह पूरी फसल तैयार होने के दौरान तीन बार बारिश हो जाए तो ठीक रहता है.
राजीव के अनुसार, लीची की फसल को 37 डिग्री सेल्सियस के आसपास का अधिकतम तापमान चाहिए, अगर इससे अधिक तापमान होता है तो फल फटने लगता है. वे कहते हैं, “पहले इस इलाके का मौसम लीची की फसल के लिए ठीक था, लेकिन साल 2000 के बाद से स्थितियां बदली हैं.”
वहीं, मुजफ्फरपुर जिले के बांदरा ब्लॉक की सिमरा ग्राम पंचायत के 60 वर्षीय वीरेंद्र कुशवाहा 120 एकड़ जमीन पर लीज पर लीची की पैदावार करते हैं. वे दो साल से सात साल तक के लिए किसी किसान का बगीचा लीज पर लेते हैं और लीची की फसल तैयार होने व उसे बाजार तक पहुंचाने का काम खुद करते हैं. उन्होंने इसके लिए अन्य राज्यों में अपना एक नेटवर्क तैयार किया है. वीरेंद्र ज्यादातर ऐसे लोगों का बगीचा लीज पर लेते हैं, जिनका परिवार दिल्ली, पटना या किसी महानगर में रहता है और उनके पास खेतीबाड़ी के लिए वक्त नहीं है.
वीरेंद्र के साथ लीची की तोड़ाई से लेकर पैकेजिंग व मार्केटिंग तक के काम में करीब 500 लोग जुड़े हुए हैं. उनके द्वारा तैयार लीची देश के अलग–अलग महानगरों के अलावा विदेशों में भी निर्यात की जाती है.
वीरेंद्र लीची की खेती के बारे में बात करते हुए कहते हैं, “लीची की खेती प्रमुख रूप से पश्चिम बंगाल के माजदिया, कालियाचक व कृष्णानगर इलाके, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले व उसके आसपास के कुछ जिलों व पंजाब के पठानकोट में होती है.” उनके के अनुसार, पश्चिम बंगाल में लीची का समय 15 अप्रैल से 15 मई तक, बिहार में 15 मई से 15 जून तक और पंजाब में 15 जून से 15 जुलाई तक है.
कुशवाहा कहते हैं कि जो स्वाद मुजफ्फरपुर की शाही लीची का है, वह किसी और लीची का नहीं, वह रोज सेंटेड होता है और यहां की काली दोमट मिट्टी उसकी खेती के अनुकूल है. बिहार के मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और वैशाली जिले में होने वाली शाही लीची को जीआइ टैग मिला हुआ है.
जलवायु परिवर्तन से कैसे जूझ रही है लीची की खेती
मुजफ्फरपुर स्थित लीची अनुसंधान केंद्र में वैज्ञानिक अंकित कुमार ने कहा, “जलवायु परिवर्तन लीची की फसल और किसानों की आय को प्रभावित कर रहा है और इससे निपटने के तरीकों पर हम काम कर रहे हैं. 40 डिग्री सेंटीग्रेट या उससे अधिक तापमान पर लीची का फल फटने लगता है, इस साल इस फसल को लेकर यह हमारी सबसे बड़ी चिंता रही, इसके साथ ही पछुआ हवा से भी फल फटता है.”
मुजफ्फरपुर के तापमान का ग्राफ बताता है कि अप्रैल 2023 में 19 अप्रैल से 27 अप्रैल तक लगातार नौ दिन अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर रहा. जबकि 12 अलग–अलग दिनों में तापमान 37 डिग्री सेल्सियस से 40 डिग्री सेल्सियस के बीच रहा.
अंकित कहते हैं, “ऐसे में लीची की खेती में तापमान नियंत्रण की तकनीक को अपनाना आवश्यक है. इसके लिए स्प्रिंकलर करना और क्लाइमेट स्मार्ट तकनीक को अपनाना जरूरी है, जिसमें मृदा में नमी बनाए रखने के लिए लीची के पेड़ की जड़ के आसपास मल्चिंग की जाती है.” उनके अनुसार, किसान अगर व्यापारी को एक साल के लीच का बगीचा लीज पर दे देता तो उससे भी नुकसान होता है, क्योंकि व्यापारी का ध्यान सिर्फ एक सीजन की फसल पर होता है और वह पेड़ का रख–रखाव ठीक से नहीं करता, जो व्यापारी लंबे समय के लिए बगीचा लेते हैं, वे उसके रख–रखाव का ख्याल रखते हैं.
अंकित कहते हैं, “लीची आम की तरह गहरी जड़ वाली फसल नहीं है, इसलिए वह जमीन के बहुत नीचे से पानी और पोषण हासिल नहीं कर सकती, इसलिए उसे अच्छे से पोषण और पानी चाहिए.”
बिहार लीची उत्पादक संघ के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह कहते हैं कि अप्रैल में लगातार 10 दिन तीव्र गर्मी पड़ने व अत्यधिक तापमान की वजह से शाही लीची की फसल 60 प्रतिशत तक ही ठीक स्थिति में है, जबकि चाईना लीची को अधिक नुकसान की आशंका है.
बिहार बागवानी मिशन के संयुक्त निदेशक राधा रमन से मोंगाबे हिंदी ने पूछा कि जलवायु परिवर्तन से लीची की फसल के बचाव के लिए सरकार के स्तर पर क्या उपाय किए जा रहे हैं. इसके जवाब में उन्होंने कहा, “हम 90 प्रतिशत अनुदान पर ड्रिप स्प्रिंकलर किसानों को प्रदान करते हैं, वे इसका लाभ ले सकते हैं.”
वहीं, समस्तीपुर के पूसा स्थित डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन क्लाइमेट चेंज के प्रमुख डॉ रत्नेश झा ने कहा, “जलवायु परिवर्तन से लीची के बचाव को लेकर अब तक हम फोकस से काम शुरू नहीं कर सके हैं, हमारा काम अभी अनाज आदि पर केंद्रित है. विश्वविद्यालय से मिली जानकारी के अनुसार, निकट भविष्य में इस पर काम करने की योजना है.”
समस्तीपुर के रोसड़ा के प्रगतिशील किसान सुधांशु कहते हैं, “लीची की फसल गर्म हवा से, गर्मी से प्रभावित होती है. लीची की फसल अपने साथ नमी को बनाए नहीं रख सकती है, इसलिए किसानों को नमी बनाए रखने के उपाय करने चाहिए और सरकार की योजनाओं का लाभ लेना चाहिए, अगर किसान ऐसा नहीं करते तो यह उनकी गलती है.”
अंकित यह भी बताते हैं कि लीची भारत में बहुत पुरानी फसल नहीं है, यहां इसका इतिहास 300 साल पुराना है. पहले चीन से होते हुए पूर्वोत्तर में इसकी खेती हुई फिर वहां से यह फल बिहार आया और यहां की मिट्टी इस फसल के अनुकूल होने की वजह से यहां इसकी खेती बड़े पैमाने पर होने लगी. मुजफ्फरपुर की मिट्टी में माइक्रो रायजा नाम का एक प्रकार का कवक होता है, जो पौधों को पोषण तत्वों के अवशोषण में मदद करता है.
लीची का कारोबार और चुनौतियां
लीची एक छोटी अवधि की फसल होती है. अलग–अलग क्षेत्र में यह एक से डेढ महीने में खत्म हो जाती है. साथ ही लीची बहुत नाजुक फल होता है, जो बहुत कम समय में खराब होने लगता है, जिसे कृषि विज्ञान की भाषा में इसकी ‘शेल्फ लाइफ’ कम होना कहा जाता है. अगर फल की सही ढंग से पैकेजिंग नहीं हो पाती है और बाहर भेजने के लिए तेज़ यातायात की सुविधा न हो तो यह कारोबार चुनौतियों भरा होता है. इससे इस फसल से जुड़े किसानों अैर व्यापारियों को नुकसान होता है. अफसोस यह है कि बिहार में उसकी पैकेजिंग पर बहुत कम काम हो पाया है और ट्रांसपोर्टेशन की सुविधा भी बेहतर सुविधा नहीं है.
बिहार लीची उत्पादक संघ (लीची ग्रोवर एसोसिएशन ऑफ बिहार) के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह ने कहा, “बिहार में लीची का 400 से 500 करोड़ रुपये (अनुमानित) का सालाना कारोबार होता है, इसमें 20 प्रतिशत ही स्थानीय स्तर पर खपत होती है, 80 प्रतिशत फल बाहर भेजा जाता है, लेकिन इस नाजुक फसल की पैकेजिंग के लिए कोई ढंग का काम अबतक नहीं हो सका है, जबकि हमारे यहां की शाही लीची जीआइ टैग वाली कमोडिटी है.”
वह बताते हैं कि कुछ समय पूर्व भागलपुर के सबौर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ डीआर सिंह ने एक कॉन्फ्रेंस के दौरान इस दिशा में पहल की है. बच्चा प्रसाद सिंह के अनुसार, वे भी उस कान्फ्रेंस में शामिल हुए थे और उस दौरान कुलपति ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग के अधिकारियों से लीची की पैकेजिंग के लिए डिजाइन तैयार करने को कहा, साथ ही उन्होंने प्रमेाशन में सहयोग का भी आश्वासन दिया है.
लीची अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक अंकित कुमार भी कहते हैं कि लीची एक से दो दिन में खराब होने लगता है, इसलिए इसके ट्रांसपोर्ट एवं पैकेजिंग की चुनौती है. अंकित कहते हैं, “हम बेहतर पैकेजिंग तकनीक पर काम कर रहे हैं.”
बच्चा प्रसाद सिंह कहते हैं कि लीची को तेजी से पहुंचाने के लिए विमान सेवा चाहिए, पर जगह नहीं मिलती है. पिछले साल दरभंगा एयरपोर्ट से काफी लीची बाहर भेजी गई थी, लेकिन इस साल विमान में जगह नहीं मिल रही है. उनके अनुसार, दरभंगा व पटना एयरपोर्ट से देश के अन्य राज्यों में लीची भेजी जाती है, जबकि विदेश भेजने के लिए वाराणसी एयरपोर्ट का सहारा लिया जाता है.
लीची का कारोबार कितना बड़ा, कितने लोग निर्भर
बच्चा प्रसाद सिंह के अनुसार, बिहार में अकेले मुजफ्फरपुर जिले में 12 हजार हेक्टेयर भूमि पर लीची की खेती होती है और बिहार में लीची का वार्षिक उत्पादन तीन लाख टन है और 400 से 500 करोड़ रुपये अनुमानित का इसका कारोबार है. उनका दावा है कि लीची उत्तर बिहार की सबसे बड़ी व्यावसायिक फसल है और करीब एक लाख लोग इसकी खेती से जुड़े हैं.
लीची पर आजीविका के लिए किसान व व्यापारी के अलावा बड़ी संख्या में मजदूर निर्भर हैं, जो उसकी तोड़ाई करते हैं और फिर उसका गुच्छा बनाकर पैकेजिंग करते हैं. जाहिर सी बात है कि नाजुक फसल होने के कारण उसका गुच्छा बनाना कौशल का काम है. हालांकि, तोड़ाई करने वाले मजदूरों को रोजाना 400 रुपये की जबकि गुच्छा बनाने वालों को 150 रुपये प्रति दिन की मजदूरी मिलती है. गुच्छा बनाने का काम ज्यादातर महिलाएं करती हैं.
बिहार बागवानी निदेशालय में संयुक्त निदेशक राधा रमन ने कहा, “बिहार में 36 हजार 673 हेक्टेयर भूमि पर लीची की खेती होती है और करीब तीन लाख टन लीची का हर साल उत्पादन होता है, जिसमें 80 प्रतिशत हिस्सेदारी शाही लीची की होती है.”
राधा रमन कहते हैं, “किसानों को व्यापारी मिल सकें, इसके लिए हम उनकी मुलाकात करवाते हैं. रेलवे से हम उसकी ढुलाई के लिए पत्राचार करते हैं, दरभंगा एयरपोर्ट पर कारगो सुविधा उपलब्ध हो इसके लिए कोशिशें की जा रही हैं, वहां एक पैक हाउस भी बन रहा है.”
पूसा कृषि विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ एग्री बिजनेस एंड रूरल मैनेजमेंट के डायरेक्टर डॉ राम दत्त ने कहा, “लीची की शेल्फ लाइफ बहुत कम होती है, इसके लिए इसकी मार्केटिंग के लिए वैल्यू चेन बहुत जरूरी है.
(साभार- MONGABAY हिंदी)
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