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क्यों तब्लीगी जमात ने देश और मुसलमानों को कोरोना से लड़ाई में हार की ओर धकेल दिया है
गुरुवार को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के ज्वाइंट सेक्रेट्री लव अग्रवाल ने अपनी रोजाना प्रेस ब्रीफिंग में ये हैरान करने वाली जानकारी दी कि- “बीते तीन दिनों में कोरोना से जुड़े मामले दोगुना हो गए हैं. 31 मार्च को कोरोना पॉज़िटिव मरीजों की संख्या 1251 थी जो 3 अप्रैल को 2547 हो गई है.” लव अग्रवाल इसके आगे जो बात कहते हैं वह बेहद चिंताजनक है. उन्होंने पत्रकारों को जानकारी दी कि- “कुल मामलों में से 647 मामले तबलीगी जमात के जलसे में शामिल लोग हैं. यानि कुल पीड़ितों में 25 फीसदी बीमार तब्लीगी जमात के इज़्तेमा में शामिल हुए लोग हैं.”
अग्रवाल के मुताबिक दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज़ में हुए इज्तेमा से निकले लोग फिलहाल देश के करीब 14 राज्यों में गए हैं. अग्रवाल कहते हैं, “इस गलती से सरकार के तमाम एहतियाती उपाय और पूर्व में बरती गई सावधानियों पर पानी फिर सकता है. पहले इतनी तेजी से मामले नहीं बढ़ रहे थे, लॉकडाउन का अच्छा फायदा हो रहा था. हम लोग एक संक्रामक रोग से लड़ रहे हैं और एक आदमी की मूर्खता ने सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया है.”
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़े के मुताबिक देश में अब तक 62 लोगों की कोरोना से मौत हो चुकी है. ये आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है.पिछले 24 घंटे में 478 नए मामले सामने आए हैं. यह एक दिन में हुई सबसे बड़ी वृद्धि है.
दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन मरकज़ को तब्लीगी जमात का दुनिया में सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है. इसकी स्थापना हजरत मौलाना इलियास कांधलवी ने 1926-27 में सुन्नी मुसलमानों के संगठन “तबलीगी जमात” के तौर पर की थी. तभी से इसे जमात का मुख्यालय माना जाता है. यहां साल भर देश-विदेश से लोग इस्लामी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से आते-जाते रहते हैं. साथ ही साल में कई बार यहां इस्लामी आयोजन होते रहते है.
इसी तरह का तब्लीग-ए-जमात का एक आयोजन 13 से 15 मार्च तक निजामुद्दीन में हुआ था. जिसमें यूपी, बिहार, बंगाल, तमिलनाडु, केरल सहित देश के कोने-कोने से लोग आए थे. इसके अलावा मलेशिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और किर्ग़िज़स्तान सहित अन्य देशों के 5,000 से अधिक प्रतिनिधियों ने भी इसमें हिस्सा लिया था.
इस कार्यक्रम में शामिल होकर वापस लौटे तेलगांना के 6 लोगों सहित 7 कोरोना वायरस संक्रमितों की मौत के बाद पिछले सोमवार को निजामुद्दीन मरकज में रुके लोगों को बाहर निकालने की कार्रवाई शुरू की गई थी. जिसे एक अप्रैल सुबह 4 बजे तक खाली करा दिया गया. यहां से निकले लोगों में बड़ी संख्या में कोरोना पॉजिटिव लोग मिले. इस दौरान तब्लीग नेतृत्व द्वारा बोले गए कुछ और झूठ भी सामने आए मसलन पुलिस को दी गई जानकारी में तब्लीग ने बताया था कि मरकज में एक हजार के करीब लोग हैं जो कि 23 मार्च से शुरू हुए देशव्यापी लॉकडाउन के कारण फंस गए हैं. लेकिन सोमवार को पुलिस ने जब मरकज से लोगों को निकालना शुरू किया तो इनकी संख्या 2361 तक पहुंच गई. इसमें से 617 को हॉस्पिटल में और बाक़ी को क्वारेंटाइन किया गया है. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट कर यह जानकारी दी.
दिल्ली पुलिस ने मरकज़ मामले में निज़ामुद्दीन थाने के एसएचओ मुकेश वलियान की शिकायत पर कुल सात लोगों मौलाना मोहम्मद साद, मोहम्मद असरफ, मुफ़्ती शहजाद, मोहम्मद जीशान, मुर्सलीन सैफी, मोहम्मद सलमान और यूनुस पर एफआईआर भी दर्ज की है. इस मामले की जांच अब क्राइम ब्रांच करेगी. केंद्र द्वारा इसे कोरोना वायरस हॉटस्पॉट (जहां कोरोना संक्रमित लोग बड़ी संख्या में मौजूद हों) घोषित किया गया है.
गृह मंत्रालय ने तब्लीग के कार्यक्रम में शामिल 960 विदेशियों को ब्लैकलिस्ट किया है और उनका वीजा भी रद्द कर दिया है. माना जा रहा है कि इन्हीं विदेशियों में शामिल मलेशिया से आए कुछ कोरोना पॉज़िटिव लोगों ने यह स्थिति पैदा की है.
मरकज से निकाले गए लोगों को अलग-अलग क्वारेंटाइन किया गया है. साथ ही सभी 14राज्यों को भी निर्देश दिया गया है जहां के लोग मरकज में शामिल हुए हैं, उनकी तलाश कर उन्हें भी क्वारेंटाइन किया जाय.
इसका सबसे ज्यादा असर दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में देखने को मिला. यहां कोरोना के 309 मामले सामने आए हैं जिनमें से 264 केस दिल्ली के तबलीगी जमात कार्यक्रम में शामिल हुए बताए जा रहे हैं. इसी तरह अन्य राज्यों में इस कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों की तलाश जारी है, जिससे संक्रमण को काबू में किया जा सके.
इसी बीच मरकज़ का दावा है कि वे 24 मार्च से लगातार पुलिस और प्रशासन के संपर्क में थे और उन्होंने 17 वाहनों के लिए कर्फ्यू पास मांगा था. मरकज़ की और से 25 मार्च को निजामुद्दीन थाने के एसएचओ को लिखा एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. जिसमें लिखा है कि 24 मार्च को एसएचओ निज़ामुद्दीन ने हमें नोटिस भेजकर धारा 144 के उल्लंघन का आरोप लगाया. हमने इसके जवाब में कहा कि मरकज को बन्द कर दिया गया है. 1500 लोगों को उनके घर भेज दिया गया है. अब 1000 बच गए हैं, जिनको भेजना मुश्किल है. हमने ये भी बताया कि हमारे यहां विदेशी नागरिक भी हैं. इसके बाद हमने एसडीएम को अर्जी देकर 17 गाड़ियों के लिए कर्फ्यू पास मांगा ताकि लोगों को घर भेजा जा सके. लेकिन हमें अभी तक पास जारी नहीं किया गया है. हमने किसी को भी बस अड्डा या सड़कों पर घूमने नहीं दिया और मरकज में बन्द रखा जैसा कि प्रधानमंत्री का आदेश था. हमने ज़िम्मेदारी से काम किया.
लेकिन इसी दौरान एक ऑडियो भी सामने आया है जिसमें मौलाना मोहम्मद सोज़ लोगों को मस्जिद में नामज़ पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. उसमें तमाम लोग लगातार खांसते सुने जा सकते हैं.
इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका पर भी कई सवाल उठ रहे हैं. एक सवाल यह भी है कि जब12 मार्च को ही दिल्ली सरकार ने एडवाइज़री जारी कर दी थी कि 50 से ज्यादा लोगों के किसी भी आयोजन की इजाजत नहीं है फिर भी 13 से 15 मार्च के बीच इतने बड़े पैमाने पर लोग इकट्ठा हुए, धारा 144 का उल्लंघन किया. मरकज से चंद कदम की दूरी पर ही पुलिस थाना है. देशव्यापी लॉकडाउन 23 मार्च को घोषित होने के बाद मरकज के भीतर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को रहने दिया गया जिसे 31 तारीख यानि आठ दिन बाद निकालने की कार्रवाई शुरू हुई. इससे स्थिति और ज्यादा बिगड़ गई.पिछले 4 दिनों में देश में कोरोना पीड़ितों की संख्या दोगुनी हो गई है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता मनदीप सिंह रंधावा से इस बारे में बात करनी चाही लेकिन वो उपलब्ध नहीं हुए.
मीडिया का शर्मनाक चेहरा
तब्लीग प्रकरण ने भारतीय मीडिया के एक हिस्से का बेशर्म चेहरा सामने रख दिया है. पिछले कुछ दिनों से इसे एक अलग ही रंग देने में जुटा हुआ है. इसमें बीमारी की चिंता से ज्यादा एक समुदाय विशेष के प्रति नफरत का भाव पैदा करना और इस ग्लोबल महामारी के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जा रही है. हमेशा की तरह ये तथाकथित राष्ट्रवादी पत्रकार इस महामारी में भी हिन्दू-मुस्लिम ढूंढ़ने में कामयाब हो गए.
इस प्रकरण की शुरुआत तेलंगाना के मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) द्वारा 30 मार्च को किए एक ट्वीट से हुई. इसमें उन्होंने लिखा, “13 से 15 मार्च तक नई दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके के मरकज में आयोजित धार्मिक सम्मेलन से लौटे तेलंगाना के 6 लोगों की कोरोना वायरस के संपर्क में आने के बाद मौत हो गई है. इनमें से दो की मौत गांधी अस्पताल में, जबकि चार अन्य की मौत क्रमशः अपोलो हॉस्पिटल, ग्लोबल हॉस्पिटल, निजामाबाद और गडवाल हॉस्पिटल में हो गई.”
जैसे ही ये बात सामने आई की संक्रमित लोगों ने दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में हिस्सा लिया था, सोशल मीडिया पर सक्रिय एक वर्ग विशेष ने पूरी बहस को कोरोना महामारी से हटाकर हिन्दू-मुस्लिम की ओर मोड़ दिया और इसे “कोरोना जिहाद” और “जमात जिहाद” जैसे नाम दिए गए. लोग बीमारी को भूल पूरे दिन सोशल मीडिया पर मुसलमानों के खिलाफ नफरत भरे बयान दिए जाने लगे. जो गलती तब्लीगी जमात ने की थी उसकी आड़ में पूरे इस्लाम और मुसलमानों को निशाना बनाया जाने लगा. 31 मार्च को लगभग पूरे दिन #कोरोनाजिहाद ट्विटर पर टॉप ट्रेंड करता रहा.
इस मामले ने बड़ा रूप तब ले लिया जब तथाकथित राष्ट्रवादी मीडिया का एक हिस्सा, जो अब तक टीवी पर लाइव अंताक्षरी खेल रहा था भी इसमें शामिल हो गया. मानो ये लोग मौके के इंतजार में बैठे थे, इसे इन्होंने खूब हाथों-हाथ लिया. और “कोरोना की जमात!”, “निजामुद्दीन का विलेन कौन?”, “तब्लीगी जमात का देश से विश्वासघात” जैसे शो टीवी पर प्रसारित किए गए. जिसमें कोरोना वायरस के बुनियादी मुद्दे को हवा हवाई कर साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई.
दो दिन पहले तक कोरोना के डर से घर से ही टीवी पर लाइव “अंताक्षरी” खेल रहीं “आज तक” चैनल की एंकर श्वेता सिंह का बीमारी का डर भी इस प्रकरण से गायब हो गया. श्वेता ने निजामुद्दीन पहुंचकर बताया कि मरकज में फंसे लोगों को निकलकर जब उन्हें बस में बिठाया गया तो ये लोग बस में बैठे हुए भी ‘थूक रहे थे.’ हालांकि आज तक डॉटकॉम पर छपी एक ख़बर की ही मानें तो मरकज के लोगों ने पुलिस से लोगों को बाहर निकालने के लिए वाहन पास की मांग की थी. जो पूरी नही हो पाई थी.
स्वघोषित राष्ट्रवादी एंकर सुधीर चौधरी भी इस मौके की तलाश में थे. उन्होंने भी “तब्लीगी जमात का देश से विश्वासघात”, “कोरोना से संक्रमित ‘जमात’ का ‘एंटी वायरस’” जैसे शो कर डाले.
इसके अलावा अन्य न्यूज़ चैनलों और अख़बारों ने भी इस मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देने में कोई कसर नही छोड़ी. पूरे घटनाक्रम को एकदम से घुमा कर दूसरी दिशा में मोड़ दिया गया. ये सिर्फ उस समुदाय को ढ़ूंढने की कोशिश में लगे रहे, जिसे इस बीमारी का जिम्मेदार ठहरा सकें.
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