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सामाजिक बराबरी का प्रश्न, राष्ट्रवाद और भीमराव आंबेडकर
बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की जयंती का यह मौका इस लिहाज से और भी खास है कि न्यूज़लॉन्ड्री हिंदी अपने पूर्ण अवतार में यानी एक भरी-पूरी वेबसाइट की शक्ल में लॉन्च होने जा रहा है. इस खास मौके पर सामाजिक बराबरी का प्रश्न और राष्ट्रवाद के मौजूदा द्वंद्व पर हमने एक विशेष परिचर्चा का आयोजन किया. इसके जरिए हमने उन कुछ सवालों का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश की है जो इन दिनों भारत के एक संवैधानिक लोकतंत्र बने रहने के ऊपर संशय पैदा कर रहे हैं, सामाजिक बदलाव और बराबरी के अवसरों को खत्म कर रहे हैं. प्रो दिलीप मंडल, बीना पल्लीकल, राहुल वर्मा और गीता भट्ट बतौर वक्ता इस चर्चा में शामिल रहे.
राष्ट्रवाद का जो विचार फ्रांसीसी क्रांति के बाद दुनिया में उभरा उसमें समानता, स्वतंत्रता के साथ बंधुत्व के भाव की कल्पना की गई थी. भारत के संविधान ने इस विचार को स्वीकार किया. लेकिन राष्ट्रवाद की इन तीन भावनाओं में से बंधुत्व का विचार भारत के सामाजिक परिवेश में काम नहीं करता. किसी भी राष्ट्र की संकल्पना में निहित है कि समानता और स्वतंत्रता के साथ राष्ट्र की उपलब्धियों या उसके शोक या दुख पूरे राष्ट्र की पीड़ा बने तब जाकर बंधुत्व का भाव कारगर हो सकता है.
यह बात पश्चिमी देशों के एकरूप समाज के लिए तो कारगर हो सकती थी लेकिन भारत में जहां समाज जातीय खांचों में बंटा हुआ है वहां बंधुत्व का भाव उस तरह से काम ही नहीं करता. मसलन दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचार के खिलाफ क्या कभी पूरे राष्ट्र का दुख या पीड़ा या चिंता एक समान होती है. जवाब है नहीं. यही बात मुसलमानों के संदर्भ में भी कही जा सकती है.
राष्ट्रवाद का बंधुत्व वाला विचार ऐसे मौकों पर पूरी तरह से असफल हो जाता है. जब आदिवासियों की जमीनों पर सरकार या कारपोरेट कब्जा करता है तब क्या यह पूरे राष्ट्र की सामूहिक चिंता बन पाता है. जवाब है नहीं. जब एनआरसी जैसी धमकियां दी जाती हैं, सीएए की क्रोनोलॉजी समझाई जाती है तब संविधान के बंधुत्व वाले विचार को खारिज किया जाता है. आंबेडकर के राष्ट्रवाद में इन यथार्थवादी सवालों से मुठभेड़ होती है. दरअसल उन्हें इस बात का अंदाजा था कि जातियों और समुदायों में बंटे भारतीय समाज में बंधुत्व का विचार कभी आकार ले ही नहीं सकता, इसलिए इसका नेशन स्टेट के रूप में विकसित हो पाना असंभव है. यहीं से आंबेडकर के राष्ट्रवाद की समझ विकसित हुई है. उनके लिए बंधुत्व का विचार बाकी दो विचारों से ऊपर आता है. इसी के मद्देनजर आंबेडकर ने हिंदू धर्म की कुरीतियों, जिनमें जाति प्रथा सबसे ऊपर थी, पर सबसे निर्मम प्रहार किया.
यह दिलचस्प बात है कि आज जिस आरएसएस की विचारधारा वाली पार्टी भाजपा सत्ता में है वह आंबेडकर को आत्मसात कर लेना चाहती है. खुद आरएसएस भी ऐसा ही चाहता है, लेकिन राष्ट्रवाद के क्लासिकल संदर्भ में आंबेडकर बिल्कुल फिट नहीं बैठते. आज धार्मिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक राजनीति का जो विकृत रूप हम राजनीति में देख रहे हैं उस पैमाने पर आंबेडकर अधिक से अधिक राष्ट्रद्रोही के खांचे में रखे जा सकते हैं.
वो आंबेडकर जो 1930 में भारत के पूर्ण स्वराज के दावे का विरोध कर चुके थे. वह भी तब जब 1929 कांग्रेस इसका प्रस्ताव पारित कर चुकी थी. उनका साफ मानना था कि दलितों के लिए रूढ़िवादी हिंदुओं की किसी भी सत्ता से बेहतर अंग्रेजी राज. वो आंबेडकर जिन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि दलितों और राष्ट्र के बीच उन्हें एक को चुनना होगा तो वो दलितों के पहले चुनेंगे, राष्ट्र को बाद में. इस तरह के रैडिकल सोच वाले आंबेडकर को आज भाजपा और आरएसएस क्यों आत्मसात कर लेना चाहते हैं, उनकी विरासत पर कब्जा कर लेना चाहते हैं.
रैडिकल सोच आंबेडकर की सबसे बड़ी चारित्रिक विशेषता थी. उन्होंने कभी भी अपने समय के लोकप्रिय और प्रचलित नैरेटिव के सामने घुटने नहीं टेके. राष्ट्र की उनकी संकल्पना में सामाजिक बराबरी के बाद बनने वाले हिंदुस्तान की तस्वीर इतनी स्पष्ट थी कि उन्होंने इसके लिए गांधी और नेहरू से भी टकराव मंजूर किया. उस आंबेडकर की जयंती के मौके पर न्यूज़लॉन्ड्री अपने पूर्ण अवतार में सामने आ रहा है. उम्मीद है हम अपने सब्सक्राइबर्स की अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे. भारत के मीडिया लैंडस्केप में सामाजिक गैरबराबरी एक बड़ा सच है, न्यूज़लॉन्ड्री ने इस दिशा में भी गंभीर प्रयास किए हैं. यह कोशिश अब आपके सामने है, देखें, इसकी खूबियों और खामियों से हमें अवगत कराएं.
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