Opinion
एंबुलेंस को रास्ता देता रोड शो और हमारा प्यारा लोकतंत्र
जैसे ही एक एंबुलेंस के लिए दुनिया का सबसे बड़ा रोड शो थोड़ी देर ठिठका, पूरी दुनिया एक बार के लिए सन्न रह गई. किसी देश के प्रधानमंत्री को आखिर क्या जरूरत थी, इतने सारे खर्चा पानी, भीड़ जुटाने, सजने - धजने, लाइट और कैमरा अपनी तरफ करने के बाद एक अस्पताल जाती एंबुलेंस के लिए रास्ता खाली करने की.
सबसे अजीब बात यह है कि कई लोग इसमें भी उनकी अदा, अवसरवाद, वोट प्रभावित करने की साजिश, आचार संहिता का उल्लंघन नहीं तो उससे छेड़छाड़ जैसी छिछोरी बातें देखने पर डटे हैं. और कोई पहली बार तो ये हुआ नहीं था. हिमाचल प्रदेश में भी प्रधानमंत्री ने एंबुलेंस को रास्ता दिया था. जीव दया, करुणा और मानवीयता का तकाजा है कि एंबुलेंस निकले तो उसे रास्ता दिया जाए.
अगर अहमदाबाद का वह रोड शो सूरत और सौराष्ट्र के आलसी और लोकशाही का कर्तव्य न निभाने वाले वोटरों को मतदान के लिए प्रेरित करने का था, तो भी यह संदेश ज्यादा बड़ा है कि मनुष्य का जीवन किसी भी मतलबी सियासत से बड़ा होता है. ये उस लंबे वाक्य के अल्प विराम की तरह था, जिससे उसका अर्थ तो वही रहता है, पर कहानी में एक ट्विस्ट के साथ. कई और अलंकार उसमें जुड़ जाते हैं. जिस आदमी का दिल ‘कुत्ते के गाड़ी के नीचे आने पर भी’ दुखता हो, यहां तो बात इंसान की थी. नरेंद्र भाई के लिए इंसानी जान की कीमत किसी भी और बात से बड़ी होती है, ये कौन नहीं जानता.
कुछ प्रतिद्वंद्वियों ने वीडियो दिखाकर कहा कि एंबुलेंस का आना पहले से फिक्स्ड था, और इसका कोई वीडियो भी दिखाया गया, पर किसी ने उसे तवज्जो देने लायक नहीं समझा. किसी और ने बताया कि एंबुलेंस तो और भी कई थीं, पर उन्हें रास्ता नहीं दिया गया. लोग जालिम थे, हर एक बात का ताना देते रहे. पर तब तक उस दिन का मतदान हो चुका था.
सबसे निखट्टू होमगार्ड को भी वैसे ये तो पता है कि ये कोई छोटी या ऐसी वैसी बात नहीं है कि काफिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हो और एक एंबुलेंस उसके बीच में अपना सायरन बजाती हुई आ जाए. प्रधानमंत्री की व्यवस्था बहुत ताबड़तोड़ होती है और सिक्योरिटी भी. जहां परिंदा भी पर न मार सके, वहां एक एंबुलेंस का यकायक प्रकट हो जाना और उसके लिये सारे सुरक्षा बंदोबस्त शिथिल कर देना ये भी किसी सस्ते और थिगड़े कागज पर छपने वाले जासूसी उपन्यासों के घटिया रोमांच से कम नहीं.
हालांकि ये ठीक से पता नहीं चल पाया, कि एंबुलेंस चला कौन चला रहा था? वह एंबुलेंस ड्राइवर कौन रहा होगा, जिसके आगे प्रधानमंत्री का जुलूस ठिठक जाए. उसके मोहल्ले, घर और विधानसभा क्षेत्र में कैसा अभिनंदन हुआ होगा? कितने सारे दूसरे एंबुलेंस ड्राइवर उसके यकायक रश्क करने लगे होंगे. कमाल की बात यह है कि उसके बारे में कोई ज्यादा जानकारी देखने पढ़ने को नहीं मिली. न ही उस मरीज के बारे में, उस अस्पताल के बारे में, उस मरीज को अटेंड करने वाले डॉक्टर के बारे में.
कहीं वह मरीज मुसलमान तो नहीं था? कहीं दंगा पीड़ित मुसलमान तो नहीं? कोई केजरीवाल या ओवैसी का समर्थक तो नहीं? कहीं बिलकीस बानो या वैसा कोई तो नहीं? कहीं मोरबी में पुल हादसे का कोई घायल तो नहीं? कहीं उसी पुल की मरम्मत और रखरखाव करने वाला फ़रार हो चुका सरकारी ठेकेदार तो नहीं? कहीं मिलावटी शराब पीकर जान की बाजी लगाने वाला कोई मजदूर तो नहीं? कहीं वह नरोदा पाटिया के उन गुनहगारों में से तो कोई नहीं, जिनमें से किसी एक की बेटी को पार्टी ने टिकट दिया हो? कहीं पार्टी का कोई बागी नेता तो नहीं?
आप कह सकते हैं, बात को इतना खींचने की क्या जरूरत है? पर जब पूरा खेल ही प्रतीकों और अवधारणा का है, तो लोकतंत्र में सबको शामिल करना पड़ता है. भले ही अवतार पुरूषों के आगे ये निरर्थक विषयांतर और बेतुके कुतर्क जान पड़ें.
लोग जान ही नहीं पाए कि उस मरीज की हालत कितनी खराब और नाज़ुक थी. उसका क्या हुआ? उसे कुछ हो जाता तो, ये किसी ने नहीं पूछा. कोई मिजाजपुर्सी के लिए न पहुंचा, न परिवार वालों की खैर खबर ली. एक तरफ नरेंद्र मोदी की इतनी मानवीय भंगिमा, दूसरी तरफ़ देश ने उस एंबुलेंस वाले के साथ भी वही किया, जो बाकी के साथ करता है. पीठ फेर ली.
थोड़ा और चौकन्ना होता तो मीडिया उन मतदाताओं का हाल लेता, जिन्होंने इस वाकये को लाइव देखने के बाद अपने वोट डालने या अपनी पसंद का फैसला बदला. एक रुके हुए चुनावी रोड शो और चलती हुई एंबुलेंस ने उन्हें इस कदर भाव विह्वल कर दिया और वे कातर मन से मतदान केंद्र की तरफ चलते बने. हालांकि प्रतिशत से ऐसा भी नहीं हुआ. बृहस्पतिवार को जिन लोगों को जिस पार्टी को वोट देना था, दिया, जिन्हें नहीं देना था, नहीं दिया.
उस एंबुलेंस से गुजरात की वह सारी थकान दूर हो गई, जो एक ही पार्टी के 27 साल तक सत्ता में बनी रहने के कारण होती है. सारी भूल चूक लेनी देनी माफ हो गई. बिना बात ही परेश रावल और अमित शाह चुनाव का हिंदू- मुसलमान करते रहे. बिना बात ही उन सरकारों को कोसना पड़ा जो 27 साल से पहले बना करती थी. जबकि सभी जान रहे हैं कि मोदी जी के होते हुए कोई और पार्टी कैसे सत्ता में आ सकती है. गुजरात में भारतीय जनता पार्टी को वोट देने वाली यह लगातार दूसरी पीढ़ी है.
कुछ पुराने ख्याल वाले लोगों ने गले खंखार के कहा कि ये ठीक नहीं है. रोड शो तब नहीं करना चाहिए जब मतदान चल रहा हो. पता नहीं किस नैतिकता की बात वे कर रहे हैं, अगर चुनाव के वक्त रोड शो नहीं होंगे तो आखिर कब होंगे. ऐसे ही जब बिहार में चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री के जनकपुर जाने और बंगाल में चुनाव के दौरान बांग्लादेश (दीमकों के देश!) जाकर एक मंदिर में मत्था टेकने की घटनाओं पर गले खंखार कर असहमतियां जताई गईं थी. हर शादी या तेरहवीं में कोई न कोई ऐसा होता ही है, जो विधि-विधान, परंपरा, पूजा पाठ को लेकर उंगली उठाता है. पर उनका प्रभाव हारे हुए जुआरियों की बद्दुआ से ज्यादा कुछ नहीं होता. मोदी जी से ज्यादा ये बात कोई नहीं जानता. वे एक गेम चेंजर हैं.
एंबुलेंस आई और चली गई. सारे कैमरे, सारी लाइट, सारी बहस मोदी जी पर ही अटक कर रह गये. रोशनी और कैमरों, ध्यान और केंद्र से वह सब बाहर है, जो भारत तो है, पर मोदी जी नहीं. जैसे धकियाए जाते मुसलमान, परेशान नौजवान, घटते रोजगार, डूबता रूपया, गिरती लोकतांत्रिक मूल्य, बढ़ता कुपोषण, मानवाधिकार, सामाजिक सौहार्द, जिनके बारे में दुनिया भर की रिपोर्टें भारत को लेकर चिंता जताती रही हैं, पर पीएम मोदी की लोकप्रियता और महत्व इस सबके बावजूद बढ़ा ही है.
एक लंबे वाक्य में (पढ़ें रोड शो!) जोड़ा गया हल्का सा अल्प विराम (पढ़ें एम्बुलेंस!) पूरे प्रसंग का संदर्भ बदल देता है. अब मेरे जैसे कुछ लोग एंबुलेंस के पीछे दौड़ेंगे, इतने में एक बेटा अपनी मां के साथ महंगे शॉल पहनकर आशीर्वाद लेने का फोटो खिंचवा कर आगे भी बढ़ चुका होगा. अगले दिन कोई और शिगूफा होगा. और उसका हांका भी. इस रोज के भेड़ियाधसान में धूल इतनी उड़ती रहेगी, कि सच न तो दिखलाई पड़ेगा, न उसकी किसी को परवाह होगी. वह कैमरे और रोशनी से बाहर ही रहेगा.
एक एंबुलेंस लोकतंत्र को वहां ले जा सकती है, जहां रोड शो नहीं ले जा सकता.
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