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तरुण तेजपाल: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का सरकारी ट्विस्ट और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का गुस्सा
वरिष्ठ संपादक और लेखक तरुण तेजपाल फिलहाल स्वतंत्र हैं. पिछले महीने गोवा की एक अदालत ने तेजपाल को उन आरोपों से मुक्त कर दिया जिसको लेकर लोगों ने राय बना ली थी कि इससे उनकी बौद्धिक और साहित्यिक महत्वाकांक्षाओं का लगाम लग गई है.
इस फैसले पर आने वाली प्रतिक्रियाएं दो स्पष्ट खेमों में बंटी हुई हैं. एक वर्ग पूछ रहा है कि एक भूतपूर्व मशहूर संपादक अपराध स्वीकार करने के बावजूद कैसे मुक्त हो गया? वहीं दूसरा समूह इसके पीछे एक राजनैतिक हस्तक्षेप देख रहा है.
शुरुआती ज्यादातर प्रतिक्रियाएं किसी पुख्ता कानूनी तर्क पर आधारित न होकर भावुकता के आवेश में आ रही थीं. शायद एक वजह ये भी थी कि फैसले की प्रति बहुत देर से जारी हुई. कई लोगों को डर था कि यह फैसला अन्य महिलाओं को यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के मामलों की रिपोर्ट करने से रोकेगा. कुछ लोगों ने तर्क दिया कि यह निर्णय पीड़िता को हतोत्साहित करने वाला है.
527 पन्नों का अदालती आदेश बहुत सारी घटनाओं, तथ्यों पर आधारित है. इसमें तेजपाल के कथित अपराध स्वीकारने वाले मेल की पृष्ठभूमि की भी व्याख्या है और साथ ही इसमें पीड़िता के व्यवहार को लेकर भी कुछ टिप्पणियां की गई हैं. जाहिर है इन दोनों चीजों का समर्थक और विरोधी पक्ष अपने मनमुताबिक व्याख्या कर रहे हैं.
तेजपाल को बरी करने के फैसले पर आप चाहे जो भी राय रखते हों लेकिन एक बात स्पष्ट है कि इस मामले में भारत सरकार के शीर्ष राजनैतिक लोगों की गहरी दिलचस्पी है. इससे और क्या साबित होता है कि निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अभियोजन पक्ष द्वारा दायर की गई त्वरित याचिका की पैरवी करने के लिए भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता स्वयं राज्य का प्रतिनिधि बनकर उपस्थित हुए?
और यहां इस बात को ध्यान में रखें कि गोवा के मुख्यमंत्री ने अदालत का फैसला आने के कुछ घंटों के भीतर ही यह घोषणा कर दी थी कि वो इसके खिलाफ अपील करेंगे, जबकि अभियोजन पक्ष और खुद मुख्यमंत्री के पास इस फैसले की प्रति तक मौजूद नहीं थी, ना ही उन्होंने इसे पढ़ा था. यही बात सॉलीसिटर जनरल के बारे में भी कही जा सकती है. कानूनी जानकार बताते हैं कि अपील की प्रक्रिया इसलिए नहीं है क्योंकि एक पक्ष को फैसला पसंद नहीं आया, बल्कि अपील उस स्थिति में की जाती है जब न्यायाधीश की ओर से निष्कर्ष पर पहुंचने में गंभीर गलती हुई हो, जाहिरन ऐसी कोई अपील तब तक नहीं की जा सकती जब तक कि आप फैसले को पूरी तरह से पढ़ न लें.
फिर भी 2 जून की सुबह मुख्यमंत्री के निर्देश पर अभियोजन पक्ष ने फैसले के खिलाफ तत्काल अपील दायर की और बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसे तत्काल सूचीबद्ध कर लिया. सॉलिसिटर जनरल स्वयं वहां उपस्थित हुए. यहां अदालत को स्पष्ट रूप से यह संदेश देने की कोशिश दिखती है कि सरकार क्या चाहती है.
यदि इस तथ्य को दरकिनार भी कर दिया जाए कि देश में कोरोना महामारी की तबाही अभी दूर-दूर तक ख़त्म होती नहीं दिख रही है. इसके चलते देश के लाखों नागरिकों के जीवन और मृत्यु की अपीलों पर सॉलिसिटर जनरल को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, फिर भी उनकी प्राथमिकता इस मामले में कई सवालों को जन्म देती है. और साथ ही यह भी कि इस मामले में भारत सरकार की क्या रुचि है?
एसजी की भूमिका उन मामलों में होती है जिसमें भारत सरकार को सलाह देना हो, संवैधानिक मामलों में सरकार का प्रतिनिधित्व करना हो या उन महत्वपूर्ण मामलों में सरकार का प्रतिनिधित्व करना जब भारत के राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय में क़ानूनी सलाह की आवश्यकता हो. यह भी एक तथ्य है कि तेजपाल मामले में फैसला वर्षों की नियमित अदालती कार्यवाही के बाद आया है. लिहाजा एसजी द्वारा इसमें विशेष रुचि दिखाने का कोई औचित्य नहीं बनता है.
मेहता पहले भी सर्वोच्च न्यायालय में कई बार तेजपाल के खिलाफ पेश हो चुके हैं, लेकिन 2 जून को बॉम्बे हाईकोर्ट में उनकी उपस्थिति के गहरे निहितार्थ हैं. ये वही मेहता हैं जो कोरोना की दूसरी वेव में मची अराजकता, ध्वस्त हो चुके टीकाकरण अभियान, सेंट्रल विस्टा के निर्लज्ज निर्माण के बीच दिल्ली सरकार के वकील से कहते हैं, "बच्चों की तरह रोना बंद कीजिए". वो ऐसा इसलिए कह रहे थे क्योंकि दिल्ली सरकार ऑक्सीजन की भयावह कमी के समाधान की गुहार लेकर हाईकोर्ट पहुंची थी.
इस मामले में पीड़िता और उसके वकील कोई बयान देने के लिए उपलब्ध नहीं हुए लेकिन गोवा अभियोजन पक्ष के एक वरिष्ठ सदस्य ने नाम नहीं छापने की शर्त पर हमें बताया कि यह निर्णय उनके लिए किसी झटके की तरह है. उन्होंने कहा, “हम विचार कर रहे हैं कि हमसे चूक कहां हुई क्योंकि हमने एक मजबूत केस तैयार किया था. बल्कि हमने इस मामले में तीसरी चार्जशीट भी दाखिल की थी. हमें पूरा भरोसा था.”
तेजपाल को मिली राहत से सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा दिखा. सामाजिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने फेसबुक और ट्विटर पर फैसले की आलोचना की. “मैं फैसले से हैरान और अचंभित हूं क्योंकि तरुण तेजपाल ने अपराध स्वीकार कर लिया था और माफी मांगी थी. उनके बयान के विपरीत जाकर उनको बरी करने के लिए पुख्ता सबूत होने चाहिए. मैंने फैसला नहीं पढ़ा है लेकिन खुद देखना चाहूंगी कि जज ने तेजपाल को बरी क्यों किया?" सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका नमिता भंडारे ने यह बात कही.
तेजपाल की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद अब तेजपाल आरोपों से मुक्त और स्वतंत्र व्यक्ति हैं. “मेरे पास वास्तव में कहने के लिए कुछ नहीं है. मुझे बहुत राहत महसूस हो रही है. यह फैसला मेरे लिए बहुत मायने रखता है. मेरे परिवार, मेरी दो बेटियां और उन सभी के लिए भी जो इतने सालों तक मेरे साथ रहे,” तेजपाल ने एक छोटे से बयान में यह बात कही.
उन्होंने कहा कि किसी भी और चीज से ज्यादा उन्हें इस बात ने अंत तक परेशान किया कि उनके परिवार को बर्बाद किया गया. “यह फैसला उनके लिए राहत की बात है, अब उन्हें चैन मिला है.”
इस खबर से उनके परिवार के सदस्यों को स्पष्ट रूप से राहत मिली है. "कई लोगों ने हम पर अविश्वास किया और हमें परेशान किया. आठ साल के लंबे इंतज़ार के बाद न्याय मिला है," तरुण की बहन नीना तेजपाल ने कहा. "हमारी जिंदगी तबाह हो चुकी थी. यह (निर्णय) हमारे लिए एक उम्मीद है," उन्होंने कहा.
वकीलों की राय
दिल्ली के वकील अंकुर चावला ने गोवा के राजीव गोम्स के साथ मिलकर तेजपाल का बचाव किया. उन्होंने कहा कि अभियोजन द्वारा बार-बार कानूनी कार्यवाही के दौरान टालमटोल की गई. तेजपाल की सबसे बड़ी चिंता इस मामले में महत्वपूर्ण सीसीटीवी फुटेज को लेकर थी. क्लोज-सर्किट टेलीविज़न (सीसीटीवी) रिकॉर्डिंग के कुल 48 घंटे के फ़ुटेज थे, जिनसे पता चलता था कि 7 और 8 नवंबर, 2013 को ग्रैंड हयात होटल में वास्तव में क्या हुआ था. यह 70 से अधिक गवाहों के साथ उन महत्वपूर्ण सबूतों का हिस्सा था जिनकी अदालत ने जांच की.
चावला ने कहा कि सार्वजनिक धारणा और दावों के विपरीत, तेजपाल ने कभी भी बलात्कार की बात स्वीकार नहीं की. उन्होंने कहा कि जो कुछ हुआ या नहीं हुआ, वह (पीड़िता की) सहमति से हुआ. उन्होंने यह भी कहा कि तेजपाल ने घटनाओं के अपने विवरण को बरक़रार रखने के बावजूद हर स्तर पर कथित रूप से पहुंची किसी चोट के लिए भी माफी मांगी. “वह अभियोजन पक्ष द्वारा उनके वकीलों को सीसीटीवी फुटेज सौंपने में देरी से बहुत चिंतित थे.”
चावला ने कहा कि मामले में निर्णायक मोड़ तब आया जब तेजपाल को होटल से सीसीटीवी फुटेज की एक प्रति बड़ी मुश्किल से मिली. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गोवा पुलिस ने फुटेज की एक प्रति उन्हें सौंपी. यह फुटेज एक महत्वपूर्ण सबूत है क्योंकि यह मानवीय हस्तक्षेप और व्याख्या से मुक्त है. “जिस दिन से जज के सामने फुटेज चलाई गई उस दिन से मामला पूरी तरह से बदल गया,” चावला ने कहा.
मामले में उतार-चढ़ाव
इस मामले में कई अजीबो-गरीब मोड़ आए हैं. इस साल की शुरुआत में गोवा पुलिस ने 6 जनवरी, 2021 को लंबे समय से चल रही कानूनी कार्यवाही में तीसरा पूरक आरोप पत्र दायर किया. नए आरोपों में पुलिस ने एक ब्लैकबेरी फोन से सबूत पेश किए जिसमें उन्होंने दावा किया कि ग्रैंड हयात होटल की लिफ्ट में हुई कथित घटना के बाद तेजपाल ने पीड़िता से माफ़ी मांगी थी. ग्रैंड हयात होटल नवंबर 2013 में तहलका द्वारा आयोजित तीन-दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन स्थल था.
उत्तरी गोवा के मापुसा में जिला एवं सत्र न्यायालय की विशेष न्यायाधीश श्यामा जोशी ने तेजपाल के खिलाफ सभी आरोपों को खारिज कर दिया. गोवा पुलिस ने 3,000 से अधिक पृष्ठों में आरोप दायर किए थे. उस वक्त गोवा के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने व्यक्तिगत रूप से इस मामले पर प्रेस वार्ताएं की थीं. मुकदमे की सुनवाई बंद कमरे में हुई थी. तेजपाल ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए केस खारिज करने का अनुरोध किया था.
तेजपाल को नवंबर 2013 के अंत में गिरफ्तार किया गया था. उन्होंने सात महीने जेल में बिताए. 2014 के मध्य में उच्चतम न्यायालय ने उन्हें जमानत दी. तब से वह इन आरोपों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.
उस वक्त आलोचकों ने तहलका पर दोहरे मानक अपनाने का आरोप लगाया था क्योंकि पत्रिका में लैंगिक असमानता और महिलाओं के अधिकारों पर लगातार कवर स्टोरी की जाती थी. महिला समूहों और आरएसएस की युवा शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों ने तेजपाल के खिलाफ सड़क पर विरोध प्रदर्शन किया था.
शुरुआती दिनों में जनता और मीडिया में मचे हंगामे के दौरान तेजपाल का एक मेल सामने आया था जिसमें उन्होंने कथित तौर पर स्वीकार किया था कि 'निर्णय की चूक' और 'स्थिति को गलत तरीके से पढ़ने' के कारण 'एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा हुई जो उन सब मूल्यों के विरुद्ध थी जिन पर हम विश्वास करते हैं और जिनके लिए लड़ते हैं.'
बाद में तेजपाल ने एक बयान जारी कर कहा कि जैसा बताया जा रहा है उन्होंने वैसा कोई माफीनामा नहीं लिखा है और अधिकारियों से आग्रह किया कि वह सीसीटीवी फुटेज की जांच करें ताकि घटनाओं का सटीक विवरण सामने आए.
तहलका का कार्यालय, जिसे कभी भारत की सबसे प्रभावशाली खोजी पत्रिकाओं में से एक माना जाता था और अपनी कठोर, लेफ्ट लिबरल पत्रकारिता के लिए जाना जाता था, अब उसे एक स्पा-कम-मैचमेकिंग एजेंसी ने ले लिया है. पत्रिका का स्वामित्व अब कोलकाता स्थित एक मीडिया कंपनी के पास है. इसका आंशिक स्वामित्व कभी चंडीगढ़ स्थित अल्केमिस्ट समूह के पास था, जिसके मालिक तृणमूल कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सांसद केडी सिंह थे.
एक फौजी पिता के पुत्र और पंजाब विश्वविद्यालय के स्नातक तेजपाल ने 2000 में तहलका की शुरुआत की थी. स्टिंग ऑपरेशन द्वारा सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को उजागर करना तहलका की विशेषता थी.
हाल के वर्षों में मुक़दमे के दौरान तेजपाल तब सुर्खियों में आए जब उनके उपन्यास 'द स्टोरी ऑफ माई असासिन्स' पर आधारित अमेज़ॅन प्राइम ने एक बेहद सफल वेब सीरीज 'पाताललोक' बनाई.
(लेखक करीब दो साल तक तहलका में बिजनेस एडिटर रहे.)
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