Media
ईयू-डिसइन्फोलैब की पड़ताल: “एएनआई के तमाम सोर्सेस फर्जी हैं”
यूरोपीय संघ (ईयू) के एक नॉन-प्रॉफिट समूह ईयू-डिसइन्फोलैब ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि भारतीय समाचार एजेंसी एएनआई ऐसे स्रोतों के हवाले से खबरें चलाता रहा है जो मौजूद ही नहीं हैं. रिपोर्ट कहती है, "एएनआई बार-बार एक थिंक टैंक का हवाला देता रहा है जो 2014 में ही भंग कर दिया गया था, और फिलहाल अस्तित्व में नहीं है." रिपोर्ट के मुताबिक एएनआई एक पत्रकार, कई ब्लॉगर्स और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का हवाला देती रही है, जो मौजूद ही नहीं हैं.
इससे पहले, 2019 में डिसइन्फोलैब ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि उसे फर्जी समाचारों और लॉबी वेबसाइटों का एक नेटवर्क मिला, जो विदेश में भारतीय हितों को बढ़ावा देने का काम करता था. रिपोर्ट में दावा किया गया था कि 65 देशों में कम से कम 265 स्थानीय नकली मीडिया आउटलेट मौजूद थे, जिन्हें एक "इंडियन इन्फ्लुएंस नेटवर्क" द्वारा संचालित किया जाता था. साथ ही रिपोर्ट यह भी दावा करती थी कि 2019 में कश्मीर का दौरा करने वाले यूरोपीय संसद के सदस्यों के समूह को दिल्ली स्थित एक ’थिंक टैंक’, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ नॉन-अलाइंड स्टडीज (आईआईएनएस) द्वारा प्रायोजित किया गया था, जिसके दिल्ली स्थित श्रीवास्तव समूह के साथ संबंध थे.
2020 में, डिसइन्फोलैब ने इस सीरीज की दूसरी खोजी रिपोर्ट जारी की, जिसमें पिछली जांच का दायरा और बढ़ाया गया था. रिपोर्ट में किए गए दावे के अनुसार 15 वर्षों से बड़े पैमाने पर ऑनलाइन और ऑफलाइन, भारतीय हितों का समर्थन करने और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने वाले ऑपरेशन चलाए जा रहे थे. रिपोर्ट में यह दावा भी किया गया कि यह सारा दुष्प्रचार “श्रीवास्तव समूह के नेतृत्व में था, और इन प्रयासों को समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा फैलाया गया था."
डिसइन्फोलैब ने आज सुबह 'बैड सोर्सेस' के नाम से अपनी तीसरी रिपोर्ट जारी की, जिसमें उन्होंने सालों से विभिन्न एएनआई रिपोर्ट्स में दर्ज और कोट किए गए सूत्रों की जांच की है. इन स्रोतों के तार तथाकथित 'थिंक-टैंक', इंटरनेशनल फोरम फॉर राइट्स एंड सिक्योरिटी (IFFRAS) और पॉलिसी रिसर्च ग्रुप (POREG) से जुड़े हैं, जो श्रीवास्तव समूह से जुड़े हैं. इनका खुलासा डिसइन्फोलैब द्वारा पिछली रिपोर्ट में किया गया था.
डिसइन्फोलैब इस नई रिपोर्ट में कहता है, "एएनआई और उनको पुनर्प्रकाशित करने वाले मीडिया संस्थानों के अलावा, किसी भी अन्य स्थापित मीडिया ने इन स्रोतों द्वारा जारी रिपोर्ट्स को कवर नहीं किया है." समूह यह भी दावा करता है कि एक समाचार एजेंसी के रूप में एएनआई, म्यूनिख चार्टर के मूल सिद्धांतों का पालन न करके अपने पाठकों के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने में विफल रहा है. म्यूनिख चार्टर पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अधिकारों और कर्तव्यों का खाका खींचता है.
एएनआई द्वारा हवाला दिए इन स्रोतों की गहरी जांच की वजह बताते हुए डिसइन्फोलैब ने कहा कि एक समाचार एजेंसी होने के साथ ही एएनआई अन्य व्यापक रूप से पढ़े जाने वाले समाचार संस्थानों के लिए सूचना स्रोत का काम करती है. इस कारण इसके दुष्प्रचार और दावों का प्रसार कई गुना बढ़ जाता है.
गौरतलब है कि एएनआई भारत की प्रमुख वीडियो वायर एजेंसी है. इसकी फीड और खबरों को देशभर के छोटे-बड़े मीडिया संस्थान सब्सक्राइब करते हैं. ऐसे में इसकी कोई भी खबर देखते ही देखते पूरे देश में फैल जाती है. इस लिहाज से फर्जी स्रोतों के आधार पर गढ़ी गई प्रोपगैंडा खबरों का दायरा भी तेजी से फैलने का खतरा रहता है.
रिपोर्ट के अनुसार IFFRAS की अनेकों फर्जी गोष्ठियों में नामित वक्ताओं की खोजबीन करने पर यह बात सामने आई कि 70 से ज्यादा वक्ताओं का कोई अस्तित्व ही नहीं है. संवाददाता इस तरफ भी ध्यान खींचते हैं कि थिंक टैंक होते हुए भी यह कथित संस्थान सोशल मीडिया पर अन्य जाने-माने थिंक टैंक के मुकाबले बेहद कम सक्रिय हैं, और शायद "IFFRAS का ऑनलाइन सामग्री डालने की इकलौती वजह उसे एएनआई द्वारा कवर किया जाना ही है, जिससे कि यह सामग्री बड़े स्तर पर भारत के मीडिया संस्थानों के जरिए आम लोगों तक पहुंच सके."
रिपोर्ट एक हास्यास्पद तथ्य की तरफ भी ध्यान खींचती है, जो इन स्रोतों के फर्जी होने के दावे को पुष्ट करता है. रिपोर्ट के अनुसार कोट किए गए बहुत से कथित विशेषज्ञों के नाम कई बार गलत लिखे हुए होते हैं, जिसको लेकर किसी भी विशेषज्ञ ने कभी आपत्ति नहीं जतायी. जो कि हैरानी की बात है और शायद इन स्रोतों के फर्जी होने का एक प्रमाण भी है.
रिपोर्ट बताती है कि मई, 2021 से जनवरी, 2023 के बीच न्यूज़ एजेंसी एएनआई ने अपनी खबरों में IFFRAS का 200 से ज्यादा बार हवाला दिया है. बहुत सी खबरें तो केवल इसकी जानकारी को आधार बनाकर ही लिखी गई हैं.
डिसइन्फोलैब की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने एएनआई की वेबसाइट से कई विशेषज्ञों पत्रकार और ब्लॉगर्स के नाम उठाकर उनकी पृष्ठभूमि जानने और उनसे संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे. इनमें से कइयों के संबंध कथित थिंक टैंक POREG से भी बताए गए थे.
डिसइन्फोलैब की पूरी रिपोर्ट ऐसे अनेकों उदाहरण सामने रखती है. रिपोर्ट इस बात पर गहरी चिंता जताती है कि पहले के खुलासों के बावजूद भी एएनआई लगातार इन फर्जी स्रोतों का इस्तेमाल बेधड़क कर रही है. इससे भारतीय पाठकों को गलत खबरें मिलने के साथ-साथ यूरोपीय संस्थानों का भी नाजायज इस्तेमाल हो रहा है. रिपोर्ट में एक संशय यह भी जताया गया है कि इन फर्जी हस्तियों को यूरोप या उत्तरी अमेरिका में स्थापित दिखाने के पीछे, शायद इन कथानकों को ज्यादा विश्वसनीयता देना है.
रिपोर्ट यूरोपियन यूनियन के प्रशासन और अधिकारियों को भी सालों से यह फर्जीवाड़ा जारी रहने देने और नजरअंदाज करने के लिए कटघरे में खड़ा करती है. डिसइन्फोलैब ने अपनी इस रिपोर्ट में यह उम्मीद भी जताई है कि यूरोपीय संघ इन गतिविधियों का संज्ञान लेगा और उन पर समुचित कार्रवाई करेगा, जिससे यूरोपीय संघ के संस्थानों का दुरुपयोग अन्य देशों की जनता को भ्रमित करने और प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए न किया जा सके.
Also Read
-
Everyone’s talking about the slap. What about the road?
-
As climate firm sells to Big Tech, a Gujarat grassland is left behind
-
‘Just declare that I’m not Indian’: Delhi’s SIR notices leave voters fed up and in despair
-
‘EC exposed, but no fresh ground to challenge SIR’: Lawyers on legal fallout of IE report
-
Karnataka’s new data centre policy puts water, energy in focus: What does it say?