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एक रूपये जुर्माने की कीमत तुम क्या जानो 'मी लार्ड'
संभवत: प्रशांत भूषण पर सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश की अवमानना के लिए लगा एक रुपये का जुर्माना इस इस सदी का सबसे दिलचस्प जुर्माना कहा जाएगा. आज के दौर में ये सांकेतिक हर्जाना कहा जा सकता है. कहने वाले कहेंगे कि आख़िर एक रूपये की कीमत ही क्या है? तो बात ऐसी है दोस्त कि जुर्माना फिर जुर्माना है, चाहे एक रुपये का हो या फिर एक लाख का.
दरअसल, सारा मामला प्रशांत भूषण के दो ट्वीट का है. एक में प्रशांत ने पूर्व मुख्य न्यायधीशों के कामकाज की आलोचना की थी. दूसरे ट्वीट में उन्होंने वर्तमान मुख्य न्यायधीश अरविन्द बोबड़े की तस्वीर पोस्ट कर दी थी जिसमें वो बिना हेलमेट, बिना मास्क पहने हार्ले डेविडसन मोटर साइकिल पर नज़र आ रहे हैं.
अब कोर्ट को ये नागवार गुज़रा कि कैसे कोई इतनी बड़ी हिमाक़त कर सकता है? आज एक है, कल और होंगे. इससे कोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो जाएगा. चुनांचे कोर्ट ने प्रशांत को सज़ा सुना दी.
प्रशांत भूषण द्वारा कोर्ट की अवमानना पर आये फ़ैसले से एक क़िस्सा याद आता है जब इसी प्रकार एक व्यक्ति को एक रूपये का जुर्माना भरना पड़ा था. आईये, जानते हैं कि वो मुद्दा क्या था? ये मामला भारतीय रेल से सम्बंधित है. इसके साथ एक दुखद अंत भी जुड़ गया है.
1905 में बनी शिमला-कालका रेलट्रैक,तब भी और आज भी, इंजीनियरिंग का शानदार नमूना है. ये तकरीबन 95 किलोमीटर लंबी है. लगभग 42 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा पर खूबसूरत हिल स्टेशन आता है जिसका नाम है बड़ोग. बात इसी जगह की है.
इस रेल लाइन पर कुल 103छोटी-बड़ी सुरंगें हैं. बड़ोग के पास 33 नंबर की सुरंग बननी तय हुई, ये सबसे लम्बी सुरंग थी और इसका ज़िम्मा दिया गया ब्रिटिश इंजिनियर अफ़सर कर्नल एस. बड़ोग को.
बड़ोग ने काम को जल्दी ख़त्म करने के लिहाज़ से फ़ैसला लिया कि पहाड़ के दोनों सिरों से सुरंग खोदने का काम शुरू किया जाए और बीच में उन्हें मिला दिया जाए. दोनों सिरों पर लगे कारीगर इंजीनियर बड़ोग की गणतीय गणना के आधार पर सुरंग खोदते गए पर दोनों सिरे बीच में नहीं मिले. गणना में कुछ भूल हो गयी थी. बड़ोग और कारीगर बेहद हताश हो गए क्योंकि उनकी मेहनत बेकार हो गयी थी.
ब्रिटिश अफ़सरों को यह बात नागवार गुजरी. उन्होंने कर्नल बड़ोग पर तब एक रुपये का जुर्माना लगा दिया. इंजीनियर जो पहले ही अपनी ग़लती पर पछता रहा था,उसे यह बड़ा अपमान लगा. एक दिन सुबह सैर करने वह घर से निकला और वहीं खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली.
बाद में इंजीनियर हर्लिंगटन ने एक साधु भाल्कू की मदद से दूसरी सुरंग का निर्माण किया. कर्नल बड़ोग को सम्मानित करने के लिए उस स्थान का नाम बड़ोग रख दिया गया. सुरंग नंबर 33 के साथ कुछ अजीब क़िस्म की किस्से भी जुड़ गए हैं. मसलन कि आज भी कर्नल बड़ोग की आत्मा उधर आती है.
इसे भारतीय रेल के इतिहास को कुछ अच्छी बातों के संदर्भ में भी याद किया जा सकता है. ब्रिटिश अफ़सरों की ज़्यादती के क़िस्से मशहूर हैं पर कुछ ऐसे भी वाकये हैं जिनमें उनकी ईमानदारी की मिसालें आज भी दी जाती हैं.
नज़ीर तो प्रशांत भूषण ने भी पेश कर दी है क्यूंकि उनकी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने वो काम कर दिया, जो बड़े बड़े अर्थशास्त्री नहीं कर पाये. कोर्ट ने रुपये के अवमूल्यन को रोका नहीं, बल्कि उसकी कीमत बढ़ा दी. कैसे? भाई, एक रुपये न चुकाने की कीमत 3 महीने की सज़ा और 3 साल के लिए कोर्ट प्रैक्टिस पर पाबंदी कोई कम मोलभाव तो नहीं, तो एक रुपए की कीमत इतना इससे पहले कब थी?
जैसे ही कोर्ट ने ये फ़ैसला सुनाया उनके मित्र और वकील राजीव धवन ने तुरंत ही यह भारी-भरकम रक़म जमा करवा दी और कोर्ट की जीत हुई. पर प्रशांत ये लड़ाई हारकर भी जीत गए. अगर वो जुर्माना न भरते तो जेल जाना पड़ता, फिर कुछ सालों के लिए वक़ालत भी न कर पाते.कई बार आपको युद्ध जीतने के लिए छोटी-मोटी लड़ाइयां हारनी पड़े तो कोई गुरेज़ नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने तो सज़ा सुनाकर अपनी विश्वसनीयता हासिल कर ली, पर आज के हुक्मरानों ने जिस तरह तमाम सरकारी संस्थानों की विश्वसनीयता को चुनौती दे रखी है, क्या कोर्ट उस तरफ़ भी कोई संज्ञान लेगा?
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