Book Review
कुली बाज़ार: कोहराम में पुस्तक मेला और पुस्तक मेले का कोहराम
तारीख़ 4 से 12 जनवरी के बीच दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले का रविवार को समापन हो गया. इस बीच स्थितियों में छाई अस्थिरता सब तरफ़ छाई रही है. वक़्त इस क़दर विषाक्त है कि राज्य द्वारा बौद्धिकता को आतंक, बौद्धिकों को आतंकवादी और विश्व-प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों को देशद्रोहियों का अड्डा बताया जा रहा है.
पुस्तक मेले के दूसरे रोज़ ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के भीतर नक़ाबपोश गुंडे घुस गए और ‘बौद्धिक आतंकियों’ और ‘देशद्रोहियों’ को हथियारों से सबक़ सिखाने लगे. इस हिंसा में पुस्तक मेले से इस तरह भी लौटा जा सकता है कि रास्ते में शाहीन बाग़ और जेएनयू पड़े. कईयों ने ऐसा ही किया. बेहतर और मूल्यनिष्ठ किताबें हमें यही सिखाती हैं- दमन के विरुद्ध उठ रही आवाज़ों के साथ होना और उनकी तरफ लौटना. इस लौटने में जेएनयू के बाहर हिंदू सेना के लगाए पोस्टर दिखते हैं जिनमें वामपंथियों को गुंडा, नरसंहारी, बलात्कारी, देशविरोधी, माओवादी, आतंकवादी, सेनाविरोधी बताते हुए उनका मुर्दाबाद किया गया है.
इस दृश्य में पुस्तक मेला इस सबसे अछूता कैसे रह सकता है! लिहाज़ा वह रहा भी नहीं. पढ़ने-लिखने वालों का संसार प्रगति मैदान में बार-बार आपस में टकराता रहा और उनकी बहसों-बातों का बड़ा हिस्सा समकालीन राजनीति और उसके कोहराम ने घेरे रखा. सिर्फ़ खाए-पीए-अघाए और ऊबे हुए सुखी ही इससे बरी थे या अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास सरीखे विदूषक या वे जिनके लिए उनकी किताब का लोकार्पण ही सब कुछ है या अच्छी तस्वीर खिंच जाना.
पुस्तक मेले की एक अनिवार्य बुराई के रूप में यहां लोकप्रियतावाद को दर्ज करना प्रासंगिक होगा. हिंदी साहित्य में यह रोग अब पूरी तरह फैल चुका है. बड़े और गंभीर प्रकाशक इससे चिंताजनक और गंभीर रूप से ग्रस्त हैं. वे केवल चमक से ही चौंधियाए हुए हैं- उन सच्ची मायूसियों और हताशाओं और विचारधाराओं को भूलकर जिनसे वे बने हैं और जिन्हें वे अब तक बेचते आए हैं.
इस बार के पुस्तक मेले में राजकमल प्रकाशन समूह ने अपने स्टॉल पर ‘हम भारत के लोग’ का फ़ोटो/सेल्फ़ी कॉर्नर बनाकर एक बेहतर संदेश देने की कोशिश की. यह पूरे मेले में किसी बड़े प्रकाशक की तरफ से की गई इकलौती कोशिश है, जिसे वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक रूप से सराहा जा सकता है. यह अलग बात है कि मेले के अंतिम दूसरे दिन कुमार विश्वास के प्रशंसकों की भीड़ ने इस कॉर्नर को हुल्लड़ केंद्र में तब्दील कर दिया. इन प्रशंसकों ने कोई नक़ाब नहीं पहन रखा था, न ही इनके हाथ में हथियार थे; फिर भी इनकी पहचान संभव नहीं या दूसरे शब्दों में कहें तो संभव है. यह वह भीड़ है जिसने अपने समय के महत्वपूर्ण का साथ छोड़ दिया है, उसे पहचानने की सलाहियत खो दी है.
इस भीड़ में इस भीड़ की संरचना समझने को बेताब व्यक्तित्व भी मिल जाते हैं. इस दौर में सब कुछ इस क़दर पल-पल परिवर्तित हो रहा है कि वे मानव-शरीर के विज्ञान से संबंधित किताबें खोजते हैं. वे चरित्र और रचना में सामंजस्य कैसे स्थापित करें, इससे जुड़ी किताबें पाने के लिए भटकते हैं. वे सहमतिया संप्रदाय में कैसे न शामिल हों, यह बताने वाली किताबें ख़रीदते हैं. उदय प्रकाश के शब्दों में कहें तो वे प्रचलन से प्रस्थान चाहते हैं, लेकिन कर नहीं पाते.
इस विश्व पुस्तक मेले का और तमाम योगदानों के साथ एक उल्लेखनीय योगदान यह भी है कि यह अब प्रतिवर्ष कुछ शब्दों को विश्व भर में तेज़ी से निरर्थक करता जा रहा है. इन कुछ शब्दों में प्रमुख हैं- कालजयी, सशक्त हस्ताक्षर और हस्तक्षेप. यह बात ध्यान देने की है कि हिंदी में कुछ विरलों को छोड़ दें तो अब लगभग प्रत्येक लिखनेवाला/वाली यह चाहने लगा/लगी है कि वह अगर लोकार्पित हो तो पुस्तक मेले में ही हो, वरना न हो.
इस क्रम में पुस्तक मेले के आख़िरी दिन के आख़िरी घंटे तक गर्म-गर्म किताबें प्रेस से निकलकर आ रही हैं, ताज़ी-ताज़ी, वे अच्छी भी लगती हैं, भले ही मात्र दो-चार कॉपी हों. लेकिन लेखकीय-संतोष बड़ी चीज़ है, वैसे ही जैसे शौक़ बड़ी चीज़ है और शॉक भी. लेखकीय-संतोष लेखक को पहले चुग़द बनाता है, फिर सालजयी और अशक्त और फिर वह हस्तक्षेप करने में असमर्थ हो जाता है.
इस प्रकार धीरे-धीरे साहित्य और संस्कृति में वह समय आता है, जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को कम आंकना बंद कर देता है, क्योंकि न जाने कब कौन ‘राजकमल प्रकाशन’ से छप जाए, न जाने कब कौन ‘जश्न-ए-रेख़्ता’ के मंच पर नज़र आ जाए. इस प्रकार सब कुछ आम होता है और औसत का श्रम और श्रेष्ठ का अकेलापन बढ़ता जाता है. चोर दरवाज़े बढ़ते जाते हैं और कोहराम भी. कोहराम में आराम न करने का विवेक बढ़ता जाता है. लेखक बढ़ते जाते हैं. किताबें बढ़ती जाती हैं. पाठक बढ़ते जाते हैं. प्रकाशक बढ़ते जाते हैं. इस बढ़ने में पुस्तक मेले जैसे मौक़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे इस बढ़ने को और बढ़ावा देते हैं और वह सब कुछ जो बढ़ता ही जा रहा है, उसे एक जगह देखने और समझने का समय देते हैं.
Also Read
-
TV Newsance 330 | Savarna khatre mein hai? Primetime hysteria over UGC’s equity rules
-
‘Full enjoy bhai’: Free birds or civic nuisance? Why Indian tourists are hated worldwide
-
‘Hindu ekta khatre mein’: How TV news rewrote UGC’s equity norms
-
UGC norms row leaves Allahabad University campus divided
-
Only 3 meetings on Delhi’s air crisis. But guess how many air purifiers in ministry’s office