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10 वर्ष में बाढ़ से 24 हजार मौतें, उत्तराखंड बाढ़ का सबसे बड़ा भुक्तभोगी
देश की पहली बाढ़ नीति 3 सितंबर, 1954 को बनी थी. करीब 64 साल गुजर रहे हैं. इस बीच राज ने नदियों से रिश्ता कभी बनाया नहीं और समाज का तालमेल ज्यादा दिन टिका नहीं. 1953 से लेकर 2017 तक 107,487 लोग इस बाढ़ में समा गए. जानकर हैरानी होगी कि बाढ़ मृतकों की करीब एक चौथाई संख्या बीते दस वर्षों की है. करीब 25 हजार लोग 2008 से 2019 तक बाढ़ और वर्षा के दौरान घटने वाली आपदाओं की वजह से मारे गए. इनमें 23,297 मृतक सिर्फ 15 राज्यों से हैं. बाढ़ आपदा के कारण सर्वाधिक मृतकों की संख्या गंगा के पहाड़ी और मैदानी राज्यों में है. बाढ़ के भुक्तभोगियों में शीर्ष पर उत्तराखंड है इसके बाद उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार का नाम शामिल है. यह बाढ़ के विकराल होते जाने की पक्की निशानी है या कुछ और?
बाढ़ के भुक्तभोगियों में उत्तराखंड शीर्ष पर क्यों है? इस सवाल पर “गंगा आह्वान” से जुड़ी मलिका भनोट ने बताया कि बाढ़ की विभीषिका का एक बड़ा कारण गंगा में अवरोध है. नदी को रोका जाए तो वह विभीषक बन जाती है. इसके अलावा उत्तराखंड में विकास के कार्यक्रम भी बहुत हद तक बाढ़ की विभीषिका को बढ़ा रहे हैं. 2013 की त्रासदी के बावजूद कदम संभाल कर नहीं रखा जा रहा. चारधाम परियोजना के लिए सड़क चौड़ीकरण में हजारों की संख्या में पेड़ काटे गए. यह पेड़ ही मिट्टी को बांधे रखते हैं. नतीजा है कि आए दिन भूस्खलन होता है. मलबे की अनियंत्रित डंपिंग ने नदियों की व्यवस्था को बिगाड़ दिया है. इसी समय बादल फटने या कम समय में ज्यादा वर्षा का होना आग में घी का काम करता है. उत्तराखंड में इस हलचल का दुष्परिणाम गंगा के मैदानी भागों में भी पड़ता रहता है. अभी वक्त है. हिमालय में फूंक-फूंक कर कदम रखा जाना चाहिए.
केंद्रीय जल आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1953 से लेकर 2011 तक के बाढ़ के नुकसान का आकलन यह दर्शाता है कि जिंदगियों के नुकसान के आधार पर सर्वाधिक तबाही वाले वर्षों में 1977 सबसे ऊपर है. 1977 में 11,316 लोगों की मृत्यु बाढ़ की वजह से हुई थी. यह बाढ़ लगातार बड़ी संख्या में जान लेती रही. 1978 में 3,396 लोगों की मृत्यु हुई. 1979 में 3,637 लोगों की मृत्यु बाढ़ में हुई. इसके करीब एक दशक बाद 1988 में बाढ़ ने 4,252 जिंदगियां छीन लीं. फिर करीब दो दशक बाद 2007 में 3,389 लोगों की जिदंगी बाढ़ में नेस्तानाबूद हो गई. यह सर्वाधिक मौत वाले वर्षों के आंकड़ों की सूची यही खत्म नहीं होती. बेहद अल्पविराम के बाद 2013 में उत्तराखंड में भीषण बाढ़ आई. इस बाढ़ में सरकारी आंकड़े के मुताबिक 3,547 लोगों की मृत्यु हुई. यह बीते चार दशकों की सबसे भीषण बाढ़ में एक थी. मृत्यु के यह आंकड़े उन मासूम लोगों के हैं जो शासन की अनीतियों के शिकार हुए.
यह डिस्कलेमर देना जरूरी है कि मृतकों की गिनती और बाढ़ के नुकसान का कोई आकलन केंद्र सरकार नहीं करती है. केंद्र का कहना है कि बाढ़ राज्यों का विषय हैं. इसलिए बाढ़ के नुकसान के आकलन की जिम्मेदारी भी राज्यों की है. यह राज्य भी टेढ़ी खीर हैं. जब केंद्रीकरण होता है तब शोर मचता है कि राज्यों की हिस्सेदारी खत्म हो रही है, जब मानवता के काम उनके जिम्मे हैं तो वे गेंद केंद्र के पाले में डाल देती हैं. केंद्र और राज्यों के बीच गेंदों की फेंका-फेंकी का यह काम अनवरत चलता रहता है. गेंदों को एक-दूसरे के पाले में फेंकते रहना अदालतों में राज्य और केंद्र की नुमाइंदगी करने वाले प्रतिनिधि वकीलों की यह एक खास रणनीति भी रही है.
1980 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (आरबीए) की सिफारिशों में नदी के डूब क्षेत्र के अतिक्रमण एक बड़ी चिंता का विषय था. यह चिंता कुछ पन्नों की सिफारिशों में बदल गई और फिर कभी चिंतन का विषय नहीं बनी. पर्यावरण और कानून के जानकार एमसी मेहता ने 1985 में गंगा और उससे जुड़े मामले पर पहली बार शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था.
एमसी मेहता बताते हैं, "1985 और उसके बाद 1986-87 में गंगा बेसिन को लेकर बातचीत शुरु हुई थी, इसमें बाढ़ के डूब क्षेत्र और उसके अतिक्रमण को लेकर भी बहस-मुबाहिसे हुए अदालतों से तो लड़ाई जीत ली है लेकिन जमीनी नतीजा आजतक हासिल नहीं हुआ. सरकारें बदलती रहीं और किसी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई."
डूब क्षेत्र के अतिक्रमण के अलावा एक दूसरा और अहम पहलू बाढ़ को काबू में लाने का है. बाढ़ को काबू में लाने के लिए स्वच्छंद और उन्मुक्त नदियों को ही बांधने की हमेशा जुगत की गई. नदी से उसका घर-आंगन ही छीना गया. मानों सरकारें महाभारत की दुर्योधन हो गई हों और नदियों को उसके पांच ग्राम भी देने को तैयार न हों. इस बीच बहुत से कृष्ण नदियों का संदेशा लेकर सरकारों के पास पहुंचे भी लेकिन दुर्भाग्य यह कि सरकारें नदियों की स्वतंत्रता और उनकी अपनी जमीन देने के बजाए उलटे उन्हें जकड़ने की ही बात पर अमादा रहीं. क्या कृष्ण की भाँति विकराल रूप धरने वाली यह नदियां दुर्योधन रूपी सरकारों को ललकार नहीं रही…जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हां, हां दुर्योधन! बांध मुझे…
तटबंधों और भारी-भरकम बांधों के बारे में बाढ़ मुक्ति अभियान के संयोजक और लेखक दिनेश मिश्र कहते हैं, "1952 तक देश में कोई भी सरकारी तटबंध नहीं था. उसके बाद 1953 से तटबंध बनने लगे और यह तबसे बन और टूट रहे हैं. बांधों का भी यही हाल है. वे सुख देने के बजाए अनवरत दुख देते जा रहे हैं."
कोसी नवनिर्माण मंच के संस्थापक महेंद्र यादव ने बताया, "नर्मदा से लेकर कोसी तक पुनर्वास को लेकर एक ही लड़ाई चल रही है. सरदार सरोवर डैम के फाटक बंद कर दिए गए हैं, इससे निमाड़ के डूब क्षेत्र में लोगों को जबरदस्त परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. उसी डूब क्षेत्र में दो लोगों की करंट लगने से मौत भी हो गई. बाढ़ के पुनर्वास को लेकर यहां भी काम नहीं किया गया. यह जिम्मेदारी सरकार की है."
विकास के युग में बाढ़ ने भी विकास किया है. राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने 1980 में देश के 21 जिलों में थी अब यह बढ़कर 39 जिलों में पहुंच गई हैं. करीब चार दशक में एक करोड़ हेक्टेयर अधिक भूमि पर बाढ़ बढ़ गई है. जलवायु परिरवर्तन की अवधारणा भी तेज हो गई है. असमय और अत्यधिक वर्षा के आंकड़े अब पक्की तरह से यह बता चुके हैं कि नीतियों में हमें भी ध्यान में रखा जाए.
राज्यसभा में 29 अप्रैल, 2015 को दिए गए लिखित जवाब में कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र के यूएनआईएसडीआर के जरिए वैश्विक आकलन रिपोर्ट 2015 में जारी की गई थी. इसमें यह अंदाजा लगाया गया था कि भारत में प्राकृतिक आपदाओं के कारण सालाना औसत 9.8 बिलियन डॉलर (697,338,600,000.00 रुपये) का नुकसान होता है. वहीं, गृह मंत्रालय का कहना था कि देश में 58.6 फीसदी भूभाग भूकंप, 8.5 फीसदी चक्रवात, और 5 फीसदी बाढ़ प्रभावित है.
अंत में यह बताना जरूरी है कि ऐसा भी नहीं है कि सरकारों ने कुछ नहीं किया. सरकारें हर साल एक बड़ा बजट बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाती और जारी करती हैं. 1978 में बाढ़ बचाव के नाम पर केंद्र ने 1727.12 करोड़ रुपये की परियोजना बनाई थी. 2019 में बाढ़ नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार का यह बजट आकार लेकर 13238.36 करोड़ रुपये का हो चुका है. यह तय समय पर तैयार हो जाता है और सरकारी जेबों तक पहुंच भी जाता है लेकिन इस बजट का फायदा कभी समय से जनता तक नहीं पहुंचा, इस वक्त तो सरकारें यह कहकर बच भी सकती हैं कि बाढ़ें अब बताकर नहीं आती.
(आंकड़ों का स्रोत : 22 जुलाई, 2014 को लोकसभा में गृह मंत्रालय का जवाब, 18 दिसंबर, 2018 को लोकसभा में गृह मंत्रालय की ओर से अतरांकित प्रश्न का जवाब. 23 जुलाई, 2019 को गृह मंत्रालय का लिखित जवाब व केंद्रीय जल आयोग)
(डाउन टू अर्थ से साभार)
देश की पहली बाढ़ नीति 3 सितंबर, 1954 को बनी थी. करीब 64 साल गुजर रहे हैं. इस बीच राज ने नदियों से रिश्ता कभी बनाया नहीं और समाज का तालमेल ज्यादा दिन टिका नहीं. 1953 से लेकर 2017 तक 107,487 लोग इस बाढ़ में समा गए. जानकर हैरानी होगी कि बाढ़ मृतकों की करीब एक चौथाई संख्या बीते दस वर्षों की है. करीब 25 हजार लोग 2008 से 2019 तक बाढ़ और वर्षा के दौरान घटने वाली आपदाओं की वजह से मारे गए. इनमें 23,297 मृतक सिर्फ 15 राज्यों से हैं. बाढ़ आपदा के कारण सर्वाधिक मृतकों की संख्या गंगा के पहाड़ी और मैदानी राज्यों में है. बाढ़ के भुक्तभोगियों में शीर्ष पर उत्तराखंड है इसके बाद उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार का नाम शामिल है. यह बाढ़ के विकराल होते जाने की पक्की निशानी है या कुछ और?
बाढ़ के भुक्तभोगियों में उत्तराखंड शीर्ष पर क्यों है? इस सवाल पर “गंगा आह्वान” से जुड़ी मलिका भनोट ने बताया कि बाढ़ की विभीषिका का एक बड़ा कारण गंगा में अवरोध है. नदी को रोका जाए तो वह विभीषक बन जाती है. इसके अलावा उत्तराखंड में विकास के कार्यक्रम भी बहुत हद तक बाढ़ की विभीषिका को बढ़ा रहे हैं. 2013 की त्रासदी के बावजूद कदम संभाल कर नहीं रखा जा रहा. चारधाम परियोजना के लिए सड़क चौड़ीकरण में हजारों की संख्या में पेड़ काटे गए. यह पेड़ ही मिट्टी को बांधे रखते हैं. नतीजा है कि आए दिन भूस्खलन होता है. मलबे की अनियंत्रित डंपिंग ने नदियों की व्यवस्था को बिगाड़ दिया है. इसी समय बादल फटने या कम समय में ज्यादा वर्षा का होना आग में घी का काम करता है. उत्तराखंड में इस हलचल का दुष्परिणाम गंगा के मैदानी भागों में भी पड़ता रहता है. अभी वक्त है. हिमालय में फूंक-फूंक कर कदम रखा जाना चाहिए.
केंद्रीय जल आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1953 से लेकर 2011 तक के बाढ़ के नुकसान का आकलन यह दर्शाता है कि जिंदगियों के नुकसान के आधार पर सर्वाधिक तबाही वाले वर्षों में 1977 सबसे ऊपर है. 1977 में 11,316 लोगों की मृत्यु बाढ़ की वजह से हुई थी. यह बाढ़ लगातार बड़ी संख्या में जान लेती रही. 1978 में 3,396 लोगों की मृत्यु हुई. 1979 में 3,637 लोगों की मृत्यु बाढ़ में हुई. इसके करीब एक दशक बाद 1988 में बाढ़ ने 4,252 जिंदगियां छीन लीं. फिर करीब दो दशक बाद 2007 में 3,389 लोगों की जिदंगी बाढ़ में नेस्तानाबूद हो गई. यह सर्वाधिक मौत वाले वर्षों के आंकड़ों की सूची यही खत्म नहीं होती. बेहद अल्पविराम के बाद 2013 में उत्तराखंड में भीषण बाढ़ आई. इस बाढ़ में सरकारी आंकड़े के मुताबिक 3,547 लोगों की मृत्यु हुई. यह बीते चार दशकों की सबसे भीषण बाढ़ में एक थी. मृत्यु के यह आंकड़े उन मासूम लोगों के हैं जो शासन की अनीतियों के शिकार हुए.
यह डिस्कलेमर देना जरूरी है कि मृतकों की गिनती और बाढ़ के नुकसान का कोई आकलन केंद्र सरकार नहीं करती है. केंद्र का कहना है कि बाढ़ राज्यों का विषय हैं. इसलिए बाढ़ के नुकसान के आकलन की जिम्मेदारी भी राज्यों की है. यह राज्य भी टेढ़ी खीर हैं. जब केंद्रीकरण होता है तब शोर मचता है कि राज्यों की हिस्सेदारी खत्म हो रही है, जब मानवता के काम उनके जिम्मे हैं तो वे गेंद केंद्र के पाले में डाल देती हैं. केंद्र और राज्यों के बीच गेंदों की फेंका-फेंकी का यह काम अनवरत चलता रहता है. गेंदों को एक-दूसरे के पाले में फेंकते रहना अदालतों में राज्य और केंद्र की नुमाइंदगी करने वाले प्रतिनिधि वकीलों की यह एक खास रणनीति भी रही है.
1980 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (आरबीए) की सिफारिशों में नदी के डूब क्षेत्र के अतिक्रमण एक बड़ी चिंता का विषय था. यह चिंता कुछ पन्नों की सिफारिशों में बदल गई और फिर कभी चिंतन का विषय नहीं बनी. पर्यावरण और कानून के जानकार एमसी मेहता ने 1985 में गंगा और उससे जुड़े मामले पर पहली बार शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था.
एमसी मेहता बताते हैं, "1985 और उसके बाद 1986-87 में गंगा बेसिन को लेकर बातचीत शुरु हुई थी, इसमें बाढ़ के डूब क्षेत्र और उसके अतिक्रमण को लेकर भी बहस-मुबाहिसे हुए अदालतों से तो लड़ाई जीत ली है लेकिन जमीनी नतीजा आजतक हासिल नहीं हुआ. सरकारें बदलती रहीं और किसी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई."
डूब क्षेत्र के अतिक्रमण के अलावा एक दूसरा और अहम पहलू बाढ़ को काबू में लाने का है. बाढ़ को काबू में लाने के लिए स्वच्छंद और उन्मुक्त नदियों को ही बांधने की हमेशा जुगत की गई. नदी से उसका घर-आंगन ही छीना गया. मानों सरकारें महाभारत की दुर्योधन हो गई हों और नदियों को उसके पांच ग्राम भी देने को तैयार न हों. इस बीच बहुत से कृष्ण नदियों का संदेशा लेकर सरकारों के पास पहुंचे भी लेकिन दुर्भाग्य यह कि सरकारें नदियों की स्वतंत्रता और उनकी अपनी जमीन देने के बजाए उलटे उन्हें जकड़ने की ही बात पर अमादा रहीं. क्या कृष्ण की भाँति विकराल रूप धरने वाली यह नदियां दुर्योधन रूपी सरकारों को ललकार नहीं रही…जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हां, हां दुर्योधन! बांध मुझे…
तटबंधों और भारी-भरकम बांधों के बारे में बाढ़ मुक्ति अभियान के संयोजक और लेखक दिनेश मिश्र कहते हैं, "1952 तक देश में कोई भी सरकारी तटबंध नहीं था. उसके बाद 1953 से तटबंध बनने लगे और यह तबसे बन और टूट रहे हैं. बांधों का भी यही हाल है. वे सुख देने के बजाए अनवरत दुख देते जा रहे हैं."
कोसी नवनिर्माण मंच के संस्थापक महेंद्र यादव ने बताया, "नर्मदा से लेकर कोसी तक पुनर्वास को लेकर एक ही लड़ाई चल रही है. सरदार सरोवर डैम के फाटक बंद कर दिए गए हैं, इससे निमाड़ के डूब क्षेत्र में लोगों को जबरदस्त परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. उसी डूब क्षेत्र में दो लोगों की करंट लगने से मौत भी हो गई. बाढ़ के पुनर्वास को लेकर यहां भी काम नहीं किया गया. यह जिम्मेदारी सरकार की है."
विकास के युग में बाढ़ ने भी विकास किया है. राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने 1980 में देश के 21 जिलों में थी अब यह बढ़कर 39 जिलों में पहुंच गई हैं. करीब चार दशक में एक करोड़ हेक्टेयर अधिक भूमि पर बाढ़ बढ़ गई है. जलवायु परिरवर्तन की अवधारणा भी तेज हो गई है. असमय और अत्यधिक वर्षा के आंकड़े अब पक्की तरह से यह बता चुके हैं कि नीतियों में हमें भी ध्यान में रखा जाए.
राज्यसभा में 29 अप्रैल, 2015 को दिए गए लिखित जवाब में कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र के यूएनआईएसडीआर के जरिए वैश्विक आकलन रिपोर्ट 2015 में जारी की गई थी. इसमें यह अंदाजा लगाया गया था कि भारत में प्राकृतिक आपदाओं के कारण सालाना औसत 9.8 बिलियन डॉलर (697,338,600,000.00 रुपये) का नुकसान होता है. वहीं, गृह मंत्रालय का कहना था कि देश में 58.6 फीसदी भूभाग भूकंप, 8.5 फीसदी चक्रवात, और 5 फीसदी बाढ़ प्रभावित है.
अंत में यह बताना जरूरी है कि ऐसा भी नहीं है कि सरकारों ने कुछ नहीं किया. सरकारें हर साल एक बड़ा बजट बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाती और जारी करती हैं. 1978 में बाढ़ बचाव के नाम पर केंद्र ने 1727.12 करोड़ रुपये की परियोजना बनाई थी. 2019 में बाढ़ नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार का यह बजट आकार लेकर 13238.36 करोड़ रुपये का हो चुका है. यह तय समय पर तैयार हो जाता है और सरकारी जेबों तक पहुंच भी जाता है लेकिन इस बजट का फायदा कभी समय से जनता तक नहीं पहुंचा, इस वक्त तो सरकारें यह कहकर बच भी सकती हैं कि बाढ़ें अब बताकर नहीं आती.
(आंकड़ों का स्रोत : 22 जुलाई, 2014 को लोकसभा में गृह मंत्रालय का जवाब, 18 दिसंबर, 2018 को लोकसभा में गृह मंत्रालय की ओर से अतरांकित प्रश्न का जवाब. 23 जुलाई, 2019 को गृह मंत्रालय का लिखित जवाब व केंद्रीय जल आयोग)
(डाउन टू अर्थ से साभार)
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