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रिचा चड्ढा पार्ट 2: ‘लोकतंत्र में तो विपक्ष में रहना ही चाहिए’
ऐसा लग रहा है कि सीएए के मुद्दे पर अभिनेत्रियां अधिक मुखर हैं. अभिनेता थोड़े खामोश हैं…
वजह बताना मुश्किल है. और सिर्फ अभिनेत्रियां क्यों? आप शाहीनबाग में जाकर देखें. औरतों ने मोर्चा संभाल रखा है. मुझे लगता है कि यह होना भी चाहिए. कई बार पुरुषों के ईगो और आक्रामकता की वजह से हम हिंसा की ओर जा सकते हैं. औरतें कोशिश करती हैं कि वे समाधान निकालें. कोशिश तो यही है कि कोई समाधान निकले. बस, आगे क्या कह सकते हैं.
जेएनयू हिंसा के खिलाफ पूरे देश में एक माहौल बना हुआ है. इस माहौल में दीपिका पादुकोण का जेएनयू जाना और छात्रों की सभा में खामोश खड़ा होना बहुत मायने रखता है. उनकी मौजूदगी ने इस मुद्दे की तरफ पूरे देश का ध्यान खींचा. हालांकि उसकी वजह से एक तबके ने दीपिका पर निशाना भी साधा.
यह हिम्मत की बात है. जो लोग कह रहे हैं कि फिल्म पब्लिसिटी के लिए दीपिका ने ऐसा किया, उन्हें नहीं मालूम कि फिल्म पब्लिसिटी किस तरह से काम करती है. फिल्म पब्लिसिटी के दौरान किसी भी विवाद से परहेज किया जाता है. आमतौर पर पॉपुलर कलाकार क्या कहते हैं? यही ना कि मुझे इस विषय की जानकारी नहीं है... जिस विषय की जानकारी नहीं है उस पर टिप्पणी नहीं देना चाहूंगा. वे यह भी तो कह सकते हैं कि देखो यह राजनीति है राजनीति पर मैं बात नहीं करता/करती. दीपिका ने एक स्टैंड लिया. इतना रिस्की प्रमोशन कोई नहीं कर सकता.
दीपिका के जेएनयू जाने के बाद फिल्म इंडस्ट्री के बाकी लोगों की मुखरता बढ़ गई. वे भी आगे आए. मुझे तो आपातकाल के दौरान और उसके बाद फिल्म कलाकारों के मुखर होने की याद आ रही है. उनकी छवियां घूम रही है.
अच्छी बात है अगर उनकी याद आ रही है. वैसा कुछ रिपीट होना चाहिए. मैं तो बोल-बोल कर थक गई. फिल्म इंडस्ट्री से लोगों की यही शिकायत रहती है और कहते ही हैं कि आप लोगों से कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती. पिछले चार-पांच सालों में लोग चुप हुए हैं. पुराने ट्वीट और खबरें निकालकर अभी लोग दिखा बता रहे हैं कि तब तो आप बोले थे. अब क्यों चुप हैं? अभी तो बोलते ही चुप कराया जाता है. पिछले सालों में कुछ बड़े कलाकारों ने बोला तो क्या हाल हुआ? हम देख चुके हैं.
आप बहुत ज्यादा ट्रोल होती हैं. कभी खीझ नहीं होती?
हमेशा राजनीतिक कारणों से ट्रोल होती हूं. अभी इस वजह से ट्रोल नहीं हुई कि नीली साड़ी पहन ली थी या मैंने ब्रेड-बटर खाया था. मेरे साथ कुछ गड़बड़ हो गयी. हमेशा पॉलिटिकल कारणों से ट्रोल होती हूं. मैंने तो देखा कि दोनों ही नेशनल पार्टियां ट्रोल करती हैं. एक ज्यादा बेहतर तरीके से लोगों को चुप कराती है. दूसरी उनसे थोड़ा पीछे है. एक और बात कहूंगी.. जो बुजुर्ग लोग हैं, उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि क्या हो रहा है. उन्हें लगता है कि बच्चे ब्रेनवाश हो गए हैं. मारपीट पर उतारू हैं. अगर उन्हें लगता है कि बच्चों का ब्रेनवाश हो गया है तो वे बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं. वे उन्हें बिल्कुल नहीं समझ पा रहे हैं. पिछले दिनों की बात है. मैं बंदर के जॉगर्स पार्क में टहल रही थी. पीछे कुछ बुजुर्ग चल रहे थे. उन दिनों आरे फॉरेस्ट का मसला चल रहा था. वे कह रहे थे कि मेट्रो बनाने के लिए पेड़ों को काट देना चाहिए. बात तो यह कि आप अपनी मर्सिडीज से उतर कर छोटे से पार्क में टहलने आए हो. आपके लिए तो यही हरियाली बची है. ऊपर से आप चाहते हो कि आरे के पेड़ कट जाएं. आरे मुंबई का फेफड़ा है. माफ करें आप तो कुछ सालों में निकल लेंगे. आपको अपने बच्चों की चिंता नहीं है क्या? बच्चे अगर समझ रहे हैं इसे और मांग कर रहे हैं तो आप समर्थन कीजिए. मौत के करीब पहुंच चुके अमीर और उम्रदराज लोगों को समझना चाहिए कि जवान आवाज क्यों उठा रहे हैं? यह पीढ़ियों का अंतर नहीं है. यह पुरानी पीढ़ी का स्वार्थ है. यह जानते हुए भी कि कुछ दिनों के बाद हम लुढ़क जाएंगे. वे आने वाली पीढ़ी का ख्याल नहीं कर रहे हैं.
क्या कभी परिवार के लोगों या दोस्तों से सलाह नहीं मिली कि थोड़ा धीरे चलो. इतनी सक्रियता मत दिखाओ विरोध की.
अच्छा है कि मेरे मां-बाप ट्विटर पर नहीं हैं. उन्हें नहीं मालूम कि मैं क्या-क्या बोलती रहती हूं. वे मुझसे इस बाबत कुछ कहते नहीं है. मैं फिलहाल ऐसी सलाहों से बची हुई हूं.
अतीत में आमिर खान से एक सरकारी कैंपेन छीन लिया गया था. अभी ख़बर है कि दीपिका पादुकोण को स्किल इंडिया से अलग कर दिया गया है. परिणीति चोपड़ा के साथ ऐसा हो चुका है. वर्क फ्रंट पर दिक्कतें आ सकती हैं इस सक्रियता की वजह से?
यह तो होता रहेगा. ऐसे दबाव डाले जाते हैं.
आप ने अभी कंगना रनोट के साथ ‘पंगा’ फिल्म में काम किया. आप दोनों के विचार विरोधी है. क्या कभी शूटिंग या कैंपेन के दौरान उनसे राजनीति पर बातें होती हैं?
पिछले चार-पांच सालों में मैं बहुत कुछ समझ गई हूं. मैंने खुद को काबू में किया है. अभी मैं गांधीवादी हो गई हूं. गांधीजी ने कभी अंग्रेजों से नफ़रत नहीं की. उनकी गलत नीतियों का विरोध किया. उनके कार्यों का विरोध किया. मैं किसी से नफ़रत नहीं करती. किसी व्यक्ति विशेष से कोई लड़ाई नहीं करती. हम दोनों के बीच ऐसी समझदारी है कि हम राजनीति पर बातें नहीं करते. हम दोनों अपनी अपनी सोच पर अडिग हैं. हम किसी को बदलने की कोशिश नहीं करते. मैं कितने ऐसे व्यक्तियों के साथ काम कर चुकी हूं, जिनकी विचारधारा मुझसे अलग है. विवेक ओबरॉय हैं, रणदीप हुड्डा हैं, कंगना रनोट हैं. इन लोगों से कभी कोई बहस या गाली-गलौज नहीं हुआ. अशोक पंडित जैसे लोग अपवाद हैं. मैं सोचती हूं कि कैसे कोई इतनी नफ़रत लेकर रह सकता है. विरोध करना और अपनी बात करना बिल्कुल अलग बात है. नफ़रत फैलाना और घृणा करना अच्छी बात नहीं है. ऐसे लोगों से तो यही कहूंगी कि अपनी सेहत का ख्याल रखिए.
क्या रिचा स्थाई विपक्ष में रहती हैं?
लोकतंत्र में तो विपक्ष में रहना ही चाहिए. अगर आप नहीं रहेंगे तो धीरे-धीरे आप अपने सारे अधिकार खो देंगे. जब तक हम वोट दे रहे हैं और अपना कर अदा कर रहे हैं तब तक तो यह हमारा अधिकार है. इसमें कोई गलत बात भी नहीं है. हमारे प्रधानमंत्री ने कहा है कि विरोध तो लोकतंत्र की आत्मा है. मैं उनकी बात मान रही हूं. आज ये रोक रहे हैं कल वे रोकेंगे. असल बात है कि हम से जो कमजोर हैं, हमसे जो गरीब है, उनके लिए हमने कुछ किया या नहीं?
क्या इन मुद्दों पर किसी फिल्म की प्लानिंग भी चल रही है?
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘रंग दे बसंती’ ऐसे ही मुद्दे पर थी. कई बार कल्पना हकीकत से पहले आ जाती है. ऐसा भी हो सकता है कि वैसी फिल्मों से जुड़े लोगों की राय बाद में बदल जाए. अपने परिवार अपने काम और अपनी ईएमआई के बारे में सोचने लगते हैं. मुझे लग रहा है कि सभी अपनी-अपनी तरह से प्रोटेस्ट कर रहे हैं. मुझे लगता है कि अभी जो ‘घोस्ट स्टोरीज’ में दिबाकर बनर्जी की फिल्म आई है उसमें हिडेन मैसेज है. बहुत सारे लोग बहुत कुछ लिख रहे होंगे और सोच रहे होंगे. भविष्य में कुछ आ सकता है.
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