Opinion
“यह भारत के सभी विश्वविद्यालयों के लिए खतरनाक है”
भारत के एक राज्य मध्यप्रदेश में एक शहर है सागर. यहां एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है जिस का नाम डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय है. बोलचाल में इसे ‘सागर विश्वविद्यालय’ भी कहा जाता है. इस के संस्थापक डॉ. हरी सिंह गौर ने अपनी पूरी जमा पूंजी लगा कर इसे ‘परिसर’ के रूप में स्थापित किया था. वे पहले कुलपति भी थे. कुलपति होते हुए भी कंजूसी की हद तक उन के मितव्ययी होने के प्रसंग आज भी प्रेरित करते हैं. आज यह कल्पना ही नहीं की जा सकती कि कोई कुलपति हो, आला दर्जे का विद्वान हो और उस के कपड़ों पर जगह-जगह पैबंद लगे हों.
विश्वविद्यालय में पढ़ाई-लिखाई के वातावरण को ले कर डॉ. हरी सिंह गौर इतने सावधान और समर्पित रहते थे कि एक बार हॉकी की अंतरविश्वविद्यालयी प्रतियोगिता में जब ‘सागर विश्वविद्यालय’ के विद्यार्थी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से अंतिम समय में मैच जीत गए और इसी उत्साह में अपने कुलपति से अगले दिन की छुट्टी मांगने गए तो उन्होंने कहा कि छुट्टी? “मैंने विश्वविद्यालय पढ़ाई के लिए खोला है, छुट्टी के लिए नहीं. कल कोई छुट्टी नहीं होगी.” फिर आगे कहा, “इंग्लैंड के राजा जॉर्ज पंचम की मृत्यु पर ब्रिटिश संसद बंद नहीं की गई थी बल्कि दो मिनट का मौन रखा गया था.” इतना ही नहीं एक तरह से हिदायत देते हुए यह भी कहा, “माई चिल्ड्रेन, ईवन वेन आई डाई, देयर शैल बी नो हॉलिडे.” इस से यह स्पष्ट है कि ‘सागर विश्वविद्यालय’ की स्थापना और विचार में ज्ञान के प्रति अटूट दृढ़ता थी.
इसी ‘सागर विश्वविद्यालय’ में 30-31 जुलाई 2021 को विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान विभाग और अमेरिका के मॉन्टक्लेयर स्टेट यूनिवर्सिटी में मानव विज्ञान के सह प्राध्यापक (एसोसिएट प्रोफेसर) नीरज वेदवान, जो भारत सरकार की ‘ग्लोबल इनिशिएटिव ऑफ एकेडेमिक नेटवर्क्स (GIAN)’ योजना के तहत ‘सागर विश्वविद्यालय’ से जुड़े भी हैं, ने आपसी सहयोग से एक ‘अंतरराष्ट्रीय वेबिनार’ आयोजित करने को सोचा था. इस ‘वेबिनार’ का विषय ‘वैज्ञानिक प्रवृत्ति हासिल करने में सांस्कृतिक और भाषाई बाधाएं’ था. इस में वक्ता के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के यशस्वी प्रोफेसर और देश के श्रेष्ठ सार्वजनिक बौद्धिक अपूर्वानंद तथा प्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं शायर गौहर रज़ा भी आमंत्रित थे. ये दोनों वर्तमान केंद्रीय सरकार की नीतियों एवं कार्यकलापों से तीखी असहमति रखते हैं और जनता के सामने पूरी शालीनता तथा विनम्रता से अपनी बात कहते हैं.
पिछले सात वर्षों में यही अनुभव है कि इस केंद्रीय सरकार को असहमति न केवल पसंद ही नहीं है बल्कि इसे बुरी तरह से कुचलने पर आमादा रहती है. कई विद्यार्थी, प्रोफेसर, चिन्तक, कवि, मानवाधिकार कार्यकर्ता आदि इस दमन का शिकार हैं और वे जेल में बंद हैं. केंद्रीय सरकार और उस से जुड़े संगठन (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आदि) असहमति रखने वालों के ख़िलाफ़ इतना दुष्प्रचार करते हैं कि उमर ख़ालिद जैसे विद्यार्थी सार्वजनिक जगह पर हत्या के शिकार होते-होते बचे. प्रो. अपूर्वानंद और गौहर रज़ा ने अपने लेख में बिलकुल ठीक लिखा है यह दबंगई है जो अकादमिक संस्कृति का विध्वंस कर रही है.
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एक छात्र संगठन है जो, दरअसल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी से संबद्ध है. विश्वविद्यालयों में किसी भी तरह के आलोचनात्मक चिंतन से जुड़े कार्यक्रम, प्रदर्शनी आदि का न केवल विरोध करता है बल्कि कार्यक्रम स्थल पर जा कर हिंसक कार्यवाही भी करता है. उक्त ‘वेबिनार’ में प्रो. अपूर्वानंद और गौहर रज़ा की भागीदारी जान कर सागर की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इकाई ने विश्वविद्यालय के कुलपति एवं स्थानीय पुलिस अधीक्षक को एक ज्ञापन दिया. इस ज्ञापन में यह कहा गया है कि ये दोनों देश विरोधी मानसिकता रखते हैं और राष्ट्र विरोधी क्रियाकलापों में संलिप्त हैं. प्रो. अपूर्वानंद के बारे में यह भी लिखा गया है कि ‘दिल्ली दंगा’ (फरवरी 2020) के संदर्भ में उन से पूछताछ की गई थी इसलिए वे इस मामले में संदिग्ध हैं. गौहर रज़ा के बारे में यह लिखा गया है कि अफजल गुरु (2001 में भारतीय संसद पर हुए आतंकवादी हमले का आरोपी जिसे 2013 में फांसी की सजा दे दी गई) की प्रशंसा में उन्होंने कविता लिखी है.
यह सही है कि प्रो. अपूर्वानंद से 3 अगस्त 2020 को उक्त दिल्ली दंगे के बारे में पूछताछ की गई थी. पर इस से यह साबित नहीं होता कि उन की संलिप्तता इस में थी ही. इसी तरह गौहर रज़ा के बारे में यह बिलकुल ही ग़लत तथ्य है कि उन्होंने अफजल गुरु के प्रेम में कविता लिखी है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जिस के ‘लोगो’ में जिस ‘ज्ञान, शील, एकता’ का उल्लेख है उसी का तकाजा है कि तथ्य की जाँच कर के ही उस के बारे में कुछ लिखा या बोला जाए. जहां तक अफजल गुरु के मुकदमे की बात है तो सर्वोच न्यायालय के फ़ैसले का सम्मान करते हुए भी कोई इस से विनम्रतापूर्वक असहमत हो सकता है. ऐसा नहीं होता तो दिल्ली विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर निर्मलांशु मुखर्जी ने फैसला आने से पहले इस से संबंधित किताब नहीं लिखी होती. अकादमिक परिसर का काम अखंड सहमति में लिपटी हुई जी-हुजूरी का निर्माण करना नहीं है.
जैसा कि ऊपर कहा गया कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने कुलपति और स्थानीय पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन दिया कि प्रो. अपूर्वानंद और गौहर रज़ा यदि इस ‘वेबिनार’ में शामिल होते हैं तो आंदोलन किया जाएगा, इन वक्ताओं के साथ साथ कुलपति, कुलसचिव और मानव विज्ञान विभाग के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ प्राथमिकी भी दर्ज़ कराई जाएगी. इतना ही नहीं विश्वविद्यालय को अनिश्चितकालीन बंद करने के लिए भी आंदोलन किया जाएगा. यह अत्यंत तकलीफ़देह है कि अपने आप को विद्यार्थियों की ‘परिषद’ कहने वाला एक संगठन सीधे-सीधे विश्वविद्यालय के रोजमर्रा के क्रियाकलापों में न केवल दखलंदाजी कर रहा है बल्कि सीधे-सीधे धमकी भी दे रहा है. फिर वही बात कही जा सकती है कि ऐसे आचरण में कहां ‘शील’ है और यह ‘ज्ञान’ विरोधी क्रिया तो है ही.
पर इन सब से भी आश्चर्यजनक एवं दुखद यह है कि ज्ञापन पा कर पुलिस अधीक्षक ने 29 जुलाई 2021 को कुलपति को एक पत्र लिख कर चेतावनी दी कि वक्ताओं के विचारों से यदि कोई आहत होता है तो और आक्रोश प्रकट करने की स्थिति में आता है तो आयोजक सामूहिक रूप से भारतीय दंड संहिता की धारा 505 के तहत दंडनीय अपराध के भागी होंगे. एक दौर भारतीय विश्वविद्यालयों का था (‘था’ क्रिया भी कितनी तकलीफ़देह है!) जब पुलिस बिना अनुमति के परिसर में प्रवेश ही नहीं कर सकती थी. पर आज पुलिस सीधे-सीधे विश्वविद्यालय को कड़ी चेतावनी दे रही है. सब से पहली बात तो यही है कि इस तरह के मसले पर पुलिस को सीधे कुलपति को पत्र लिखने की न तो कोई ज़रूरत है और न ही अधिकार. एक ‘वेबिनार’ का आयोजन कोई सांप्रदायिक हिंसा तो है नहीं जिस के डर के कारण सावधानी बरती जाए.
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह शांतिपूर्ण वातावरण में अहिंसक तरीक़े से अपनी अभिव्यक्ति कर सकता है. इस दृष्टि से पुलिस अधीक्षक का पत्र संवैधानिक अधिकारों को सीमित कर रहा है. पुलिस अधीक्षक का यह पत्र बताता है कि जिस पुलिस का कोई भी कदम जांच पर आधारित होना चाहिए उस ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा दिए गए ज्ञापन को ही सच एवं आधार मान लिया. इस पत्र में एक बात और यह लिखी गई है कि ‘वेबिनार’ में चर्चा की जानेवाली विषय-वस्तु और अभिव्यक्त होने वाले विचारों के बारे में पहले से ही सहमति बना ली जाए जिस से किसी धर्म, जाति, क्षेत्र, समुदाय, व्यक्ति की भावना आहत न हो.
जब यही करना हो तो फिर ऐसे आयोजन की ज़रूरत क्या है? संगोष्ठी आदि का आयोजन इसीलिए होता ही है कि अनेक तरह के विचार वाले एक विषय पर खुल कर बात कर पाएं और फिर किसी साझा विचार तक पहुंच पाएं. आहत भावनाओं की राजनीति पिछले कई वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े संगठन करते रहे हैं. पुलिस ने अपनी भूमिका का यथोचित निर्वाह न करते हुए जिस भाषा में कुलपति को पत्र लिख रही है उस से स्पष्ट है कि पुलिस भी इसी संकीर्ण राजनीति के साथ खड़ी हो गई.
दूसरी बात यह भी है कि आहत भावनाओं की आशंका में यदि पुलिस भी काम करे तो फिर तार्किक और वैज्ञानिक प्रवृत्ति से संपन्न भारत का निर्माण कैसे हो सकता है जो हमारी संवैधानिक प्राथमिकता है. पुलिस का काम यह होना चाहिए था कि वह अखिल विद्यार्थी परिषद के लोगों को समझाती कि विश्वविद्यालय का काम ही तर्क, संवाद और बहस है. अगर आप को वक्ताओं के विचारों से असहमति है तो आप भी उसी ‘वेबिनार’ में खुल कर अपना पक्ष शालीनता से रख सकते हैं. निश्चय ही पुलिस ने ऐसा नहीं किया. वह भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की तरह धमकी की भाषा ही बोलने लगी. यह दुखद है कि पुलिस जैसी एक संवैधानिक संस्था ने एक असंवैधानिक रास्ता अपने लिए चुन लिया.
विश्वविद्यालय प्रशासन को भी यह दृढ़ता से कहना चाहिए था कि यह एक अकादमिक आयोजन है इसलिए इस में सभी को अपनी बात रखने का हक़ है. पर इस का उलटा हुआ. कुलपति को लिखे गए पत्र के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन सक्रिय हुआ और मानव विज्ञान विभाग को यह निर्देश दिया गया कि 15 जनवरी 2021 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी या वेबिनार आदि के आयोजन के लिए ज़ारी निर्देशिकाओं के अनुसार शिक्षा मंत्रालय द्वारा पूर्व अनुमति आवश्यक है, इसलिए यदि ऐसी अनुमति नहीं मिली है तो इसे स्थगित कर दिया जाए. अंततः ‘वेबिनार’ शुरू होने के लगभग दो घंटे पहले मानव विज्ञान विभाग अपने को इस के आयोजन से अलग करने पर बाध्य हुआ.
क्या इसे विडंबना मान कर केवल आंसू बहाया जाए कि जिस ‘सागर विश्वविद्यालय’ के संस्थापक कुलपति ने यह कहा था कि “मेरे मरने पर भी विश्वविद्यालय में छुट्टी न हो” उसी विश्वविद्यालय में यह नौबत आ गई है कि एक ‘वेबिनार’ यानी अकादमिक काम को स्थगित करने और विश्वविद्यालय को अनिश्चितकालीन बंद करने की खुलेआम धमकी दी जा रही है? अकादमिक परिसर एक खुली बातचीत की जगह होते हैं. वहां विचारों में तो जबरदस्त असहमति हो सकती है पर अकादमिक ईमानदारी को कुचला नहीं जा सकता. यह न तो भारतीय ज्ञान – संस्कृति है और न ही संवैधानिक अधिकार. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद संगठन ने यही करने की कोशिश की और उस में सफल भी हुआ. जिस भारतीय संस्कृति की महानता के गुण गाते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी थकते नहीं है उसी की ज्ञान परंपरा में यह निहित है कि कोई भी आचार्य अपने विरोधी के मत को आदरपूर्वक स्थान देता है जिसे शास्त्रीय भाषा में ‘पूर्व पक्ष’ कहा जाता है और फिर खंडन करते हुए अपना मत प्रकट करता है जिसे ‘उत्तर पक्ष’ कहा जाता है.
ज़ाहिर है कि इस प्रक्रिया में दूसरे को सुनना महत्त्वपूर्ण है. चूंकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को वर्तमान शासक दल का समर्थन प्राप्त है इसलिए उस की एक जिला इकाई के ज्ञापन ने विश्वविद्यालय के काम करने को न केवल बाधित किया बल्कि इसे अपने हिसाब से समायोजित करने में सफलता पाई. इसी का परिणाम हुआ कि पुलिस अधीक्षक कुलपति को निर्देश दे दिया. यह सब भारत के विश्वविद्यालयों के लिए बहुत ही खतरनाक है. हमें इस का प्रतिरोध करना ही होगा क्योंकि और चुप बैठना मृत्यु का लक्षण है.
(लेखक- योगेश प्रताप शेखर, सहायक प्राध्यापक (हिंदी), दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय)
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