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‘सरल’ ही ‘कठिन’ है, सिंपल क्यों नहीं लिखते-बोलते?
कहा गया है कि भाषा बहता नीर है. हिंदी में अलग-अलग शब्द अलग-अलग समय पर अलग-अलग भाषाओं से आते रहे हैं. कुछ पीछे जाकर देखें तो हम पाते हैं कि रामचरितमानस में ही अरबी, फारसी और उर्दू के शब्द हैं. कामसूत्र की भाषा भी संस्कृतनिष्ठ नहीं रखी गई थी. ऐसी भाषा का उपयोग हुआ था जो आम लोगों की समझ में आए. यह तो शुरु से मानते आए हैं कि एक जनभाषा होती है और एक पांडित्य की भाषा होती है. हमारे साहित्य में हमेशा मध्यमार्ग अपनाया गया.
खड़ी बोली हिंदी की बात करें तो इसमें भी कई भाषाओं के शब्द हैं. भारत में इतनी बोलियां और भाषाएं हैं कि वे एक-दूसरे में मिलती रहती हैं. लोगों के आवागमन बढ़ने से यह संसर्ग बढ़ता है. संक्षेप में कहने का यही आशय है की भाषाएं नए शब्द ग्रहण करती रहती हैं.
हिंदी की शब्द संपदा बहुत बड़ी है. भाषा के सरलीकरण के लिए उसका मौलिक स्वरूप बिगड़ने नहीं देना चाहिए. पूरे देश में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो चुकी है, इसलिए नई पीढ़ी की सोच की भाषा अंग्रेजी हो जाती है. बोलचाल और लोक व्यवहार में तो हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल होता है, लेकिन शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक सम्प्रेषण की भाषा लगभग अंग्रेजी हो चुकी है.
महानगरों की हिंदी में क्रिया हिंदी की होती है और बाकी बहुत सारे शब्द अंग्रेजी के बोले जाते हैं. इधर मैं युवा लेखकों की ढेर सारी स्क्रिप्ट पढ़ रहा हूं. उन्हें पढ़ते हुए मैंने महसूस किया और उन्हें सावधान किया कि आपकी स्क्रिप्ट में अंग्रेजी के शब्द धड़ल्ले से आ रहे हैं, जबकि फिल्म हम हिंदी में बना रहे हैं. उन्होंने एहसास किया कि उनकी भाषा पर अंग्रेजी का इतना प्रभाव है कि वह सहज रूप में उनकी स्क्रिप्ट में आता है. चूंकि विचार अंग्रेजी में ही आते हैं.
इन दिनों एक धारणा प्रचलित है कि ऐसे शब्द इस्तेमाल करो जो सभी समझ सकें. भाषा का इतना सरलीकरण कर देते हैं कि हम नए शब्दों के प्रयोग के अवसर खो देते हैं. अतीत के ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जब साहित्य और सिनेमा में बहुत सारे शब्दों को तोड़ा, मरोड़ा और जोड़ा जाता था. भाव आ गया है तो भाव के लिए जरूरी शब्द बना लिए जाते थे. यह देखना चाहिए कि नए शब्दों से अवरोध न पैदा हो. साथ ही सभी से आग्रह होगा कि नए शब्द आएं तो उनका विरोध भी ना करें.
अगर मैं 2020 में ‘चाणक्य’ की स्क्रिप्ट लिख रहा होता तो उसकी वही भाषा नहीं रखता जो मैंने उस समय रखी थी. अभी मैं अपनी स्क्रिप्ट लिख रहा होता हूं तो हिंदी शब्दों के पर्यायवाची खोजता हूं कि उसका सरलतम शब्द क्या हो सकता है, जो लोगों को आसानी से समझ में आए जाए. अब जैसे कि ‘आसक्ति’ का पर्याय ‘लगाव’ हो सकता है, लेकिन पता हूं कि दोनों में भाव की तीव्रता का फर्क है. पिछले दिनों एक ऐक्टर से बात कर रहा था तो मैंने कहा, न जाने क्यों लोग मुझे कहते हैं कि मेरी भाषा कठिन है, जबकि मेरी भाषा तो इतनी सरल है. इस पर उसने पलट कर जवाब दिया आपका यह ‘सरल’ ही बहुत ‘कठिन’ है. आप इसके बदले सिंपल शब्द भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
अभी स्थिति ऐसी हो गई है कि मैं कलाकारों को पढ़ने के लिए स्क्रिप्ट नहीं भेजता हूं. मैं उनसे कहता हूं कि आकर सुना दूंगा. उसका कारण यही कारण है कि मेरी स्क्रिप्ट हिंदी में होती है और ज्यादातर कलाकार उसे पढ़ नहीं सकते. उन्हें रोमन में चाहिए. मैं रोमन में नहीं लिखता. मैं रोमन में लिख सकता हूं, लेकिन मेरा आग्रह है कि मैं हिंदी में लिखूंगा. हिंदी में मेरे सामने बिंब उभरते हैं. दूसरे मुझे पता है कि मैं स्क्रिप्ट भेज दूंगा तो वे लोग पढ़ेंगे नहीं और बगैर पढ़े वह बैरंग वापस आ जाएगा.
मैंने एक ऐसे कलाकार के साथ भी काम किया जो कभी स्क्रिप्ट पढ़ते ही नहीं है, केवल सुनते हैं. वहीं कुछ कलाकार ऐसे हैं जो स्क्रिप्ट पढ़ना पसंद करते हैं. चंद ऐक्टर ही हिंदी में पढ़ते हैं उनमें अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, मनोज बाजपेयी आदि के नाम लिए जा सकते हैं. नई पीढ़ी के ज्यादातर एक्टर रोमन में ही पढ़ना पसंद करते हैं.
कुछ समय पहले मैंने ‘स्वराज्य संहिता’ नाम का धारावाहिक का लेखन और निर्देशन किया था. उसमें कुछ पारिभाषिक शब्द थे. संस्कृत के उन शब्दों का पर्यायवाची खोजना मुश्किल काम था. अगर मैं उन शब्दों का सरलीकरण करता तो मुझे बहुत सारी पंक्तियां लिखनी पड़तीं. अब जैसे के ‘बलाधिकृत’, यह उस समय इस्तेमाल होता था. पुलिस की भाषा थी. मैं इसलिए इन शब्दों का इस्तेमाल कर रहा था कि आज की पीढ़ी सीख सकेगी.
प्राचीन साहित्य में कर और बलि दोनों शब्द टैक्स के लिए इस्तेमाल होते थे. अभी बलि का मतलब काटना होता है. बलि शब्द का अर्थ होता स्वेच्छा से दिया हुआ कर. अशोक स्तंभ के कई शब्दों के अर्थ बदल गए हैं. मैं जब उन शब्दों का प्रयोग कर रहा था तो मेरे सहायकों ने कहा कि मेरी भाषा कठिन हो गई है. मेरी समस्या थी कि मैं तकनीकी, पारिभाषिक और शास्त्रोक्त शब्द बताना चाहता था. एक तरीका यह हो सकता था कि मैं उनके अर्थ नीचे सबटाइटल में लिख देता. उस समय यह तरीका भी लोगों को मुश्किल लगता था. अब धीरे-धीरे लोगों को आदत हो रही है ओटीटी के प्रचलन के कारण.
मैं हमेशा अपनी स्क्रिप्ट रिवाइज कर रहा होता हूं. मैं अपनी स्क्रिप्ट में शब्द खोज-खोज कर उनके आसान पर्याय लिखता रहता हूं. अपनी पुरानी स्क्रिप्ट को भी रिवाइज कर देता हूं. मैं उन्हें इतना सरल कर देना चाहता हूं कि आम दर्शक को भी समझ में आ जाए. अगर आप पढ़े-लिखे हैं और आपकी शब्द संपदा है तो आपके लिए अधिक मुश्किल है फिल्मों में लिखना. यहां कुछ हज़ार शब्दों में ही काम हो जाता है.
कहा गया है कि भाषा बहता नीर है. हिंदी में अलग-अलग शब्द अलग-अलग समय पर अलग-अलग भाषाओं से आते रहे हैं. कुछ पीछे जाकर देखें तो हम पाते हैं कि रामचरितमानस में ही अरबी, फारसी और उर्दू के शब्द हैं. कामसूत्र की भाषा भी संस्कृतनिष्ठ नहीं रखी गई थी. ऐसी भाषा का उपयोग हुआ था जो आम लोगों की समझ में आए. यह तो शुरु से मानते आए हैं कि एक जनभाषा होती है और एक पांडित्य की भाषा होती है. हमारे साहित्य में हमेशा मध्यमार्ग अपनाया गया.
खड़ी बोली हिंदी की बात करें तो इसमें भी कई भाषाओं के शब्द हैं. भारत में इतनी बोलियां और भाषाएं हैं कि वे एक-दूसरे में मिलती रहती हैं. लोगों के आवागमन बढ़ने से यह संसर्ग बढ़ता है. संक्षेप में कहने का यही आशय है की भाषाएं नए शब्द ग्रहण करती रहती हैं.
हिंदी की शब्द संपदा बहुत बड़ी है. भाषा के सरलीकरण के लिए उसका मौलिक स्वरूप बिगड़ने नहीं देना चाहिए. पूरे देश में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो चुकी है, इसलिए नई पीढ़ी की सोच की भाषा अंग्रेजी हो जाती है. बोलचाल और लोक व्यवहार में तो हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल होता है, लेकिन शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक सम्प्रेषण की भाषा लगभग अंग्रेजी हो चुकी है.
महानगरों की हिंदी में क्रिया हिंदी की होती है और बाकी बहुत सारे शब्द अंग्रेजी के बोले जाते हैं. इधर मैं युवा लेखकों की ढेर सारी स्क्रिप्ट पढ़ रहा हूं. उन्हें पढ़ते हुए मैंने महसूस किया और उन्हें सावधान किया कि आपकी स्क्रिप्ट में अंग्रेजी के शब्द धड़ल्ले से आ रहे हैं, जबकि
फिल्म हम हिंदी में बना रहे हैं. उन्होंने एहसास किया कि उनकी भाषा पर अंग्रेजी का इतना प्रभाव है कि वह सहज रूप में उनकी स्क्रिप्ट में आता है. चूंकि विचार अंग्रेजी में ही आते हैं.
इन दिनों एक धारणा प्रचलित है कि ऐसे शब्द इस्तेमाल करो जो सभी समझ सकें. भाषा का इतना सरलीकरण कर देते हैं कि हम नए शब्दों के प्रयोग के अवसर खो देते हैं. अतीत के ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जब साहित्य और सिनेमा में बहुत सारे शब्दों को तोड़ा, मरोड़ा और जोड़ा जाता था. भाव आ गया है तो भाव के लिए जरूरी शब्द बना लिए जाते थे यह देखना चाहिए कि नए शब्दों से अवरोध न पैदा हो. साथ ही सभी से आग्रह होगा कि नए शब्द आएं तो उनका विरोध भी ना करें .
अगर मैं 2020 में ‘चाणक्य’ की स्क्रिप्ट लिख रहा होता तो उसकी वही भाषा नहीं रखता जो मैंने उस समय रखी थी. अभी मैं अपनी स्क्रिप्ट लिख रहा होता हूं तो हिंदी शब्दों के पर्यायवाची खोजता हूं कि उसका सरलतम शब्द क्या हो सकता है, जो लोगों को आसानी से समझ में आए जाए. अब जैसे कि ‘आसक्ति’ का पर्याय ‘लगाव’ हो सकता है, लेकिन पता हूं कि दोनों में भाव की तीव्रता का फर्क है. पिछले दिनों एक ऐक्टर से बात कर रहा था तो मैंने कहा, न जाने क्यों लोग मुझे कहते हैं कि मेरी भाषा कठिन है, जबकि मेरी भाषा तो इतनी सरल है. इस पर उसने पलट कर जवाब दिया आपका यह ‘सरल’ ही बहुत ‘कठिन’ है. आप इसके बदले सिंपल शब्द भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
अभी स्थिति ऐसी हो गई है कि मैं कलाकारों को पढ़ने के लिए स्क्रिप्ट नहीं भेजता हूं. मैं उनसे कहता हूं कि आकर सुना दूंगा. उसका कारण यही कारण है कि मेरी स्क्रिप्ट हिंदी में होती है और ज्यादातर कलाकार उसे पढ़ नहीं सकते. उन्हें रोमन में चाहिए. मैं रोमन में नहीं लिखता. मैं रोमन में लिख सकता हूं, लेकिन मेरा आग्रह है कि मैं हिंदी में लिखूंगा. हिंदी में मेरे सामने बिंब उभरते हैं. दूसरे मुझे पता है कि मैं स्क्रिप्ट भेज दूंगा तो वे लोग पढ़ेंगे नहीं और बगैर पढ़े वह बैरंग वापस आ जाएगा.
मैंने एक ऐसे कलाकार के साथ भी काम किया जो कभी स्क्रिप्ट पढ़ते ही नहीं है, केवल सुनते हैं. वहीं कुछ कलाकार ऐसे हैं जो स्क्रिप्ट पढ़ना पसंद करते हैं. चंद ऐक्टर ही हिंदी में पढ़ते हैं उनमें अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, मनोज बाजपेयी आदि के नाम लिए जा सकते हैं. नई पीढ़ी के ज्यादातर एक्टर रोमन में ही पढ़ना पसंद करते हैं.
कुछ समय पहले मैंने ‘स्वराज्य संहिता’ नाम का धारावाहिक का लेखन और निर्देशन किया था. उसमें कुछ पारिभाषिक शब्द थे. संस्कृत के उन शब्दों का पर्यायवाची खोजना मुश्किल काम था. अगर मैं उन शब्दों का सरलीकरण करता तो मुझे बहुत सारी पंक्तियां लिखनी पड़तीं. अब जैसे के ‘बलाधिकृत’, यह उस समय इस्तेमाल होता था. पुलिस की भाषा थी. मैं इसलिए इन शब्दों का इस्तेमाल कर रहा था कि आज की पीढ़ी सीख सकेगी.
कई बार लगता है कि हिंदी सिनेमा में सिर्फ हिंदी कहने के लिए रह जाएगी. मैं नाम नहीं बताऊंगा लेकिन हाल में एक कलाकार को स्क्रिप्ट सुना रहा था तो उनके सेक्रेटरी ने कहा कि आज पहली बार शुद्ध हिंदी में स्क्रिप्ट सुन रहा हूं. मैं कौन सा शुद्ध लिखता हूं. मैं तो हिंदी भाषा का विद्यार्थी भी नहीं रहा. शुद्ध हिंदी का मतलब क्या था. मैं तो बस हिंदी बोल रहा था. उनके कहने का तात्पर्य था कि वह पहली बार ऐसी स्क्रिप्ट सुन रहे थे, जिसमें अंग्रेजी के शब्द बहुत कम थे. मैं अपनी स्क्रिप्ट में कभी अंग्रेजी शब्दों को रोकता नहीं हूं, लेकिन मैं महाराष्ट्र में पला, बढ़ा और पढ़ा हूं इसलिए मेरी भाषा में अंग्रेजी के शब्द कम आते हैं
इधर हिंदी के उपयोग और प्रयोग में आत्महीनता की ग्रंथि भी काम करती है. अगर आप हिंदी में बोलते हैं तो ‘हिंदी बोलने वाले’ मान लिए जाते हैं और आप के प्रति एक अलग रवैया होता है. आपके नाम में ‘जी’ लगा दिया जाता है. मेरे बारे में तो लोग कहते ही हैं,वही न... जो हिंदी में बोलते हैं चंद्रप्रकाश.
मेरे अनुभव में रंगमंच से आये अभिनेता स्क्रिप्ट में लिखे हुए शब्दों को जस का तस स्वीकार कर लेते हैं. उसी को बोलना पसंद करते हैं. उन्हें कभी कोई दिक्कत नहीं होती है. सिनेमा के लोकप्रिय कलाकार हिंदी के प्रति अलग रवैया रखते हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि उनके संवाद आमफहम हिंदी में होनी चाहिए. वे अपनी बात आम से आम दर्शक तक पहुंचाना चाहते हैं. रंगमंच के अभिनेता संवादों के अनुप्रास, अलंकार और ध्वनियों को समझ लेते हैं. हिंदी फिल्मों के पॉपुलर स्टार्स को इनकी कोई समझ नहीं होती. वे ऐसा संवाद चाहते हैं, जिसे बोलने में आसानी हो. अनेक अभिनेता तो शब्दों के सही उच्चारण और ठहराव पर भी जोर नहीं देते. उनका तर्क होता है कि हम साहित्य थोड़े ही बोल रहे हैं.
वे कहते हैं- आपकी ही बात को मैं अपने लहजे में कह रहा हूं. मेरा यह कहना होता है कि भाई स्क्रिप्ट लिखने में मैंने अपने संवादों और शब्दों को कई बार बदला है, सुधारा है. अब आप उसमें कोई परिवर्तन ना करें. भाषा का ज्ञान नहीं होने से अभिनेता व्यर्थ हस्तक्षेप करते हैं और स्क्रिप्ट बिगाड़ देते हैं. चूंकि हिंदी फिल्मों में आजकल लोकप्रिय स्टार्स की तूती बोलती है. उसके पीछे बल होता है, इसलिए वह मनमानी करता है. मैं अपनी बात कहने में कम से कम शब्दों का इस्तेमाल करता हूं. एक अभिनेता को तो मैंने दो वाक्य लिख कर दिए कि इसको अपनी तरह से बोल कर देखिए. आप पाएंगे कि आपने अनेक नए शब्द जोड़ दिए. अगर ऐसे जोड़ते जाएं तो पूरी स्क्रिप्ट में 20-30 हजार शब्द बढ़ जाएंगे. फिल्म की अवधि बढ़ जाएगी. फिर भी अगर अभिनेता ऐसी गलती करते जाते हैं तो हम लोग उसे एडिटिंग में काटकर निकालते हैं.
इसमें कोई तर्क नहीं है कि स्क्रिप्ट के सॉफ्टवेयर सब अंग्रेजी में हैं, इसलिए अंग्रेजी का चलन बढ़ा है. मैं तो हिंदी में लिखता हूं और सेल टीएक्स सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करता हूं. मुझे कोई परेशानी नहीं होती. यह कोई रॉकेट साइंस भी नहीं है. आप आसानी से किसी भी सॉफ्टवेयर में हिंदी इस्तेमाल कर सकते हैं.
सच है कि आजकल कई लेखक विवरण और निर्देशन अंग्रेजी में लिखते हैं और केवल संवाद हिंदी में वह भी रोमन हिंदी में लिखते हैं. मैं ऐसा नहीं करता. मेरी फिल्मों में निर्देश, विवरण और संवाद सब हिंदी में होते हैं. एक मजेदार घटना बताता हूं. मैं एक शूटिंग में था. मैंने कलाकार को कहा कि लाइवशूट करते हैं. बुलाया उन्हें, वे कैमरे के सामने आए और उन्होंने पूछा कि क्या करना है? मुझे हैरत हुई कि स्क्रिप्ट उनके पास थी, लेकिन उन्होंने निर्देश नहीं पढ़े थे. पता चला कि उन्होंने केवल अपने संवाद पढ़े. निर्देश पढ़े ही नहीं है. तब मेरी समझ में आया कि कलाकार पढ़ते नहीं हैं. उन्हें बताना पड़ता है कि सीन में क्या करना है? हर सीन में बताना पड़ता है. ज्यादातर कलाकार केवल अपना संवाद पढ़ते हैं. पहले मेरी स्क्रिप्ट में कला निर्देशक, कॉस्टयूम डिजाइनर और बाकी तकनीकी टीम के लिए भी निर्देश होते थे. अब मैं इतने विस्तार में नहीं लिखता. मैंने पाया कि कई बार विस्तार से लिखने पर स्क्रिप्ट बोझिल हो जाती है या लगने लगती है. कलाकारों को समझा देना ज्यादा सुविधाजनक है.
अभी तो सेट पर संपर्क भाषा भी अंग्रेजी हो गई है. यह सच है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी सिर्फ संवाद की भाषा रह गई है. फिल्म यूनिट के संप्रेषण और व्यवहार की भाषा अंग्रेजी हो गई है. आजकल जहां ‘नमस्ते’ को दकियानूसी और ‘हाय’ को प्रगतिशील समझा जाता है, वहां आप हिंदी के लिए किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद न रखें. भाषाओं का स्वरूप बदलता रहता है और मुझे उम्मीद है कि हिंदी का स्वरूप बहुत बदल जाएगा.
मुझे तो अब यह लगने लगा है कि अंग्रेजी के संवादों के बीच में कुछ-कुछ शब्द, क्रिया और योजक शब्द हिंदी के रह जाएंगे. अभी हिंदी वालों को तय करना है कि उन्हें हिंदी को किस दिशा में ले जाना है? साथ ही सरकार को भी तय करना है कि उसका रवैया क्या होता है? सरकार को न सिर्फ हिंदी बल्कि सारी भारतीय भाषाओं के बारे में सोचना चाहिए. हर प्रदेश को याद रखना होगा कि उनकी सरकारों का काम, उनके प्रदेश के प्रशासन और न्यायालय का काम वहां की भाषा में हो, इन भाषाओं का चलन बढ़ेगा और वहां के नेता और अभिनेता सब उस भाषा में बोलने लगेंगे तो भाषा बची रहेगी.
यह विडंबना ही है कि हिंदी फिल्मों के कलाकार हिंदी नहीं बोलते हैं, जबकि भारत की ही सभी भाषाओं के कलाकार अपनी भाषा में बातें करते हैं. हमारे अभिनेता केवल संवादों में हिंदी बोलते हैं. उसके अलावा उनके जीवन में हिंदी कहीं नहीं है. मैंने तो इधर महसूस किया है कि हिंदी प्रदेशों से आए कलाकार, तकनीशियन और लेखक हिंदी बोलने और व्यवहार करने में आत्महीनता महसूस करते हैं. मेरे साथ सुविधा है कि मेरी फिल्म की भाषा अंग्रेजी हो ही नहीं सकती. मैं 12वीं शताब्दी के चरित्रों को लेकर फिल्म बना रहा हूं.
(डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी इन दिनों यशराज फिल्म्स के लिए ‘पृथ्वीराज’ फिल्म का निर्देशन कर रहे हैं. उनकी निर्देशित ‘पिंजर’, ‘जेड प्लस’ और ‘मोहल्ला अस्सी’ चर्चित फ़िल्में रही हैं. उन्होंने दूरदर्शन के लिए ‘चाणक्य’ का लेखन-निर्देशन किया था और चाणक्य की शीर्षक भूमिका भी निभाई थी.)
लेख प्रस्तुति- अजय ब्रह्मात्मज.
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