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कोरोना के संकट में मुस्लिमों से भेदभाव वाला “गुजरात मॉडल”
कोरोना महामारी के इस दौर में मुस्लिम समाज के प्रति नफ़रत लगातार बढ़ रही है. उनके साथ स्वास्थ्य सुविधाओं में भी भेदभाव हो रहा है. पर इससे हमें ज्यादा दिक्कत नहीं होनी चाहिए क्योंकि हमने विकास का यही मॉडल 2014 और 2019 में लगातार दो बार लोकतांत्रिक ढंग से चुना है. इसकी आत्मा में मुस्लिम समाज के साथ भेदभाव भरा है. ये मॉडल है ‘गुजरात का विकास मॉडल.’
अहमदाबाद में कोरोना के इलाज के लिए बनाए गए अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल में मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम समाज के लिए अलग-अलग वार्ड बनाया गया. इस खबर की पुष्टि हॉस्पिटल के कर्मचारियों ने तो कि लेकिन राज्य सरकार ने इससे इनकार करते हुए मामले की जांच का आश्वासन दिया है.
उत्तर प्रदेश के मेरठ में वालेंटिस कैन्सर हॉस्पिटल ने 11 बिंदुओं वाला एक इस्तहार छपवाया है जिसमें लिखा गया कि उनके हॉस्पिटल में अगर कोई मुस्लिम समुदाय का व्यक्ति इलाज करवाना चाहता है तो उसे पहले कोरोना का जांच बाहर से करवाना पड़ेगा. मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ इस तरह की स्वास्थ्य सुविधाओं में भेदभाव की खबरें भरतपुर, राजस्थान के सरकारी हॉस्पिटल और झारखंड के जमशेदपुर हॉस्पिटल से भी आ रही हैं.
मुस्लिम समाज के प्रति भेदभाव से भरा राज्य का यह स्वरूप गुजरात के इतिहास में दो दशक से ज़्यादा पुराना नहीं है. गुजरात के मुसलमान 1990 के दशक तक राज्य के अंदर विकास के लगभग सभी पैमाने पर ग़ैर-मुस्लिम समाज से कुछ बेहतर ही थे. लेकिन वर्ष 2005-06 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने तक मामला पलट चुका था, जब भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार दूसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बनने को तैयार थे.
सच्चर कमेटी के अनुसार गुजरात की कुल जनसंख्या का 9.7 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिमों का है पर वर्ष 2005-06 तक, राज्य सरकार द्वारा क्रियान्वित ज़्यादातर योजनाओं में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी नगण्य थी. मुस्लिमों को इक्का-दुक्का योजनाओं जैसे स्वर्ण जयंती शहरी रोज़गार योजना और नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम में ही उनकी आबादी के अनुसार हिस्सेदारी मिल पायी थी. (सच्चर कमेटी रिपोर्ट, 2005-06, पृष्ठ स 178).
गुजरात में वर्ष 2002-03 से 2005-06, के बीच राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में मुस्लिमों की भागीदारी मात्र 3.5% थी. इसी दौरान राज्य में जितने भी पावर टेलर और ट्रैक्टर किसानों को सब्सिडी पर दिए गए उनमें से मात्र 1.4% पावर टेलर और 4.1% ट्रैक्टर मुस्लिमों को दिए गए. इस दौरान मुस्लिम समाज के लोगों को राज्य सहकारी विभाग और ग्रामीण विकास विभाग से एक भी क़र्ज़ नहीं दिया गया. (सच्चर कमिटी रिपोर्ट, 2005-06, पृष्ठ स. 373-5).
इसी तरह वर्ष 2000-01 जब नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे और वर्ष 2005-06 के दौरान स्मॉल इंडस्ट्रीज़ डिवेलपमेंट बैंक के द्वारा दिए गए कुल 3,133.77 करोड़ रुपए के क़र्ज़ में से मुस्लिमों की हिस्सेदारी मात्र 0.44 करोड़ रुपए था. उसी प्रकार वर्ष 2004-05 और 2005-06 के बीच नाबार्ड द्वारा राज्य में दिए गए कुल क़र्ज़ में से मुस्लिमों की भागीदारी मात्र 1.7% थी. इसी दौरान राज्य सरकार द्वारा राज्य के भूमिहीनों को बांटी गई ज़मीन में मुस्लिमों की भागीदारी मात्र 4.5% थी. (सच्चर कमेटी रिपोर्ट, 2005-06, पृष्ठ स 351-53).
हम गुजरात के मुस्लिम समुदाय पर विकास के प्रति उदासीनता का भी आरोप नहीं लगा सकते हैं क्योंकि वर्ष 2005-06 में राज्य में क़र्ज़ भले ही उन्हें कम मिला हो पर राज्य के कुल बैंक खाताधारकों में से मुस्लिमों की भगेदारी 12.4% है और अपने खातों में पैसे जमा करने के मामले में मुस्लिम समाज के लोगों की भागेदारी ग़ैर-मुस्लिम समाज से लगभग 20% अधिक थी जबकि राज्य में दिए गए सभी प्रकार के क़र्ज़ों में उनकी भागेदारी मात्र 2.6% है. जो कि राज्य में उनकी जनसंख्या अनुपात से कहीं अधिक थी. (सच्चर कमेटी रिपोर्ट, 2005-06, पृष्ठ स. 127 और 351-53).
सच्चर कमेटी के आंकड़ों के अनुसार राज्य में स्वरोज़गार के लिए बनाए गए थ्रिफ़्ट सोसायटी और क्रेडिट सोसायटी में मुस्लिमों की भागेदारी उनकी आबादी के अनुपात में लगभग दो गुनी थी जबकि बेरोज़गारों को स्वरोज़गार के लिए दिए जाने वाले प्रशिक्षण में मुस्लिमों की भागेदारी राज्य में उनकी पूरी आबादी के तक़रीबन आधी थी. (सच्चर कमेटी रिपोर्ट, 2005-06, पृष्ठ स 373-5).
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट जारी होने के बाद वर्ष 2007-08 में उस वक्त की केंद्र सरकार ने मुस्लिम समुदाय के गरीब छात्रों जिनकी पारिवारिक वार्षिक आय एक लाख से कम थी उनकी मदद करने के लिए एक छत्रवृत्ति योजना प्रारम्भ किया, पर उस वक्त नरेंद्र मोदी की राज्य सरकार उक्त योजना को लागू करने से इनकार करते हुए योजना के ख़िलाफ पहले उच्च न्यायालय में गई और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में. जब दोनों जगह राज्य को मुंह की खानी पड़ी और लताड़ लगी तो अंततः वर्ष 2013 में राज्य सरकार ने ऊपरी मन से इस योजना को गुजरात में लागू किया. हालांकि तब तक पांच क़ीमती वर्ष इस योजना के बर्बाद हो चुके थे. राज्य में सरकारी नौकरियों में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी लगातार घटती जा रही है.
हाल ही में अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा जारी वार्षिक रिपोर्ट में सामने आया कि केंद्र सरकार द्वारा राज्य के अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब छात्रों के लिए दिए जाने वाले विभिन्न प्रकार की छात्रवृत्ति के लिए राज्य सरकार को आवंटित कुल 3,797.80 करोड़ रुपए में से राज्य सरकार ने वर्ष 2016-18 के दौरान मात्र 1,152.54 करोड़ रुपए ही खर्च किए.
केंद्र सरकार द्वारा गुजरात में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम, लाया गया जिसमें उक्त समुदाय के विकास के लिए अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पेयजल, सड़क, रोज़गार के साधन मुहैया करवाने के लिए प्रयास किया जाना था पर योजना आज भी ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है. गुजरात के 710 अल्पसंख्यक बहुल तालुके, 66 शहर और 13 क्लस्टर में सर्व शिक्षा अभियान, महिला बाल सुरक्षा योजना आदि जैसे सभी सरकारी योजनाओं के लिए आवंटित धन का इस्तेमाल पूरी तरह नहीं हो रहा है.
मुस्लिम समुदाय के प्रति द्वेष, तिरस्कार और भेदभाव की भावना समाज के चंद हिस्सों और गुजरात से उठकर धीरे-धीरे पूरे देश की राजव्यवस्था और प्रशासन को अपनी चपेट में ले चुकी है. लोग तो अब सामूहिक रूप से खुलेआम मुस्लिम समुदाय के लोगों से सब्ज़ी और अन्य तरह की वस्तुएं नहीं ख़रीदने की अपीलें करने लगे हैं. मुस्लिम टैक्सी ड्राईवर और सेल्समेन से सेवा लेने से व्यक्तिगत रूप से इनकार करने वालों की ख़बरें पिछले कुछ वर्षों में सामान्य हो चुकी हैं. इस तरह की सामूहिक अपील ख़तरनाक भविष्य की ओर इशारा कर रही है.
अगर आने वाले दिनो में कोई दुकान वाला मुस्लिम परिवार को राशन बेचने से मना कर दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. देश में पहले से ही मुस्लिम समाज को रोज़गार के लिए अनौपचारिक क्षेत्र पर अधिक निर्भर रहना पड़ता था और अब अनौपचारिक क्षेत्र में रोज़गार के साधन में भी मुस्लिमों के साथ भेदभाव की स्थितियां पैदा की जा रही हैं तो उनकी स्थिति और अधिक दयनीय हो सकती है.
विकास के गुजरात मॉडल की अवधारणा में मुस्लिम समुदाय को पहले से ही रोज़गार के औपचारिक क्षेत्र से लगातार अनौपचारिक क्षेत्र की ओर धकेला जा चुका है. वर्ष 2014-15 में राज्य की सरकारी नौकरियों में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी 8.56% थी जो वर्ष 2015-16 में घटकर 7.5% हो गई है. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में लगभग 57% मुस्लिम अनौपचारिक क्षेत्र में रोज़गार कर रहे थे. यह बात साफ है कि कोरोना जैसी किसी भी महामारी के दौरान अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूर सर्वाधिक प्रभावित होते हैं. इस प्रकार मुस्लिम समाज के लोगों की परेशानी कहीं अधिक है.
बाज़ारीकरण और निजीकरण के इस दौर में जब सरकारी सेवाओं का तेज़ी से निजीकरण किया जा रहा है तब ऐसे दौर में सरकार और राज्य किस तरह से निजी हाथों, निजी वर्ग और समूह द्वारा मुस्लिमों के ख़िलाफ़ भेदभाव पर अंकुश लगा सकेगा ये देखने वाली बात होगी पर फ़िलहाल तो सरकारी तंत्र ख़ुद मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव करता दिख रहा है. सरकार भले ही मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए पृथक वार्ड व्यवस्था करने की ख़बर से असहमति जता रही हो पर हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए जब हमारे समाज के कुछ लोग ऐसी ख़बरों को उचित ठहराने लगें.
भारतीय समाज का ये इस्लामोफोबिया देश के संविधान और धर्म-निरपेक्षता के मूल्यों के लिए ही ख़तरा नहीं है, बल्कि अब इसका दूरगामी परिणाम दिखता नज़र आ रहा है. अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख़ासकर अरब देशों की इस मामले में तीखी प्रतिक्रिया हमारे अंतराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक सम्बन्धों के साथ-साथ आर्थिक संबंधों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है. और शायद यही कारण है कि देश के प्रधानमंत्री के साथ-साथ देश के कई मंत्रियों को सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया के द्वारा लगातार धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाने के प्रयासों के ख़िलाफ़ बोलना पड़ता है.
अमेरिकी आयोग द्वारा अपनी एक रिपोर्ट में भारत में मुस्लिमों की घटती स्वतंत्रता पर भले ही भारत सरकार और आम भारतीय बिफर गए हों पर हिंदुस्तान में मुस्लिमों के साथ बढ़ते भेदभाव का चुनाव हमने ही किया था जब हमने विकास का यह मॉडल पूरे हिंदुस्तान पर लागू करने का सपना देखा था, जो मूल रूप से मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव पर ही आधारित है.
(लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में प्रोग्राम मैनेजर हैं)
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