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भारत का डिजिटल मीडिया भी सवर्णवादी मुख्यधारा मीडिया का एक्सटेंशन बना
यह लेख इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली के 21 नवंबर के अंक में छपे दिलीप मंडल के शोधपरक लेख पर आधारित संक्षिप्त समीक्षा है. अपने लेख में दिलीप मंडल लिखते हैं- भारतीय मीडिया में निचली जातियों के प्रतिनिधित्व की कमी और उच्च जातियों के वर्चस्व का सवाल लंबे समय से शैक्षणिक और सार्वजनिक बहस का विषय रहा है. भारतीय न्यूज़रूम में जातियों का पहला अध्ययन 1996 में किया गया था. उस दौरान पायनियर से जुड़े पत्रकार बीएन उनियाल ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि उस वक्त दिल्ली के किसी न्यूज़रूम में एक भी दलित पत्रकार नहीं था.
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मंडल कहते हैं- इसके बाद दिल्ली के न्यूज़रूमों की सामाजिक संरचना की जांच को 2006 में योगेंद्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेंद्र कुमार ने आगे बढ़ाया. उनके द्वारा किए गए सर्वेक्षण ने मीडिया हाउसों में महत्वपूर्ण संगठनात्मक पदों पर बैठे लोगों का विश्लेषण किया. ये संगठनात्मक पद कौन सा न्यूज़ आइटम सलेक्ट होना है और कौन सा रिजेक्ट होना है यह निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार हैं. साथ ही क्या दिखाना है और उसका कलेवर कैसा होगा, कवरेज कितनी देर का होगा यह सब भी यही लोग तय करते हैं. इस सर्वेक्षण से पता चला कि हिंदू धर्म की दो जातियों के (द्विज और सवर्ण) पुरूष भारतीय मीडिया में उच्च पदों पर हैं.
1931 की जनगणना के आधार पर यह सामाजिक समूह भारत की आबादी का करीब 8 प्रतिशत है (इसके बाद कभी भी जाति की गणना नहीं की गई). जबकि यह मीडिया में 71 प्रतिशत शीर्ष पदों पर काबिज है. इस सर्वेक्षण के मुताबिक 315 प्रमुख निर्णय लेने वालों में से एक भी व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का नहीं था. जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अनुपात 4 प्रतिशत से कम था. वहीं गैर ओबीसी मध्यवर्ती जातियों को भी कम करके आंका जाता है.
लेख के मुताबिक मीडिया शोधकर्ता प्रमोद रंजन ने 2009 में पटना, बिहार में न्यूज़ रूम की सामाजिक संरचना का अध्ययन करते हुए इसी तरह के निष्कर्ष निकाले हैं. उनके द्वारा किए गए सर्वे में शहर के मीडिया न्यूजरूम में हिंदू अपर कास्ट के लोग ही अधिक प्रतिनिधित्व करते हैं. यानी पटना के मीडिया हाऊस में अपर कास्ट जातियों का प्रतिनिधित्व 90 फीसदी है. उन्होंने अपने अध्यन में पाया कि यह स्थिति बिहार में प्रिंट मीडिया की स्थापना के बाद से ही मौजूद है.
न्यूज़रूम की सामाजिक संरचना जानने के लिए ऑक्सफेम और न्यूज़लॉन्ड्री ने मिलकर 2019 में एक नया अध्ययन किया है. यह रिपोर्ट भी भारतीय न्यूज़रूम में उच्च जातियों के वर्चस्व को दिखाती है. रिपोर्ट में टीवी मीडिया, प्रिंट मीडिया और डिजिटल मीडिया शामिल हैं. इस अध्ययन से पता चलता है कि 121 शीर्ष पदों में से 106 पर उच्च जाति के पत्रकार काबिज हैं. इनमें एक भी पत्रकार एससी या एसटी समुदाय का नहीं है.
इस रिपोर्ट में मौजूदा स्थिति काफी गंभीर थी. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या 16.6 फीसदी है जबकि अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या 8.6 प्रतिशत है. दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अनुमान के अनुसार ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत है. वहीं ऑक्सफैम और न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक ये तीनों एससी, एसटी और ओबीसी भारतीय मीडिया में उच्च पदों से लगभग गायब हैं.
मीडिया विविधता का महत्व
बड़े लोकतंत्रों के कामकाज में मीडिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह केवल एक सूचना का माध्यम नहीं है बल्कि मनोरंजन का भी साधन है. साथ ही मीडिया समाज के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा और बहस करके महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. सार्वजनिक क्षेत्र को आकार देने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है. यहां सभी मंचों को शामिल किया जाता है. जहां एक राजनीतिक समुदाय और सार्वजनिक जीवन में नागरिकों की भागीदारी के लिए आवश्यक जानकारी सहित चर्चा और बहस की जाती है.
मंडल लिखते हैं- न्यूज़रूम में विविधता का व्यवस्थित अध्ययन शैक्षिक बातचीत में तुलनात्मक रूप से नया विषय है. अमेरिका के डेट्रायट और अन्य औद्योगिक शहरों में 1964- 67 के नस्लीय दंगों के बाद इस मुद्दे को प्रमुखता मिली. इसके बाद संघीय सरकार ने हिंसा का अध्यन किया और केर्नर आयोग ने इस नस्लीय हिंसा से संबंधित मुद्दों पर 1967 में एक रिपोर्ट पेश की. मंडल मीडिया में व्याप्त समस्याओ का जिक्र करते हुए कहते हैं- मीडिया के साथ एक अन्य समस्या यह भी है कि यहां जो मालिक हैं वह ज्यादातर बड़े कॉर्पोरेट्स हैं. इसलिए मेनस्ट्रीम मीडिया की स्वामित्व संरचना उद्योग को अलोकतांत्रिक और भेदभावपूर्ण बनाती है. किसी मीडिया प्लेटफॉर्म प्रिंट, टीवी और रेडियो को चलाने के लिए एक मोटे निवेश की जरूरत होती है साथ ही इसके लिए कई मुश्किल समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है. ऐसे में किसी मीडिया प्लेटफॉर्म को चलाना आम आदमी के बस की बात नहीं है. बेन बेगडिकियन (1988) ने बताया है कि कैसे पांच बड़े कारपोरेशन ने अमेरिकी मीडिया के लगभग सभी स्थानों पर क ब्जा किया हुआ है.
उनके मुताबिक, मीडिया एकाधिकार और क्रॉस-मीडिया स्वामित्व भारत में भी नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय रहा है. दूरसंचार नियामक ट्राई ने 2008 में इस बारे में एक पत्र प्रकाशित किया था, हालांकि यह अफसोस की बात है कि यह मामला कभी जांच का विषय नहीं बन सका. अन्य लोकतंत्रों के विपरीत भारत में कोई क्रॉस-मीडिया स्वामित्व नहीं है. जबकि भारत में मीडिया हाउस न्यूजपेपर, मैगजीन, टीवी न्यूज, इंटरटेनमेंट चैनल्स, डीटीएच प्लेटफॉर्म और केबल नेटवर्क, रेडियो स्टेशन चलाते हैं. साथ ही अब वह डिजिटल प्लेटफॉर्म के भी मालिक हैं. इन्होंने भारत में मीडिया एकाधिकार का निर्माण किया है.
डिजिटल मीडिया की शुरुआत
नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में न्यू मीडिया पर एक कोर्स पढ़ाते समय मैं अक्सर छात्रों को ब्लॉग और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खुद को व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करता था. मेरी आम धारणा रही है कि भले ही आपके पास 10 रुपए हैं और कहीं आसपास साइबर कैफे है तो आप भी पत्रकारिता कर सकते हैं. यह 2011 की बात है, उस समय स्मार्टफोन नई बात हुआ करते थे. मैं उन्हें बताता था कि आप सिर्फ किसी मीडिया घराने की कंपनी से जुड़कर पत्रकार नहीं हो सकते हैं लेकिन ब्लॉग, पॉडकास्ट और वीडियो के माध्यम से भी आप लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं. इंटरनेट ने शुरुआती वर्षों में लोकतांत्रिक माध्यम होने का वादा किया था. उस समय चौतरफा उत्साह को देखते हुए यह गलत भी नहीं था.
कई विद्वानों ने उस समय इस उत्साह को साझा किया था. इंटरनेट के आने से विशेष रूप से सोशल मीडिया की लोकप्रियता हासिल करने के बाद, इसकी एक वजह यह भी थी कि इन माध्यमों का कोई गेटकीपर नहीं था. क्योंकि यह मंच एक सार्वजनिक क्षेत्र के रूप में कार्य करने जा रहे थे. जहां लोग सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर विचार साझा करेंगे. दलित बहुजनों से संबंधित वीडियो पोस्ट करने का दावा करने वाले कम से कम 10 यूट्यूब चैनल हैं. जिनके पांच लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं. इनमें एससी, एसटी और ओबीसी के मुद्दे शामिल हैं-
डिजिटल क्रांति से पहले मीडिया हाउस में भारी धन शामिल था. लेकिन डिजिटल के दौर में मीडिया आउटलेट शुरू करने के लिए अब बहुत ज्यादा धन की जरूरत नहीं है. नेशनल दस्तक के संपादक शंभू कुमार सिंह का कहना है कि एक ऑनलाइन वीडियो चैनल चलाने के लिए केवल एक स्मार्टफोन, ट्राइपॉड, एक एडिटिंग एप और इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता होती है. इसने दलित बहुजन युवाओं के लिए मीडिया आउटलेट शुरू करने का अवसर पैदा किया है. यह बातें उन्होंने नई दिल्ली में मई 2019 में एक इंटरव्यू के दौरान कही थीं.
दिलीप मंडल ईपीडब्ल्यू के अपने लेख में कहते हैं- हालांकि दूसरी तरफ मैं गलत भी साबित हुआ. मुझे लगता था कि सोशल मीडिया स्पेस एक बहुलतावादी और लोकतांत्रिक स्थान होगा. जहां पर सभी आवाजों को सुना और बहस में शामिल किया जाएगा. इस प्रकार यह एक आदर्श सार्वजनिक क्षेत्र बन जाएगा. हालांकि भारत में डिजिटल मीडिया तक पहुंच सभी समुदायों के लिए सामान नहीं है. यह क्षेत्र काफी विषम और विकृत है. क्योंकि इसी संरचना को डिजिटल मीडिया में भी पेश किया गया है. हममें से कई लोगों ने सोचा था कि डिजिटल और सोशल मीडिया के आने के बाद यह खामियां कम हो जाएंगी. लेकिन वे आशावादी अब निराशा और मोहभंग महसूस कर रहे होंगे.
डिजिटल मीडिया को कौन कंट्रोल करता है?
मीडिया घरानों के प्लेटफॉर्मों में से कुछ के डिजिटल माडिया प्लेटफॉर्म हो सकते हैं. यह बिल्कुल व्यापक सूची में नहीं है क्योंकि इनमें से कुछ आउटलेट्स में विभिन्न राज्यों या विषयों जैसे कि खेल, सिनेमा, ज्योतिष आदि को कवर करने वाले कई ऑफशूट प्लेटफॉर्म हैं. और यह काफी अच्छी स्थिति में हैं. लेकिन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों की पहुंच पैसे और प्रभाव के मामले में विरासत मीडिया कंपनियों को कोई भी चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं. इसका अंदाजा आप ऐसे लगाइए कि शीर्ष 10 दलित बहुजन मीडिया प्लेटफॉर्मों की संयुक्त क्षमता इंडिया टुडे, जी और टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप से मेल नहीं खाती है. यह केवल संख्या के बारे में नहीं है बल्कि विरासत मीडिया कंपनियों ने आधारभूत संरचना का निर्माण किया है. जो कि कम समय में नहीं बन सकता है. इस संदर्भ में, यदि हम बड़े डिजिटल मीडिया समूह के स्वामित्व को देखे तो इसमें विविधता की कमी है. कुछ बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म ही हैं जो डिजिटल और सोशल मीडिया में हावी हैं.
डिजिटल मीडिया कंपनियों के मालिक और इनकी जातियां
लेख बताता है कि द वायर, प्रिंट और क्विंट जैसी गैर-विरासत और उभरती डिजिटल मीडिया कंपनियां भी ज्यादातर ब्राह्मण और बनिया समुदायों द्वारा नियंत्रित की जा रही है. विरासत मीडिया कंपनियों से जुड़े पत्रकार और संपादक सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हैं और वह महत्वपूर्ण प्रभावशाली व्यक्ति बन गए है. यह आश्चर्य की बात नहीं है कि ट्विटर पर फॉलो किए जाने वाले शीर्ष 20 भारतीय पत्रकार उच्च जातियों से हैं. वेरिफाइड अकाउंट्स के कारण आमतौर पर उन्हें अधिक आकर्षण और प्रतिक्रिया मिलती है. आमतौर पर, वेरिफाइड हैंडल बातचीत शुरू करते हैं और अन्य उपयोगकर्ता उसे फॉलो करते हैं और इस प्रक्रिया में, वह बातचीत को इस बिंदु तक बढ़ाते हैं कि वे प्रमुख, कथन-आधारित बयान बन जाए. जैसा कि सोशल मीडिया कंपनियों ने वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को सब्जेक्टिव और मनमाना रखने का फैसला किया है, और क्योंकि इसमें मानवीय हस्तक्षेप भी शामिल है. इसलिए यह तर्क दिया जा सकता है कि इसमें पूर्वाग्रह और पक्षपात हो सकता है.
सोशल मीडिया से जुड़ी एक और प्रमुख बात यह है कि यह उपयोगकर्ताओं के पोस्ट को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए पैसे देकर बढ़ाने की अनुमति देता है. इसका मतलब यह हैं कि पैसे का उपयोग सोशल मीडिया पर किसी भी विचार या उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है. अपने लेख के निष्कर्ष में मंडल कहते हैं- भारतीय मीडिया में उच्च-जाति का वर्चस्व डिजिटल और सोशल मीडिया के आने के बाद भी जारी है. एससी, एसटी और ओबीसी ने कई डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म लॉन्च किए हैं, लेकिन वे केवल उच्च-जाति-आधारित मीडिया द्वारा बनाई गई खाई को भरने की कोशिश कर रहे हैं.
दलित-बहुजन मीडिया का प्रसार हो रहा है, लेकिन ये मंच अभी भी भारतीय समाज पर हावी विभिन्न बातचीत के हाशिये पर हैं. सबसे दुखद बात यह है कि भारत में हमारे पास प्रिंट, टेलीविजन या डिजिटल स्पेस में शिकागो डिफेंडर जैसा कुछ नहीं है. लगभग, डेढ़ दशक बाद डिजिटल और सोशल मीडिया को लेकर भारत यह कहने की स्थिति में हैं- यह साबित करने के लिए प्रयोगसिद्ध आंकड़ों के साथ- कि विरासती मीडिया घरानों में उच्च-जाति के वर्चस्व ने खुद को डिजिटल में फिर से पेश किया है. लोकतांत्रिक डिजिटल मीडिया की आशा अब एक झूठ प्रतीत होता है.
(अनुवाद अवधेश कुमार)
Also Read: डिजिटल मीडिया पर लगाम लगाने के लिए एक और कदम
यह लेख इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली के 21 नवंबर के अंक में छपे दिलीप मंडल के शोधपरक लेख पर आधारित संक्षिप्त समीक्षा है. अपने लेख में दिलीप मंडल लिखते हैं- भारतीय मीडिया में निचली जातियों के प्रतिनिधित्व की कमी और उच्च जातियों के वर्चस्व का सवाल लंबे समय से शैक्षणिक और सार्वजनिक बहस का विषय रहा है. भारतीय न्यूज़रूम में जातियों का पहला अध्ययन 1996 में किया गया था. उस दौरान पायनियर से जुड़े पत्रकार बीएन उनियाल ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि उस वक्त दिल्ली के किसी न्यूज़रूम में एक भी दलित पत्रकार नहीं था.
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मंडल कहते हैं- इसके बाद दिल्ली के न्यूज़रूमों की सामाजिक संरचना की जांच को 2006 में योगेंद्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेंद्र कुमार ने आगे बढ़ाया. उनके द्वारा किए गए सर्वेक्षण ने मीडिया हाउसों में महत्वपूर्ण संगठनात्मक पदों पर बैठे लोगों का विश्लेषण किया. ये संगठनात्मक पद कौन सा न्यूज़ आइटम सलेक्ट होना है और कौन सा रिजेक्ट होना है यह निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार हैं. साथ ही क्या दिखाना है और उसका कलेवर कैसा होगा, कवरेज कितनी देर का होगा यह सब भी यही लोग तय करते हैं. इस सर्वेक्षण से पता चला कि हिंदू धर्म की दो जातियों के (द्विज और सवर्ण) पुरूष भारतीय मीडिया में उच्च पदों पर हैं.
1931 की जनगणना के आधार पर यह सामाजिक समूह भारत की आबादी का करीब 8 प्रतिशत है (इसके बाद कभी भी जाति की गणना नहीं की गई). जबकि यह मीडिया में 71 प्रतिशत शीर्ष पदों पर काबिज है. इस सर्वेक्षण के मुताबिक 315 प्रमुख निर्णय लेने वालों में से एक भी व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का नहीं था. जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अनुपात 4 प्रतिशत से कम था. वहीं गैर ओबीसी मध्यवर्ती जातियों को भी कम करके आंका जाता है.
लेख के मुताबिक मीडिया शोधकर्ता प्रमोद रंजन ने 2009 में पटना, बिहार में न्यूज़ रूम की सामाजिक संरचना का अध्ययन करते हुए इसी तरह के निष्कर्ष निकाले हैं. उनके द्वारा किए गए सर्वे में शहर के मीडिया न्यूजरूम में हिंदू अपर कास्ट के लोग ही अधिक प्रतिनिधित्व करते हैं. यानी पटना के मीडिया हाऊस में अपर कास्ट जातियों का प्रतिनिधित्व 90 फीसदी है. उन्होंने अपने अध्यन में पाया कि यह स्थिति बिहार में प्रिंट मीडिया की स्थापना के बाद से ही मौजूद है.
न्यूज़रूम की सामाजिक संरचना जानने के लिए ऑक्सफेम और न्यूज़लॉन्ड्री ने मिलकर 2019 में एक नया अध्ययन किया है. यह रिपोर्ट भी भारतीय न्यूज़रूम में उच्च जातियों के वर्चस्व को दिखाती है. रिपोर्ट में टीवी मीडिया, प्रिंट मीडिया और डिजिटल मीडिया शामिल हैं. इस अध्ययन से पता चलता है कि 121 शीर्ष पदों में से 106 पर उच्च जाति के पत्रकार काबिज हैं. इनमें एक भी पत्रकार एससी या एसटी समुदाय का नहीं है.
इस रिपोर्ट में मौजूदा स्थिति काफी गंभीर थी. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या 16.6 फीसदी है जबकि अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या 8.6 प्रतिशत है. दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अनुमान के अनुसार ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत है. वहीं ऑक्सफैम और न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक ये तीनों एससी, एसटी और ओबीसी भारतीय मीडिया में उच्च पदों से लगभग गायब हैं.
मीडिया विविधता का महत्व
बड़े लोकतंत्रों के कामकाज में मीडिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह केवल एक सूचना का माध्यम नहीं है बल्कि मनोरंजन का भी साधन है. साथ ही मीडिया समाज के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा और बहस करके महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. सार्वजनिक क्षेत्र को आकार देने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है. यहां सभी मंचों को शामिल किया जाता है. जहां एक राजनीतिक समुदाय और सार्वजनिक जीवन में नागरिकों की भागीदारी के लिए आवश्यक जानकारी सहित चर्चा और बहस की जाती है.
मंडल लिखते हैं- न्यूज़रूम में विविधता का व्यवस्थित अध्ययन शैक्षिक बातचीत में तुलनात्मक रूप से नया विषय है. अमेरिका के डेट्रायट और अन्य औद्योगिक शहरों में 1964- 67 के नस्लीय दंगों के बाद इस मुद्दे को प्रमुखता मिली. इसके बाद संघीय सरकार ने हिंसा का अध्यन किया और केर्नर आयोग ने इस नस्लीय हिंसा से संबंधित मुद्दों पर 1967 में एक रिपोर्ट पेश की. मंडल मीडिया में व्याप्त समस्याओ का जिक्र करते हुए कहते हैं- मीडिया के साथ एक अन्य समस्या यह भी है कि यहां जो मालिक हैं वह ज्यादातर बड़े कॉर्पोरेट्स हैं. इसलिए मेनस्ट्रीम मीडिया की स्वामित्व संरचना उद्योग को अलोकतांत्रिक और भेदभावपूर्ण बनाती है. किसी मीडिया प्लेटफॉर्म प्रिंट, टीवी और रेडियो को चलाने के लिए एक मोटे निवेश की जरूरत होती है साथ ही इसके लिए कई मुश्किल समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है. ऐसे में किसी मीडिया प्लेटफॉर्म को चलाना आम आदमी के बस की बात नहीं है. बेन बेगडिकियन (1988) ने बताया है कि कैसे पांच बड़े कारपोरेशन ने अमेरिकी मीडिया के लगभग सभी स्थानों पर क ब्जा किया हुआ है.
उनके मुताबिक, मीडिया एकाधिकार और क्रॉस-मीडिया स्वामित्व भारत में भी नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय रहा है. दूरसंचार नियामक ट्राई ने 2008 में इस बारे में एक पत्र प्रकाशित किया था, हालांकि यह अफसोस की बात है कि यह मामला कभी जांच का विषय नहीं बन सका. अन्य लोकतंत्रों के विपरीत भारत में कोई क्रॉस-मीडिया स्वामित्व नहीं है. जबकि भारत में मीडिया हाउस न्यूजपेपर, मैगजीन, टीवी न्यूज, इंटरटेनमेंट चैनल्स, डीटीएच प्लेटफॉर्म और केबल नेटवर्क, रेडियो स्टेशन चलाते हैं. साथ ही अब वह डिजिटल प्लेटफॉर्म के भी मालिक हैं. इन्होंने भारत में मीडिया एकाधिकार का निर्माण किया है.
डिजिटल मीडिया की शुरुआत
नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में न्यू मीडिया पर एक कोर्स पढ़ाते समय मैं अक्सर छात्रों को ब्लॉग और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खुद को व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करता था. मेरी आम धारणा रही है कि भले ही आपके पास 10 रुपए हैं और कहीं आसपास साइबर कैफे है तो आप भी पत्रकारिता कर सकते हैं. यह 2011 की बात है, उस समय स्मार्टफोन नई बात हुआ करते थे. मैं उन्हें बताता था कि आप सिर्फ किसी मीडिया घराने की कंपनी से जुड़कर पत्रकार नहीं हो सकते हैं लेकिन ब्लॉग, पॉडकास्ट और वीडियो के माध्यम से भी आप लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं. इंटरनेट ने शुरुआती वर्षों में लोकतांत्रिक माध्यम होने का वादा किया था. उस समय चौतरफा उत्साह को देखते हुए यह गलत भी नहीं था.
कई विद्वानों ने उस समय इस उत्साह को साझा किया था. इंटरनेट के आने से विशेष रूप से सोशल मीडिया की लोकप्रियता हासिल करने के बाद, इसकी एक वजह यह भी थी कि इन माध्यमों का कोई गेटकीपर नहीं था. क्योंकि यह मंच एक सार्वजनिक क्षेत्र के रूप में कार्य करने जा रहे थे. जहां लोग सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर विचार साझा करेंगे. दलित बहुजनों से संबंधित वीडियो पोस्ट करने का दावा करने वाले कम से कम 10 यूट्यूब चैनल हैं. जिनके पांच लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं. इनमें एससी, एसटी और ओबीसी के मुद्दे शामिल हैं-
डिजिटल क्रांति से पहले मीडिया हाउस में भारी धन शामिल था. लेकिन डिजिटल के दौर में मीडिया आउटलेट शुरू करने के लिए अब बहुत ज्यादा धन की जरूरत नहीं है. नेशनल दस्तक के संपादक शंभू कुमार सिंह का कहना है कि एक ऑनलाइन वीडियो चैनल चलाने के लिए केवल एक स्मार्टफोन, ट्राइपॉड, एक एडिटिंग एप और इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता होती है. इसने दलित बहुजन युवाओं के लिए मीडिया आउटलेट शुरू करने का अवसर पैदा किया है. यह बातें उन्होंने नई दिल्ली में मई 2019 में एक इंटरव्यू के दौरान कही थीं.
दिलीप मंडल ईपीडब्ल्यू के अपने लेख में कहते हैं- हालांकि दूसरी तरफ मैं गलत भी साबित हुआ. मुझे लगता था कि सोशल मीडिया स्पेस एक बहुलतावादी और लोकतांत्रिक स्थान होगा. जहां पर सभी आवाजों को सुना और बहस में शामिल किया जाएगा. इस प्रकार यह एक आदर्श सार्वजनिक क्षेत्र बन जाएगा. हालांकि भारत में डिजिटल मीडिया तक पहुंच सभी समुदायों के लिए सामान नहीं है. यह क्षेत्र काफी विषम और विकृत है. क्योंकि इसी संरचना को डिजिटल मीडिया में भी पेश किया गया है. हममें से कई लोगों ने सोचा था कि डिजिटल और सोशल मीडिया के आने के बाद यह खामियां कम हो जाएंगी. लेकिन वे आशावादी अब निराशा और मोहभंग महसूस कर रहे होंगे.
डिजिटल मीडिया को कौन कंट्रोल करता है?
मीडिया घरानों के प्लेटफॉर्मों में से कुछ के डिजिटल माडिया प्लेटफॉर्म हो सकते हैं. यह बिल्कुल व्यापक सूची में नहीं है क्योंकि इनमें से कुछ आउटलेट्स में विभिन्न राज्यों या विषयों जैसे कि खेल, सिनेमा, ज्योतिष आदि को कवर करने वाले कई ऑफशूट प्लेटफॉर्म हैं. और यह काफी अच्छी स्थिति में हैं. लेकिन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों की पहुंच पैसे और प्रभाव के मामले में विरासत मीडिया कंपनियों को कोई भी चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं. इसका अंदाजा आप ऐसे लगाइए कि शीर्ष 10 दलित बहुजन मीडिया प्लेटफॉर्मों की संयुक्त क्षमता इंडिया टुडे, जी और टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप से मेल नहीं खाती है. यह केवल संख्या के बारे में नहीं है बल्कि विरासत मीडिया कंपनियों ने आधारभूत संरचना का निर्माण किया है. जो कि कम समय में नहीं बन सकता है. इस संदर्भ में, यदि हम बड़े डिजिटल मीडिया समूह के स्वामित्व को देखे तो इसमें विविधता की कमी है. कुछ बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म ही हैं जो डिजिटल और सोशल मीडिया में हावी हैं.
डिजिटल मीडिया कंपनियों के मालिक और इनकी जातियां
लेख बताता है कि द वायर, प्रिंट और क्विंट जैसी गैर-विरासत और उभरती डिजिटल मीडिया कंपनियां भी ज्यादातर ब्राह्मण और बनिया समुदायों द्वारा नियंत्रित की जा रही है. विरासत मीडिया कंपनियों से जुड़े पत्रकार और संपादक सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हैं और वह महत्वपूर्ण प्रभावशाली व्यक्ति बन गए है. यह आश्चर्य की बात नहीं है कि ट्विटर पर फॉलो किए जाने वाले शीर्ष 20 भारतीय पत्रकार उच्च जातियों से हैं. वेरिफाइड अकाउंट्स के कारण आमतौर पर उन्हें अधिक आकर्षण और प्रतिक्रिया मिलती है. आमतौर पर, वेरिफाइड हैंडल बातचीत शुरू करते हैं और अन्य उपयोगकर्ता उसे फॉलो करते हैं और इस प्रक्रिया में, वह बातचीत को इस बिंदु तक बढ़ाते हैं कि वे प्रमुख, कथन-आधारित बयान बन जाए. जैसा कि सोशल मीडिया कंपनियों ने वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को सब्जेक्टिव और मनमाना रखने का फैसला किया है, और क्योंकि इसमें मानवीय हस्तक्षेप भी शामिल है. इसलिए यह तर्क दिया जा सकता है कि इसमें पूर्वाग्रह और पक्षपात हो सकता है.
सोशल मीडिया से जुड़ी एक और प्रमुख बात यह है कि यह उपयोगकर्ताओं के पोस्ट को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए पैसे देकर बढ़ाने की अनुमति देता है. इसका मतलब यह हैं कि पैसे का उपयोग सोशल मीडिया पर किसी भी विचार या उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है. अपने लेख के निष्कर्ष में मंडल कहते हैं- भारतीय मीडिया में उच्च-जाति का वर्चस्व डिजिटल और सोशल मीडिया के आने के बाद भी जारी है. एससी, एसटी और ओबीसी ने कई डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म लॉन्च किए हैं, लेकिन वे केवल उच्च-जाति-आधारित मीडिया द्वारा बनाई गई खाई को भरने की कोशिश कर रहे हैं.
दलित-बहुजन मीडिया का प्रसार हो रहा है, लेकिन ये मंच अभी भी भारतीय समाज पर हावी विभिन्न बातचीत के हाशिये पर हैं. सबसे दुखद बात यह है कि भारत में हमारे पास प्रिंट, टेलीविजन या डिजिटल स्पेस में शिकागो डिफेंडर जैसा कुछ नहीं है. लगभग, डेढ़ दशक बाद डिजिटल और सोशल मीडिया को लेकर भारत यह कहने की स्थिति में हैं- यह साबित करने के लिए प्रयोगसिद्ध आंकड़ों के साथ- कि विरासती मीडिया घरानों में उच्च-जाति के वर्चस्व ने खुद को डिजिटल में फिर से पेश किया है. लोकतांत्रिक डिजिटल मीडिया की आशा अब एक झूठ प्रतीत होता है.
(अनुवाद अवधेश कुमार)
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