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योगीजी की माया: टाइम मैगजीन का ‘विज्ञापन’ बना भारतीय मीडिया में ‘रिपोर्ट’
6 जनवरी को भारतीय मीडिया के कुछ प्रमुख चैनलों ने अमेरिका की प्रतिष्ठित “टाइम मैगजीन” के भारत संस्करण में छपे एक विज्ञापन को यूपी सरकार की तारीफ से भरी रिपोर्ट के रूप में दिखा दिया. इन चैनलों में मुख्य रूप से जी न्यूज, टीवी-9 भारतवर्ष, नेटवर्क-18 यूपी और एबीपी गंगा शामिल हैं.
ख़बर में बताया गया कि टाइम मैगजीन ने यूपी सरकार के कोविड से निपटने के तौर-तरीकों की तारीफ में एक ‘लेख’ लिखा है, जो देश के लिए गौरव की बात है. ज़ी न्यूज़ ने सब हेड में चलाया- ‘योगी आदित्यनाथ की विश्वप्रशंसा का ‘टाइम’!’ इसी तरह नेटवर्क-18 यूपी ने इस विज्ञापन को टाइम मैगज़ीन की खबर बताते हुए इसके ऊपर 15 मिनट का एक शो कर डाला. इस दौरान चैनल के एंकर और वरिष्ठ सहयोगी इस पर विस्तार से चर्चा करते रहे.
जिस ख़बर को ये चैनल टाइम मैगजीन में छपे लेख के हवाले से खबर बनाकर चला रहे थे, दरअसल वह लेख नहीं बल्कि मैगजीन के 21-28 दिसंबर के एडिशन में छपा यूपी सरकार का विज्ञापन था. जिस पर साफ- साफ ‘कंटेंट फ्रॉम यूपी गवर्मेंट’ लिखा था. हालांकि टाइम मैगज़ीन द्वारा शब्दों को घुमा-फिराकर लिखने के ऊपर भी सवाल खड़ा होता है. आखिर विज्ञापन को सीधे-सीधे ‘प्रायोजित’ या ‘विज्ञापन’ लिखने से बचने की क्या मजबूरी है. लेकिन भारत में अतिउत्साही एंकरों और खबरिया चैनलों ने तो हर चीज को नौटंकी और अतिवाद का जरिया बना दिया है. उन्हें ख़बर और विज्ञापन में अंतर नजर नहीं आया. पेज के डिजाइन, उसकी लिखावट से विज्ञापन समझ में आता है, उससे भी महत्वपूर्ण है कि टाइम में कोई भी लेख बिना बाइलाइन के कैसे छप सकता है!
टाइम मैगजीन ने न्यूजलॉन्ड्री को इस बारे में स्पष्टीकरण देते हुए लिखा है- “यह एक पेड कंटेंट है. जैसा कि विज्ञापन पेज पर ‘कंटेंट फ्रॉम यूपी गवर्मेंट’ का जिक्र भी किया गया है.”
इस पूरी गफलत और मीडिया की धमाचौकड़ी के पीछे सबसे पहली गलती उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दफ्तर के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से की गई. इस ट्विटर हैंडल ने गलतबयानी करते हुए 15 दिसंबर को इस विज्ञापन को ‘रिपोर्ट’ बताकर शेयर किया.
मुख्यमंत्री कार्यालय से यह ट्वीट आने के बाद यूपी बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और बोम्बे स्टॉक एक्सचेंज के चीफ एक्जीक्यूटिव आशीष चौहान ने भी इस विज्ञापन को रिपोर्ट बताते हुए अपने हैंडल से ट्वीट किया.
यहां से भारतीय मीडिया का एक हिस्सा इस खबर को ले उड़ा. सरकार की प्रशंसा करने को आतुर रहने वाला मीडिया का एक हिस्सा आगे आया. इन लोगों ने पत्रकारिता के मानदंड और तथ्यों क्रॉस चेक करने की जहमत भी नहीं उठाई.
6 जनवरी की सुबह नेटवर्क-18 के यूपी चैनल पर 16 मिनट के शो में एंकर बार-बार टाइम मैगजीन में छपा ‘लेख’ बताकर ख़बर पढ़ते रहे. चैनल के नेशनल एडिटर शैलेंद्र यांगू ने अपने विश्लेषण में इस घटना को योगीजी की उपलब्धि और देश ही नहीं विदेश में भी कोरोना से निपटने के लिए प्रशंसा योग्य कार्य बताया. उन्होंने यह भी लगे हाथ जोड़ दिया कि यूके से नए कोरोना स्ट्रेन के मामले सामने आने के बाद भी यूपी में ज्यादा मामले सामने नहीं आ रहे.
इसी तरह जी न्यूज ने ‘टाइम मैगजीन’ ने यूपी की योगी सरकार की प्रशंसा की’ नाम से शो चलाया, और बड़ी खबर के साथ बुलेटिन में भी पढ़ा.
टाइम में छपे इस विज्ञापन पर अगर गौर करें तो उसमें ऊपर ‘क़ॉन्टेंट फ्रॉम उत्तर प्रदेश’ साफ लिखा है. यूपी सरकार के इस विज्ञापन में ‘कोविड मृत्यु दर 1.3 प्रतिशत और रिकवरी रेट 94 प्रतिशत’ के अलावा ‘विषम परिस्थितियों में पॉजिटिव रहना सरल नहीं बल्कि ये नेतृत्व का कमाल है’. योगी के अलावा किसी और मुख्यमंत्री ये नहीं कर पाए. इसी तरह की तारीफ भरी बातें लिखी हैं. साथ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मुस्कुराते हुए तस्वीर भी लगी है.
दिलचस्प बात है कि नवंबर 2020 में इसी टाइम मैगजीन में योगी सरकार की कड़ी आलोचना की गई थी. तब कथित लव जिहाद कानून के चलते योगी आदित्यनाथ को ‘हार्डलाइन हिंदू राष्ट्रवादी साधू’ बताया गया था. इससे पहले मई 2019 में टाइम ने अपने कवर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ नाम से लेख लिखा था. तब बीजेपी के नेताओं ने और तमाम खबरिया चैनलों ने उसकी कड़ी आलोचना की थी.
यह विज्ञापन टाइम मैगजीन में पब्लिश होने से पहले यूपी के पत्रकारों के पास दिसम्बर की शुरुआत में एक प्रेस ब्रीफिंग के रूप में भी पहुंचा था. न्यूज़लॉन्ड्री के पास वह दस्तावेज मौजूद है. इसमें यूपी सरकार के कोविड संबंधी कामकाज जैसे- लॉकडाउन, कोविड हॉस्पिटल, टेस्टिंग आदि के बारे में बताया गया है. उस प्रेस रिलीज को तमाम छोटे-बड़े मीडिया संस्थान एडिटिंग करके पहले ही छाप चुके हैं.
सबसे पहले यह राजस्थान से पब्लिश होने वाले ‘फर्स्ट इंडिया’ नामक अंग्रेजी अखबार में छपा था. इसका संचालन ज़ी न्यूज़ के पूर्व एक्जीक्यूटिव एडिटर जगदीप चंद्र करते हैं. 5 दिसम्बर को अखबार ने ये प्रेस ब्रीफिंग लगभग इसी हेडलाइन और कंटेंट के साथ छापी थी.
इसके अलावा दैनिक अखबार डेली गार्जियन ने 9 नवंबर को इस प्रेस रिलीज को ख़बर बनाकर प्रकाशित किया था.
इसके एक हफ्ते बाद 14 दिसम्बर को तहलका ने इसी रिपोर्ट को इसी तरह छापा था. न्यूजलॉन्ड्री ने जब यहां रहने वाले एक कर्मचारी से संपर्क किया तो पता चला कि एक समय अपनी खोजी रिपोर्टिंग के लिए मशहूर रही तहलका मैगजीन को योगी सरकार के साथ थोड़ा सॉफ्ट रहने की नसीहत दी गई है.
कर्मचारी से जब पूछा गया कि सरकार की प्रेस रिलीज को रिपोर्ट बताकर क्यों छापा गया है, तो उसने कहा, “हम क्या कर सकते हैं? जॉब की कमी है और सैलरी भी कम है. हम यहां प्रबंधन के हाथों में लगभग क्लर्क बन चुके हैं.”
कर्मचारी ने आगे बताया, “इस तरह की रिपोर्ट करने के कारण ही इस बार हमें यूपी सरकार से काफी विज्ञापन मिला है. अगर आप उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता करना चाहते हो तो आपको हाथ में मोमबत्ती लेकर चलना होगा. सरकार वहां एएनआई जैसे कुछ गिने-चुने मीडिया हाउस के सिवा किसी को सवालों का जवाब नहीं देती.”
17 दिसम्बर को उत्तर प्रदेश के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी अमित मोहन का एक ओपिनियन पीस इंडियन एक्सप्रेस ने छापा था. जिसमें कोविड संकट से निपटने के तौर तरीकों को बताया गया था. इसे भी उस प्रेस ब्रीफिंग का छोटा रूप कहा जा सकता है.
मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार इस मुद्दे पर कहते हैं, “मेरा मानना ये है कि ये चैनल और पब्लिशिंग हाउस इस तरह की मूर्खता इसलिए करते हैं क्योंकि वे टेस्टिंग करते हैं कि समाज का कॉमन सेंस कितना खत्म हो चुका है. इसलिए वे इस तरह की हरकतें हर 10-15 दिन में करते हैं. ये खुद जानते हैं कि ये पेड एडवरटाइजमेंट है लेकिन ख़बर की तरह इसलिए चलाते हैं क्योंकि इनका इरादा लोगों का सेंस खत्म करना है.”
6 जनवरी को भारतीय मीडिया के कुछ प्रमुख चैनलों ने अमेरिका की प्रतिष्ठित “टाइम मैगजीन” के भारत संस्करण में छपे एक विज्ञापन को यूपी सरकार की तारीफ से भरी रिपोर्ट के रूप में दिखा दिया. इन चैनलों में मुख्य रूप से जी न्यूज, टीवी-9 भारतवर्ष, नेटवर्क-18 यूपी और एबीपी गंगा शामिल हैं.
ख़बर में बताया गया कि टाइम मैगजीन ने यूपी सरकार के कोविड से निपटने के तौर-तरीकों की तारीफ में एक ‘लेख’ लिखा है, जो देश के लिए गौरव की बात है. ज़ी न्यूज़ ने सब हेड में चलाया- ‘योगी आदित्यनाथ की विश्वप्रशंसा का ‘टाइम’!’ इसी तरह नेटवर्क-18 यूपी ने इस विज्ञापन को टाइम मैगज़ीन की खबर बताते हुए इसके ऊपर 15 मिनट का एक शो कर डाला. इस दौरान चैनल के एंकर और वरिष्ठ सहयोगी इस पर विस्तार से चर्चा करते रहे.
जिस ख़बर को ये चैनल टाइम मैगजीन में छपे लेख के हवाले से खबर बनाकर चला रहे थे, दरअसल वह लेख नहीं बल्कि मैगजीन के 21-28 दिसंबर के एडिशन में छपा यूपी सरकार का विज्ञापन था. जिस पर साफ- साफ ‘कंटेंट फ्रॉम यूपी गवर्मेंट’ लिखा था. हालांकि टाइम मैगज़ीन द्वारा शब्दों को घुमा-फिराकर लिखने के ऊपर भी सवाल खड़ा होता है. आखिर विज्ञापन को सीधे-सीधे ‘प्रायोजित’ या ‘विज्ञापन’ लिखने से बचने की क्या मजबूरी है. लेकिन भारत में अतिउत्साही एंकरों और खबरिया चैनलों ने तो हर चीज को नौटंकी और अतिवाद का जरिया बना दिया है. उन्हें ख़बर और विज्ञापन में अंतर नजर नहीं आया. पेज के डिजाइन, उसकी लिखावट से विज्ञापन समझ में आता है, उससे भी महत्वपूर्ण है कि टाइम में कोई भी लेख बिना बाइलाइन के कैसे छप सकता है!
टाइम मैगजीन ने न्यूजलॉन्ड्री को इस बारे में स्पष्टीकरण देते हुए लिखा है- “यह एक पेड कंटेंट है. जैसा कि विज्ञापन पेज पर ‘कंटेंट फ्रॉम यूपी गवर्मेंट’ का जिक्र भी किया गया है.”
इस पूरी गफलत और मीडिया की धमाचौकड़ी के पीछे सबसे पहली गलती उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दफ्तर के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से की गई. इस ट्विटर हैंडल ने गलतबयानी करते हुए 15 दिसंबर को इस विज्ञापन को ‘रिपोर्ट’ बताकर शेयर किया.
मुख्यमंत्री कार्यालय से यह ट्वीट आने के बाद यूपी बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और बोम्बे स्टॉक एक्सचेंज के चीफ एक्जीक्यूटिव आशीष चौहान ने भी इस विज्ञापन को रिपोर्ट बताते हुए अपने हैंडल से ट्वीट किया.
यहां से भारतीय मीडिया का एक हिस्सा इस खबर को ले उड़ा. सरकार की प्रशंसा करने को आतुर रहने वाला मीडिया का एक हिस्सा आगे आया. इन लोगों ने पत्रकारिता के मानदंड और तथ्यों क्रॉस चेक करने की जहमत भी नहीं उठाई.
6 जनवरी की सुबह नेटवर्क-18 के यूपी चैनल पर 16 मिनट के शो में एंकर बार-बार टाइम मैगजीन में छपा ‘लेख’ बताकर ख़बर पढ़ते रहे. चैनल के नेशनल एडिटर शैलेंद्र यांगू ने अपने विश्लेषण में इस घटना को योगीजी की उपलब्धि और देश ही नहीं विदेश में भी कोरोना से निपटने के लिए प्रशंसा योग्य कार्य बताया. उन्होंने यह भी लगे हाथ जोड़ दिया कि यूके से नए कोरोना स्ट्रेन के मामले सामने आने के बाद भी यूपी में ज्यादा मामले सामने नहीं आ रहे.
इसी तरह जी न्यूज ने ‘टाइम मैगजीन’ ने यूपी की योगी सरकार की प्रशंसा की’ नाम से शो चलाया, और बड़ी खबर के साथ बुलेटिन में भी पढ़ा.
टाइम में छपे इस विज्ञापन पर अगर गौर करें तो उसमें ऊपर ‘क़ॉन्टेंट फ्रॉम उत्तर प्रदेश’ साफ लिखा है. यूपी सरकार के इस विज्ञापन में ‘कोविड मृत्यु दर 1.3 प्रतिशत और रिकवरी रेट 94 प्रतिशत’ के अलावा ‘विषम परिस्थितियों में पॉजिटिव रहना सरल नहीं बल्कि ये नेतृत्व का कमाल है’. योगी के अलावा किसी और मुख्यमंत्री ये नहीं कर पाए. इसी तरह की तारीफ भरी बातें लिखी हैं. साथ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मुस्कुराते हुए तस्वीर भी लगी है.
दिलचस्प बात है कि नवंबर 2020 में इसी टाइम मैगजीन में योगी सरकार की कड़ी आलोचना की गई थी. तब कथित लव जिहाद कानून के चलते योगी आदित्यनाथ को ‘हार्डलाइन हिंदू राष्ट्रवादी साधू’ बताया गया था. इससे पहले मई 2019 में टाइम ने अपने कवर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ नाम से लेख लिखा था. तब बीजेपी के नेताओं ने और तमाम खबरिया चैनलों ने उसकी कड़ी आलोचना की थी.
यह विज्ञापन टाइम मैगजीन में पब्लिश होने से पहले यूपी के पत्रकारों के पास दिसम्बर की शुरुआत में एक प्रेस ब्रीफिंग के रूप में भी पहुंचा था. न्यूज़लॉन्ड्री के पास वह दस्तावेज मौजूद है. इसमें यूपी सरकार के कोविड संबंधी कामकाज जैसे- लॉकडाउन, कोविड हॉस्पिटल, टेस्टिंग आदि के बारे में बताया गया है. उस प्रेस रिलीज को तमाम छोटे-बड़े मीडिया संस्थान एडिटिंग करके पहले ही छाप चुके हैं.
सबसे पहले यह राजस्थान से पब्लिश होने वाले ‘फर्स्ट इंडिया’ नामक अंग्रेजी अखबार में छपा था. इसका संचालन ज़ी न्यूज़ के पूर्व एक्जीक्यूटिव एडिटर जगदीप चंद्र करते हैं. 5 दिसम्बर को अखबार ने ये प्रेस ब्रीफिंग लगभग इसी हेडलाइन और कंटेंट के साथ छापी थी.
इसके अलावा दैनिक अखबार डेली गार्जियन ने 9 नवंबर को इस प्रेस रिलीज को ख़बर बनाकर प्रकाशित किया था.
इसके एक हफ्ते बाद 14 दिसम्बर को तहलका ने इसी रिपोर्ट को इसी तरह छापा था. न्यूजलॉन्ड्री ने जब यहां रहने वाले एक कर्मचारी से संपर्क किया तो पता चला कि एक समय अपनी खोजी रिपोर्टिंग के लिए मशहूर रही तहलका मैगजीन को योगी सरकार के साथ थोड़ा सॉफ्ट रहने की नसीहत दी गई है.
कर्मचारी से जब पूछा गया कि सरकार की प्रेस रिलीज को रिपोर्ट बताकर क्यों छापा गया है, तो उसने कहा, “हम क्या कर सकते हैं? जॉब की कमी है और सैलरी भी कम है. हम यहां प्रबंधन के हाथों में लगभग क्लर्क बन चुके हैं.”
कर्मचारी ने आगे बताया, “इस तरह की रिपोर्ट करने के कारण ही इस बार हमें यूपी सरकार से काफी विज्ञापन मिला है. अगर आप उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता करना चाहते हो तो आपको हाथ में मोमबत्ती लेकर चलना होगा. सरकार वहां एएनआई जैसे कुछ गिने-चुने मीडिया हाउस के सिवा किसी को सवालों का जवाब नहीं देती.”
17 दिसम्बर को उत्तर प्रदेश के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी अमित मोहन का एक ओपिनियन पीस इंडियन एक्सप्रेस ने छापा था. जिसमें कोविड संकट से निपटने के तौर तरीकों को बताया गया था. इसे भी उस प्रेस ब्रीफिंग का छोटा रूप कहा जा सकता है.
मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार इस मुद्दे पर कहते हैं, “मेरा मानना ये है कि ये चैनल और पब्लिशिंग हाउस इस तरह की मूर्खता इसलिए करते हैं क्योंकि वे टेस्टिंग करते हैं कि समाज का कॉमन सेंस कितना खत्म हो चुका है. इसलिए वे इस तरह की हरकतें हर 10-15 दिन में करते हैं. ये खुद जानते हैं कि ये पेड एडवरटाइजमेंट है लेकिन ख़बर की तरह इसलिए चलाते हैं क्योंकि इनका इरादा लोगों का सेंस खत्म करना है.”
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