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गांधीनगर: एक हाल दिल्ली के मैनचेस्टर का

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रहने वाले 36 वर्षीय मंतोष कुमार पाठक एक गोदामनुमा कमरे में अपने साथियों के साथ बैठे हुए हैं. उनके कमरे के बाहर एक पिकअप गाड़ी खड़ी है. उसके पिछले हिस्से में गैस चूल्हा रखा हुआ है. बीती रात उनके पास सब्जी खत्म हो गई तो आज वे और उनके साथी रोटी और नमक-तेल से काम चला रहे हैं. हाथ में सरसों तेल का डब्बा दिखाते हुए मंतोष कहते हैं कि यह लगभग एक महीने से चल रहा है.

पूर्वी दिल्ली के गांधीनगर में पिकअप चलाकर अपना और अपने परिवार का पेट भरने वाले मंतोष को बीते 20 मार्च से एक रुपए की आमदनी नहीं हुई है. 14 मार्च को होली से दो दिन पहले उनके पास जो पैसे थे उसमें से कुछ उन्होंने गांव भेज दिया था. उसके बाद जो पैसे बचे थे सब धीरे-धीरे खत्म हो गए. आज उनके पास सब्जी खरीदने के पैसे नहीं बचे थे. बस नमक-तेल और रोटी का सहारा बचा है.

पीले रंग का हाफ टीशर्ट पहने और मुंह पर मास्क लगाए मंतोष हमें गुथा हुआ आटा दिखाते हुए कहते हैं, “रोटी बनाने जा रहा हूं. बगल में ही यहां के सांसद गौतम गंभीर का ऑफिस है, लेकिन वहां से अब तक कोई भी नहीं आया है.”

मंतोष कुमार और उनके साथी

गांधीनगर की ख्याति एशिया का सबसे बड़े रेडीमेड कपड़ा मार्केट के रूप में है. पूर्वी दिल्ली में पड़ने वाले गांधीनगर में लॉकडाउन के बाद जो सन्नाटा फैला हुआ है उसके बारे में स्थानीय लोग बताते हैं कि इस तरह का सन्नाटा आखिरी बार इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगे के समय देखने को मिला था. तमाम दुकानें बंद हैं, ग्राहक नदारद हैं. बात हमें अशोक कुमार गुप्ता ने बताई.

गांधीनगर में कई मार्केट एसोसिएशन हैं. उसी में से एक एसोसिएशन के प्रमुख और यहां कपड़े की दुकान चलाने वाले अशोक कुमार गुप्ता भी हैं. उनका बचपन गांधीनगर की तंग गलियों में बीता है. वे कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं. हमारी मुलाकात उनसे तब हुई जब वे गांधीनगर थाने की पुलिस के सहयोग से मजदूरों में खाना वितरित कर रहे थे. वे कहते हैं, ‘‘इस तरह का सन्नाटा तो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देखने को मिला था. इसके अलावा कभी-कभार किसी एसोसिएशन या पार्टी द्वारा बंद बुलाने पर ऐसा होता था. हालांकि तब भी इस तरह की मुर्दा शांति नहीं होती थी. लोग सड़कों पर होते थे.’’

गांधीनगर में बंद पड़ी दुकानें

अशोक कुमार बताते हैं, ‘‘बाकी दिनों में यहां दिन-रात काम चलता ही रहता था. कोरोना की मार ने यहां के मालिकों और मजदूरों, दोनों को बेहाल कर दिया है. हम कर क्या सकते हैं. इस बुरे दौर में हम देश के साथ हैं और चाहते हैं कि यह बीमारी जल्दी से जल्दी खत्म हो.’’

बेहाल मजदूर घर जाने को बेचैन

कुछ लोग गांधीनगर को दिल्ली का मैनचेस्टर कहते हैं. यहां लगभग पांच हज़ार कपड़े की दुकानें और कपड़े सिलने की छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां हैं. यहां से सिर्फ भारत के अलग-अलग राज्यों में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी रेडीमेड कपड़े निर्यात होते हैं.

कभी झुग्गी झोपड़ी रहे गांधीनगर का महात्मा गांधी से कोई सीधा संबंध है या नहीं, हमें नहीं पता. लेकिन यह जगह दिल्ली की कुछेक सूक्ष्म और लघु उद्योगों की बहुलता वाले इलाके में से एक है, जिससे लाखों लोगों के घरों में हर दिन चूल्हा जलता है. लॉकडाउन होने की वजह से घरों पर जलने वाले चूल्हों का तो पता नहीं लेकिन जो लोग कमाकर पैसे भेजते थे वे खुद ही भूखे रहने को मजबूर हैं. खाने के लिए उन्हें घंटो लाइन में लगना पड़ रहा है.

दोपहर के एक बजे हम गांधीनगर पहुंचे. गांधीनगर थाने के बाहर दो लम्बी लाइनें लगी हुई है. एक तरफ महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे हैं तो दूसरी तरफ पुरुष खड़े हुए हैं. यहां खाना एक बजे मिलता हैं, लेकिन खाने के लिए लोग लाइन में सुबह दस बजे से ही लग जाते हैं. लाइन को नियंत्रित करने के लिए और सोशल डिस्टेंसिग बनाए रखने के लिए पुलिस और सामाजिक संगठन के लोग लगातार कोशिश करते नज़र आते हैं.

खाने के लिए लाइन में लगे मजदूर

खाने के लिए लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे चंदन कुमार बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले हैं. दुबले पतले 20 वर्षीय चन्दन को परिवार की मज़बूरी पढ़ाई छोड़कर काम के लिए दिल्ली लाई है.

चंदन गांधीनगर की एक सिलाई फैक्ट्री में सिलाई का काम करते थे. उनका काम लॉकडाउन के कारण बंद हो गया जिस वजह से उन्हें खाने के लिए सरकारी गाड़ी और सामाजिक संगठनों की मेहरबानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है. वे न्यूजलॉन्ड्री से कहते हैं, ‘‘अभी सरकार के लोग या दूसरे लोग खिला रहे हैं तो खा रहे हैं जिस रोज नहीं खिलाएंगे उस दिन कमरे पर देखेंगे. हालांकि कमरे पर भी पैसे नहीं है. नौ हज़ार रुपए महीने का कमाते थे और उसमें से घर भी भेजना होता है. मार्च महीने में जो काम किए थे उसी में से मालिक हज़ार और पांच सौ रुपए करके दे देता है जिससे कमरे में कुछ-कुछ बना लेते हैं.’’

चंदन को यह एहसास है कि लॉकडाउन जल्दी खत्म नहीं होगा. उनके साथ सीतामढ़ी के पांच और लोग रहते हैं, घर जाने के सवाल पर चन्दन कहते हैं, ‘‘हमारे साथ कई लोग रहते थे. उसमें से यूपी वाले लोग चले गए लेकिन जो बिहार वाले हैं वे अभी रुके हुए हैं. हम इंतजार कर रहे हैं कि गाड़ियां चले तो हम निकल जाएं. हालांकि वे इस उम्मीद में भी है कि काम शुरू हो जाए ताकि उन्हें घर ना लौटना पड़े.’’

खाने के लिए लाइन में लगे चंदन कुमार

यहीं हमारी मुलाकात बुजुर्ग राम अवतार सिंह से हुई जो मोतिहारी जिले के रहने वाले हैं और यहां लम्बे समय से सिलाई करने का काम करते हैं. मुंह पर मास्क लगाए और हाथों में दाल और लच्छा पराठा लेकर सड़क किनारे अपने साथियों के साथ खा रहे रामअवतार सिंह कहते हैं, ‘‘मैं सिलाई का काम करता हूं. लॉकडाउन लगने के बाद मालिक सब राजस्थान चला गया तो हम लोग फंस गए. अब खाने के लिए समझ जाइये कि एक पैसा नहीं है. कैसे खाएं? कैसे गांव जाएं. सरकार से मैं गुजारिश कर रहा हूं ट्रेन चलवाकर या बस चलवाकर हमें अपने-अपने घर भिजवा दें. बीमारी से कम भुखमरी से ज्यादा लोग मरेंगे. ये लाइन (खाने के लिए लगी लाइन) आप देख रहे हैं, लोग भूख से ही मर जाएंगे.’’

गांधीनगर थाने पर रोजाना दोपहर और शाम को मजदूरों के लिए पुलिस थाना और स्थानीय समाजिक संस्थाओं द्वारा खाने का इंतज़ाम किया जाता है. रोजाना यहां सुबह शाम छह सौ से सात सौ मजदूर खाना खाते हैं.

खाने के इंतजार में ही गुजर रहा वक़्त

अब दोपहर के 3 बजने को हैं. हम गांधी नगर से थोड़ा आगे कृष्णा नगर की ओर बढ़ते हैं. यहां हमें सड़कों पर एक लम्बी लाइन दिखती है जो इंसानों की नहीं थाली फ्लेट और टिफिन की है. दरअसल धूप की वजह से मजदूरों ने अपना बर्तन सड़क के किनारे नाली के पास रख दिया है और खुद छाया में खड़े हो गए हैं. बगल के घरों की छांव में.

यहां लाइन में खड़े वो मजदूर हैं जो गांधीनगर में माल ढुलाई, सिलाई या किसी भी तरह का काम करते थे. वे बताते हैं कि दोपहर बारह बजे जो खाना मिलता है उसके लिए सुबह छह बजे से लोग लाइन में लग जाते हैं, वहीं जो खाना शाम छह बजे मिलता है उसके लिए लोग दोपहर एक बजे से लाइन में लगने लगते हैं. पूरा दिन खाना लेने में ही गुजर जाता है. वहां हमें देख एक छोटी लड़की कहती हैं, ‘‘भैया, कल तो हमको खाना ही नहीं मिला. आज सबसे आगे मेरा ही नम्बर है.’’ यहां खाना लेना किसी मैराथन जीतने जैसा हो गया है. सरकारी गाड़ी आती है और लोग उसके पीछे भागते हैं.

खाने के लिए तीन घंटे पहले से लग जाती है लाइन

यहां खड़े और अपनी बारी का इंतजार कर रहे मूलचंद्र उत्तर प्रदेश के एटा जिले के रहने वाले हैं. मूलचंद्र लॉकडाउन से पहले एक प्राइवेट स्कूल में बस चलाने का काम करते थे, वे बताते हैं, ‘‘यहां रोजाना 200 से 250 लोग खाना लेने आते हैं. बस चलाता था तो पैसे आ जाते थे लेकिन काम बंद होने के बाद जो पैसे थे खत्म हो गए. अब तो रोजाना खाने के लिए लाइन में लगना पड़ता है. अगर लाइन में नहीं लगे तो भूखे रहना पड़ेगा. सुबह से लाइन में इसीलिए लगना पड़ता है कि कई बार जो पीछे रह जाता है उसे खाने को नहीं मिल पाता है. बिना खाना लिए वापस जाना पड़ता है.’’

यहां मजदूरों के बीच खाना सरकार द्वारा दिया जा रहा है. खाने में चावल हर रोज रहता है बस उसके साथ कभी दाल, तो कभी कढ़ी तो कभी राजमा होता है.

अपने पड़ोसियों के साथ खाने का इंतजार करते मूलचंद्र

यहां रह रहे मजदूर अपने घर जाने को बेचैन हैं. तीन तारीख के आसपास हम थाने के बाहर पहुंचे तो वहां हर दस मिनट में मजदूरों का झुण्ड यह पता करने आ रहा था कि सरकार ने उन्हें घर भेजने का फैसला लिया है तो उसके लिए कहां अप्लाई करना है. मैखिक रूप से बताते-बताते जब पुलिस अधिकारी थक गए तो उन्होंने थाने के गेट पर एक पोस्टर लगा दिया. मजदूर जानकारी लेने आते तो उस पोस्टर की तरफ इशारा कर दिया जा रहा था.

यहीं हमारी मुलाकात मुकेश कुमार से हुई जो अपने भाई के साथ ट्रेन का पता पूछने आए थे. 24 वर्षीय मुकेश शादी शुदा हैं और उनके दो बच्चे हैं. यहां वे अपने परिवार के साथ रहते थे. सिलाई का काम करने वाले मुकेश पिछले दिनों घर से 10 हज़ार रुपए मंगाए थे जिससे उनके यहां खर्च चल रहा है. वे कहते हैं कि छोटे-छोटे बच्चे हैं उनको लाइन में लेकर लगना मुश्किल है इसलिए घर पर ही खाना बनाकर खाते हैं. मकान मालिक को किराया देना है. इसलिए हम चाहते हैं कि घर निकल जाए वहां बच्चों को खाने-पीने की दिक्कत तो नहीं होगी.’’

मुकेश जैसे सैकड़ों लोग दिनभर यह पता करने आ रहे हैं कि कब तक गाड़ी दिल्ली से बिहार के लिए चलेगी.

अपने भाई के साथ मुकेश बिहार जाने के लिए बेहाल दिखे

बिहार के लाखों मजदूर दिल्ली में रहकर काम करते हैं. कुछ पैदल लौट चुके हैं तो कुछ इंतजार कर रहे हैं कि दिल्ली से ट्रेन चले. हालांकि आठ मई को पहली ट्रेन दिल्ली से मुजफ्फरपुर के बीच चली है. इसको लेकर भी विवाद खड़ा हो गया. दिल्ली सरकार का दावा है कि उसने मजदूरों का किराया चुकाया है. हालांकि एक पत्र भी सामने आया है जिसमें लिखा था कि बिहार सरकार दिल्ली सरकार को पैसे बाद में चुकाएगी. मजदूरों पर राजनीति जारी है और पैदल मजदूरों का निकलना भी जारी है. इस दौरान उनकी मौत भी हो रही है. हाल ही में महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश लौट रहे 16 लोगों की ट्रेन से कटकर मौत हो गई थी. थके हारे लोगों पर माल गाड़ी उस वक्त चढ़ गई जब वे पटरी पर सो रहे थे.

रोजाना हो रहा करोड़ों का नुकसान

मजदूर तो परेशान है ही लेकिन दुकान मालिकों और कंपनी मालिकों की भी मुसीबत कम नहीं है. उनका रोजाना लाखों का नुकसान हो रहा है.

गांधीनगर थाने के पास पैसे भेजने और बाकी तमाम ऑनलाइन कामों की दुकान चलाने वाले करण शर्मा बताते हैं कि मेरा बिजनेस तो इन्हीं मजदूरों पर निर्भर था. ये लोग गांव पैसे भेजते थे. पिछले एक दो महीने से कोई भी गांव पैसे नहीं भेज रहा. यहां बहुत कम पढ़े लिखे मजदूर भी है जो एटीएम से पैसे नहीं निकाल पाते हैं. जब उनके गांव से पैसे आते हैं तो वे ये पैसा निकलवाने जरूर आते हैं. मजदूरों की आमदनी पर ही हमारी आमदनी निर्भर है. ऐसे में काम बंद है.

गांधीनगर में लगभग पांच हज़ार की संख्या में रेडिमेड कपड़ों की दुकानें और कपड़े सिलने की फैक्ट्रियां हैं. रेडिमेड मार्केट एसोसिएशन के प्रमुख अशोक कुमार गुप्ता नुकसान का जिक्र करते हुए कहते हैं, ‘‘आप नुकसान का अंदाजा इस बात से लगाएं कि यहां के हर दुकान पर पांच से छह मजदूर सेल्समैन के रूप में काम करते हैं. हर दुकान पर एक दो सिलाई करने वाले होते हैं. जिन जगहों पर रेडिमेड कपड़ा बनता है वहां सिलाई करने वालों की संख्या ज्यादा होती है. यहां के दुकानों से करोड़ों रुपए का व्यापर रोजाना होता है. लाखों लोग इस पर आश्रित हैं. लेकिन इस समय जब लोगों की जिंदगी ही खतरे में हैं तो रोजगार का क्या ही करेंगे.’’

अशोक कुमार गुप्ता की अपनी कपड़े की दुकान है. वे कहते हैं, “मेरा रोजाना का दस हज़ार का नुकसान है. ऐसे में पांच हज़ार दुकानों का आप अंदाजा लगा सकते हैं. मेरी दुकान बहुत बड़ी नहीं है. मेरी दुकान से बहुत बड़ी-बड़ी दुकानें यहां हैं. अनुमान लगाना मुश्किल है पर कई करोड़ का नुकसान हो चुका है.’’

अभी की अगर हम बात करे तो भारत में कोरोना पच्चास हज़ार के पार कर गया है. रोजाना मामलों में इजाफा देखने को मिल रहा है. इसी बीच एम्स के निर्देशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि भारत में कोरोना अपने पीक में जून-जुलाई महीने में होगा. जिसके बाद लोगों की चिंताएं बढ़ गई है.

मार्केट एसोसिएशन के प्रमुख अशोक कुमार गुप्ता

लेकिन अशोक गुप्ता को भरोसा है कि गांधीनगर में स्थिति अगले एक महीने में ऐसी हो जाएगी कि दुकानें खुल जाए. उसके बाद दुकानों पर काम होने में दो महीने का और समय लग सकता है, क्योंकि बहुत सारे मजदूर अपने घरों को लौट चुके हैं. उनके वापसी में समय लगेगा. ऐसे में काम में तेजी तभी आएगी जब मजदूर अपने घरों से लौटकर आएंगे. मजदूरों के बगैर काम प्रभावित होगा ही.’’

गुप्ता को भले ही यह भरोसा है कि दो से तीन महीने में सब बेहतर हो जाएगा लेकिन बाकी कई दुकान मालिकों से हमने बात की तो उनका कहना है कि यह साल तो हमारे हाथ से जाता दिख रहा है. कपड़े के कारोबार का सबसे शानदार समय शादियों का होता है. कोरोना की चपेट में वो सब बर्बाद हो चुका है. होली तो कुछ हद तक प्रभावित हुई लेकिन ईद पर तो इसका व्यापक असर साफ़ दिख रहा है.

रमजान के महीने में गांधीनगर की रौनक बढ़ जाती थी, यहां देशभर से लोग कपड़ों की होल सेल खरीदारी करने आते थे. लेकिन लॉकडाउन के चलते बाजारों में सन्नाटा है, अब दुकानदारों की उम्मीदें दिवाली और छठ पूजा पर टिकी हैं. अभी जो हालात है उसमें तो लग रहा है कि नम्बर-दिसंबर तक भी हालात बेहतर नहीं होंगे. आज जो मजदूर घर जा रहे हैं वो अब छठ से पहले आयेंगे ही नहीं. यहां ज्यादातर मजदूर बिहार के ही हैं.

सड़क पर खाना खाते बच्चे

ऐसा ही कुछ कहना है, अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी से जुड़े प्रोफेसर अमित बसोले का. वो कहते हैं, ‘‘दो तीन महीने में सबकुछ समान्य हो जाएगा ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. मुझे जहां तक लगता है कि दिवाली के आसपास चीजें समान्य होंगी और अगर ऐसा होता है तो इन कपड़ा व्यवसाइयों के लिए सही रहेगा क्योंकि शादी का समय तो इनके हाथ से निकल गया. कोरोना की वजह से इस साल शादियां भी कम हुई हैं लेकिन अगर दिवाली तक यही हालात रहे तो सही नहीं होगा. हालांकि हम यह सब सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं. दुकानें खुलेंगी या नहीं यह सब निर्भर करेगा भारत में हालात क्या रहते हैं. अभी तो जिस तरह से आंकड़े बढ़ रहे हैं उसे देखकर लगता नहीं कि हालात में जल्द सुधार की संभावना है.’’

आर्थिक मदद की उम्मीद

दिल्ली सरकार लगातार केंद्र सरकार पर हमला कर रही है कि सरकार उन्हें आर्थिक पैकेज नहीं दे रही है. अरविन्द केजरीवाल ने बीते दिनों समाचार चैनल आज तक को दिए इंटरव्यू में कहा था कि अब हमें कोरोना को साथ रहने की आदत डाल लेनी चाहिए. इसके अलावा धीरे-धीरे मार्केट को खोलना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था चलने लगे.’’

केजरीवाल आगे थोड़ा हंसते हुए कहते हैं, ‘‘आज दिल्ली के अंदर बिलकुल रेवेन्यु आना बंद हो गया है. हर साल अप्रैल के महीने में हमलोगों के पास 3,500 करोड़ का टैक्स आता था लेकिन इस बार सिर्फ तीन सौ करोड़ का टैक्स आया है. अब हम अगले महीने तनख्वाह कहां से देंगे.’’

केजरीवाल सरकार और केंद्र सरकार के बीच आर्थिक मदद को लेकर बहस चल रही है. हालांकि दिल्ली सरकार को एक मोटा टैक्स गांधीनगर से मिलता था. गुप्ता बताते हैं कि यहां काम बंद होने से सिर्फ मजदूरों और मालिकों को ही नुकसान नहीं है बल्कि सरकार को भी नुकसान है. सरकारों को गांधीनगर से करोड़ों का टैक्स मिलता है.

बंद दुकान के बाहर बैठा एक युवक

एक तरफ जहां दिल्ली सरकार टैक्स की कमी की बात कर रही हैं वहीं केंद्र सरकार किसी तरह का आर्थिक पॅकेज जारी नहीं कर रही है. वहीं यहां के दुकान मालिकों को उम्मीद है कि सरकार उन्हें भी आर्थिक मदद देगी.

सरकार से मदद के सवाल पर गुप्ता कहते हैं, ‘‘सरकार ने हमसे कहा कि अपने यहां काम करने वालों को वेतन दो. हमने ऐसा किया क्योंकि हमें पता है कि वो बेचारे घर पर बैठे हुए उनको भूखे नहीं रख सकते हैं. हम उनके लिए खाने का इंतजाम कर रहे हैं, लेकिन इस दौरान सरकार को भी हमने बिजली बिल या अन्य टैक्स के मामले में राहत देनी चाहिए. हम उनसे यह उम्मीद कर रहे हैं.’’

सब उम्मीद के भरोसे

यहां सब उम्मीद के भरोसे नजर आते हैं. मजदूर मालिकों और सरकारों से उम्मीद लगाए बैठे हैं तो मालिक सरकारों से उम्मीद लगे बैठे हैं, दिल्ली सरकार केंद्र सरकार से उम्मीद लगाए बैठी है. इन उम्मीदों के बीच लोगों की परेशानी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है. ज्यादातर मजदूरों से बात करके लगता है कि वो वापस नहीं लौटना चाहते हैं, वे काम चाहते है. मालिक भी चाह रहे हैं कि काम शुरू हो, दिल्ली सरकार का भी कहना है कि धीरे-धीरे काम शुरू हो ताकि अर्थव्यवस्था तबाह होने से बच जाए लेकिन अभी जो हालात है वो इसकी इजाजत नहीं दे रहे. दिल्ली में कोरोना मरीजों की संख्या ग्यारह हज़ार के पार हो चुकी है. अब देखना होगा कि गांधीनगर में पुरानी रौनक कब तक लौटती है.

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