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‘सरकार को हमारी चिंता होती तो सिर्फ एसी ट्रेन क्यों चलाती’
मध्य प्रदेश के छतरपुर के रहने वाले गौरीशंकर अपने कंधे पर बैग लटकाए और सर पर बड़ा सा बोरा लिए पहाड़गंज से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ रहे थे. शरीर पर लदा बोझ कितना भारी है इसका अनुमान उनके पैरों से जाहिर हो जाता है. उनके साथ उनकी पत्नी भी हैं जिनके सर पर टीन की पेटी है. दो बेटियां है, उनके पास भी कुछ ना कुछ समान है जिसे लेकर वो स्टेशन की तरफ बढ़ रहे हैं, ट्रेन मिलने की उम्मीद लिए.
कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभाव को रोकने के इरादे से 22 मार्च के बाद ट्रेनों का परिचालन रोक दिया गया था. लॉकडाउन के कारण कोरोना वायरस कितना रुका इसका अनुमान तो विशेषज्ञ लगाएंगे लेकिन इस बिन तैयारी के लॉकडाउन ने मजदूरों को बहुत सताया है. भूख के डर से मजदूर पैदल ही अपने घरों को निकलने लगे. लॉकडाउन के लगभग दो महीने बाद यह स्थिति है कि लोगों का पैदल जाने का सिलसिला खत्म नहीं हो रहा.
इस बीच सरकार ने 3 मई से जब लॉकडाउन को तीसरी बार दो सप्ताह के लिए बढ़ाया तो मजदूरों के लिए श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन चलाने के बात हुई तो उसके टिकट को लेकर विवाद हो गया.
12 मई से सरकार ने समान्य ट्रेनें चलाने का फैसला लिया. इस ट्रेन के तमाम डब्बे एसी हैं जिससे टिकटों की कीमत 800 से तीन हज़ार तक की हो गई है. मंगलवार को दिल्ली स्थित नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से इन विशेष ट्रेनों का परिचालन शुरू हुआ. न्यूज़लॉन्ड्री ने इसका मुआयना किया.
रेलवे स्टेशन पहुंचने के रास्ते में कनॉट प्लेस के पास दिल्ली पुलिस के जवान बैरिकेड लगाकर हर आने-जाने वाले की जांच कर रहे थे. कई गाड़ियों को वापस कर दिया जा रहा हैं. जांच के बाद हम जैसे ही इस बैरिकेड से आगे बढ़े हमारी मुलाकात 40 वर्षीय गौरीशंकर से हुई. गौरीशंकर रहने वाले तो छतरपुर के हैं लेकिन झांसी के लिए चलने वाली ट्रेन से झांसी जाना चाहते हैं. उसके आगे के सफर के सवाल पर वे कहते हैं, ‘‘आगे का सफर भगवान भरोसे है.’’
दिल्ली सरकार तमाम दावे कर रही है कि हम लोगों तक राहत पहुंचा रहे हैं फिर भी आप घर क्यों निकल रहे हैं? गौरीशंकर इस सवाल का जवाब बड़ा हैरान करने वाला देते हैं. वे कहते हैं, ‘‘स्थिति तो यहां बहुत बढ़िया है. बस ख़ुशी के लिए घर जा रहे हैं.’’
असल में वो गुस्से में सरकारों पर तंज कर रहे थे. दुर्गापुरी स्थित ज्योति कॉलोनी में रहकर मजदूरी करने वाले गौरीशंकर कहते हैं, ‘‘दिल्ली सरकार रोज चावल दे रही थी. आप बताओ दो महीने सिर्फ चावल खाकर कोई रह सकता है. हम मजदूर हैं. 22 मार्च के पहले से काम बंद हो गया था. 25 बार कोशिश किया कि घर जाने के लिए हमारा नम्बर आ जाए. आज से समान्य ट्रेन चलने की घोषणा हुई तो हमने टिकट कराया.’’
गौरीशंकर कहते हैं कि एसी ट्रेन में चलने के लिए उन्हें नौ सौ रुपए का एक टिकट लेना पड़ा. जहां ढाई सौ रुपए का टिकट होता था वहां नौ सौ रुपए देने के लिए हमें कर्ज लेना पड़ा. गांव से पैसे मंगाकर घर जा रहा हूं. गरीब का कोई नहीं है. जिसके पास पैसे है उन्हें ही अपने घर जाने की इजाजत है. यहां मरने से बेहतर है कि घर चले जाएं.’’
गौरीशंकर ने बताया कि पैसे की कमी के कारण दोनों बेटियां पढ़ाई नहीं करती हैं.
चढ़ी दोपहर में हम तेज़ गर्मी के बीच नई दिल्ली स्टेशन पहुंचे. वहां लाइनों में लगे कुछ लोग अपना-अपना बैग सड़क किनारे छोड़कर छांव में जा बैठे थे. पुलिस लगातार लोगों को चेतावनी जारी कर रही थी कि यहां धारा 144 लगा हुआ है, बिना वजह पांच या ज्यादा लोगों के इकठ्ठा होने पर क़ानूनी कार्रवाई की जा सकती है.
हनमत लाल द्वारका के सेक्टर 23 में रहकर मजदूरी करते थे. वे भी अपने घर झांसी के लिए मंगलवार को निकले. हनमत, लॉकडाउन को मुसीबत का समय बताते हैं. वे कहते हैं, “खाने के लिए इधर से उधर भागना पड़ता था. गांव से मज़बूरी में शहर आए थे कि बच्चों के लिए कमाकर भेजेंगे लेकिन अब यहां रहना खतरे से खाली नहीं है. गांव से पैसे मंगाकर आठ सौ 30 रुपए का टिकट कराया है. यह टिकट महंगा है लेकिन घर जाना जरूरी है.’’
इसी बातचीत के दौरान उनके साथी मोहनलाल जो दिल्ली में बेलदारी का काम करते हैं, बीच में बोल पड़ते हैं, “खाने के लिए पैसे नहीं थे तो टिकट कैसे करा पाते. हम कुछ लोग साईकिल से निकल गए थे लेकिन पुलिस वालों ने बीच में रोक दिया और भला-बुरा कहकर वापस कमरे पर भेज दिया.”
गुरुग्राम से पैदल आना पड़ा
भारत सरकार ने सिर्फ एसी डब्बों वाली ट्रेन चलाने का फैसला क्यों किया इसकी कोई जानकारी नहीं है लेकिन इसके टिकटों की जो कीमत है उससे अंदाजा लगाना आसान है कि इसमें सफर कौन सा तबका करेगा.
इन ट्रेनों का टिकट 850 रुपए से शुरू होकर तीन हज़ार तक जाता है. जिन मजदूरों के सामने खाने का संकट है उनके लिए ये टिकट पहाड़ तोड़ने जैसा है. लेकिन जिन लोगों ने किसी तरह यह टिकट लिया है उनकी भी परेशानी कम नहीं हुई है.
प्रवासियों मजदूरों को सालों से शरण दे रहे मानेसर के मारुति-सुजुकी फैक्ट्री में में मेकैनिक का काम करने वाले महाराष्ट्र के हेमंत पाटिल ने 2,300 रुपए खर्च करके टिकट लिया है. लेकिन उन्हें मानेसर से पैदल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आना पड़ा. अभी सवारी गाड़ियां चल नहीं रही हैं और सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किया. ऐसे में वे देर रात पैदल मानेसर से निकले और दोपहर में 50 किलोमीटर चलकर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे हैं.
मारुति सुजुकी जैसी प्रतिष्ठित कंपनी में काम करने के बावजूद आपको अपने घर लौटना पड़ रहा है? अपनी मराठी मिली हिंदी में पाटिल कहते हैं, ‘‘उधर मकान मालिक सब बहुत परेशान कर रहे थे. पगार नहीं आने के बाद भी किराया मांग रहे थे. पहले मारुती ने कुछ दिनों तक खाना खिलाया फिर वो बंद हो गया. बचत के पैसे भी खर्च हो गए. काम अभी शुरू नहीं हो रहा तो मैं घर जा रहा हूं. कल दोपहर से अभी तक मैं सिर्फ दो बिस्कुट खाकर हूं.’’
मानेसर में बीते दिनों प्रवासी मजदूरों की पिटाई स्थानीय लोगों ने कर दी थी. क्या वहां अब भी प्रवासी मजदूर डर के साये में हैं. इस सवाल के जवाब में पाटिल कहते हैं, ‘‘वो लोग तो मार-पिटाई करते ही है. प्रवासी लोग क्या ही बोले.”
ज्यादातर लोग पैदल ही यहां पहुंचे हुए थे. उनका कहना था कि जब ट्रेन चल रही है तो लोग यहां कैसे पहुंचेगे इसके लिए सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किया है.
पुलिस का इनकार और न्यूजलॉन्ड्री ने जो देखा
रेलवे और पुलिस के आला अधिकारी दिन भर रेलवे स्टेशन का चक्कर लगाते रहे. स्टेशन के अंदर पत्रकारों के प्रवेश पर प्रतिबंध था. मजदूरों के जाने से पहले एंट्री गेट को सेनेटाईज किया जा रहा था. शाम के छह बजे डीसीपी सेंट्रल संजय भाटिया रेलवे स्टेशन पहुंचे.
यहां न्यूजलॉन्ड्री ने उनसे व्यवस्था को लेकर जब सवाल किया तो उन्होंने बताया, “हमने चेकिंग पॉइंट बनाया है जहां से सिर्फ उन्हें ही अंदर आने दिया जा रहा है जिनके पास टिकट है. बिना टिकट वाले को वापस लौटा दिया जा रहा है.’’
पर यह सच नहीं था. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहाड़गंज की तरफ सैकड़ों की संख्या में वे लोग मौजूद थे जिनके पास टिकट नहीं था. वे उम्मीद लगाकर आए थे कि रेलवे की मदद से अपने घर चले जाएंगे.
ऐसे ही एक बुजुर्ग सरयुग प्रसाद से हमारी मुलाकात हुई. बिहार के नालंदा जिले के रहने वाले प्रसाद जयपुर में रेहड़ी पर सब्जी बेचते थे. लॉकडाउन में सब्जी लाने के लिए उनके पास कोई साधन नहीं था तो काम बिलकुल बंद हो गया. छह दिन पैदल चलकर वे सोमवार शाम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे. उन्हें उम्मीद थी कि यहां से ट्रेन मिल जाएगी.
न्यूजलॉन्ड्री से बात करते हुए प्रसाद बताते हैं, ‘‘उनकी दो बेटियां है और दोनों की शादी हो गई है. पत्नी को लकवा मार दिया है. वो बेटी के यहां रहती हैं. मेरी उम्र कमाने के लायक तो नहीं रही लेकिन बीमार पत्नी के इलाज के लिए काम करना पड़ता है. अभी मेरे पास एक भी रुपया नहीं है. मुझे लगा कि किसी से मांगकर टिकट करा लूंगा. टिकट तो बुजुर्गों की सस्ती आती है लेकिन यहां तो टिकट हज़ारों रुपए का मिल रहा है. मैं कैसे घर जाऊं. पैदल निकला तो मर ही जाऊंगा.’’
सरयुग प्रसाद की तरह ही यहां बिहार के छपरा जिले की रहने वाली सुशीला देवी भी थीं. उनके पति की तबीयत बेहद खराब रहती हैं. पति के इलाज के लिए मार्च के शुरुआत में वो गुरुग्राम आई थी. वह रोते हुए कहती हैं कि बबुआ घर जाने का भी पैसा नहीं है. कंपनी में काम करते हुए अभी दस ही दिन हुए थे कि लॉकडाउन हो गया और मैं फंस गई. पैदल गुडगांव से आई हूं. पास में एको रुपया नहीं है.
सुशीला देवी जब गुरुग्राम के बस स्टॉप पर फंसी थी तो उनकी मुलाकात छपरा के ही रहने वाले शमशाद हसन से हुई. शमशाद ने हाल ही में घर से पांच हज़ार रुपए मंगाए थे. अपना टिकट बुक करना के बाद उनके पास 2,600 रुपए बचे थे.
शमशाद कहते हैं कि चाची को अकेले देखकर हम सोचे कि गांव-जवार की हैं तो इन्हें लेते चलता हूं. मेरे पास एक टिकट हैं, साहब लोगों से कहकर इन्हें अपनी सीट पर बैठा दूंगा और मैं नीचे बैठकर चला जाऊंगा. देर रात हम लोग धौला कुंआ के पास पहुंचे. वहां बैठकर सुस्ता रहे थे तभी चार लोग आए और मेरा गर्दन दबाकर चाक़ू दिखाया. जो कुछ था, सब लूट ले गए. वैसे मेरे पास फोन और 2,600 रुपए के अलावा कुछ भी नहीं था. जब फोन चला गया तो मेरा टिकट भी नहीं बचा. अब यहीं बैठे हैं. कोई मदद कर देगा तो निकल जाएंगे.’’
यहां गुजरात के रहने वाले चार किन्नर भी बिना टिकट पहुंचे थे. न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए वे बताते हैं कि होली से पहले वे लोग यहां आए थे. लॉकडाउन में फंस गए. उनके पास किराया देने तक का पैसा नहीं था. सोमवार को उनके मकान मालिक ने बताया कि नई दिल्ली से ट्रेन चल रही है. वहां से चली जाओ. अब हम यहां पहुंचे तो टिकट मांगा जा रहा है.
उसमें से एक किन्नर बताती हैं कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने चार हज़ार रुपए की मदद की थी और एक पत्रकार ने पांच सौ रुपए दिए थे. हमने पता किया तो एक टिकट का कीमत लगभग चार हज़ार है. हम कैसे घर जायंगे.
हमने इन तमाम लोगों की बात जब डीसीपी सेंट्रल संजय भाटिया के सामने रखा तो उन्होंने कहा कि हम लगातार कोशिश कर रहे हैं और लोगों से गुजारिश कर रहे हैं कि यहां न आए. बिना टिकट यहां आकर उन्हें कोई फायदा नहीं होगा.
चने के भरोसे जिंदगी
यहां कुछ सामाजिक संगठन लोगों के खाने-पीने का इंतज़ाम कर रहे हैं. लेकिन जब वे नहीं आते तो लोगों को चने पर गुजारा करना पड़ता है. अपोलो पॉकेट बारह से आकर दो दिनों से यहां बैठे बिहार के शेखपुरा के रहने वाले शैलेश कुमार होली के बाद 18 मार्च को दिल्ली आए थे. वे यहां सालों से पानी बेचने का काम करते हैं.
लॉकडाउन के कुछ दिनों बाद उनका काम बंद हो गया. ठेकेदार ने कुछ दिन खिलाया और रविवार को एक हज़ार रुपए देकर बोला कि घर चले जाओ. पैदल जैसे तैसे रेलवे स्टेशन पहुंचे शैलेश और उनके तीन साथियों के पास अब पैसे ही नहीं बचे हैं. उनके सामने एक बोतल में चना भिंगोकर रखा हुआ हैं. वे कहते हैं कि लोग जब खाने को दे गए तो खा लेते हैं, लेकिन जब कोई नहीं देता तो चना ही सहारा है. चार किलो चना खरीदकर रखे हुए हैं.
शेखपुरा और दिल्ली के बीच की दूरी लगभग 1,100 किलोमीटर है. शैलेश कहते हैं, ‘‘मन कर रहा है कि पैदल ही निकल जाएं. जिंदा रही तो घर पहुंच जाएंगे और मर गए तो क्या ही होगा. मर तो यहां भी रहे हैं. यह सरकार गरीबों की सुन नहीं रही है. सुनती तो खाली एसी डब्बा वाला ट्रेन काहे चलाती.’’
लॉकडाउन के 50 दिनों के भीतर लाखों लोग अपने घरों को लौट गए और अब भी लोग लौट रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ काम शुरू होने लगा है. क्या समान्य होने पर यहां वापस आयेंगे इस सवाल के जवाब में झांसी के रहने वाले हनमत लाल कहते हैं कि दोबारा वापस नहीं आऊंगा.
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