NL Tippani
श्मशान और सिस्टम के बीच कारवां गुजर गया, चुनाव देखते रहे
देश एक किस्म की निराशा और अराजकता में फंस गया है. दूर देश का ट्विटर यहां सबसे भरोसेमंद हेल्पलाइन बन गया है और अपने देश के सरकारी तंत्र की फोनलाइन या तो डेड पड़ी है या फिर अनअटेंडेड रह जाती है. दिल्ली के शाहंशाहों के पास न कोई योजना है, न कोई दृष्टि है. मौत को इतने आस-पास मंडराते इतने सारे लोगों ने पहले कभी महसूस नहीं किया था.
कवि और शायर गोपालदास नीरज की एक अमर कविता है- कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे. नीरजजी से माफी के साथ आज के समय को दर्ज करने के लिए मैंने इस कविता की एक पैरोडी लिखी है, ताकि सनद रहे जब देश में लाखों लोग कोरोना की भेंट चढ़ रहे थे तब हमारा राजनीतिक वर्ग कर क्या रहा था. यह कविता आम आदमी की खीज, उसकी हताशा, बेबसी, राजनीतिक वर्ग की बेइमानियों का दर्ज दस्तावेज है. और साथ ही यह कविता सरकारी बेदिली से मौत के मुंह में जा पहुंचे अनगिनत लोगों को श्रद्धांजलि भी है.
तोतारटंत, घोघाबसंत मीडिया इस आपात स्थिति में भी अपनी बेहयाइयों से बाज नहीं आ रहा. मौत के सैलाब में भी वह सरकार बहादुर से सीधे सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा. अपनी बेइमानियों को ढंकने के लिए इस हफ्ते उसने सिस्टम का जुमला खोजा है. एक तरफ से चैनल दर चैनल एंकर एंकराएं सिस्टम की तोतारटंत लगाते दिखे.
सिस्टम क्या होता है? इसे एक और उदाहरण से समझिए आप बेहतरीन वाली मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू या फिर ऑडी कार खरीद लीजिए लेकिन यह खुद से नहीं चलती, खुद ही मंजिल तक नहीं पहुंचती. इसके लिए एक हुनरमंद ड्राइवर की जरूरत होती है. ड्राइवर चौपट निकला तो गाड़ी मंजिल पर पहुंचने की बजाय अस्पताल पहुंच सकती है. सब कुछ निर्भर करता है कि ड्राइवर कितना कुशल है. बिल्कुल उसी तरह यह देश और इसके तंत्र यानि सिस्टम को भी एक कुशल ऑपरेटर की जरूरत होती है. वह ऑपरेटर इस देश का नेता होता है जिसे इस देश की जनता चुनती है. फिलहाल वो चुना हुआ नेता नरेंद्र मोदी है. कोई सिस्टम उतना ही कारगर या निकम्मा होता है जितना उसे चलाने वाला ऑपरेटर. इसलिए कोरोना के हाहाकार में मीडिया को सिस्टम की यह थेथरई अब छोड़ देनी चाहिए क्योंकि दांव पर हिंदुस्तानियों की ज़िंदगियां लगी हैं.
मीडिया की बेशर्मियों की इंतेहा हो चुकी है. जब देश में दूसरी वेव के चलते लोग मर रहे हैं तब बेसिर-पैर की मिथकीय कहानी को फर्जी तरीके से घंटा भर दिखाने का औचित्य चैनलों के न्यूज़ सेंस की कलई तो खोलता ही है. लेकिन यह चुगली भी करता है कि मोदीजी से सवाल पूछना नहीं है तब घंटा भर पास करने का तरीका क्या हो.
किशोर अजवाणी या सुधीर चौधरी जैसे एंकरों ने बारंबार यह साबित किया है कि मीडिया का मौजूदा मॉडल फेल हो चुका है वह इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी में भी जनता के सवाल सत्ता से नहीं पूछ सकता क्योंकि उसकी नब्ज सरकारों ने दबा रखी है. इस महामारी ने साबित किया है कि अब मीडिया का पारंपरिक मॉल बदलने का वक्त है. वह मॉडल एक ही हो सकता है सब्सक्रिप्शन का मॉडल. न्यूज़लॉन्ड्री पर तमाम ग्राउंड रिपोर्ट और खबरें इस महामारी के दौर में भी आप इसीलिए देख पा रहे हैं क्योंकि हमें आपका समर्थन है. तीन सौ महीने की बहुत छोटी सी रकम है जिसके जरिए आप स्वतंत्र पत्रकारिता का हाथ मजबूत कर सकते हैं और गर्व से कह सकते हैं मेरे खर्च पर आज़ाद हैं खबरें. न्यूज़लॉन्ड्री की हिंदी वेबसाइट शुरू हो चुकी है. आप हिंदी डॉट न्यूज़लॉन्ड्री डॉट कॉम पर जाएं. वहां आपको अपनी पसंदीदा खबरें, पॉडकास्ट, वीडियो शोज़ और लेख मिलेंगे. देखें और अपनी सलाह जरूर दें.
अगले हफ्ते होगी एक और टिप्पणी. स्वस्थ रहिए, सुरक्षित रहिए, कोरोना के नियमों का पालन करिए. अपनी क्षमता भर लोगों की सहायता करिए, ध्यान रखिए दुनिया में मानवता किसी सरकार और सिस्टम के बनने से हजारों साल पहले से मौजूद रही है, जब सरकारें नहीं थी तब भी मनुष्य की सामाजिकता, उसकी संवेदना ने मानव जाति को बचाए रखा था. आज भी वही सामुदायिकता और मानवीय संवेदना इस संकट से बचाएगी, क्योंकि सरकारों की सीमाएं और छुद्रताएं उजागर हो चुकी हैं. अपने आस-पास नजरें खुली रखें, जरूरतमंदों की सहायता करें.
Also Read
-
‘Today I only see denuded land’: Mango orchards give way to Adani’s power plant
-
Will Gen Z vote out the BJP in ’27? Sreenivasan Jain asks UP’s youth
-
A pristine forest, wildlife, over 32,000 trees at risk: Anger grows over Torrent project in Maharashtra
-
TV Newsance 355 | ‘Aap itne democratic kyun ho gaye?’ Arnab’s Diwali question
-
उत्तराखंड: समय-सीमा खत्म होने के बाद चुनाव अधिकारियों ने दर्ज की 2 हजार से ज्यादा आपत्तियां