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उत्तराखंड आपदा: राहत और बचाव का काम सेना के हवाले, 200 लोग लापता, 28 शव बरामद
उत्तराखंड में आई आपदा से जुड़े बचाव और राहत कार्यों का जिम्मा मंगलवार से सेना ने अपने हाथ में ले लिया. आज सुबह से सेना ने तपोवन में क्षतिग्रस्त एनटीपीसी पॉवर प्लांट में फंसे लोगों को निकालने का अभियान नए सिरे से शुरू किया है. मेजर जनरल राजीव छिब्बर ने मौके पर न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, "ये एक बहुत कठिन और चुनौतीपूर्ण काम है. लेकिन हम मशीनों और मनवीय संसाधनों, दोनों की मदद ले रहे हैं." सेना के हेलीकॉप्टर भी इस काम में लगाए गए हैं.
छिब्बर ने हमें जानकारी दी कि 37 लोग अभी भी सुरंग के भीतर फंसे हुए हैं. सेना के आने से बचाव कार्य में तेजी आ गई है.
उधर आपदा से जूझ रहे राहतकर्मियों के लिये सोमवार का दिन काफी कठिन रहा. उन्हें किसी को जीवित निकालने में कामयाबी नहीं मिली. हालांकि रविवार को 12 लोगों को एनटीपीसी की एक साइट से बचाया गया था. पुलिस ने जानकारी दी कि सोमवार शाम तक अलग अलग जगहों से 28 लोगों के शव बरामद किये जा चुके थे. अटकलें हैं कि इस हादसे में कुल 250 से अधिक लोगों की जान गई है. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सोमवार को खुद 200 से अधिक लोगों के लापता होने की बात मानी है.
राहत एजेंसियों और अर्धसैनिक बलों के साथ लगी रही सेना
न्यूज़लॉन्ड्री की टीम ने ऋषिगंगा और धौलीगंगा में आपदा की मौके पर जाकर जानकारी ली है. लाता घाटी में सरहदी इलाके में 13.5 मेगावॉट के ऋषिगंगा हाइडिल प्रोजेक्ट की जगह अब मलबे के ढेर के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि कई लोग या तो बह गये या अब भी मलबे के नीचे दबे हैं. यहां प्रोजेक्ट के दूसरी ओर के गांवों का देश से ज़मीनी संपर्क फिलहाल कटा हुआ है क्योंकि नदी पर बना महत्वपूर्ण पुल बह गया है.
राहत कार्य में जुटे स्थानीय निवासी संतोष पंवार ने हमें बताया, “यहां अनुमान है कि 40 से 50 लोग मलबे में दबे हैं. कुछ लोग बह भी गये हैं. यहां प्रवासी मज़दूर भी थे और प्रोजेक्ट का स्टाफ भी, जो यहीं लेबर कालोनी में रहते थे. उन्हें भी भागने का मौका नहीं मिला. कुछ पुलिस कर्मी भी ड्यूटी पर थे उनमें से भी कुछ लापता हैं.”
उधर इस स्पॉट से करीब 4 किलोमीटर दूर धौलीगंगा पर बन रहे 520 मेगावॉट के एनटीपीसी पावर प्रोजेक्ट जिसे तपोवन विष्णुगाड़ परियोजना के नाम से जाना जाता है, में भी भारी तबाही हुई है. यह निर्माणाधीन प्रोजेक्ट था.
रविवार को यहां से 12 लोगों को सुरक्षित निकाला गया था. लेकिन सोमवार को करीब 2 किलोमीटर लम्बी सुरंग के लगभग 900 मीटर के हिस्से में फंसे लोगों को निकालने के लिये राहतकर्मी पूरा दिन जूझते रहे. सेना के जवान, भारत तिब्बत सीमा पुलिस, राज्य और केंद्र की एजेंसियां (एसडीआरएफ और एनडीआरएफ) के जवान लगातार अपने काम में लगे हुए हैं, लेकिन उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली.
एक मोटी मोटा अनुमान है कि इस सुरंग में 100 से अधिक लोग फंस गए थे. सुरंग में इतनी गाद भर गई है कि उसे हटाने में राहत कर्मियों को बहुत दिक्कतें आ रही हैं.
आईटीबीपी के एक राहतकर्मी ने मौके पर कहा, “कल (रविवार को) 12 वर्करों को सेफ निकाला था, उनका उपचार चल रहा है. जो सुरंग आप सामने देख रहे हैं इनमें भी राहत कर्मी भीतर जाकर रास्ता बनाने की कोशिश कर रहे हैं.” लेकिन हमारी टीम ने साफ देखा कि एनटीपीसी के धौलीगंगा में सुरंग में इतना मलबा भरा था कि उसे जेसीबी मशीन के इस्तेमाल के बावजूद हटाकर रास्ता नहीं बन पा रहा था.
उत्तराखंड पुलिस ने बताया कि अंधेरा होने के बाद भी सुरंग में राहत का काम जारी है. पुलिस ने यह भी ट्वीट किया कि सोमवार शाम तक 28 शव निकाले जा चुके थे.
‘प्रवासी मज़दूरों पर पड़ी मार’
आपदा के शिकार लोगों में बहुत सारे प्रवासी मजदूर हैं. इनमें उत्तराखंड के अलावा, पश्चिम बंगाल, पंजाब, यूपी, बिहार और झारखंड के साथ जम्मू कश्मीर और नेपाल के मज़दूर भी हैं. केंद्रीय बिजली मंत्री आरके सिंह ने कहा कि वह सुनिश्चित करेंगे कि एनटीपीसी में मारे गये लोगों के परिवार को 20 लाख रुपये का मुआवाज़ा मिले. दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का कहना है कि आपदाओं की मार गरीबों पर पड़ना सामान्य बात हो गई है.
घटना के बाद चमोली जिले के दौरे पर पहुंचे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने रविवार को घोषणा की थी कि मृतकों के परिजनों को चार लाख रुपए की आर्थिक सहयाता दी जाएगी.
घटनास्थल पर पहुंचे सीपीआई (एमएल) के नेता इंद्रेश मैखुरी ने हमारी टीम से बातचीत में कहा कि जहां सरकार पर्यावरण के नियमों की धज्जियां उड़ा कर इतने संवेदनशील इलाके में प्रोजेक्ट लगा रही है वहीं वह लोगों के अधिकारों और जीवन के प्रति बिल्कुल बेपरवाह है.
मैखुरी कहते हैं, “जहां यह दोनों प्रोजेक्ट (ऋषिगंगा और धौलीगंगा) लगे हैं वह नंदादेवी बायोस्फियर रिज़र्व का बफर ज़ोन है. यहां स्थानीय लोगों को पत्ता तक तोड़ने नहीं दिया जाता लेकिन बड़ी-बड़ी निजी और सरकारी कंपनियां अपने प्रोजेक्ट में नियमों की अवहेलना करती हैं और उसकी मार ऐसे गरीबों और प्रवासियों को झेलनी पड़ती है जो रोज़ी रोटी के लिये हज़ारों किलोमीटर दूर से यहां आते हैं.”
उत्तराखंड में आई आपदा से जुड़े बचाव और राहत कार्यों का जिम्मा मंगलवार से सेना ने अपने हाथ में ले लिया. आज सुबह से सेना ने तपोवन में क्षतिग्रस्त एनटीपीसी पॉवर प्लांट में फंसे लोगों को निकालने का अभियान नए सिरे से शुरू किया है. मेजर जनरल राजीव छिब्बर ने मौके पर न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, "ये एक बहुत कठिन और चुनौतीपूर्ण काम है. लेकिन हम मशीनों और मनवीय संसाधनों, दोनों की मदद ले रहे हैं." सेना के हेलीकॉप्टर भी इस काम में लगाए गए हैं.
छिब्बर ने हमें जानकारी दी कि 37 लोग अभी भी सुरंग के भीतर फंसे हुए हैं. सेना के आने से बचाव कार्य में तेजी आ गई है.
उधर आपदा से जूझ रहे राहतकर्मियों के लिये सोमवार का दिन काफी कठिन रहा. उन्हें किसी को जीवित निकालने में कामयाबी नहीं मिली. हालांकि रविवार को 12 लोगों को एनटीपीसी की एक साइट से बचाया गया था. पुलिस ने जानकारी दी कि सोमवार शाम तक अलग अलग जगहों से 28 लोगों के शव बरामद किये जा चुके थे. अटकलें हैं कि इस हादसे में कुल 250 से अधिक लोगों की जान गई है. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सोमवार को खुद 200 से अधिक लोगों के लापता होने की बात मानी है.
राहत एजेंसियों और अर्धसैनिक बलों के साथ लगी रही सेना
न्यूज़लॉन्ड्री की टीम ने ऋषिगंगा और धौलीगंगा में आपदा की मौके पर जाकर जानकारी ली है. लाता घाटी में सरहदी इलाके में 13.5 मेगावॉट के ऋषिगंगा हाइडिल प्रोजेक्ट की जगह अब मलबे के ढेर के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि कई लोग या तो बह गये या अब भी मलबे के नीचे दबे हैं. यहां प्रोजेक्ट के दूसरी ओर के गांवों का देश से ज़मीनी संपर्क फिलहाल कटा हुआ है क्योंकि नदी पर बना महत्वपूर्ण पुल बह गया है.
राहत कार्य में जुटे स्थानीय निवासी संतोष पंवार ने हमें बताया, “यहां अनुमान है कि 40 से 50 लोग मलबे में दबे हैं. कुछ लोग बह भी गये हैं. यहां प्रवासी मज़दूर भी थे और प्रोजेक्ट का स्टाफ भी, जो यहीं लेबर कालोनी में रहते थे. उन्हें भी भागने का मौका नहीं मिला. कुछ पुलिस कर्मी भी ड्यूटी पर थे उनमें से भी कुछ लापता हैं.”
उधर इस स्पॉट से करीब 4 किलोमीटर दूर धौलीगंगा पर बन रहे 520 मेगावॉट के एनटीपीसी पावर प्रोजेक्ट जिसे तपोवन विष्णुगाड़ परियोजना के नाम से जाना जाता है, में भी भारी तबाही हुई है. यह निर्माणाधीन प्रोजेक्ट था.
रविवार को यहां से 12 लोगों को सुरक्षित निकाला गया था. लेकिन सोमवार को करीब 2 किलोमीटर लम्बी सुरंग के लगभग 900 मीटर के हिस्से में फंसे लोगों को निकालने के लिये राहतकर्मी पूरा दिन जूझते रहे. सेना के जवान, भारत तिब्बत सीमा पुलिस, राज्य और केंद्र की एजेंसियां (एसडीआरएफ और एनडीआरएफ) के जवान लगातार अपने काम में लगे हुए हैं, लेकिन उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली.
एक मोटी मोटा अनुमान है कि इस सुरंग में 100 से अधिक लोग फंस गए थे. सुरंग में इतनी गाद भर गई है कि उसे हटाने में राहत कर्मियों को बहुत दिक्कतें आ रही हैं.
आईटीबीपी के एक राहतकर्मी ने मौके पर कहा, “कल (रविवार को) 12 वर्करों को सेफ निकाला था, उनका उपचार चल रहा है. जो सुरंग आप सामने देख रहे हैं इनमें भी राहत कर्मी भीतर जाकर रास्ता बनाने की कोशिश कर रहे हैं.” लेकिन हमारी टीम ने साफ देखा कि एनटीपीसी के धौलीगंगा में सुरंग में इतना मलबा भरा था कि उसे जेसीबी मशीन के इस्तेमाल के बावजूद हटाकर रास्ता नहीं बन पा रहा था.
उत्तराखंड पुलिस ने बताया कि अंधेरा होने के बाद भी सुरंग में राहत का काम जारी है. पुलिस ने यह भी ट्वीट किया कि सोमवार शाम तक 28 शव निकाले जा चुके थे.
‘प्रवासी मज़दूरों पर पड़ी मार’
आपदा के शिकार लोगों में बहुत सारे प्रवासी मजदूर हैं. इनमें उत्तराखंड के अलावा, पश्चिम बंगाल, पंजाब, यूपी, बिहार और झारखंड के साथ जम्मू कश्मीर और नेपाल के मज़दूर भी हैं. केंद्रीय बिजली मंत्री आरके सिंह ने कहा कि वह सुनिश्चित करेंगे कि एनटीपीसी में मारे गये लोगों के परिवार को 20 लाख रुपये का मुआवाज़ा मिले. दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का कहना है कि आपदाओं की मार गरीबों पर पड़ना सामान्य बात हो गई है.
घटना के बाद चमोली जिले के दौरे पर पहुंचे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने रविवार को घोषणा की थी कि मृतकों के परिजनों को चार लाख रुपए की आर्थिक सहयाता दी जाएगी.
घटनास्थल पर पहुंचे सीपीआई (एमएल) के नेता इंद्रेश मैखुरी ने हमारी टीम से बातचीत में कहा कि जहां सरकार पर्यावरण के नियमों की धज्जियां उड़ा कर इतने संवेदनशील इलाके में प्रोजेक्ट लगा रही है वहीं वह लोगों के अधिकारों और जीवन के प्रति बिल्कुल बेपरवाह है.
मैखुरी कहते हैं, “जहां यह दोनों प्रोजेक्ट (ऋषिगंगा और धौलीगंगा) लगे हैं वह नंदादेवी बायोस्फियर रिज़र्व का बफर ज़ोन है. यहां स्थानीय लोगों को पत्ता तक तोड़ने नहीं दिया जाता लेकिन बड़ी-बड़ी निजी और सरकारी कंपनियां अपने प्रोजेक्ट में नियमों की अवहेलना करती हैं और उसकी मार ऐसे गरीबों और प्रवासियों को झेलनी पड़ती है जो रोज़ी रोटी के लिये हज़ारों किलोमीटर दूर से यहां आते हैं.”
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