Newslaundry Hindi
क्या इलेक्टोरल बॉन्ड में चंदादाता की पहचान गोपनीय है? नहीं…
फरवरी 2017 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली सरकार के उस फैसले के पक्ष में राज्यसभा में अड़कर खड़े हो गए जिसने व्यापारिक घरानों को गुमनाम रहते हुए भारी धन राजनीतिक दलों को देने का रास्ता खोल दिया.
नई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के तहत सरकार ने कारपोरेट फंडिंग को नियंत्रित करने वाली पूर्व में मौजूद सभी व्यवस्थाओं को खत्म कर दिया.
जेटली ने दावा किया कि किसी चंदादाता ने किस राजनीतिक दल को कितना चंदा दिया यह सिर्फ उस चंदादाता को ही पता रहेगा.
सामाजिक कार्यकर्ता कमोडोर लोकेश बत्रा (सेवानिवृत्त) के पास मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि यह बिल्कुल झूठी बात थी. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जो कि देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक है, इलेक्टोरल बॉन्ड योजना का संचालन करता है. यह काम वित्त मंत्रालय की सख्त निगरानी में होता है. यह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एक-एक इलेक्टोरल बॉन्ड का रिकॉर्ड अपने पास रखता है- जारी होने से लेकर इसे पाने वाले तक.
अब इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि सरकार ने जो दावा किया था सच्चाई उसके विपरीत है. असल में एसबीआई को इस योजना के संचालन, ऑडिट के साथ ही बॉन्ड की पूरी ट्रेल रखना होता है खरीदने वाले से लेकर इसे पाने वाले तक.
सभी बॉन्ड पर एक गोपनीय नंबर दर्ज होता है जो आंखों से आमतौर पर नहीं दिखता. हर बार एक से दूसरे को हस्तांतरित होने के वक्त इस गोपनीय नंबर को ट्रैक किया जाता है. वित्त मंत्रालय ने एसबीआई को इस बाबत गोपनीय नंबर की व्यवस्था को बनाने का निर्देश दिया था. इलेक्टोरल बॉन्ड के रेगुलेशन के लिए बनी व्यवस्था के तहत एसबीआई बाध्य है कि अगर कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार संस्थाएं चाहें तो इसे उनसे साझा किया जाय.
इनमें से कुछ संस्थाएं मसलन सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के ऊपर के हाल कि दिनों में इस बात का आरोप लगता रहा है कि वो अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर विपक्षी पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है.
इस लिहाज से जेटली राज्यसभा में इलेक्टोरल बॉन्ड की सही तस्वीर नहीं रख रहे थे जब वो कह रहे थे कि दानदाता की गोपनीयता से विपक्षी पार्टियों को भी चंदा इकट्ठा करने में सहूलियत होगी और उन्हें भी पहचान छुपा कर लोग चंदा दे सकेंगे. उनका कथन था, “अगर कोई सरकार एक कानून बनाती है जो अंतत: विपक्ष को फायदा पहुंचाता है तो यह हमारे बड़े दिल को दर्शाता है.”
कमोडोर बत्रा के पास मौजूद साल 2017 से 19 के बीच की आधिकारिक फाइलों, नोट आदि से पता चलता है कि इलेक्टोरल बॉन्ड सभी पक्षों के लिए बराबरी का अवसर मुहैया नहीं करवाता जो कि नरेंद्र मोदी सरकार का दावा था. जो भी पार्टी केंद्र की सत्ता में होगी उसे इसका बेजा फायदा होगा, जो कि फिलहाल बीजेपी है. वो इस योजना को मनमाने तरीके से नियंत्रित कर सकती है, इसमें फेरबदल कर सकती है जैसा कि हमने अपनी पिछली स्टोरी में देखा भी. एसबीआई द्वारा सहेज कर रखे जा रहे गोपनीय नंबर को जब चाहें सरकारी जांच एजेंसिया हासिल कर सकती हैं.
अप्रैल 2018 में द क्विंट वेबसाइट ने अपनी एक रिपोर्ट में एक अज्ञात स्रोत को कोट करते हुए इस गोपनीय नंबर के बारे में खुलासा किया था. जब इंडियन एक्सप्रेस ने इस मामले में वित्त मंत्रालय से टिप्पणी की मांग की तो उसने सीधे झूठ बोल दिया. इस पूरे विषय में हमने देखा कि सरकार ने बार-बार ऐसा किया.
सरकार ने यह तो स्वीकार किया कि बॉन्ड में सुरक्षा फीचर के रूप में एक ‘अनियमति क्रम वाला सीरियल नंबर’ है. लेकिन सरकार ने लगे हाथ दावा किया, “यह नंबर एसबीआई द्वारा ऐसे किसी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया जाता जिसका संबंध इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने या इसे हासिल करने वाले राजनीतिक दल से हो. इसलिए जब बैंक बॉन्ड को किसी खरीददार को जारी करता है यह किसी पक्ष से जुड़ा नहीं होता.”
“इस नंबर का ऐसा कोई इस्तेमाल नहीं है, ना ही इसका किसी खरीददार या प्राप्तकर्ता को ट्रैक करने के लिए इस्तेमाल होगा.”
हमको मिले नए दस्तावेज जो अब तक सामने नहीं आए थे, उनसे साबित होता है कि यह कोरा झूठ था.
सरकार और एसबीआई के बीच सहमति
1 फरवरी 2017 को जब अरुण जेटली ने पहली बार इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा की उस वक्त तक सरकार को भी पता नहीं था कि यह योजना असल में किस तरह से काम करेगी.
सरकार ने रिज़र्व बैंक, चुनाव आयोग और विपक्षी दलों से सलाह-मशविरे का दिखावा जरूर किया लेकिन उनके सुझावों को खारिज कर दिया.
हमारे पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक लगभग एक साल बाद जनवरी 2018 में वित्त मंत्रालय ने मूलभूत सैद्धांतिक ढांचा बनाने के बाद एसबीआई के साथ सलाह-मशविरे की प्रक्रिया शुरू की.
16 जनवरी, 2018 को एसबीआई ने वित्त मंत्रालय के साथ हुई एक मीटिंग में विस्तार से बताया कि बॉन्ड के खरीददार और प्राप्तकर्ता के सीरियल नंबर की पहचान एक आवश्यक आवश्यकता है.
“इलेक्टोरल बॉन्ड पर खरीददार या प्राप्तकर्ता के नाम अंकित नहीं होंगे, लेकिन उन्हें एक सीरियल नंबर की जरूरत होगी,” ये बातें बैंक के अधिकारियों ने मंत्रालय के अधिकारियों से कही जो कि उस मीटिंग के नोटिंग में दर्ज है.
बैंक ने स्पष्ट किया कि सीरियल नंबर के बिना बैंक को बिक्री हुए बॉन्ड की ऑडिट और आंतरिक हिसाब-किताब रखने में दिक्कत होगी. अगर अदालत या किसी जांच संस्था ने एसबीआई से बिक्री हुए बॉन्ड की जानकारी मांग लेगी तो बैंक के पास कोई जवाब नहीं होगा. नंबर की अनुपस्थिति में नकली बॉन्ड की बिक्री भी हो सकती है और उनका हिसाब-किताब रखना असंभव हो जाएगा.
सीरियल नंबर का उद्देश्य साफ था इलेक्टोरल बॉन्ड की शुचिता बनी रहे साथ ही इसका यह भी मतलब था कि एसबीआई को इलेक्टोरल बॉन्ड की अवधारणा को लेकर किसी तरह का भ्रम नहीं था. यानि किसी व्यक्ति अथवा कारपोरेशन के एकाउंट से उसे खरीदा जाएगा और फिर राजनीतिक दल के एकाउंट में उसे जमा कर दिया जाएगा.
दानदाता को आम जनता से गोपनीयता मिल जाती लेकिन एसबीआई से नहीं. रिकॉर्ड बताते हैं कि वित्त मंत्रालय इस बाबत एसबीआई से सहमत था.
वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आंतरिक फाइलों में दर्ज नोटिंग में लिखा, “एसबीआई को सीरियल नंबर डालने की इजाजत दे देनी चाहिए ताकि बैंक और इलेक्टोरल बॉन्ड योजना इन झमेलों से बच जाय.” उसमें आगे लिखा है, “यद्यपि बैंक को सलाह दी जा सकती है कि इस जानकारी को पूरी तरह से गोपनीय रखा जाए और इसके लीक होने की किसी भी संभावना से दूर रखा जा सके.”
इलेक्टोरल बॉन्ड को नियंत्रित करने वाले प्रावधानों में यह तय किया गया कि जांच एजेंसियों को इसकी जरूरत होने पर वो उसे साझा करे.
2 जनवरी, 2018 को जारी हुए नोटिफिकेशन की धारा 6(4) कहती हैं, “खरीददार से जुड़ी सूचना को पूरी तरह से गोपनीय रखा जाएगा विक्रेता बैंक द्वारा और किसी भी संस्था या प्राधिकार के सामने किसी भी उद्देश्य से इसका खुलासा नहीं किया जाएगा. सिर्फ उसी स्थिति में इसे साझा किया जा सकेगा जब कि किसी अदालत या किसी जांच संस्था द्वारा आपराधिक केस दर्ज कराया जाय.”
इस जिक्र में आपराधिक केस को विस्तार से नहीं समझाया गया. इसने एक अनसुलझी स्थिति खड़ा कर दिया कि किस स्थिति में कोई जांच संस्था एसबीआई से जानकारी मांग सकती है. इसके तहत सरकार या एसबीआई की तरफ से खरीददार या प्राप्तकर्ता को उसकी जानकारी साझा किए जाने की पूर्वसूचना देना भी जरूरी नहीं था.
क्या कोई सरकार एसबीआई द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर हुए लेनदेन की गोपनीय रिकॉर्ड तक पहुंच सकती है?
सरकार द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर जनता, विपक्षी दलों, सांसद, कानूनी और संवैधानिक संस्थाओं, जैसे आरबीआई और इलेक्शन कमीशन के साथ झूठ बोलने का स्तर इतना ज्यादा रहा कि इन संस्थाओं की विश्वसनीयता ही खतरे में पड़ गई.
तथ्य ये है कि न सिर्फ इलेक्टोरल बॉन्ड के स्रोत का पता लगाना आसान है बल्कि सरकार और कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार संस्थाओं से सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए नियम भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं. पिछले कुछ वर्षों से मोदी सरकार के राजनीतिक विरोधी और आलोचक कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार संस्थाओं पर विपक्ष को निशाना बनाने का आरोप लगाते रहे हैं. ऐसा भी देखने को मिला कि विपक्ष से जुड़े मामलों में सरकारी एजेंसियों ने बेहद तत्परता से कार्रवाई की.
हमें अपनी खोजबीन ऐसे तमाम सबूत मिले जिनसे पता चलता है कि एसबीआई वित्त मंत्रालय की सतर्क निगरानी और दिशानिर्देशन में इलेक्ट्रोरल बॉन्ड योजना को अंजाम दे रहा था. इतना ही नहीं एसबीआई समय-समय पर वित्त मंत्रालय के कहे अनुसार इस योजना में फेरबदल कर रहा था.
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना पर केंद्र सरकार की पकड़ इतनी मजबूत है कि एसबीआई वित्त मंत्रालय की मंजूरी और निगरानी के बगैर सूचना के अधिकार के अधिकार के तहत पूछे गए सवालों के जवाब तक नहीं दे सकता था, यह बात दोनों के बीच बातचीत से स्पष्ट होती है. यह अनुचित और गैरक़ानूनी है – कानूनन एसबीआई एक स्वतंत्र संस्था और उसे जनता को कोई सूचना देने के लिए सरकारी इजाजत की जरूरत नहीं है
इससे भी बदतर ये कि कई दफा ऐसे मौके आए जब वित्त मंत्रालय ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना में तोड़मरोड़ के लिए एसबीआई को मजबूर किया. एसबीआई द्वारा शुरुआत में थोड़ा-बहुत विरोध दर्ज हुआ, लेकिन बाद में वो रास्ते पर आ गया.
ऐसा ही घटना फरवरी 2019 में देखने को मिली जब केंद्र सरकार ने एसबीआई को लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री के लिए एक विशेष विंडो खोलने के लिए कहा.
नियमों के अनुसार, एसबीआई राजनीतिक चंदे के लिए साल में चार दफा 10-10 दिनों के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री करता है. साथ ही यह नियम भी हैं कि जिस साल लोकसभा चुनाव होंगे उस साल 30 दिनों के लिए अलग से एक विंडो खुलेगा.
पत्राचार और दस्तावेजों का अध्ययन कर हमने पाया कि फरवरी 2019 में केंद्र सरकार ने 30 दिनों के लिए खुले विंडो को और 5 दिनों तक बढ़ाये जाने के लिए दबाव बनाया. वित्त मंत्रालय की फाइल नोटिंग के अनुसार तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने खुद फरवरी 2019 में इस अवैध विस्तार को अनुमति दी.
28 फरवरी, 2019 को एसबीआई को वित्त मंत्रालय ने एक ईमेल कर निर्देशों का पालन करने के लिए कहा.
एसबीआई ने उसी दिन उस मेल के जवाब में वित्त मंत्रालय को लिखा कि उनका निर्देश कानून के खिलाफ है और साथ ही वित्त मंत्रालय से इसे स्पष्ट करने के लिए कहा.
वित्त मंत्रालय ने इस अवैध बिक्री की जिम्मेदारी एसबीआई पर डालने की कोशिश की. उसी दिन एसबीआई को ईमेल द्वारा भेजे गए जवाब में वित्त मंत्रालय ने दावा किया कि 30 दिन की अवधि के बजाय, 35 दिनों की विशेष विंडो खोले जाने का प्रस्ताव “एसबीआई की सिफारिश” पर ही किया गया था.
एसबीआई ने इस गैरकानूनी कदम की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया.
वित्त मंत्रालय को भेजे गए एक ईमेल में कहा गया, “आपकी तरफ से इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री के संबंध में 27.02.2019 को टेलीफोन पर हमें सूचित किया गया था और यह ‘एसबीआई की सिफारिश’ नहीं थी जैसा कि 28.02.2019 को भेजे गए ईमेल में आपने कहा.”
हालांकि, इसी ईमेल में बैंक तमाम नियमों के तोड़ते हुए 35 दिनों के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री के लिए राजी हो गया क्योंकि अब उसे इसकी जिम्मेदारी अपने सर आने की उम्मीद नहीं थी.
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की वैधता और उसके कार्यान्वयन की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था. सुप्रीम कोर्ट ने 12 अप्रैल, 2019 को एक अंतरिम आदेश जारी किया. अन्य निर्देशों के अलावा अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि वह नियमों का उल्लंघन न करें और 2019 में 30 दिनों में बॉन्ड के लिए विशेष विंडो अवधि बढ़ाने से रोके. इसके बाद वित्त मंत्रालय जो कि 35 दिनों के लिए विंडो खोले रखने की चाह रखता था अचानक से 30 दिन के लिए राजी हो गया.
(इस रिपोर्ट का अंग्रेजी संस्करण आप हफिंगटन पोस्ट इंडिया की वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं)
Also Read
-
SIP was the successful Sharma ji ka ladka. Now it has a problem
-
From ‘Maunmohan’ to ‘Maunendra’: Modi’s ‘strategic’ silence’ as Trump walks over India
-
A pig at the gate, TV cameras outside: The making of a viral Eid controversy
-
चापलूसी चलीसा, ईरानी थाली, ईएमआई वाली और न्यूज़क्लिक की बातें
-
‘If not India, then who?’: Palestinian envoy flags Gaza healthcare collapse, seeks urgent assistance