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दैनिक भास्कर: ‘रेड कर रहे अधिकारियों ने कहा, हमें दिखाकर ही कुछ पब्लिश करें’
गुरुवार की अल सुबह दैनिक भास्कर अखबार के भोपाल, नोएडा समेत कई कार्यालयों और इसके मालिकों के घरों पर आईटी विभाग ने छापेमारी शुरू की.
इस दौरान दैनिक भास्कर ने एक रिपोर्ट पब्लिश की. जिसका शीर्षक, ‘सच्ची पत्रकारिता से डरी सरकार: गंगा में लाशों से लेकर कोरोना से मौतों के सही आंकड़े देश के सामने रखने वाले भास्कर ग्रुप पर सरकार की दबिश’ है.
इस रिपोर्ट में भास्कर ने कोरोना महामारी के दौरान की गई अपनी खबर का स्क्रीनशॉट लगाते हुए यह बताया कि जो छापेमारी हुई है उसकी मुख्य वजह यह है. इस खबर के सबसे आखिरी में जो लिखा गया वो सबसे हैरान करने वाला है. भास्कर ने लिखा, ‘‘इस खबर को पब्लिश करने से पहले ग्रुप पर रेड डालने वाले अधिकारियों को भी दिखाया गया. क्योंकि उन्होंने हमसे कहा था कि आप जो कुछ भी रेड को लेकर पब्लिश करेंगे, उसे हमें दिखाकर ही पब्लिश करेंगे.’’
भास्कर ने अपनी दूसरी खबरों में भी बताया, “भास्कर दफ्तर में बैठे अधिकारियों का निर्देश है कि छापे से जुड़ी हर खबर दिखाकर पब्लिश करनी है.''
यह हैरान करने वाली बात इसलिए भी है क्योंकि आपातकाल के दौरान भी इसी तरह अखबार को पब्लिश होने से पहले सरकारी सेंसर से होकर गुजरना पड़ता था.
सत्याग्रह डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘‘आपातकाल के दौरान 28 जून, 1975 को राजनीतिक विरोधियों और आंदोलनकारियों की गतिविधियों पर पहरा बैठाने के साथ ही प्रेस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था. ब्रिटिश शासन के बाद ऐसा पहली बार हुआ था. आलम यह था कि समाचार पत्रों में छपने वाली खबरों को सेंसर किया जाने लगा. उन्हें छापने से पहले सरकार की अनुमति लेने की बंदिश लगा दी गई.’’
दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर ओम गौर ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, ‘‘भोपाल के कार्यालय में जहां हमारी प्रमुख डिजिटल टीम बैठती है. वहां अधिकारियों ने कहा है कि रेड से संबंधित खबर प्रकाशित करने से पहले हमें दिखाए.’’
इसको लेकर एनडीटीवी से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन कहते हैं, ‘‘पिछले कई महीनों से भास्कर के तेवर बदले हुए थे. वह गंगा किनारे बनी क़ब्रों का सच दिखा रहा था, टीकाकरण की सुस्त रफ़्तार की बात कर रहा था. यानी सरकार की दी हुई स्क्रिप्ट नहीं पढ़ रहा था. इसलिए आज वहां छापे पड़ गए. यह साफ़ है कि छापों का मक़सद भास्कर पर ही नहीं, पूरे मीडिया पर दबाव बनाना है.’’
वह आगे कहते हैं, ‘‘दिलचस्प यह है कि भास्कर ने जब इस छापे के पीछे की वजह बताते हुए अपनी पुरानी ख़बरों का हवाला देते हुए शुरू में लिखा कि यह ख़बर छापा मारने वाले अफसरों को उनके निर्देश के मुताबिक दिख ली गई है तो कुछ अचरज हुआ. आख़िर अधिकारी आयकर का ब्योरा लेने निकले हैं या अख़बार की प्रकृति तय करने. दरअसल इससे भी उनके इरादे खुलते हैं. भास्कर ने यह सूचना भी सार्वजनिक कर उनकी मंशा ही उजागर कर दी. क्योंकि ख़बर में किसी सेंसर के संकेत नहीं हैं. वैसे हममें यह पेशेवर साहस होना चाहिए कि ऐसे किसी दबाव को ख़ारिज कर सकें.’’
वहीं पत्रकार और समाजशास्त्री अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘‘अगर इनकम टैक्स वालों ने ऐसा किया है तो यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज है. वे छापा डाल सकते हैं. बैंक खातों की जांच कर सकते हैं. आमदनी कहां से हो रही है. टैक्स दिया या नहीं दिया. इन विषयों के बारे में हस्तक्षेप करने का उनको अधिकार है. लेकिन इसके अलावा तो उनको अधिकार नहीं.’’
दुबे आगे कहते हैं, ‘‘यह साफ तौर पर सेंसर करना है. अब इनकम टैक्स दफ्तर सेंसर अफसर की भूमिका निभा रहे हैं. सेंसर लागू होने के बाद सेंसर के दफ्तर में खबर दिखानी पड़ती है. यह बहुत निंदनीय है. इसकी जितनी निंदा की जाए उतना कम है.’’
न्यूज़लॉन्ड्री ने दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर एलबी पंत से भी बात की. उन्होंने बताया, ‘‘खबर प्रकाशित करने से पहले उसे दिखाने के लिए कहना तो गलत है ही, लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है. दरअसल हमारे भोपाल कार्यालय में कुछ देर के लिए ऐसा हुआ था पर अब हम अपने हिसाब से खबरें प्रकाशित कर रहे हैं.’’
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