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ढाल में पड़ती दरार: कैसे सुंदरबन के जंगल मर रहे हैं और बंगाल के लिए चक्रवातों का खतरा बढ़ा रहे हैं

18 मई 2020 की शाम थी, बाकी सारी दुनिया की तरह बंगाल भी कोरोनावायरस महामारी की चपेट में था. भारत सरकार ने देशभर में महामारी को फैलने से रोकने के लिए सख्त लॉकडाउन लगा दिया था जिसकी वजह से अधिकतर लोग अपने घरों में थे.

शाम के 5:45 बजे तूफान आ गया, अक्षरशः. अमफन चक्रवात बंगाल के तटीय क्षेत्रों से टकराया और अपने रास्ते में तबाही मचाता चला गया.

अमफन, पिछले 300 वर्षों में बंगाल की खाड़ी से निकलने वाला सबसे विकराल चक्रवात था. टकराने के बाद 155-165 किलोमीटर प्रति घंटे हवा की रफ्तार की वजह से इसे पांचवीं श्रेणी का सुपर साइक्लोन अर्थात महाचक्रवात बताया गया. ऐसा चक्रवात जिसमें टकराने से पहले हवा की रफ्तार 260 किलोमीटर प्रति घंटा तक जा सकती है. राज्य सरकार के अनुमानों से, अमफन ने राज्य की करीब 60 प्रतिशत आबादी को प्रभावित किया और करीब एक लाख करोड़ का नुकसान किया.

बंगाल का सुंदरबन क्षेत्र सबसे बुरी तरह से प्रभावित हुआ, सुंदरबन एक द्वीपों का समूह है जो बंगाल की खाड़ी में मिलने से पहले, गंगा और ब्रह्मपुत्र के संगम के तटीय क्षेत्र में बसे हैं. यहां विश्व का सबसे बड़े मैंग्रोव वन हैं- मैंग्रोव अर्थात उष्णकटिबंधीय वृक्षों के झुरमुट. अमफन चक्रवात खेती और घरों को उजाड़ते हुए सुंदरबन से गुज़रा.

यही विचार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के द्वारा भी दोहराए गए जिन्होंने 5 जून को कहा कि इलाके का 28% हिस्सा पूरी तरह तबाह हो चुका है, यानी कुल 4263 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में से लगभग 1200 वर्ग किलोमीटर. एक प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा, "सुंदरबन खत्म हो गया."

ऐसा पहली बार नहीं है कि सुंदरबन को किसी चक्रवात को सबसे ज्यादा झेलना पड़ा, न ही यह आखरी बार है. पिछले 23 सालों में इस इलाके में 13 महाचक्रवात देखे हैं. 2019 से 12 महीने में तीन चक्रवात आए हैं. मई 2019 में फानी, नवंबर 2019 में बुलबुल और इस साल मई में अमफन.

इस तबाही की पराकाष्ठा कहीं ज्यादा बढ़ जाती है जब आप यह याद करते हैं कि सुंदरबन में रहने वाले 70 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन जीते हैं जहां प्रति व्यक्ति आय 13300 रुपए प्रतिमाह है.

सुंदरबन के 102 टापुओं में से 54 पर वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 45 लाख लोग रहते हैं. अधिकतर लोग जीवन यापन के लिए कृषि पर निर्भर रहते हैं, यहां की मुख्य फसल धान है. इसके अतिरिक्त और पैसे मछली पकड़ना, मछली पालन, शहद इकट्ठा करना और केकड़े पकड़ना है.

अमफन चक्रवात के 6 महीने बाद भी सुंदरबन के लोग अपने बिखरे हुए जीवन के टुकड़े समेट रहे हैं. क्यों सुंदरबन इतने चक्रवात झेलता है? और यहां की प्राकृतिक परिस्थितियों और लोगों पर इस बार-बार होने वाली तबाही का क्या असर पड़ता है?

सुंदरबन की परेशानियों का सरल जवाब बंगाल की खाड़ी से उसकी नज़दीकी है. हिंद महासागर के उत्तरपूर्वी घुमाव क्षेत्र से अक्सर चक्रवात निकलते हैं, Weather Underground के अनुसार इतिहास के 35 सबसे खतरनाक चक्रवाती में से 26 यहीं से निकले हैं.

और इस क्षेत्र को कुछ बचा सकता है, जो सही अर्थों में बाकी राज्य को भी बचा सकता है, वो हैं सुंदरबन के मैंग्रोव वन, जो मर रहे हैं.

निर्वनीकरण, और लकड़ी का काला बाज़ार

"बाकी बंगाल, खास तौर पर कोलकाता, सुंदरबन के वनों की वजह से कभी चक्रवातों का असली विकराल रूप नहीं देखता."

यह कहना है जयंत सेन का. जयंत एक पर्यावरणविद हैं जिन्होंने पिछले पांच सालों से ज्यादा सुंदरबन के संरक्षण पर काम किया है. उनका एनजीओ, पुरोनो कोलकातार् गोल्पो, अमफन के बाद हरकत में आया और उन्होंने सुंदरबन के लोगों को पुनर्वास इत करने के प्रयास किए और कुछ टापू के तटीय क्षेत्रों में वृक्षारोपण अभियान चलाया.

जयंत के उपरोक्त विचार के पीछे शोध के तथ्य हैं. यह सर्वविदित है कि मैंग्रोव वन, तूफान और चक्रवातों के वेग को कम कर देते हैं. 2013 में फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में इंगित किया कि मैनग्रोव वन हरिकेनों को भी पांचवीं श्रेणी से तीसरी श्रेणी तक हल्का कर सकते हैं जिसे "मैंग्रोव न्यूनयन प्रभाव" कहा जाता है. हरिकेन अमेरिका में आने वाले उष्णकटिबंधीय तूफानों को कहते हैं जो काफी कुछ चक्रवातों की तरह ही होते हैं.

पर पिछले 250 सालों में सुंदरबन के मैंग्रोव वन इस प्राकृतिक ढाल में दरारें पड़ गई हैं. बंगाल सरकार की पर्यावरण परिवर्तन कार्यवाही योजना बताती है कि 1989 से उसके वन्य प्रदेश में पांच प्रतिशत की कमी आई है, इसके बावजूद जबकि क्षेत्र को पहले से ही सुरक्षित जैव आरक्षित क्षेत्र घोषित किया जा चुका है.

सुंदरबन के मैंग्रोव जो कि चक्रवातों की ढाल के रूप में कार्य करते हैं
सतजेलिया गांव निवासी अरुण सरकार

इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण विलुप्त होते सुंदरी पेड़ों में कमी होना है, जो यहां पाए जाने वाली मैंग्रोव की सबसे बड़ी प्रजाति है और उसी से इस इलाके का नाम पड़ा है. यह पेड़ अब बहुत दुर्लभ हो गया है, प्राकृतिक संरक्षण कि अंतरराष्ट्रीय यूनियन ने इसे विलुप्त होने के खतरे को झेल रही प्रजाति की श्रेणी में रखा है.

दयापुर टापू के सतजेलिया गांव के अरुण सरकार कहते हैं, "जब मैं छोटा था तो सुंदरी के पेड़ हमारे टापू के हर किनारे पर कतार में लगे होते थे. अब तो शायद ही कभी कोई पेड़ दिखाई दे जाए."

सुंदरी प्रजाति एक "ऊपर से मार" देने वाली बीमारी से मर रही है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार इसके कई कारण हैं और इनमें "अत्यधिक बाढ़", "मिट्टी का बढ़ता खारापन" और "चक्रवातों से पड़ने वाला दबाव" भी शामिल हैं.

वनों की कटाई भी एक बहुत बड़ा कारण है. 1987 तक यह कटाई बेरोकटोक चलती रही जबकि सुंदरबन के मैंग्रोव वन यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल घोषित थे. अब, पश्चिम बंगाल के 2006 में लागू हुए वन रहित क्षेत्रों में वृक्ष रक्षा और संरक्षण कानून के अंतर्गत सुंदरबन में पेड़ काटने पर एक साल के कारावास और पांच हजार रुपए तक के हर्ज़ाने का प्रावधान है.

फिर भी इस इलाके में आज भी पेड़ गिराए जा रहे हैं. मैनग्रोव के वन अब फैलती हुई लकड़ी की गुपचुप तस्करी के व्यापार का सहारा बन गए हैं.

सतजेलिया के निवासी रतन मोंडल स्वीकार करते हैं कि वह सुंदरी जैसे वृक्षों की शाखाएं काटते हैं क्योंकि वह उनके लिए "आय का एकमात्र ज़रिया" है. बार-बार आने वाले चक्रवातों ने उनके धान के खेतों को तबाह कर दिया है जिसकी वजह से वह कहते हैं कि उन्हें घने जंगलों में पेड़ काटने के लिए मजबूर होना पड़ा.

दयापुर के निवासी रमेश मोंडल बताते हैं कि जितने भी पेड़ गिराए जाते हैं, उनमें से अधिकतर सरहद के पार बांग्लादेशी व्यापारियों को बेचे जाते हैं. वे कहते हैं, "सुंदरी के पेड़ की एक फुट लकड़ी करीब 500 रुपए की पड़ती है. तो आप कल्पना कीजिए 10 या 15 फीट का पेड़ हमारी कितनी कमाई करा देगा."

बांग्लादेशी अखबार डेली स्टार के द्वारा की गई एक खोजी रिपोर्ट ब्यौरा देती है- सुंदरबन से आने वाली लकड़ी अवैध बाजार में 1750 रुपए प्रति घन फिट तक बिकती है. यह बांग्लादेश तक आपस में जुड़ी हुई नदियों के द्वारा लाई जाती है और सीमावर्ती जिले नेसराबाद के एक तैरते हुए बाजार में बेची जाती है. सारा लेन-देन नावों और मछली पकड़ने में इस्तेमाल किए जाने वाले छोटे जहाजों के जरिए होता है. यह एकदम खुली हुई बात है जिसमें सीमा के दोनों तरफ के वन्य अधिकारी शामिल हैं.

हमसे बात करने वाले सुंदरबन के नागरिकों ने हमें बताया कि उनके इस अवैध व्यापार में लगने का एक बड़ा कारण उनके पास अब खेती के लिए ज़मीन का न होना है.

राज्य सरकार के पर्यावरण परिवर्तन की कार्यवाही योजना के अनुसार सुंदरबन के वन रहित क्षेत्रों में खेती की भूमि मुख्यतः बार बार आने वाले चक्रवात, खेती के पिछड़े तौर-तरीके और बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण, 2002 से 2009 के बीच 2149 वर्ग किलोमीटर से घटकर 1691 वर्ग किलोमीटर रह गई. हालांकि शहद इकट्ठा करना और मछली पकड़ना अभी भी आय के साधन हैं, लेकिन लकड़ी बेचना कहीं ज्यादा आर्थिक दृष्टि से आकर्षक है.

अरुण सरकार भी इसकी पुष्टि करते हैं, चीन का कहना है कि "लोगों के पास ज़िंदा रहने के लिए जंगल के अलावा और कोई विकल्प नहीं है."

परिणाम स्वरूप सुंदरबन के मैंग्रोव वन पिछले 200 सालों में 16700 वर्ग किलोमीटर से घटकर 9630 वर्ग किलोमीटर तक सिकुड़ गए हैं, इसमें भारत और बांग्लादेश दोनों ही देशों का क्षेत्र आता है और दोनों ही देशों को हर साल आने वाले चक्रवातों से असुरक्षित छोड़ देता है.

अरुण का कहना है कि मैनग्रोव मर रहे हैं. वे बताते हैं, "अगर हम जंगलों में जाएं तो देख पाएंगे कि मैनग्रोव के बहुत सारे वृक्षों की पत्तियां पीली पड़ गई हैं. इसका अर्थ है कि वह मर रहे हैं."

बढ़ता तापमान और खारापन

सुंदरबन के रक्षा कवच की तबाही और चक्रवातों की भरमार का एक और बहुत बड़ा कारण है, पर्यावरण परिवर्तन.

मैंग्रोव के वृक्ष 10 से 19 डिग्री सेल्सियस के पानी में उगते हैं. अगर तापमान वृक्षों के अनुकूल इस सीमा से थोड़ा भी इधर उधर होता है, तो वृक्ष मरने लगते हैं.

2012 की बंगाल पर्यावरण कार्यवाहक योजना के अनुसार पिछले 30 सालों में सुंदरबन में औसत तापमान प्रति दशक 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है, जो कि वैश्विक औसत 0.06 डिग्री से लगभग 8 गुना ज्यादा है.

इस अध्ययन के अनुसार इस समस्या को और भी बढ़ाने वाली बात यह है कि सुंदरबन में समुद्र का स्तर 1.2 इंच प्रतिवर्ष बढ़ा है, इसके अनुपात में जल स्तर बढ़ने का वैश्विक औसत 0.14 इंच है.

कोलकाता विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान के प्रोफेसर एसके मुखर्जी कहते हैं, "यह मुख्यतः पानी के pH स्तर के गिरने की वजह से होता है, जिसका कारण पानी में ऑक्सीजन का कम होता स्तर है. ऐसा होने का कारण भी कम होते मैंग्रोव वन हैं क्योंकि उनमें हवा और पानी दोनों ही से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड खींच लेने की क्षमता होती है."

वे यह भी कहते हैं, "समुद्र का बढ़ता स्तर और उसके साथ तेजी से बढ़ता तापमान, दुनिया के इस हिस्से में चक्रवातों को बढ़ाता है."

बढ़े हुए तापमान और समुद्र से निकटता दोनों ही में सुंदरबन के पानी में खारेपन को बढ़ाने में योगदान दिया है. जब भी चक्रवात आता है यह खारापन बढ़ जाता है क्योंकि चक्रवात के ज़रिए समुद्र का पानी नदियों और उनके टापुओं में पहुंच जाता है. इससे मिट्टी में खारे तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है जिसके परिणामस्वरूप मैनग्रोव के वृक्षों की जड़ें कमजोर और उनकी वृद्धि को हानि पहुंचती है.

पर्यावरणविद जयंत सेन कहते हैं किस का एक इलाज और ज्यादा बारिश होना हो सकता है. वह कहते हैं, "और ज्यादा तूफानों के कारण समुद्र से आने वाले खारे जल की बढ़ोतरी को बारिश का पानी सुंदरबन की नदियों में बराबर कर सकता है." लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. सुंदरबन में औसतन 1920 मिलीमीटर सालाना वर्षा होती है, और यह औसत बढ़ नहीं रहा बल्कि गिर रहा है.

तटबंधों का प्रश्न

इसी क्षेत्र में बाढ़ के खतरे को देखते हुए अंग्रेजों ने 100 साल से थोड़ा अधिक समय पहले मिट्टी के तटबंध बनाए थे. यह 3122 किलोमीटर के तटबंधों के घेराव की देखरेख राज्य के सिंचाई और जल विभाग करते हैं.

चोटो मोलखली का तबाह किया हुआ तटबंध
चक्रवात ऐला के नष्ट करने से पहले अरुण सरकार का घर जहां खड़ा था

2009 में ऐला चक्रवात ने तटबंध के 778 किलोमीटर को तबाह कर दिया था खाना की स्थानीय नागरिकों की गणना में यह नुकसान और ज्यादा था. इसके पश्चात, अंग्रेजों के बाद पहली बार बंगाल सरकार में इनके पुनर्निर्माण की योजना राज्य के सिंचाई विभाग की देखरेख में शुरू की. इस योजना में अंग्रेजों के जमाने के मिट्टी के तटबंधों को 5032 करोड़ रुपए की लागत से ईंट, गारे और पॉलिप्रोपिलीन की चादरों से पुनर्निर्मित करने की थी.

यह बात 2009 की है. आज 10 साल बाद यह योजना पूरी नहीं हुई है. अपनी पहचान छुपाने की शर्त पर सिंचाई विभाग के एक कर्मचारी बताते हैं, "केवल 20 प्रतिशत राशि का इस्तेमाल हुआ है, और प्रायोजित 1000 किलोमीटर में से केवल 100 किलोमीटर ही पुनर्निर्माण हुआ है." कर्मचारी ने इससे अधिक सूचना देने से इंकार कर दिया.

जहां पर पुनर्निर्माण हुआ भी है, वहां भी वह हर जगह सफल नहीं हुआ. दयापुर टापू में ग्रामीण कहते हैं कि "जब भी चक्रवात आता है, तो नए तटबंध में से सीमेंट के टुकड़े उखड़ कर बह जाते हैं."

अरुण सरकार बताते हैं, "कभी-कभी हम गांव के लोग तटबंध को सीमेंट के बोरों से दोबारा बनाते हैं. कभी-कभी सरकारी लोग भी आकर हमारी मदद करते हैं पर निर्माण की गुणवत्ता जैसी होनी चाहिए वैसी नहीं है, आप देख ही रहे हैं." यह कहते हुए उन्होंने तटबंध के एक हिस्से की तरफ इशारा किया जहां से अमफन चक्रवात के बाद सीमेंट निकल गया था.

छोटो मोल्लाखली टापू पर ग्रामीण कहते हैं कि सरकार ने कभी किसी को तटबंध के पुनर्निर्माण के लिए भेजा ही नहीं. मौशुमि मोंडल अंग्रेजो के द्वारा बनाए गए और जर्जर हो चुके तटबंध की तरफ इशारा करते हुए कहती हैं, "इस तटबंध को मैंने बचपन से देखा है. चक्रवात और थोड़ी बहुत बारिश भी इसे जैसे पिघलाने लगती है. उसके बाद हमें कई-कई दिन तक घुटनों तक कीचड़ में चलना पड़ता है. इससे हमें काफी परेशानी होती है."

चक्रवात के तबाही मचाने के बाद गांव वाले इकट्ठा होकर तटबंधों को दोबारा बनाते हैं. पर उनकी क्षमता ज्यादा कुछ करने की नहीं है जिसके परिणाम स्वरूप वह बहुत नाज़ुक होता है. जब अगला चक्रवात आता है तो तटबंध टूट जाता है और समुद्र का पानी खेतों और गांव में बह आता है और फसलें भी तबाह हो जाती हैं.

अरुण सरकार अपने कड़वे अनुभव से जानते हैं की असल में सुंदरबन कितने बड़े खतरे में है. 11 साल पहले ऐला चक्रवात में उन्होंने अपना घर खो दिया था.

दयापुर टापू के तट की तरफ, वह नदी के एक भाग की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, "हमारा यहां घर हुआ करता था. उस तरफ खेत था और वहां दूसरी तरफ मैं बचपन में खेला करता था."

घर और खेत अब दोनों ही नहीं हैं, दोनों को चढ़ते हुए पानी ने निगल लिया. टापू पर बाढ़ आ गई, 332 लोग मारे गए और 40 हजार से ज्यादा घर तबाह हो गए, इनमें से एक घर अरुण सरकार का था.

तब से अरुण ने अपना घर दोबारा से बना लिया है. परंतु उनके और हजारों और लोग जो यहां रहते हैं, केवल थोड़े ही समय की बात है कि अगला चक्रवात आ जाएगा.

कुछ नाम पहचान छुपाने के लिए बदल दिए गए हैं.

***

पांच भागों में प्रकाशित होने वाली असम बाढ़ और बंगाल के अमफन चक्रवात के कारण होने वाले विनाशकारी परिणाम सीरीज का यह तीसरा पार्ट है. पहला पार्ट और दूसरा पार्ट यहां पढ़ें.

यह स्टोरी हमारे एनएल सेना प्रोजेक्ट का हिस्सा जिसमें 43 पाठकों ने सहयोग किया है. यह आदित्य देउस्कर, देशप्रिया देवेश, जॉन अब्राहम, अदिति प्रभा, रोहित उन्नीमाधवन, अभिषेक दैविल, और अन्य एनएल सेना के सदस्यों के लिए संभव बनाया गया है. हमारे अगले एनएल सेना प्रोजेक्ट 'लव जिहाद': मिथ वर्सेस रियलिटी में सहयोग दे और गर्व से कहें मेरे ख़र्च पर आजाद हैं ख़बरें.

18 मई 2020 की शाम थी, बाकी सारी दुनिया की तरह बंगाल भी कोरोनावायरस महामारी की चपेट में था. भारत सरकार ने देशभर में महामारी को फैलने से रोकने के लिए सख्त लॉकडाउन लगा दिया था जिसकी वजह से अधिकतर लोग अपने घरों में थे.

शाम के 5:45 बजे तूफान आ गया, अक्षरशः. अमफन चक्रवात बंगाल के तटीय क्षेत्रों से टकराया और अपने रास्ते में तबाही मचाता चला गया.

अमफन, पिछले 300 वर्षों में बंगाल की खाड़ी से निकलने वाला सबसे विकराल चक्रवात था. टकराने के बाद 155-165 किलोमीटर प्रति घंटे हवा की रफ्तार की वजह से इसे पांचवीं श्रेणी का सुपर साइक्लोन अर्थात महाचक्रवात बताया गया. ऐसा चक्रवात जिसमें टकराने से पहले हवा की रफ्तार 260 किलोमीटर प्रति घंटा तक जा सकती है. राज्य सरकार के अनुमानों से, अमफन ने राज्य की करीब 60 प्रतिशत आबादी को प्रभावित किया और करीब एक लाख करोड़ का नुकसान किया.

बंगाल का सुंदरबन क्षेत्र सबसे बुरी तरह से प्रभावित हुआ, सुंदरबन एक द्वीपों का समूह है जो बंगाल की खाड़ी में मिलने से पहले, गंगा और ब्रह्मपुत्र के संगम के तटीय क्षेत्र में बसे हैं. यहां विश्व का सबसे बड़े मैंग्रोव वन हैं- मैंग्रोव अर्थात उष्णकटिबंधीय वृक्षों के झुरमुट. अमफन चक्रवात खेती और घरों को उजाड़ते हुए सुंदरबन से गुज़रा.

यही विचार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के द्वारा भी दोहराए गए जिन्होंने 5 जून को कहा कि इलाके का 28% हिस्सा पूरी तरह तबाह हो चुका है, यानी कुल 4263 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में से लगभग 1200 वर्ग किलोमीटर. एक प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा, "सुंदरबन खत्म हो गया."

ऐसा पहली बार नहीं है कि सुंदरबन को किसी चक्रवात को सबसे ज्यादा झेलना पड़ा, न ही यह आखरी बार है. पिछले 23 सालों में इस इलाके में 13 महाचक्रवात देखे हैं. 2019 से 12 महीने में तीन चक्रवात आए हैं. मई 2019 में फानी, नवंबर 2019 में बुलबुल और इस साल मई में अमफन.

इस तबाही की पराकाष्ठा कहीं ज्यादा बढ़ जाती है जब आप यह याद करते हैं कि सुंदरबन में रहने वाले 70 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन जीते हैं जहां प्रति व्यक्ति आय 13300 रुपए प्रतिमाह है.

सुंदरबन के 102 टापुओं में से 54 पर वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 45 लाख लोग रहते हैं. अधिकतर लोग जीवन यापन के लिए कृषि पर निर्भर रहते हैं, यहां की मुख्य फसल धान है. इसके अतिरिक्त और पैसे मछली पकड़ना, मछली पालन, शहद इकट्ठा करना और केकड़े पकड़ना है.

अमफन चक्रवात के 6 महीने बाद भी सुंदरबन के लोग अपने बिखरे हुए जीवन के टुकड़े समेट रहे हैं. क्यों सुंदरबन इतने चक्रवात झेलता है? और यहां की प्राकृतिक परिस्थितियों और लोगों पर इस बार-बार होने वाली तबाही का क्या असर पड़ता है?

सुंदरबन की परेशानियों का सरल जवाब बंगाल की खाड़ी से उसकी नज़दीकी है. हिंद महासागर के उत्तरपूर्वी घुमाव क्षेत्र से अक्सर चक्रवात निकलते हैं, Weather Underground के अनुसार इतिहास के 35 सबसे खतरनाक चक्रवाती में से 26 यहीं से निकले हैं.

और इस क्षेत्र को कुछ बचा सकता है, जो सही अर्थों में बाकी राज्य को भी बचा सकता है, वो हैं सुंदरबन के मैंग्रोव वन, जो मर रहे हैं.

निर्वनीकरण, और लकड़ी का काला बाज़ार

"बाकी बंगाल, खास तौर पर कोलकाता, सुंदरबन के वनों की वजह से कभी चक्रवातों का असली विकराल रूप नहीं देखता."

यह कहना है जयंत सेन का. जयंत एक पर्यावरणविद हैं जिन्होंने पिछले पांच सालों से ज्यादा सुंदरबन के संरक्षण पर काम किया है. उनका एनजीओ, पुरोनो कोलकातार् गोल्पो, अमफन के बाद हरकत में आया और उन्होंने सुंदरबन के लोगों को पुनर्वास इत करने के प्रयास किए और कुछ टापू के तटीय क्षेत्रों में वृक्षारोपण अभियान चलाया.

जयंत के उपरोक्त विचार के पीछे शोध के तथ्य हैं. यह सर्वविदित है कि मैंग्रोव वन, तूफान और चक्रवातों के वेग को कम कर देते हैं. 2013 में फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में इंगित किया कि मैनग्रोव वन हरिकेनों को भी पांचवीं श्रेणी से तीसरी श्रेणी तक हल्का कर सकते हैं जिसे "मैंग्रोव न्यूनयन प्रभाव" कहा जाता है. हरिकेन अमेरिका में आने वाले उष्णकटिबंधीय तूफानों को कहते हैं जो काफी कुछ चक्रवातों की तरह ही होते हैं.

पर पिछले 250 सालों में सुंदरबन के मैंग्रोव वन इस प्राकृतिक ढाल में दरारें पड़ गई हैं. बंगाल सरकार की पर्यावरण परिवर्तन कार्यवाही योजना बताती है कि 1989 से उसके वन्य प्रदेश में पांच प्रतिशत की कमी आई है, इसके बावजूद जबकि क्षेत्र को पहले से ही सुरक्षित जैव आरक्षित क्षेत्र घोषित किया जा चुका है.

सुंदरबन के मैंग्रोव जो कि चक्रवातों की ढाल के रूप में कार्य करते हैं
सतजेलिया गांव निवासी अरुण सरकार

इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण विलुप्त होते सुंदरी पेड़ों में कमी होना है, जो यहां पाए जाने वाली मैंग्रोव की सबसे बड़ी प्रजाति है और उसी से इस इलाके का नाम पड़ा है. यह पेड़ अब बहुत दुर्लभ हो गया है, प्राकृतिक संरक्षण कि अंतरराष्ट्रीय यूनियन ने इसे विलुप्त होने के खतरे को झेल रही प्रजाति की श्रेणी में रखा है.

दयापुर टापू के सतजेलिया गांव के अरुण सरकार कहते हैं, "जब मैं छोटा था तो सुंदरी के पेड़ हमारे टापू के हर किनारे पर कतार में लगे होते थे. अब तो शायद ही कभी कोई पेड़ दिखाई दे जाए."

सुंदरी प्रजाति एक "ऊपर से मार" देने वाली बीमारी से मर रही है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार इसके कई कारण हैं और इनमें "अत्यधिक बाढ़", "मिट्टी का बढ़ता खारापन" और "चक्रवातों से पड़ने वाला दबाव" भी शामिल हैं.

वनों की कटाई भी एक बहुत बड़ा कारण है. 1987 तक यह कटाई बेरोकटोक चलती रही जबकि सुंदरबन के मैंग्रोव वन यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल घोषित थे. अब, पश्चिम बंगाल के 2006 में लागू हुए वन रहित क्षेत्रों में वृक्ष रक्षा और संरक्षण कानून के अंतर्गत सुंदरबन में पेड़ काटने पर एक साल के कारावास और पांच हजार रुपए तक के हर्ज़ाने का प्रावधान है.

फिर भी इस इलाके में आज भी पेड़ गिराए जा रहे हैं. मैनग्रोव के वन अब फैलती हुई लकड़ी की गुपचुप तस्करी के व्यापार का सहारा बन गए हैं.

सतजेलिया के निवासी रतन मोंडल स्वीकार करते हैं कि वह सुंदरी जैसे वृक्षों की शाखाएं काटते हैं क्योंकि वह उनके लिए "आय का एकमात्र ज़रिया" है. बार-बार आने वाले चक्रवातों ने उनके धान के खेतों को तबाह कर दिया है जिसकी वजह से वह कहते हैं कि उन्हें घने जंगलों में पेड़ काटने के लिए मजबूर होना पड़ा.

दयापुर के निवासी रमेश मोंडल बताते हैं कि जितने भी पेड़ गिराए जाते हैं, उनमें से अधिकतर सरहद के पार बांग्लादेशी व्यापारियों को बेचे जाते हैं. वे कहते हैं, "सुंदरी के पेड़ की एक फुट लकड़ी करीब 500 रुपए की पड़ती है. तो आप कल्पना कीजिए 10 या 15 फीट का पेड़ हमारी कितनी कमाई करा देगा."

बांग्लादेशी अखबार डेली स्टार के द्वारा की गई एक खोजी रिपोर्ट ब्यौरा देती है- सुंदरबन से आने वाली लकड़ी अवैध बाजार में 1750 रुपए प्रति घन फिट तक बिकती है. यह बांग्लादेश तक आपस में जुड़ी हुई नदियों के द्वारा लाई जाती है और सीमावर्ती जिले नेसराबाद के एक तैरते हुए बाजार में बेची जाती है. सारा लेन-देन नावों और मछली पकड़ने में इस्तेमाल किए जाने वाले छोटे जहाजों के जरिए होता है. यह एकदम खुली हुई बात है जिसमें सीमा के दोनों तरफ के वन्य अधिकारी शामिल हैं.

हमसे बात करने वाले सुंदरबन के नागरिकों ने हमें बताया कि उनके इस अवैध व्यापार में लगने का एक बड़ा कारण उनके पास अब खेती के लिए ज़मीन का न होना है.

राज्य सरकार के पर्यावरण परिवर्तन की कार्यवाही योजना के अनुसार सुंदरबन के वन रहित क्षेत्रों में खेती की भूमि मुख्यतः बार बार आने वाले चक्रवात, खेती के पिछड़े तौर-तरीके और बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण, 2002 से 2009 के बीच 2149 वर्ग किलोमीटर से घटकर 1691 वर्ग किलोमीटर रह गई. हालांकि शहद इकट्ठा करना और मछली पकड़ना अभी भी आय के साधन हैं, लेकिन लकड़ी बेचना कहीं ज्यादा आर्थिक दृष्टि से आकर्षक है.

अरुण सरकार भी इसकी पुष्टि करते हैं, चीन का कहना है कि "लोगों के पास ज़िंदा रहने के लिए जंगल के अलावा और कोई विकल्प नहीं है."

परिणाम स्वरूप सुंदरबन के मैंग्रोव वन पिछले 200 सालों में 16700 वर्ग किलोमीटर से घटकर 9630 वर्ग किलोमीटर तक सिकुड़ गए हैं, इसमें भारत और बांग्लादेश दोनों ही देशों का क्षेत्र आता है और दोनों ही देशों को हर साल आने वाले चक्रवातों से असुरक्षित छोड़ देता है.

अरुण का कहना है कि मैनग्रोव मर रहे हैं. वे बताते हैं, "अगर हम जंगलों में जाएं तो देख पाएंगे कि मैनग्रोव के बहुत सारे वृक्षों की पत्तियां पीली पड़ गई हैं. इसका अर्थ है कि वह मर रहे हैं."

बढ़ता तापमान और खारापन

सुंदरबन के रक्षा कवच की तबाही और चक्रवातों की भरमार का एक और बहुत बड़ा कारण है, पर्यावरण परिवर्तन.

मैंग्रोव के वृक्ष 10 से 19 डिग्री सेल्सियस के पानी में उगते हैं. अगर तापमान वृक्षों के अनुकूल इस सीमा से थोड़ा भी इधर उधर होता है, तो वृक्ष मरने लगते हैं.

2012 की बंगाल पर्यावरण कार्यवाहक योजना के अनुसार पिछले 30 सालों में सुंदरबन में औसत तापमान प्रति दशक 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है, जो कि वैश्विक औसत 0.06 डिग्री से लगभग 8 गुना ज्यादा है.

इस अध्ययन के अनुसार इस समस्या को और भी बढ़ाने वाली बात यह है कि सुंदरबन में समुद्र का स्तर 1.2 इंच प्रतिवर्ष बढ़ा है, इसके अनुपात में जल स्तर बढ़ने का वैश्विक औसत 0.14 इंच है.

कोलकाता विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान के प्रोफेसर एसके मुखर्जी कहते हैं, "यह मुख्यतः पानी के pH स्तर के गिरने की वजह से होता है, जिसका कारण पानी में ऑक्सीजन का कम होता स्तर है. ऐसा होने का कारण भी कम होते मैंग्रोव वन हैं क्योंकि उनमें हवा और पानी दोनों ही से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड खींच लेने की क्षमता होती है."

वे यह भी कहते हैं, "समुद्र का बढ़ता स्तर और उसके साथ तेजी से बढ़ता तापमान, दुनिया के इस हिस्से में चक्रवातों को बढ़ाता है."

बढ़े हुए तापमान और समुद्र से निकटता दोनों ही में सुंदरबन के पानी में खारेपन को बढ़ाने में योगदान दिया है. जब भी चक्रवात आता है यह खारापन बढ़ जाता है क्योंकि चक्रवात के ज़रिए समुद्र का पानी नदियों और उनके टापुओं में पहुंच जाता है. इससे मिट्टी में खारे तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है जिसके परिणामस्वरूप मैनग्रोव के वृक्षों की जड़ें कमजोर और उनकी वृद्धि को हानि पहुंचती है.

पर्यावरणविद जयंत सेन कहते हैं किस का एक इलाज और ज्यादा बारिश होना हो सकता है. वह कहते हैं, "और ज्यादा तूफानों के कारण समुद्र से आने वाले खारे जल की बढ़ोतरी को बारिश का पानी सुंदरबन की नदियों में बराबर कर सकता है." लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. सुंदरबन में औसतन 1920 मिलीमीटर सालाना वर्षा होती है, और यह औसत बढ़ नहीं रहा बल्कि गिर रहा है.

तटबंधों का प्रश्न

इसी क्षेत्र में बाढ़ के खतरे को देखते हुए अंग्रेजों ने 100 साल से थोड़ा अधिक समय पहले मिट्टी के तटबंध बनाए थे. यह 3122 किलोमीटर के तटबंधों के घेराव की देखरेख राज्य के सिंचाई और जल विभाग करते हैं.

चोटो मोलखली का तबाह किया हुआ तटबंध
चक्रवात ऐला के नष्ट करने से पहले अरुण सरकार का घर जहां खड़ा था

2009 में ऐला चक्रवात ने तटबंध के 778 किलोमीटर को तबाह कर दिया था खाना की स्थानीय नागरिकों की गणना में यह नुकसान और ज्यादा था. इसके पश्चात, अंग्रेजों के बाद पहली बार बंगाल सरकार में इनके पुनर्निर्माण की योजना राज्य के सिंचाई विभाग की देखरेख में शुरू की. इस योजना में अंग्रेजों के जमाने के मिट्टी के तटबंधों को 5032 करोड़ रुपए की लागत से ईंट, गारे और पॉलिप्रोपिलीन की चादरों से पुनर्निर्मित करने की थी.

यह बात 2009 की है. आज 10 साल बाद यह योजना पूरी नहीं हुई है. अपनी पहचान छुपाने की शर्त पर सिंचाई विभाग के एक कर्मचारी बताते हैं, "केवल 20 प्रतिशत राशि का इस्तेमाल हुआ है, और प्रायोजित 1000 किलोमीटर में से केवल 100 किलोमीटर ही पुनर्निर्माण हुआ है." कर्मचारी ने इससे अधिक सूचना देने से इंकार कर दिया.

जहां पर पुनर्निर्माण हुआ भी है, वहां भी वह हर जगह सफल नहीं हुआ. दयापुर टापू में ग्रामीण कहते हैं कि "जब भी चक्रवात आता है, तो नए तटबंध में से सीमेंट के टुकड़े उखड़ कर बह जाते हैं."

अरुण सरकार बताते हैं, "कभी-कभी हम गांव के लोग तटबंध को सीमेंट के बोरों से दोबारा बनाते हैं. कभी-कभी सरकारी लोग भी आकर हमारी मदद करते हैं पर निर्माण की गुणवत्ता जैसी होनी चाहिए वैसी नहीं है, आप देख ही रहे हैं." यह कहते हुए उन्होंने तटबंध के एक हिस्से की तरफ इशारा किया जहां से अमफन चक्रवात के बाद सीमेंट निकल गया था.

छोटो मोल्लाखली टापू पर ग्रामीण कहते हैं कि सरकार ने कभी किसी को तटबंध के पुनर्निर्माण के लिए भेजा ही नहीं. मौशुमि मोंडल अंग्रेजो के द्वारा बनाए गए और जर्जर हो चुके तटबंध की तरफ इशारा करते हुए कहती हैं, "इस तटबंध को मैंने बचपन से देखा है. चक्रवात और थोड़ी बहुत बारिश भी इसे जैसे पिघलाने लगती है. उसके बाद हमें कई-कई दिन तक घुटनों तक कीचड़ में चलना पड़ता है. इससे हमें काफी परेशानी होती है."

चक्रवात के तबाही मचाने के बाद गांव वाले इकट्ठा होकर तटबंधों को दोबारा बनाते हैं. पर उनकी क्षमता ज्यादा कुछ करने की नहीं है जिसके परिणाम स्वरूप वह बहुत नाज़ुक होता है. जब अगला चक्रवात आता है तो तटबंध टूट जाता है और समुद्र का पानी खेतों और गांव में बह आता है और फसलें भी तबाह हो जाती हैं.

अरुण सरकार अपने कड़वे अनुभव से जानते हैं की असल में सुंदरबन कितने बड़े खतरे में है. 11 साल पहले ऐला चक्रवात में उन्होंने अपना घर खो दिया था.

दयापुर टापू के तट की तरफ, वह नदी के एक भाग की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, "हमारा यहां घर हुआ करता था. उस तरफ खेत था और वहां दूसरी तरफ मैं बचपन में खेला करता था."

घर और खेत अब दोनों ही नहीं हैं, दोनों को चढ़ते हुए पानी ने निगल लिया. टापू पर बाढ़ आ गई, 332 लोग मारे गए और 40 हजार से ज्यादा घर तबाह हो गए, इनमें से एक घर अरुण सरकार का था.

तब से अरुण ने अपना घर दोबारा से बना लिया है. परंतु उनके और हजारों और लोग जो यहां रहते हैं, केवल थोड़े ही समय की बात है कि अगला चक्रवात आ जाएगा.

कुछ नाम पहचान छुपाने के लिए बदल दिए गए हैं.

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पांच भागों में प्रकाशित होने वाली असम बाढ़ और बंगाल के अमफन चक्रवात के कारण होने वाले विनाशकारी परिणाम सीरीज का यह तीसरा पार्ट है. पहला पार्ट और दूसरा पार्ट यहां पढ़ें.

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