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मोदी सरकार की खराब नीतियों और बुरे फैसलों की वजह से किसान बदहाल
भारत के किसान कुछ राहत की सांस ले सकते हैं, क्योंकि क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) के तीखे विरोध ने मोदी सरकार को इस विनाशकारी कदम से पीछे हटने को मजबूर कर दिया है. पहले से ही खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के लिए आरसीईपी किसी बुरे विचार जैसा था और खेती-किसानी जैसे संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए यह बर्बादी का वारंट था.
पिछले हफ्ते राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की लीक हुई रिपोर्ट के मुताबिक बीते चार दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब ग्रामीण उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता में कमी आई है. पिछले वर्ष कृषि आय 14 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई. दो दशकों में पहली बार खेती की कीमतों में गिरावट आई है. सितंबर में जारी आरबीआई की एक रिपोर्ट में चिंता जाहिर की गई कि कृषि ऋण के लिए किसान अपने परिवार का सोना तक गिरवी रख रहे हैं.
किसानों को कुछ फसलों के लिए लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देने का ऐलान कर, सरकार वाहवाही लूटने में व्यस्त है. जबकि किसानों को कृषि के खर्च (बीज, खाद, पानी, जुताई, मजदूरी इत्यादि) के साथ-साथ कृषक परिवार के श्रम, जमीन का किराया और लागत पूंजी पर ब्याज को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिए जाने का वादा था. लेकिन मोदी सरकार ने किसानों की सभी प्रमुख मांगों को अनदेखा कर दिया.
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि देश के बहुत कम किसानों को एमएसपी के आधार पर उनके उत्पाद की कीमत मिल पाती है. जबकि ज्यादातर किसान अपनी फसलों को कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं. साल 2018 के एक कृषि बाजार विश्लेषण के मुताबिक 60 प्रतिशत किसानों ने अपनी उपज को एमएसपी से कम दाम में बेचा है.
उपज की कम कीमत के साथ-साथ किसानों का सरकार पर बकाया भी बढ़ता जा रहा है. राज्यसभा में सरकार ने सूचित किया है कि एक साल में गन्ना किसानों का बकाया 54 गुना बढ़ा है.
किसानों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है वो चक्रीय होने के साथ संरचनात्मक भी है. भारतीय किसानों ने पहले भी अकाल और बाढ़ झेला है. लेकिन मौजूदा संकट इसलिए अलहदा क्योंकि यह खराब नीतियों और बुरे फैसलों की वजह से पैदा हुआ संकट है.
फसल की कम कीमतें मोदी सरकार की अनुचित रूप से खाद्य महंगाई दर को निचले स्तर पर रखने की नीति का परिणाम है. कुछ शहरी उपभोग्ताओं को मूल्य-वृद्धि से संरक्षित रखने के लिए, सरकार ने ऐसी स्थिती पैदा कर दिया है जहां कृषि में अपस्फीति और कम आमदनी होती दिख रही है.
ऐसे में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं की लागत तेजी से बढ़ी है. भारतीय किसानों को अपनी उपज के बराबर या कम कीमत मिल रही है, जबकि इन सेवाओं के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ता है.
इसमें कोई विवाद नहीं कि महंगाई की अत्यधिक उंची दर पर लगाम लगनी चाहिए, लेकिन जब सरकार कीमतों में मामूली वृद्धि की भी इजाजत नहीं देती तो यह देश के 50 फीसदी कृषि पर निर्भर परिवारों पर सीधी चोट होती है. हमें यहां ध्यान देना होगा कि कृषि पर होने वाले खर्च में लगातार वृद्धि हुई है. खाद, कीटनाशकों और डीजल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, लेकिन कृषि उत्पादों की बिक्री मामूली दरों पर हो रही है.
ऐसे हालात में अगर फसल किसी वजह से खराब हो जाती है तो किसान ना केवल अपनी फसल से होने वाली आय खो देगा बल्कि बीज, उर्वरक, कीटनाशक और डीजल (उच्च दर) पर हुआ खर्च भी नहीं निकल पाएगा. इसके नतीजे में उसे कर्ज लेना पड़ता है. यह कर्ज उसे एक नए कुचक्र में फंसा देता है.
कृषि क्षेत्र के समक्ष दूसरा संरचनात्मक अवरोध, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली है. जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हरीश दामोदरन का कहना है कि कृषि ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जहां व्यवसायी (किसान) बिक्री पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का दावा नहीं कर सकता.
बता दें कि जीएसटी के तहत, एक व्यवसायी को इनपुट की खरीद पर लगने वाले कर पर छूट का दावा करने की इजाजत है. लेकिन कीटनाशक, सुरक्षा किट इत्यादि पर 18 प्रतिशत की दर से भुगतान करने के बावजूद किसान के पास इन लागतों को वसूलने का कोई तरीका नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक किसानों को सालाना 15,000 करोड़ रुपये जीएसटी देना पड़ रहा है, जिस पर वे इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा नहीं कर सकते.
जब हम जीएसटी की बात करते हैं तो हमें नोटबंदी को नहीं भूलना चाहिए. साल 2016, मानसून के लिहाज से एक अच्छा वर्ष था और किसानों को अच्छे लाभ की उम्मीद थी. लेकिन 8 नवंबर, रात 8 बजे की घोषणा ने एक झटके में इस उम्मीद को धराशायी कर दिया. तभी से भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार है, जिसका सबसे बुरा प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ा है.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के धाराशायी होने के साथ मजदूरी भी गिरी, जिस वजह से ग्रामीण खपत नें भारी गिरावट आई. एनएसओ का खपत सर्वेक्षण गांवों में भोजन पर होने वाले खर्च में भारी कटौती का संकेत दे रहा है. चार दशकों में पहली बार, ग्रामीण मांग कम होने के कारण उपभोक्ता खर्च में कमी आई है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस वजह से स्वतंत्र भारत में पहली बार गरीबी में वृद्धि हो सकती है.
कुल मिलाकर स्थिती गंभीर है और सरकार को इस पर कार्रवाई करने की आवश्यकता है. सालों पहले पंडित नेहरू ने कहा था, “सब कुछ इंतजार कर सकता है लेकिन कृषि नहीं.”
मौजूदा सरकार ने अपने गलत फैसलों और नीतियों के जरिए हमें ऐसे समय में वापस ला दिया है जहां अब वास्तव कृषि इंतजार नहीं कर सकती. इसके लिए विश्वसनीय समाधान की जरूरत है और वो भी तत्काल. यह उचित होगा कि मोदी सरकार लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के घोषणापत्र में सुविचारित सुझावों पर गौर करे. हालांकि किसी सरकार के लिए यह संभव नहीं है कि वह दूसरे दल की नीतियों का अनुसरण करे. सरकार ने पहले भी कांग्रेस की नीतियों को अपनाया है. किसानों के हित में, एक बार फिर ऐसा करने से हिचकना नहीं चाहिए.
इसके अतिरिक्त, यह प्रयास किसानों और सभी संबंधित हितधारकों के साथ एक ईमानदार बातचीत के साथ होना चाहिए. सरकार किसानों के साथ बात करेगी तो उनके पास निश्चित रूप से बेहतर समाधान होंगे.
(ललितेश पति त्रिपाठी कांग्रेस नेता हैं और आकाश सत्यबली, कांग्रेस सांसद राजीव गौड़ा से जुड़े हुए हैं )
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