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खत्म होते रोजगार और गिरती गुणवत्ता: भारत में फोटोजर्नलिज़्म की चुनौतियां
क्या आपको वो तस्वीर याद है जिसमें कोविड लॉकडाउन के समय दिल्ली में पैदल चलने वालों पर सरकारी अधिकारी सैनिटाइजर छिड़क रहे थे? जहां एक ओर यह तस्वीर कोविड संकट से निपटने की सरकार की कोशिशों की रिपोर्टिंग का हिस्सा बन गई, वहीं यह तस्वीर लेने वाले फोटोजर्नलिस्ट पर महामारी का क्या प्रभाव पड़ा, इसपर मीडिया का ध्यान कम ही गया.
अप्रैल 2020 में यह तस्वीर लेने वाले 41 वर्षीय के आसिफ तब इंडिया टुडे ग्रुप के मेल टुडे के लिए काम कर रहे थे. कुछ महीनों बाद कथित रूप से महामारी के कारण ही मेल टुडे को बंद कर दिया गया. आसिफ की नौकरी चली गई और गुजारा चलाना भी मुश्किल हो गया.
"मैंने बहुत जोखिम उठाए थे. मुझे पीपीई किट और डबल मास्क पहनना पड़ता था और बार-बार अपने कैमरे और उपकरणों को सैनिटाइज करना पड़ता था,” आसिफ ने उस तस्वीर का जिक्र करते हुए कहा. आसिफ की वह फोटो ऑल इंडिया वर्किंग न्यूज़ कैमरामैन एसोसिएशन द्वारा आयोजित 'द बिग पिक्चर' प्रदर्शनी में 250 तस्वीरों के बीच प्रदर्शित की गई थी. प्रदर्शनी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 21 अप्रैल से 2 मई के बीच आयोजित की गई.
आसिफ ने कहा, "वह कठिन समय था. लेकिन अब फ्रीलांसर के तौर पर उससे कहीं अधिक कमा लेता हूं जितना किसी संस्था में काम करते हुए कमाता था. छाया-पत्रकारों की वित्तीय स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण है. वे महत्वपूर्ण तस्वीरें लेने में अपना जीवन जोखिम में डालते हैं, फिर भी उन्हें उनकी संस्था से अक्सर वह पहचान या समर्थन नहीं मिलता है जिसके वे हकदार हैं."
यह सिर्फ आसिफ की कहानी नहीं है. प्रदर्शनी में उपस्थित पत्रकारों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि मुख्यधारा के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में फोटोजर्नलिज़्म के अवसर काफी कम हो गए हैं. मीडिया संस्थानों में काम करने वाले छाया-पत्रकारों को अक्सर कम वेतन मिलता है, जिसके परिणामस्वरूप कई फोटोजर्नलिस्ट अब फ्रीलांस का रुख कर रहे हैं.
बेहतर कैमरे और उपकरणों के अलावा अपने काम को प्रदर्शित करने के लिए सोशल मीडिया और प्रदर्शनियों की बढ़ती उपलब्धता के बावजूद, अनुभवी फोटोग्राफरों को लगता है कि यह उद्योग अपने पतन की राह पर है.
"फोटोजर्नलिज़्म मर रहा है," डब्ल्यूएनसीए के अध्यक्ष एसएन सिन्हा ने प्रदर्शनी में तस्वीरों को देखते हुए कहा. "फोन में कैमरा आ जाने के बाद पत्रकार रिपोर्टिंग के साथ-साथ फोटोग्राफी भी करने लगे. इसकी वजह से प्रकाशित होने वाली तस्वीरों की संख्या में काफी गिरावट आई है. उनकी गुणवत्ता भी कम हुई है. अक्सर पत्रकार दूसरे प्रकाशनों से फोटो ले लेते हैं, जिसकी वजह से फोटोजर्नलिस्ट की नौकरियां खत्म हो रही हैं."
1970 के दशक में फोटोजर्नलिस्ट के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले सिन्हा 2006 तक हिंदुस्तान टाइम्स के साथ थे. उन्होंने कहा, "हालांकि सोशल मीडिया फोटोग्राफरों को एक मंच प्रदान करता है, लेकिन केवल ऑनलाइन तस्वीरें पोस्ट करके आजीविका चलाना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर तेजी से घट रहे हैं."
एक और अनुभवी फोटोग्राफर और प्रदर्शनी के आयोजक मनीष सहरावत ने कहा कि भले ही आज उन्नत टेक्नोलॉजी के कारण फोटोग्राफरों के पास अपने काम को दुनिया भर में प्रदर्शित करने के बेहतरीन अवसर हैं, लेकिन मीडिया घरानों, विशेष रूप से समाचार पत्रों में उनकी जो जगह थी वह बहुत कम हो गई है.
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ फोटोग्राफी में अस्सिटेंट प्रोफेसर सहरावत ने कहा, "फ्रंटलाइन जैसी कुछ पत्रिकाएं ही आजकल फोटो-लेख के लिए एक निश्चित कॉलम रखती हैं."
एनडीटीवी की फोटो और वीडियो पत्रकार पूजा आर्या ने कहा, "फोटोग्राफी अधिक सुलभ होती जा रही है. भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फोटोजर्नलिज़्म में शानदार काम किया जा रहा है." आर्या की एक एसिड अटैक सर्वाइवर को दर्शाती हुई तस्वीरें प्रदर्शनी में प्रदर्शित की गई थीं.
हालांकि, उन्होंने भी सिन्हा और सहरावत की बातों का समर्थन किया कि फोटोग्राफरों और वीडियोग्राफरों को अक्सर टीवी एंकरों और पत्रकारों की तुलना में उतना श्रेय नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं, जबकि उनका काम भी महत्वपूर्ण और अक्सर हमेशा के लिए होता है. उन्होंने कहा, "कुछ तस्वीरें हमेशा लोगों के जेहन में रहेंगी, जैसे रघु राय द्वारा भोपाल गैस त्रासदी के बाद ली गई रेत में दबे एक बच्चे के सिर की वह बहुचर्चित तस्वीर."
उन्होंने माना कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से उत्पन्न छवियों में वृद्धि हुई है, लेकिन उन्हें नहीं पता कि उनका पत्रकारों पर कितना प्रभाव होगा.
मदर टेरेसा, राजीव गांधी और इंदिरा गांधी जैसी हस्तियों की तस्वीरें लेने वाले वरिष्ठ पत्रकार वी राजगोपाल की तस्वीरें भी प्रदर्शनी में लगाई गईं थीं. "1990 के दशक में जब मैं काम करता था, तब के मुकाबले अब अखबारों में मुश्किल से ही फोटोजर्नलिस्ट बचे हैं," उन्होंने कहा.
एक राजनीतिक फोटोजर्नलिस्ट के रूप में अपने अनुभव को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उनके सामने सीमित उपकरणों के साथ काम करने की चुनौतियां थीं, लेकिन "राजनेता तब अधिक सुलभ और मित्रवत थे, जिससे अधिक अंतरंग और सहज क्षणों को कैमरे में कैद किया जा सकता था."
काम के दौरान जोखिमों के बारे में बात करते हुए एक अन्य पत्रकार ने कहा, "इसमें हमेशा जोखिम होता है, लेकिन किसी न किसी को तो यह करना पड़ेगा."
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