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खिलाड़ियों की कड़ी परीक्षा: ओलंपिक पर पड़ रही जलवायु परिवर्तन की मार
बढ़ते तापमान के साथ ही ओलंपिक खेलों पर मंडराता संकट और गहराता जा रहा है. तापमान में होती यह वृद्धि खिलाड़ियों की कड़ी परीक्षा ले रही है, साथ ही आयोजकों के लिए भी नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं. विशेष रूप से ऐसे खेल जिसमें बहुत ज्यादा शारीरिक श्रम और धीरज की जरूरत पड़ती है उन खेलों को लेकर कहीं ज्यादा चिंताएं हैं.
गौरतलब है कि हाल की कुछ प्रतियोगिताओं में भीषण गर्मी के चलते कई मैराथन धावक अपनी दौड़ से बाहर हो गए थे. हाल ही में इस बारे में किए एक नए अध्ययन से पता चला है कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन के चलते पहले से कहीं ज्यादा शहर इन खेलों की मेजबानी करने में असमर्थ होंगें.
इस बारे में जर्नल साइंटिफिक रिपोर्टस में एक नया शोध प्रकाशित हुआ है, जिसमें जलवायु परिवर्तन से जुड़े कारकों, अनुकूलन के लिए किए जा रहे उपायों और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर विचार करते हुए ओलंपिक मैराथन की व्यवहार्यता पर प्रकाश डाला गया है.
पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के चलते कहीं ज्यादा क्षेत्र ओलंपिक मैराथन की मेजबानी करने में कठिनाई का सामना करेंगें. वहीं यदि वर्तमान में संभावित मेजबानों के आधार पर देखें तो सदी के अंत तक इनकी संख्या 27 फीसदी तक घट जाएगी.
इतना ही नहीं शोध से यह भी पता चला है कि दर्जनों उभरते शहर विशेष रूप से एशिया में जो इन खेलों के संभावित मेजबान बनना चाहते हैं, वो भविष्य में उच्च उत्सर्जन परिदृश्य के तहत मैराथन की मेजबानी करने में सक्षम नहीं होंगे.
तापमान में हो चुकी है 1.59 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि
वहीं यदि तापमान में होती वृद्धि को देखें तो 1850 से 1900 की तुलना में 2011 से 20 के बीच वैश्विक तापमान में करीब 1.59 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है, जिसके इस सदी के अंत तक और बढ़ने की सम्भावना जताई जा रही है. यह बढ़ती गर्मी जीवों में तनाव का कारण बनती है जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकती है.
गौरतलब है कि 2016 में 170 करोड़ लोगों को कई दिनों तक भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा था. वहीं आंकड़े दर्शाते हैं कि 1991 से 2018 के बीच दुनिया भर में करीब 732 स्थानों पर गर्मी के कारण हुए 37 फीसदी मौतों के लिए कहीं न कहीं जलवायु में आता बदलाव ही जिम्मेवार था.
अनुमान है कि सदी के अंत तक यदि तापमान में 4.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो उसके चलते और 8.3 करोड़ लोग भीषण गर्मी का शिकार बन सकते हैं. ऐसे में इतनी भीषण गर्मी में ओलिंपिक खेलों में मैराथन का आयोजन उसमें भाग लेने वाले खिलाडियों के लिए कितना सुरक्षित है उसका अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं.
शोध के अनुसार यह स्पष्ट है कि बढ़ता तापमान और गर्मी विशेष रूप से बुजुर्गों और बच्चों के लिए खतरनाक है. इसके साथ ही बाहर खुले में होने वाले खेलों और प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा लेने वाले के लिए भी यह जोखिम पैदा कर सकती है. ऐसा ही कुछ 2014 में ऑस्ट्रेलियन ओपन के दौरान टेनिस मैचों में देखें को मिला था जब तापमान 43 डिग्री सेल्सियस पहुंचने पर इन खेलों को बंद कर दिया गया था.
इसी तरह 2019 में आयोजित होने वाली आईएएएफ विश्व चैंपियनशिप से 68 में से 40 महिला मैराथन धावकों ने अपना नाम वापस ले लिया था. गौरतलब है कि इस दौरान तापमान 33 डिग्री सेल्सियस और आद्रता 73 फीसदी पर पहुंच गई थी.
वहीं हाल ही में जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पनास) में प्रकाशित एक शोध के हवाले से पता चला है कि 1980 से भीषण गर्मी का सामना करने वालों का आंकड़ा तीन गुणा बढ़ चुका है. अनुमान है कि शहरी क्षेत्रों में बढ़ती गर्मी दुनिया की लगभग एक चौथाई और शहरों की 46 फीसदी आबादी को प्रभावित कर रही है.
इसी तरह ओलंपिक खेलों पर मंडराते जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर हाल ही में एक अन्य शोध जर्नल करंट इश्यूज इन टूरिज्म में प्रकाशित हुआ था. जिसके अनुसार जिस तरह से जलवायु में बदलाव आ रहा है उसके चलते शीतकालीन ओलंपिक खेलों पर व्यापक असर पड़ सकता है.
गौरतलब है कि इस बार बीजिंग विंटर ओलंपिक में पहली बार पूरी तरह कृत्रिम बर्फ का इस्तेमाल किया गया था, जो स्पष्ट तौर पर जलवायु परिवर्तन के असर को दर्शाता है जिसकी वजह से कहीं ज्यादा बर्फ पिघल रही है.
शोधकर्ताओं के मुताबिक जिस तरह से वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है उसका इन खेलों पर बहुत ज्यादा असर पड़ेगा. वहीं यदि हालात न बदले तो इसके कारण शीतकालीन खेलों का अस्तित्व पूरी तरह खत्म हो सकता है.
ऐसे में शोधकर्ताओं का मानना है कि मैराथन को अगस्त से अक्टूबर के बीच और देश के कई शहरों में आयोजित किया जाना मददगार हो सकता है. खिलाड़ियों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है ऐसे में यदि हमें इन खेलों की क्षेत्रीय विविधता को बनाए रखना है तो हमें इस समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा.
(साभार- डाउन टू अर्थ)
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