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ध्यानचंद को ज्ञानचंद का सम्मान और चापलूसी के गोल्ड मेडल के लिए हुड़कचुल्लुओं में स्पर्धा
इस हफ्ते टोक्यो में संपन्न हुए ओलिंपिक खेलों में भारत के प्रदर्शन का जिक्र धृतराष्ट्र के दरबार में हुआ. हमारे तमाम खिलाड़ियों ने देश का नाम रौशन किया. तमाम खिलाड़ियों ने भविष्य के लिए उम्मीद की रौशनी पैदा की. लेकिन खबरिया चैनलों के अंधकार में ये तमाम रौशनियां गुम हो गई. प्राइम टाइम पर गौरव दिलाने वाले इन खिलाड़ियों के बजाय असली खिलाड़ी का चेहरा छाया रहा, उसी के इर्द गिर्द कहानियां गढ़ी गईं, बीते सात सालों में एक लाख बार इनकी महानता के गीत गा चुके हुड़कचुल्लुओं ने एक लाख एकवीं बार इनकी महानता का गीत गाया, उस महानता का जिसमें इनका कोई योगदान नहीं था.
चौधरी ने बाकियों से बाजी मारते हुए इतनी बार मोदी जाप किया कि मेडल जीतने वाले असली खिलाड़ियों का नाम लेना ही भूल गए. लगे हाथ चौधरी ने सफलता का मंत्र भी दिया. लेकिन बीते हफ्ते चौधरी के गले में एक और फांस पड़ गई. यह फांस डाली टेलीविज़न पत्रकारिता के एक अन्य धुरंधर अजित अंजुम ने. उन्होंने एक चचा को पकड़ लिया जिन्हें मुंह से हथगोले मारने में महारत थी. चचा ने बताया कि 2019 से पहले कश्मीर पाकिस्तान में था और 2014 से पहले देश में खेती-किसानी नहीं होती थी. उन्होंने लगे हाथ यह भी बताया कि उनके ज्ञान का स्रोत ज़ी न्यूज है. फिर तो युद्ध छिड़ गया. उस युद्ध का नतीजा जानने के लिए आपको यह टिप्पणी देखनी पड़ेगी.
कायरता एक दुर्गुण है लेकिन कुछ लोगों ने इस गहना बना दिया है. मसलन जब यह बहस छिड़ी कि ज़ी न्यूज़ देखने वाले बंदे का आईक्यू दस से 15 के बीच क्यों होता है तब सुधीर चौधरी ने सामने से वार नही किया. वह दूसरों के ट्वीट पर जाकर रीट्वीट कर रहे थे. यानी दूसरे के बंदूक में अपना कारतूस. किसने सोचा था कि एक दिन कायरता भी गहना बन जाएगी. तिहाड़ शिरोमणि ने कर दिखाया.
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