Report
60 लाख बच्चों पर मंडराया भूख का संकट: रिपोर्ट
पिछले डेढ़ साल के दौरान जब कोविड-19 महामारी ने लाखों बच्चों को भूखे रहने पर मजबूर कर दिया. इस तरह के साल 100 वर्षों में एक बार आते हैं, जबकि हर चार से सात साल में, अल नीनो के कारण उष्णकटिबंधीय इलाकों में मौसम का मिजाज बदल जाता है. जिसके चलते तापमान बढ़ता है है और बारिश के पैटर्न में बदलाव होता है. इस सबका कृषि, संक्रामक रोगों के फैलने, स्वास्थ्य आदि पर बहुत बुरा असर पड़ता है.
एक नए अध्ययन के मुताबिक एक इकलौते खतरनाक अल नीनो के दौरान, लगभग 60 लाख बच्चों में पोषण की कमी हो जाती है. जो कि कम से कम 70 प्रतिशत के बराबर है और महामारी के कारण भूखे रहने वाले बच्चों की संख्या का तीन गुना तक हो सकता है.
हैरिस स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में सहायक प्रोफेसर और अध्ययनकर्ता अमीर जीना कहते हैं दुनिया को एक महामारी के लिए तैयार करना बहुत मुश्किल होता है. लेकिन हम अल नीनो की घटनाओं के बारे में ऐसा नहीं कह सकते हैं जो बच्चों के विकास और स्वास्थ्य पर लंबे समय में बहुत अधिक प्रभाव डालते हैं.
वैज्ञानिक छह महीने पहले तक अल नीनो का पूर्वानुमान लगा सकते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सबसे बुरे प्रभावों को रोकने के लिए समय मिल जाता है. उन्होंने कहा कि यह अध्ययन खाद्य असुरक्षित क्षेत्रों में वैश्विक सार्वजनिक निवेश को बढ़ाने के लिए बच्चों के पोषण पर पड़ने वाले प्रभावों को मापने में मदद करता है.
जीना और उनके सहयोगी अध्ययनकर्ता, जेसी एंटिला-ह्यूजेस और गॉर्डन मैककॉर्ड ने दुनिया भर के उष्णकटिबंधीय इलाकों में बच्चों के पोषण पर अल नीनो के प्रभावों का पहला अनुमान लगाया हैं. उन्होंने चार दशकों से सभी विकासशील देशों के 10 लाख से अधिक बच्चों के आंकड़ों को इकट्ठा करके यह अनुमान लगाया है. यह एक ऐसा डेटासेट है जिसमें दुनिया भर के 60 करोड़ से अधिक पांच साल से कम की आबादी के लगभग आधे बच्चे शामिल हैं.
उनके विश्लेषण से पता चलता है कि गर्म, सूखे अल नीनो की स्थिति अधिकांश उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बच्चों में कुपोषण को बढ़ाती है. जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा 20 प्रतिशत बच्चों को पहले से ही गंभीर रूप से कम वजन वाला माना जाता है. अल नीनो वर्षों के दौरान यह अतिरिक्त 2.9 प्रतिशत तक बढ़ जाता है, जिससे लाखों बच्चे प्रभावित होते हैं.
2015 के खतरनाक अल नीनो के मामले में, कम वजन वाले बच्चों की संख्या में लगभग छह प्रतिशत की वृद्धि हुई है. कहा जा सकता है कि अतिरिक्त लगभग 60 लाख बच्चे भूखे हैं. जबकि बच्चों का वजन समय के साथ ठीक होने लगता है, कम उम्र में पोषण की कमी के चलते आने वाले जीवन में उनका विकास रुक जाता है.
सतत विकास लक्ष्यों के मुताबिक, दुनिया भर में लोग 2030 तक सभी तरह के कुपोषण को खत्म करने के लिए काम कर रहे हैं. जिसका अर्थ है कि हर साल लगभग 60 लाख बच्चों को भूख की गंभीर समस्या से निपटने की जरूरत पड़ेगी.
उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमारे पास 10 साल से भी कम का समय है, जबकि 2015 के अल नीनो ने एक साल की प्रगति को कम कर दिया है. अध्ययन में पाया गया है कि 2015 के अल नीनो के प्रभावों को दूर करने के लिए 13.4 करोड़ बच्चों को सूक्ष्म पोषक तत्वों की खुराक या 7.2 करोड़ भोजन से वंचित बच्चों को खाना प्रदान करने की जरूरत पड़ेगी.
यूसी सैन डिएगो स्कूल ऑफ़ ग्लोबल पालिसी एंड स्ट्रेटेजी के गॉर्डन मैककॉर्ड कहते हैं चूंकि वैज्ञानिक इस बात का महीनों पहले पूर्वानुमान लगा सकते हैं कि किन स्थानों पर सूखा पड़ने वाला है और किन स्थानों पर बाढ़ आने वाली है. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय लाखों बच्चों को कुपोषण के शिकार होने से रोकने के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर सकता है. यह एक वास्तविक त्रासदी है कि 21वीं सदी में भी इंसानों की आबादी का इतना बड़ा हिस्सा जलवायु से संबंधित समस्याओं से जूझ रहा है.
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि जलवायु परिवर्तन से अल नीनो की तीव्रता में वृद्धि होगी या नहीं, जलवायु परिवर्तन के कारण गर्म क्षेत्र गर्म हो जाएंगे और शुष्क क्षेत्र शुष्क हो जाएंगे. जब अल नीनो को इन समग्र पारियों के शीर्ष पर रखा जाता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि अल नीनो वर्षों के दौरान प्रभाव अभी की तुलना में अधिक खतरनाक होंगे. उदाहरण के लिए, जैसा कि क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के चलते फसलों की हानि की आशंका है, उन्हीं क्षेत्रों में अल नीनो वर्षों के दौरान और भी अधिक फसलों का नुकसान होगा.
सैन फ्रांसिस्को विश्वविद्यालय के जेसी एंटिला-ह्यूजेस कहते हैं कि ये जलवायु की नियमित घटनाएं हैं जो दुनिया भर में वास्तविक त्रासदी का कारण बनती हैं. अल नीनो का अध्ययन हमें उन प्रभावों के बारे में जानकारी दे सकता है जो एक गर्म, शुष्क जलवायु से आते हैं. चूंकि दुनिया भर में ये बदलाव जलवायु परिवर्तन के साथ बड़े पैमाने पर बढ़ जाते हैं. यह अध्ययन नेचर कम्युनिकेशंस नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.
लेकिन चिंता इस बात की है कि आने वाले कुछ साल अल नीनो के होते हैं, हमें इस बात की जानकारी पहले से ही होती है कि अल नीनो आ रहा है. हम तब भी उनसे निपटने के लिए कार्य नहीं करते हैं, यह ठीक नहीं है क्योंकि इनमें से कई जलवायु परिवर्तन अलग तरह की लू या हीट वेव से तूफान तक कुछ भी हो सकता है, जिसका जलवायु परिवर्तन के रूप में बहुत कम अनुमान लगाया गया है.
(साभार- डाउन टू अर्थ)
Also Read
-
The bigger story in Kashmir is the media’s silence on action against its own
-
‘How can you remove names without checking?’: Inside Prayagraj’s battle over voter lists
-
6 journalists summoned this month, ‘25’ in a year: The police trail following Kashmir’s press
-
Mark Carney calls out the rules-based global order lie, but only after it hurts middle powers
-
‘This is why he wanted to leave India’: Noida techie death raises civic safety questions