Newslaundry Hindi
अखिलेश, मायावती और तेजस्वी इस इंतजार में हैं कि जनता बीजेपी को खारिज कर इन्हें तख्त पर बैठा देगी!
भारतीय राजनीति का 1990 से लेकर 2014 तक का समय सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए काफी मुफीद रहा है. ऐसा नहीं है कि उन 24 वर्षों में सब कुछ दलितों-पिछ़ड़ों के लिए ही हुआ, लेकिन यह ज़रूर है कि इन वर्षों में अपवादों को छोड़कर घोषित तौर पर कोई ऐसे कानून नहीं बने जो दलितो-पिछड़ों और कुछ हद तक अल्पसंख्यकों के पूरी तरह खिलाफ रहे हों. हकीकत तो यह भी है कि इन 24 वर्षों में से छह वर्ष तो सीधे तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी, फिर भी भारत के मूल संवैधानिक ढांचे से बहुत हद तक छेड़छाड़ नहीं की गयी.
इसके कारण कई हो सकते हैं, लेकिन जो सबसे प्रमुख कारण थे वह यह कि उस समय लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, कांशीराम, शरद यादव, मायावती, रामविलास पासवान जैसे दलित-पिछड़ों के सशक्त नेता मौजूद थे. दूसरा कारण यह भी था कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी आरएसएस का जितना भी बड़ा मुखौटा रहे हों, अंततः उनका पालन-पोषण नेहरुवियन समयकाल में हुआ था. चूंकि अपनी जिंदगी के शुरूआती वर्ष उन्होंने नेहरू, गांधी, आंबेडकर, लोहिया, एके गोपालन, नंबूदरीपाद जैसे महापुरुषों के राजनीतिक औरा को देखते हुए गुजारे थे, इसलिए आरएसएस का जितना भी दबाव हो, घनघोर सांप्रदायिक व जातिवादी होने के बावजूद उसी रूप में उसे लागू करना पूरी तरह संभव नहीं था.
तीसरी बात शायद यह भी थी कि दक्षिणपंथी जनसंघ-बीजेपी जितना भी घनघोर हिन्दुत्ववादी हो, कल्याण सिंह व उमा भारती जैसे पिछड़े नेताओं के चलते पिछड़ों के खिलाफ कोई कदम उठाने या योजना बनाने से कतराती थी.
2014 के बाद राजनीतिक समयकाल पूरी तरह बदल गया. कांशीराम का बहुत पहले निधन हो चुका था. लालू यादव भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे गए. मुलायम सिंह की राजनीतिक व स्वास्थ्य संबंधी ताकतें काफी क्षीण हो गईं, मायावती भ्रष्टाचार के दबाव के चलते कमजोर हुईं और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से तरह-तरह के दबाव डालकर उन्हें स्पष्ट व कठोर निर्णय लेने से रोक दिया गया. अखिलेश यादव भले ही जनता के जोरदार समर्थन से मुख्यमंत्री बने हों, उनका राजनीति करने का तरीका पूरी तरह मध्यमवर्गीय था. परिणाम यह हुआ कि मुख्यमंत्री की गद्दी से उतरते ही वह पूरी तरह दिशाहीन हो गये.
उदाहरण के लिए, मोदी के दूसरी बार सत्ता मे आने के बाद के दो बड़े फैसलों को लिया जा सकता है. मोदी सरकार ने पिछले साल अनुच्छेद 370 को खत्म किया और सीएए लागू किया. अनुच्छेद 370 सीधे तौर पर कश्मीर से जुड़ा मसला था जिसके तहत कश्मीर को न्यूनतम स्वायत्तता रह गयी, लेकिन मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने को इस रूप में पेश किया जैसे कि कश्मीर के मुसलमानों को इसके खात्मे के बाद औकात में ला दिया गया है. इसे इस रूप में भी पेश किया गया कि अनुच्छेद 370 का एकमात्र मकसद कश्मीर में बाहरी लोगों (खासकर हिन्दुओं को) जमीन खरीदने पर रोक लगायी गयी है. इसी तरह सीएए-एनआरसी का मसला इस देश के हर उस नागरिक को परेशान करने का सबसे खतरनाक कदम था जिनके पास अपना वजूद साबित करने की हैसियत नहीं है. और यह सबसे बुरी तरह मुसलमानों व गरीबों पर लागू होना था. इसके खिलाफ सबसे शालीन लेकिन जबर्दस्त विरोध दिल्ली के शाहीनबाग व पूरे उत्तर प्रदेश में हुआ, लेकिन समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी ने इस मसले पर पूरी तरह चुप्पी साध ली, जबकि 1990 के बाद मुसलमानों का वोट मोटे तौर पर उत्तर प्रदेश में इन्हीं दो पार्टियों को मिलता रहा है.
इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य व सांसद आजम खान को तरह-तरह के झूठे आरोपों में योगी सरकार ने जेल में बंद कर रखा है, लेकिन समाजवादी पार्टी ने उनके पक्ष में उतरना भी मुनासिब नहीं समझा. अखिलेश यादव को लग रहा है कि कहीं जनता में यह मैसेज न चला जाए कि वह या उनकी पार्टी मुसलमानों से सहानुभूति रखती है. इसी तरह जितना कहर योगी सरकार ने सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश के मुसलमानों और मुखालफ़त कर रहे नागरिकों और नेताओं पर ढहाये हैं, उसके खिलाफ समाजवादी पार्टी ने कुछ नहीं किया है. और तो और, उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ भी आंदोलन की जद में था, वहां पर राज्य सरकार ने आंदोलनकारियों के ऊपर इतने बर्बर अत्याचार किए लेकिन अखिलेश यादव आंदोलनकारियों का हाल तक लेने नहीं पहुंचे जबकि आजमगढ़ उनका संसदीय क्षेत्र है.
इसी तरह नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानून के खिलाफ पूरे देश के किसान आंदोलन कर रहे हैं लेकिन अखिलेश यादव, मायावती और तेजस्वी यादव ने ट्वीट पर खानापूर्ति करके अपना कर्तव्य निभा दिया. हां, अखिलेश यादव ने इस बीच एक प्रेस कांफ्रेंस जरूर की लेकिन इसके अलावा किसानों के समर्थन में सिर्फ ट्विटर पर दिखायी पड़े हैं, जबकि इन तीनों नेताओं का सामाजिक आधार किसान, किसानी पर आश्रित मजदूर ही अधिक हैं, लेकिन वैचारिक मतिभ्रम के कारण कोई फैसला लेने का माद्दा ही नहीं रह गया है. अखिलेश, मायावती या तेजस्वी इस इंतजार में हैं कि जनता जब बीजेपी को खारिज कर देगी तो जनता स्वतः चलकर उनके पास ही आएगी और तख्त पर बैठा देगी!
अन्यथा क्या कारण है कि जिस राम मनोहर लोहिया के नाम पर वे राजनीति चला रहे हैं उनके बताये सप्तक्रांति के एक भी बिन्दु पर अखिलेश या तेजस्वी ने आंदोलन की बात तो छोड़ ही दीजिए, प्रदर्शन तक नहीं किया है. या फिर मायावती ने डॉ. आंबेडकर के बताये रास्ते पर कोई आंदोलन किया हो.
आज से सौ साल से भी अधिक पहले वर्ष 1909 में यूएन मुखर्जी ने ‘’हिन्दूः डाईंग रेस’’ नामक एक किताब लिखी थी. किताब की हकीकत जो भी हो, लेकिन किताब आरएसएस के पूर्व अवतार हिन्दू महासभा को भा गयी और इसके कई एडिशन छपवाये. आज भी आरएसएस व बीजेपी उसी झूठ को अपने विस्तार में इस्तेमाल कर रहा है, जबकि हर एक तर्क और आंकड़ों से मुखर्जी की बातें बार-बार गलत साबित होती रही हैं.
आज सामाजिक न्याय की ताकतें पूरी तरह दिशाहीन हो गयी हैं, वे अपनी प्राथमिकता ही नहीं तय कर पा रहे हैं कि उन्हें करना क्या है!
(साभार- जनपथ)
भारतीय राजनीति का 1990 से लेकर 2014 तक का समय सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए काफी मुफीद रहा है. ऐसा नहीं है कि उन 24 वर्षों में सब कुछ दलितों-पिछ़ड़ों के लिए ही हुआ, लेकिन यह ज़रूर है कि इन वर्षों में अपवादों को छोड़कर घोषित तौर पर कोई ऐसे कानून नहीं बने जो दलितो-पिछड़ों और कुछ हद तक अल्पसंख्यकों के पूरी तरह खिलाफ रहे हों. हकीकत तो यह भी है कि इन 24 वर्षों में से छह वर्ष तो सीधे तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी, फिर भी भारत के मूल संवैधानिक ढांचे से बहुत हद तक छेड़छाड़ नहीं की गयी.
इसके कारण कई हो सकते हैं, लेकिन जो सबसे प्रमुख कारण थे वह यह कि उस समय लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, कांशीराम, शरद यादव, मायावती, रामविलास पासवान जैसे दलित-पिछड़ों के सशक्त नेता मौजूद थे. दूसरा कारण यह भी था कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी आरएसएस का जितना भी बड़ा मुखौटा रहे हों, अंततः उनका पालन-पोषण नेहरुवियन समयकाल में हुआ था. चूंकि अपनी जिंदगी के शुरूआती वर्ष उन्होंने नेहरू, गांधी, आंबेडकर, लोहिया, एके गोपालन, नंबूदरीपाद जैसे महापुरुषों के राजनीतिक औरा को देखते हुए गुजारे थे, इसलिए आरएसएस का जितना भी दबाव हो, घनघोर सांप्रदायिक व जातिवादी होने के बावजूद उसी रूप में उसे लागू करना पूरी तरह संभव नहीं था.
तीसरी बात शायद यह भी थी कि दक्षिणपंथी जनसंघ-बीजेपी जितना भी घनघोर हिन्दुत्ववादी हो, कल्याण सिंह व उमा भारती जैसे पिछड़े नेताओं के चलते पिछड़ों के खिलाफ कोई कदम उठाने या योजना बनाने से कतराती थी.
2014 के बाद राजनीतिक समयकाल पूरी तरह बदल गया. कांशीराम का बहुत पहले निधन हो चुका था. लालू यादव भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे गए. मुलायम सिंह की राजनीतिक व स्वास्थ्य संबंधी ताकतें काफी क्षीण हो गईं, मायावती भ्रष्टाचार के दबाव के चलते कमजोर हुईं और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से तरह-तरह के दबाव डालकर उन्हें स्पष्ट व कठोर निर्णय लेने से रोक दिया गया. अखिलेश यादव भले ही जनता के जोरदार समर्थन से मुख्यमंत्री बने हों, उनका राजनीति करने का तरीका पूरी तरह मध्यमवर्गीय था. परिणाम यह हुआ कि मुख्यमंत्री की गद्दी से उतरते ही वह पूरी तरह दिशाहीन हो गये.
उदाहरण के लिए, मोदी के दूसरी बार सत्ता मे आने के बाद के दो बड़े फैसलों को लिया जा सकता है. मोदी सरकार ने पिछले साल अनुच्छेद 370 को खत्म किया और सीएए लागू किया. अनुच्छेद 370 सीधे तौर पर कश्मीर से जुड़ा मसला था जिसके तहत कश्मीर को न्यूनतम स्वायत्तता रह गयी, लेकिन मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने को इस रूप में पेश किया जैसे कि कश्मीर के मुसलमानों को इसके खात्मे के बाद औकात में ला दिया गया है. इसे इस रूप में भी पेश किया गया कि अनुच्छेद 370 का एकमात्र मकसद कश्मीर में बाहरी लोगों (खासकर हिन्दुओं को) जमीन खरीदने पर रोक लगायी गयी है. इसी तरह सीएए-एनआरसी का मसला इस देश के हर उस नागरिक को परेशान करने का सबसे खतरनाक कदम था जिनके पास अपना वजूद साबित करने की हैसियत नहीं है. और यह सबसे बुरी तरह मुसलमानों व गरीबों पर लागू होना था. इसके खिलाफ सबसे शालीन लेकिन जबर्दस्त विरोध दिल्ली के शाहीनबाग व पूरे उत्तर प्रदेश में हुआ, लेकिन समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी ने इस मसले पर पूरी तरह चुप्पी साध ली, जबकि 1990 के बाद मुसलमानों का वोट मोटे तौर पर उत्तर प्रदेश में इन्हीं दो पार्टियों को मिलता रहा है.
इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य व सांसद आजम खान को तरह-तरह के झूठे आरोपों में योगी सरकार ने जेल में बंद कर रखा है, लेकिन समाजवादी पार्टी ने उनके पक्ष में उतरना भी मुनासिब नहीं समझा. अखिलेश यादव को लग रहा है कि कहीं जनता में यह मैसेज न चला जाए कि वह या उनकी पार्टी मुसलमानों से सहानुभूति रखती है. इसी तरह जितना कहर योगी सरकार ने सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश के मुसलमानों और मुखालफ़त कर रहे नागरिकों और नेताओं पर ढहाये हैं, उसके खिलाफ समाजवादी पार्टी ने कुछ नहीं किया है. और तो और, उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ भी आंदोलन की जद में था, वहां पर राज्य सरकार ने आंदोलनकारियों के ऊपर इतने बर्बर अत्याचार किए लेकिन अखिलेश यादव आंदोलनकारियों का हाल तक लेने नहीं पहुंचे जबकि आजमगढ़ उनका संसदीय क्षेत्र है.
इसी तरह नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानून के खिलाफ पूरे देश के किसान आंदोलन कर रहे हैं लेकिन अखिलेश यादव, मायावती और तेजस्वी यादव ने ट्वीट पर खानापूर्ति करके अपना कर्तव्य निभा दिया. हां, अखिलेश यादव ने इस बीच एक प्रेस कांफ्रेंस जरूर की लेकिन इसके अलावा किसानों के समर्थन में सिर्फ ट्विटर पर दिखायी पड़े हैं, जबकि इन तीनों नेताओं का सामाजिक आधार किसान, किसानी पर आश्रित मजदूर ही अधिक हैं, लेकिन वैचारिक मतिभ्रम के कारण कोई फैसला लेने का माद्दा ही नहीं रह गया है. अखिलेश, मायावती या तेजस्वी इस इंतजार में हैं कि जनता जब बीजेपी को खारिज कर देगी तो जनता स्वतः चलकर उनके पास ही आएगी और तख्त पर बैठा देगी!
अन्यथा क्या कारण है कि जिस राम मनोहर लोहिया के नाम पर वे राजनीति चला रहे हैं उनके बताये सप्तक्रांति के एक भी बिन्दु पर अखिलेश या तेजस्वी ने आंदोलन की बात तो छोड़ ही दीजिए, प्रदर्शन तक नहीं किया है. या फिर मायावती ने डॉ. आंबेडकर के बताये रास्ते पर कोई आंदोलन किया हो.
आज से सौ साल से भी अधिक पहले वर्ष 1909 में यूएन मुखर्जी ने ‘’हिन्दूः डाईंग रेस’’ नामक एक किताब लिखी थी. किताब की हकीकत जो भी हो, लेकिन किताब आरएसएस के पूर्व अवतार हिन्दू महासभा को भा गयी और इसके कई एडिशन छपवाये. आज भी आरएसएस व बीजेपी उसी झूठ को अपने विस्तार में इस्तेमाल कर रहा है, जबकि हर एक तर्क और आंकड़ों से मुखर्जी की बातें बार-बार गलत साबित होती रही हैं.
आज सामाजिक न्याय की ताकतें पूरी तरह दिशाहीन हो गयी हैं, वे अपनी प्राथमिकता ही नहीं तय कर पा रहे हैं कि उन्हें करना क्या है!
(साभार- जनपथ)
Also Read
-
Hey Cockroaches, while you were protesting, Godi-Jeevis were eating Melody 🪲 TV Newsance 343
-
Hafta 590: The Norway question that shook Modi’s tour and Press Freedom
-
CJP can endure the meme cycle. But can it articulate what kind of India it’s fighting for?
-
Your favourite viral column might have been written by AI. Now what?
-
A trail of grief, little accountability: The Marion Biotech story after 68 children deaths