Opinion
सामाजिक विसंगतियों का बेबाक चिंतन है उपन्यास ‘नेपथ्य लीला’
पाश्चात्य चिंतक जॉनथन स्विफ्ट व्यंग्य के विषय में कहते थे, “व्यंग्य एक ऐसा दर्पण है जिसमें देखने वाले को अपने अतिरिक्त सभी का चेहरा दिखता है.” इस विधा का मुख्य उद्देश्य है, व्यक्ति और उसके सामाजिक संदर्भों में दिखने वाली किसी भी विसंगति पर कुठाराघात करना, भले ही यह संदर्भ, व्यक्ति और समाज के संबंध का हो सकता है, वर्ग और जाति के समीकरण का हो सकता है या विभिन्न विचारधाराओं के टकराव का.
हिंदी में व्यंग्य विधा से आज शायद ही कोई अपरिचित हो. आज भी व्यंग्य की परंपरा में हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल एवं ज्ञान चतुर्वेदी का नाम सम्मान से लिया जाता है. सच कहा जाए तो जिस विट और व्यंजना से लैस इन व्यंग्यकारों का रचना संसार रहा है उसकी झलक इससे आगे की पीढ़ी में बहुत कम दिखाई पड़ती है.
हिन्दी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी किसी भी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं. व्यंग्य विधा को अपने सुदृढ़ और आधुनिक रूप में खड़ा करने में ज्ञान चतुर्वेदी के योगदान को आलोचकों ने एक सिरे से स्वीकार किया है.
एक आधुनिक विधा के रूप में व्यंग्य की ख्याति 20वीं सदी में हुई. हिन्दी व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने में प्रमुख व्यंग्यकारों में ज्ञान चतुर्वेदी भी एक हैं. ज्ञान चतुर्वेदी के लेखन की शुरुआत 70 के दशक में 'धर्मयुग' से हुई. उनका पहला व्यंग्य उपन्यास 'नरक यात्रा' अत्यन्त चर्चित रहा, जो भारतीय चिकित्सा-शिक्षा और व्यवस्था पर था. इसके पश्चात् 'बारामासी', 'मरीचिका' और 'हम न मरब' जैसे उपन्यास आए. अब तक हजारों व्यंग्य रचनाओं के रचयिता ज्ञान चतुर्वेदी के कई व्यंग्य संग्रह 'प्रेत कथा', 'दंगे में मुर्गा', 'मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएं', 'बिसात बिछी हैं', 'खामोश! नंगे हमाम में हैं', 'प्रत्यंचा' ओर 'बाराखड़ी' इत्यादि प्रकाशित हो चुके हैं तथा व्यंग्य विधा को उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री सम्मान के साथ 'राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान' हिंदी अकादमी सम्मान', अन्तर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा-सम्मान (लन्दन) तथा 'चकल्लस पुरस्कार' एवं हाल ही में 'लमही सम्मान' के अलावा कई विशिष्ट सम्मान हासिल हो चुके हैं. ज्ञान चतुर्वेदी पेशे से चिकत्सक हैं.
इनकी रचनाओं में समाज में पाई जाने वाली सभी विसंगतियों का बेबाक चित्रण मिलता है. वे लम्बे अर्शे तक 'इंडिया टुडे' में व्यंग्य स्तंभ लिखते रहे हैं तथा 'नया ज्ञानोदय' में भी कई वर्षों तक नियमित स्तम्भ लिखा है. इसके अतिरिक्त 'राजस्थान पत्रिका' और 'लोकमत समाचार' दैनिक समाचर-पत्रों के लिए भी वे व्यंग्य स्तंभ लिखते रहे हैं.
ज्ञान चतुर्वेदी का यह छठा उपन्यास है- नेपथ्य लीला. लेखक ने बेहद बारीकी से इसमें खोखले आदर्शों की दुहाई देने वालों की असली मानसिकता को उजागर किया है. साथ ही वर्तमान समय में प्रेमियों के प्रेम और रिश्तों की यथार्थ के साथ प्रोन्नति पाने के लिए अनेक प्रकार के तिकड़म भिड़ाने वालों और सिफारिश करने वालों पर भी गंभीरता से कटाक्ष किया है. आधुनिक समय में प्रेमियों के मध्य पनपने वाला प्रेम कितना अल्पकालिक हो गया है, इसे भी उन्होंने रोचक तरीके से उकेरा है.
थोड़े शब्दों में गंभीर और बड़ी बात कह जाने में ज्ञान चतुर्वेदी का कौशल अद्भुत है. इसमें 51 छोटे-छोटे अध्याय हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं- मरने में जुगाड़, अपनी मार्केटिंग, अपना आदमी वहां बैठ जाए, बस इश्क में इंची टेप, साहित्य का अफसर, कमीशन की चमक, गांधीजी की गवाही, कानून का राज, राजा हंस रहा है, काव्य रस के व्यापारी, जानलेवा समृद्धि, जय बोलने से पहले, अजीब शहर है यह, कौन जाति के हो भाई, भूख है कि मिटती ही नहीं और पथरीली आचार संहिता. सत्ता के गलियारों में अपनी पैठ बनाए रखने के लिए लालायित भ्रष्ट नेताओं, घूसखोरी में डूबे बेईमानों और इनके सामने लचर होती कानून व्यवस्था पर करारा प्रहार इस पुस्तक की विशेषता है.
हमारे आसपास एक तरह की हताशा चारों तरफ़ नजर आ रही है. यह मोहभंग का भी दौर है. अपने उपन्यास में ऐसे निराशा भरे महौल में उन्होंने समाज की विसंगतियों को चुटीली शैली में सामने लाया है. उपन्यास 'नेपथ्य लीला' के केंद्र बिंदु में बाजार है और बाजार के केंद्रबिंदु में हम. बाजार हमें किस तरह से बदलता है. तोड़ता-मरोड़ता है, इन्हीं बातों को लेखक एक धागे में पिरोता है. कई चैप्टरों में बंटी इस किताब में हर चैप्टर अपनी तरह से एक बात कहने की कोशिश करता है.
उन्हें हमारे दौर में हिन्दी के सबसे प्रतिभाशाली व्यंग्य लेखक के रूप में आदर प्राप्त है. उनके व्यंग्य स्थितियों की जड़ता की विडम्बना दर्शा कर ही अपना दायित्व पूरा नहीं कर लेते अपितु इसके कारणों की तलाश करते हुए इस जड़ता की बेचैनी भी प्रकट करते हैं.
'नेपथ्य लीला' में जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वो इसकी भाषा शैली है. ज्ञान चतुर्वेदी के नये उपन्यास 'नेपथ्य लीला' उनके विराट साहित्यिक यात्रा की एक शानदार झांकी जैसा है. इस कृति में लेखन की एक अलग ही रेंज दिखती है. इसे पढ़ते हुए कई बार लगता ही नहीं कि हम, नरक यात्रा, बारामासी या मरीचिका वाले लेखक को ही पढ़ रहे हैं. एक नया ज्ञान चतुर्वेदी इस उपन्यास में बार-बार अपनी दस्तक देता है, नए सार्म्थय और विषय के साथ. यहां भाषा में विट उनकी पिछली रचनाओं जैसा ही है, लेकिन विषय की गंभीरता और उसके देखे जाने के तरीके यहां बात कहने की स्टाइल को बदल देते हैं.
इसी तरह की अलंकृत नए शब्दावली के साथ यह उपन्यास हमारे चेतन पर गम्भीर चोट करता है. सारे के सारे पात्र और उनकी शैली आपको खूब हंसाएगी भी और रुलायेगी भी. जब आप भारत के वास्तविक दुर्दशा का चित्रण इस अंलकृत हिंदी में पढ़ते हुए गंभीरतापूर्वक सोचेंगे तो कटुसत्य से परिचय होगा. यह व्यंग्य हमारे ऊपर ऐसा प्रहार है.. यह हमें सोचने के लिए विवश करता है. लेखक की अपनी एक अर्जित भाषा शिल्प है, जो उन्हें बाकी व्यंग्यकारों से अलग तो बनाती ही है, साथ ही भाषा का एक नया संसार भी रचती है. प्रस्तुत कृति में भी भाषा के जरिए एक जादू बिखरने की कोशिश की गई है. अगर आप यथार्थ को सीधा नहीं व्यंग्य की चाशनी के साथ पगाकर पढ़ने में यकीन करते हैं तो ज्ञान की यह किताब आपके लिए है.
ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास ‘नेपथ्य लीला' में परिवेश का तटस्थ अवलोकन, मूल्यहीन सामाजिकता का सूक्ष्म विश्लेषण और करुणा से पगा निर्मम व्यंग्य जिस तरह इस उपन्यास में मौजूद है, वह ज्ञान चतुर्वेदी की असाधारण लेखकीय क्षमता और उनके हमारे समय का प्रतिनिधि व्यंग्यकार होने का प्रमाण है. हमेशा कि तरह चतुर्वेदी जी अपेक्षाओं पर खरे उतरे है.
ज्ञान चतुर्वेदी हिंदी के उन पहले रचनाकारों में से हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा. उनकी व्यंग्य रचनाएं हमारे मन में गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने–सामने खड़ा करती हैं. वर्तमान सामाजिक व राजनैतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है. उन्होंने अपने लेखन में सदैव विवेक और विज्ञान–सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है. उनकी भाषा–शैली में खास किस्म का अपनापन महसूस होता है.
'नेपथ्य लीला' में फंतासी और कल्पनाओं के जरिए पात्रों के माध्यम से उनसे उपजने वाले हालातों को टटोलने की कोशिश की गई है. पिछली उपन्यासों से उलट यहां एक अलग तरीके से भाषा का चमत्कार किया गया है. ये व्यंग्य चुभते हुए नस्तर जैसा है. हम उन्हें पढ़ते हुए सायास अनुभव करते हैं कि, कैसे ज्ञान चतुर्वेदी अपने सम्पूर्ण साहित्यिक लेखन को अद्भुत भाषा शैली, मिथकीय शिल्प और देशज मुहावरों से गढ़ा है.
मशहूर व्यंग्यकार रवींद्रनाथ त्यागी का लिखा बरबस ही याद आ रहा है कि, सिर्फ़ ज्ञान चतुर्वेदी एक ऐसा व्यंग्य-लेखक है, जिसकी प्रतिभा किसी गंवई स्टेशन पर दूर से आती हुई डाकगाड़ी की हेडलाइट की भांति चमकती है और जो धड़धड़ाती हुई आगे निकल जाती है. लिखने में सचमुच अद्वितीय, ज्ञान चतुर्वेदी उन विरले लेखकों में से हैं, जो 'क्लासिकल' होने की सारी आशंकाएं अपने भीतर समेटे हैं.
पुस्तक : नेपथ्य लीला - ज्ञान चतुर्वेदी
प्रकाशक - राजपाल एंड संस
मूल्य - रु-295
(आशुतोष कुमार ठाकुर बैंगलोर में रहते हैं, पेशे से मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं तथा कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के क्यूरेटर तथा को-डाइरेक्टर हैं,)
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