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दलित बच्चों पर कहर बन रहा है फूलों की खेती का जहर: रिपोर्ट में खुलासा
भारत में एक तरफ छोटे किसान बेहतर आमदनी के लिए भले ही निर्यात होने वाले फूलों की खेती की तरफ आकर्षित हो रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ इसकी बड़ी कीमत मासूम बच्चों को चुकानी पड़ रही है. तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में बड़े पैमाने पर चमेली की खेती की जाती है, जिसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन करते हुए प्रतिबंधित जहरीले रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है. चौंकाने वाला यह है कि स्कूल का खर्चा निकालने और अपने परिवार को आर्थिक मदद देने के लिए ज्यादातर दलित बच्चे इन खेतों में मजदूरी करते हैं और सप्ताह में एक दिन गंभीर तरीके से बीमार पड़ते हैं.
यह खुलासा 3 दिसंबर को भोपाल गैस त्रासदी को याद करते हुए टॉक्सिक ब्लूम्स: इम्पैक्ट्स ऑफ पेस्टिसाइड्स इन इम्पैक्ट्स ऑफ फ्लोरीकल्चर इंडस्ट्री इन तमिलनाडु, इंडिया रिपोर्ट में किया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक 09 वर्ष से 13 वर्ष की उम्र तक के बच्चों में सिरदर्द, त्वचा संबंधी परेशानियां, उल्टी, थकान, नींद की कमी, झटके, सुस्ती, बुखार और शरीर दर्द जैसी समस्याएं हो रही हैं. वहीं, खेतों में काम करने वाले करीब एक तिहाई बच्चों ने अपने जवाब में कहा कि सप्ताह में वे एक बार जरूर बीमार पड़ते हैं.
पेस्टीसाइड एक्शन नेटवर्क एशिया पैसिफिक (पीएनएपी), सोसाइटी फॉर रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट (एसआरईडी) और पैन इंडिया द्वारा जारी संयुक्त अध्ययन में बताया गया है कि तमिलनाडु में फ्लोरीकल्चर फार्मों में अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों (एचएचपी) का इस्तेमाल हुआ है, जो इन खेतों में काम करने वाले दलित बच्चों के स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है.
अमेरिका, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और यूनाइटेड अरब अमीरात वो गंतव्य देश हैं जहां भारतीय फूल उद्योग सबसे ज्यादा फूलों का निर्यात करता है. कई छोटी जोत वाले किसान, भू-स्वामी और कॉरपोरेशन इसीलिए फूलों की खेती की तरफ आकर्षित हो रही हैं. इन फूलों में जबरदस्त तरीके से कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है.
बच्चों, किसानों और खुदरा दुकानदारों के जरिए कुल 109 कीटनाशकों में से 82 फीसदी अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों की पहचान की गई है.
वहीं, कुल 44 अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों में से 32 ऐसे कीटनाशक पाए गए जो एक या उससे अधिक देशों में प्रतिबंधित हैं. और इनमें से ज्यादातर मधुमक्खियों के लिए बेहद ही घातक हैं. यहां तक की यदि इन्हें सूंघा जाए तो बेहोशी तक आ जाए. प्रजनन को विषाक्त करने वाले, कैंसर पैदा करने वाले, इंडोक्राइन यानी हॉर्मोन को बिगाड़ने वाले और जमीन व पानी में दृढ़ता के साथ टिके रहने वाले हैं.
इनमें पीएएनएपी के जरिए नौ ऐसे कीटनाशकों की पहचान की गई है जो कि बच्चों के लिए बेहद घातक हैं. इनमें साइपरमेथ्रिन, लैम्ब्डा क्लोथ्रिन, क्लोरपाइरीफोस, मोनोक्रोटोफोस, पैराक्वाट, ग्लाइफोसेट, डाइक्लोरोस, मैन्कोजेब और पर्मेथ्रिन शामिल हैं.
पैराक्वाट और क्लोरपाइरीफोस दो ऐसे कीटनाशक हैं जो सेंट्रल इंसेक्टीसाइड बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी के जरिए फूलों की खेती में इस्तेमाल करने के लिए प्रतिबंधित हैं. इसके बावजूद इनका इस्तेमाल खेतों में पाया गया जहां बच्चे काम करते हैं.
इस मसले पर एसआरईडी की कार्यकारी निदेशक डॉ फातिमा बर्नड ने कहा, '' हम 21 वीं सदी में हैं और दुनिया के विकास की कीमत फूलों के खेतों में काम करने वाले दलित बच्चों के शोषण पर आधारित है. यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार मानकों का स्पष्ट उल्लंघन है. कॉरपोरेट मुनाफाखोर दलित बच्चों का खून चूस रहे हैं. ये एग्रोकेमिकल निगम अपने स्वास्थ्य और शिक्षा पर कीटनाशकों के कारण होने वाले नुकसान के साथ दलित बच्चों के भविष्य को नष्ट कर रहे हैं. हम इस कॉर्पोरेट घुसपैठ की हमारे गांवों, हमारे कृषि और हमारे देश में निंदा करते हैं.
वहीं, अत्यधिक खतरनाक कीटनाशक (एचएचपी) बनाने वाली कंपनियों के माल और दुकानों की सुरक्षा जांच की गई तो पाया गया कि फूलों की खेती के खेतों में उपयोग किए जाने वाले एचएचपी के अग्रणी निर्माता स्थानीय और ट्रांसनैशनल एग्रोकेमिकल कंपनियां हैं जिनमें धानुका एग्रीटेक, सिनजेन्टा, बेयर क्रॉप साइंस, डॉव एग्रोसाइंस और रैलिस इंडिया शामिल हैं.
अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक कीटनाशकों से जुड़े खुदरा दुकानों में बहुत ही सीमित जगह व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) पाए गए जबकि केवल पांच कीटनाशक उत्पादों में स्थानीय भाषा में लिखित उपयोग के निर्देश थे.
पैन इंडिया के सहायक निदेशक दिलीप कुमार ने कहा कि जमीनी हकीकत यह है कि फूलों की खेती में किए जा रहे खतरनाक कीटनाशकों का इस्तेमाल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों का खुला उल्लंघन है. खतरनाक कीटनाशकों के जद में आने वाले बच्चों के पुराने स्वास्थ्य प्रभावों को यह बढ़ाने वाला साबित हो सकता है. इस वर्ष के शुरुआत में सरकार ने अपने मसौदे में कुछ खतरनाक रसायनों के प्रतिबंध की बात कही थी, जो कि निश्चित एक अच्छा कदम था लेकिन यह कब लागू होगा अभी तक पता नहीं है.
पीएएनएपी के मुताबिक, कीटनाशक कंपनियों को बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के उल्लंघन के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, जैसे कि जीवन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, और स्वास्थ्य के उच्चतम मानक का आनंद लेने का अधिकार हैं.
अध्ययन रिपोर्ट में सिफारिश करते हुए कहा गया है कि बालश्रम को रोका जाना चाहिए और ऐसे कीटनाशकों पर तत्काल रोक लगनी चाहिए जिनका स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम पड़ रहा है. इसके लिए एक्शन प्लान भी बनना चाहिए. साथ ही लेबलिंग, सेफ्टी प्रीकॉशन्स और ट्रेनिंग स्टैंडर्ड को भी सख्ती से जांचा जाना चाहिए.
पैन इंडिया के दिलीप कुमार ने कहा कि सरकार को बच्चों के स्वास्थ्य का ख्याल करते हुए वैकल्पिक गैर रसायनिक फार्मिंग अभ्यास पर जोर देना चाहिए. साथ ही उचित प्रयास नीति के जरिए उठाए जाने चाहिए.
इस अध्ययन में तिरवल्लुर जिले के 24 किसान परिवार से जुड़े बच्चों ने अध्ययन में भागीदारी की. यह बच्चे फूलों की खेती में प्रत्यक्ष भागीदार हैं और कीटनाशक रसायनों के स्प्रे से लेकर फूलों को तोड़ने व ढ़ोने आदि का काम आदि करते हैं. भागीदारी करने वाले बच्चे दलित वर्ग से ताल्लुक रखते हैं.
डाउन टू अर्थ से साभार
भारत में एक तरफ छोटे किसान बेहतर आमदनी के लिए भले ही निर्यात होने वाले फूलों की खेती की तरफ आकर्षित हो रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ इसकी बड़ी कीमत मासूम बच्चों को चुकानी पड़ रही है. तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में बड़े पैमाने पर चमेली की खेती की जाती है, जिसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन करते हुए प्रतिबंधित जहरीले रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है. चौंकाने वाला यह है कि स्कूल का खर्चा निकालने और अपने परिवार को आर्थिक मदद देने के लिए ज्यादातर दलित बच्चे इन खेतों में मजदूरी करते हैं और सप्ताह में एक दिन गंभीर तरीके से बीमार पड़ते हैं.
यह खुलासा 3 दिसंबर को भोपाल गैस त्रासदी को याद करते हुए टॉक्सिक ब्लूम्स: इम्पैक्ट्स ऑफ पेस्टिसाइड्स इन इम्पैक्ट्स ऑफ फ्लोरीकल्चर इंडस्ट्री इन तमिलनाडु, इंडिया रिपोर्ट में किया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक 09 वर्ष से 13 वर्ष की उम्र तक के बच्चों में सिरदर्द, त्वचा संबंधी परेशानियां, उल्टी, थकान, नींद की कमी, झटके, सुस्ती, बुखार और शरीर दर्द जैसी समस्याएं हो रही हैं. वहीं, खेतों में काम करने वाले करीब एक तिहाई बच्चों ने अपने जवाब में कहा कि सप्ताह में वे एक बार जरूर बीमार पड़ते हैं.
पेस्टीसाइड एक्शन नेटवर्क एशिया पैसिफिक (पीएनएपी), सोसाइटी फॉर रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट (एसआरईडी) और पैन इंडिया द्वारा जारी संयुक्त अध्ययन में बताया गया है कि तमिलनाडु में फ्लोरीकल्चर फार्मों में अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों (एचएचपी) का इस्तेमाल हुआ है, जो इन खेतों में काम करने वाले दलित बच्चों के स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है.
अमेरिका, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और यूनाइटेड अरब अमीरात वो गंतव्य देश हैं जहां भारतीय फूल उद्योग सबसे ज्यादा फूलों का निर्यात करता है. कई छोटी जोत वाले किसान, भू-स्वामी और कॉरपोरेशन इसीलिए फूलों की खेती की तरफ आकर्षित हो रही हैं. इन फूलों में जबरदस्त तरीके से कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है.
बच्चों, किसानों और खुदरा दुकानदारों के जरिए कुल 109 कीटनाशकों में से 82 फीसदी अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों की पहचान की गई है.
वहीं, कुल 44 अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों में से 32 ऐसे कीटनाशक पाए गए जो एक या उससे अधिक देशों में प्रतिबंधित हैं. और इनमें से ज्यादातर मधुमक्खियों के लिए बेहद ही घातक हैं. यहां तक की यदि इन्हें सूंघा जाए तो बेहोशी तक आ जाए. प्रजनन को विषाक्त करने वाले, कैंसर पैदा करने वाले, इंडोक्राइन यानी हॉर्मोन को बिगाड़ने वाले और जमीन व पानी में दृढ़ता के साथ टिके रहने वाले हैं.
इनमें पीएएनएपी के जरिए नौ ऐसे कीटनाशकों की पहचान की गई है जो कि बच्चों के लिए बेहद घातक हैं. इनमें साइपरमेथ्रिन, लैम्ब्डा क्लोथ्रिन, क्लोरपाइरीफोस, मोनोक्रोटोफोस, पैराक्वाट, ग्लाइफोसेट, डाइक्लोरोस, मैन्कोजेब और पर्मेथ्रिन शामिल हैं.
पैराक्वाट और क्लोरपाइरीफोस दो ऐसे कीटनाशक हैं जो सेंट्रल इंसेक्टीसाइड बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी के जरिए फूलों की खेती में इस्तेमाल करने के लिए प्रतिबंधित हैं. इसके बावजूद इनका इस्तेमाल खेतों में पाया गया जहां बच्चे काम करते हैं.
इस मसले पर एसआरईडी की कार्यकारी निदेशक डॉ फातिमा बर्नड ने कहा, '' हम 21 वीं सदी में हैं और दुनिया के विकास की कीमत फूलों के खेतों में काम करने वाले दलित बच्चों के शोषण पर आधारित है. यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार मानकों का स्पष्ट उल्लंघन है. कॉरपोरेट मुनाफाखोर दलित बच्चों का खून चूस रहे हैं. ये एग्रोकेमिकल निगम अपने स्वास्थ्य और शिक्षा पर कीटनाशकों के कारण होने वाले नुकसान के साथ दलित बच्चों के भविष्य को नष्ट कर रहे हैं. हम इस कॉर्पोरेट घुसपैठ की हमारे गांवों, हमारे कृषि और हमारे देश में निंदा करते हैं.
वहीं, अत्यधिक खतरनाक कीटनाशक (एचएचपी) बनाने वाली कंपनियों के माल और दुकानों की सुरक्षा जांच की गई तो पाया गया कि फूलों की खेती के खेतों में उपयोग किए जाने वाले एचएचपी के अग्रणी निर्माता स्थानीय और ट्रांसनैशनल एग्रोकेमिकल कंपनियां हैं जिनमें धानुका एग्रीटेक, सिनजेन्टा, बेयर क्रॉप साइंस, डॉव एग्रोसाइंस और रैलिस इंडिया शामिल हैं.
अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक कीटनाशकों से जुड़े खुदरा दुकानों में बहुत ही सीमित जगह व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) पाए गए जबकि केवल पांच कीटनाशक उत्पादों में स्थानीय भाषा में लिखित उपयोग के निर्देश थे.
पैन इंडिया के सहायक निदेशक दिलीप कुमार ने कहा कि जमीनी हकीकत यह है कि फूलों की खेती में किए जा रहे खतरनाक कीटनाशकों का इस्तेमाल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों का खुला उल्लंघन है. खतरनाक कीटनाशकों के जद में आने वाले बच्चों के पुराने स्वास्थ्य प्रभावों को यह बढ़ाने वाला साबित हो सकता है. इस वर्ष के शुरुआत में सरकार ने अपने मसौदे में कुछ खतरनाक रसायनों के प्रतिबंध की बात कही थी, जो कि निश्चित एक अच्छा कदम था लेकिन यह कब लागू होगा अभी तक पता नहीं है.
पीएएनएपी के मुताबिक, कीटनाशक कंपनियों को बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के उल्लंघन के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, जैसे कि जीवन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, और स्वास्थ्य के उच्चतम मानक का आनंद लेने का अधिकार हैं.
अध्ययन रिपोर्ट में सिफारिश करते हुए कहा गया है कि बालश्रम को रोका जाना चाहिए और ऐसे कीटनाशकों पर तत्काल रोक लगनी चाहिए जिनका स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम पड़ रहा है. इसके लिए एक्शन प्लान भी बनना चाहिए. साथ ही लेबलिंग, सेफ्टी प्रीकॉशन्स और ट्रेनिंग स्टैंडर्ड को भी सख्ती से जांचा जाना चाहिए.
पैन इंडिया के दिलीप कुमार ने कहा कि सरकार को बच्चों के स्वास्थ्य का ख्याल करते हुए वैकल्पिक गैर रसायनिक फार्मिंग अभ्यास पर जोर देना चाहिए. साथ ही उचित प्रयास नीति के जरिए उठाए जाने चाहिए.
इस अध्ययन में तिरवल्लुर जिले के 24 किसान परिवार से जुड़े बच्चों ने अध्ययन में भागीदारी की. यह बच्चे फूलों की खेती में प्रत्यक्ष भागीदार हैं और कीटनाशक रसायनों के स्प्रे से लेकर फूलों को तोड़ने व ढ़ोने आदि का काम आदि करते हैं. भागीदारी करने वाले बच्चे दलित वर्ग से ताल्लुक रखते हैं.
डाउन टू अर्थ से साभार
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