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बादलों ने सूरज की हत्या कर दी, सूरज मर गया
“बादलों ने सूरज की हत्या कर दी, सूरज मर गया’’, ऐसे तो यह एक संवाद का हिस्सा है जिसे हिन्दी के उल्लेखनीय साहित्यकार भुवनेश्वर ने अपनी एक चर्चित एकांकी ‘तांबे की कीड़े’ में इस्तेमाल किया है. लेकिन जब समय घनघोर ढंग से दो बातों के बीच संगत न देख पाने का हो तब कई तरह से बादलों द्वारा सूरज की हत्या होती है. हालांकि सूरज मरता नहीं है पर बादल को यह गुमान करने का पूरा हक़ है कि उसने सूरज को ढंका नहीं बल्कि उसकी हत्या ही कर दी है. सूरज और धरती के बीच आए बादल बहुत देर टिकते भी नहीं पर जब तक बीच में हैं तब तक धरती भी इस भ्रम में रह ही सकती है कि बादलों ने सूरज की हत्या कर दी है और सूरज मर गया है.
अजीब सा है न? लेकिन इसका अश्लील मुजाहिरा कल देश में हुआ. बादल बन कर अपनी ही पोषित, प्रशिक्षित जनता को संबोधित करते हुए जो कुछ भी कहा गया उसका कुल मतलब यही था कि उन्होंने सूरज की हत्या कर दी है और सूरज मर गया है. यह सूरज जनता की वह न्यूनतम चेतना थी जिसे उनके नेता ने मार दिया.
वैश्विक विपदा के दौरान देशवासियों को संदेश देते हुए एक समृद्ध लोकतन्त्र के प्रधानमंत्री ने मानो लोकतन्त्र की हत्या कर दी, लोकतन्त्र मर गया. हास्य, व्यंग्य और रोमांच से भी आगे एक अवस्था आती है जहां दो बातों के बीच, मौजूदा परिस्थितियों के बीच कुछ कहे जाने के लिए तर्क, संगति या सहजबोध की गुंजाइश खत्म हो जाती है. ऐसी अवस्था को ‘एब्सर्डिटी’ की अवस्था कहा जाता है.
हिंदुस्तान की जनता और हिंदुस्तान का लोकतन्त्र इसी एब्सर्डिटी की तयशुदा अवस्था को प्राप्त हो चुका है. प्रधानमंत्री के हालिया संबोधन के बाद जिन्हें लगता है कि वो एक स्वस्थ मन, स्वस्थ शरीर, स्वस्थ परिवार, स्वस्थ समाज और स्वस्थ देश में रहते हैं उन्हें कोरोना से पहले अपनी आत्मा और अपने शरीर का सम्पूर्ण परीक्षण कराना चाहिए.
यह प्रधानमंत्री का भाषण नहीं था. यह एक नितांत गैरजिम्मेदार प्रशासक का आइने के सामने खड़े होकर किया गया एकालाप था. जो केवल खुद से आंखें मिला रहा था. उस आइने में वो अपनी आंखों के मार्फत अपनी अदायगी देख रहा था. जैसे वो मंच पर आने से पहले रिहर्सल करते एक कलाकार का अभिनय था. जिसे यह भली-भांति पता था कि अभी वो मंच पर नहीं है. जिसके ज़हन में दर्शकदीर्घा में बैठे वास्तविक दर्शक नहीं थे बल्कि उसे अब तक यह पता था कि वो दर्शकों के सामने जाने की रिहर्सल मंच के पीछे बने ग्रीन रूम में कर रहा है.
दर्शक या जनता उसके ज़हन में हैं ही नहीं. एक नाटक दर्शक और अभिनेता के बीच बनती हुई केमिस्ट्री से पूरा होता है. कल प्रधानमंत्री ने देश की जनता को यह भी रुतबा न बख्शा. लगा जैसे किसी बेजान सी रंगशाला में अपनी रिहर्सल करके चले गए. स्क्रिप्ट क्या थी, किसने लिखी थी, कैसी थी इन सब से बेपरवाह, एक नाटकीय कार्यवाही नौ मिनट में निपटा कर चले गए. लेकिन क्या बोलना और क्या नहीं? इसे लेकर सतर्क और चौकन्ने. आए, बोला और निकल लिए. यह रिहर्सल ही तो थी.
जो जानकार, पूंजीवाद के पहियों पर सवार धुर दक्षिणपंथी राजनीति और तानाशाही के बारे में लिखते बोलते आए हैं उनके हवाले से ऐसे कितने ही ब्यौरे मिलते हैं जहां उस राजनीति के लिए जनता महज़ एक जड़ वस्तु में बदली जा चुकी होती है.
कल प्रधानमंत्री ने क्या बोला या क्या बोलना चाहिए था, इसे लेकर ‘अभासी लोकवृत्त’ में टिप्पणियां होतीं रहीं जिन्हें रंगशाला से निकलते हुए दर्शकों की प्रतिक्रियायों से अधिक तवज्जो मिली नहीं. हर दर्शक की आंखों की पुतलियां और उंगलियों की छापें निज़ाम के महल में रखी जा चुकीं हैं. सबकी फेहरिस्त बन रही है. नापसंद टिप्पणियां करने वाले प्रेक्षकों को देर सबेर बतला दिया जाएगा.
उन्हें पता है कि यह जनता, जिसे वो जनता जनार्दन कहते हैं उससे सोचने समझने की क्षमता छीनी जा चुकी है. वह कभी यह नहीं कहेगी कि आज के दिन जब हम अपने भविष्य को लेकर इतने आशंकित हैं आपसे यह नहीं सुनना चाहते? हम अपनी एकता का अनुनाद कर लेंगे, सामूहिकता का जागरण भी कर लेंगे. यह आपके कहने से नहीं होगा हमें करना है, हम करेंगे. आप हमें हमारे भविष्य को लेकर क्या सोच क्या तैयारियां और क्या योजनाएं लेकर आए हैं केवल वही बताइये. थाली बजाना है या मोमबत्ती जलाना है यह हमारे विवेक पर छोड़ दीजिये. यह आपका काम नहीं है.
जनता होने के नाते हम जो नहीं कर सकते और जिसके लिए आपको हमने चुना है, हमें उसके बारे में बताइये. हमें बताइये कि हमारे डाक्टर्स को सुरक्षा उपकरण कब दिला रहे हैं? हमें बताइये कि कितने वेंटीलेटर्स अब तक मुहैया कराये जा सके? हमें बताइये कि कितने टेस्ट किट्स एक दिन में प्रयोग में लाये जा रहे हैं? हमें बताइये कि कितने नए अस्पताल अस्थायी ही सही अब तक तैयार किए जा सके? इस लॉकडाउन की अवधि में जिनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा है उनके लिए क्या इंतजमात किए गए हैं? पीएम केयर्स जैसे नवोदित और रहस्यमयी ट्रस्ट में अब तक कुल कितना दान आया? उस दान से आप क्या करने वाले हैं? पीएम रिलीफ़ फंडस जब था तो यह बनाया ही क्यों गया? जो आर्थिक नुकसान इस अवधि में देश को हुआ है उसका क्या विकल्प तैयार किया है? करोड़ों नौकरियां जो जा चुकी हैं या जाने वाली हैं उनके लिए आपने क्या सोचा? इस विपदा के समय भी देश में हर जगह कालाबाजारी हो रही है उसके लिए क्या करेंगे? ये सवाल इस अभिनेता की आंख में आंख डालकर पूछने के थे. लेकिन जनता न तो प्रधानमंत्री के ज़हन में है और न खुद जनता के ज़हन में वो जनता के रूप में मौजूद है.
प्रकारांतर से कल का संबोधन ‘तांबे की कीड़े’ एकांकी के मंचन का राष्ट्रव्यापी सीधा प्रसारण था. ‘तांबे की कीड़े’ के पात्र वैसे लोग हैं जो भय और भ्रम में जी रहे है, जीवन की लड़ाई लड़ते-लड़ते थक चुके हैं. वे अपने को अकेला, असमर्थ, असहाय समझते है और किसी सहारे की, अवलंब की तलाश में हैं. सभी के अपने-अपने डर हैं, अपने-अपने भ्रम हैं, अपनी-अपनी लड़ाइयां हैं, अपनी–अपनी चाहतें हैं. एक बात सभी में समान हैं कि सभी को एक सहारे की ज़रूरत है. वो सहारा प्रधानमंत्री ने खुद को बना लिया है. यह उन्होंने अर्जित किया है. इसके लिए वो सब कुछ किया है जो लोकतन्त्र के सूरज की हत्या करने के लिए ज़रूरी है.
ऐसी तर्कहीनता, दृष्टिहीनता, विज्ञान हीनता और विवेक हीनता की अवस्था में जो होता है उसे 3 अप्रैल, 2020 का हिंदुस्तान कहा जाता है. 5 अप्रैल 2020 को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र इस ‘एब्सर्डिटी’ की चरम अवस्था में पहुंच जाने का जश्न मनाएगा.
हालांकि इस असंगत समय में एक उम्मीद शायद बची रह जाये जो इस एकांकी में आई महिला एनाउंसर झुनझुना बजाकर कहते हुए सुनाई देती है कि ‘‘हम अपनी आत्मा से रचते हैं, और शरीर से नाश कर देते है कि फिर अपने सत्य से उसे सजाएं.’’
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