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जेएनयू विवाद: यूनिवर्सिटी में राजनीतिक हस्तक्षेप और स्वायत्तता का सनातन संकट
जेएनयू विवाद जो हॉस्टल मैन्युअल और फीस वृद्धि से शुरू हुआ था, अब छात्रों के संसद भवन मार्च और उन पर बल प्रयोग के बाद यह संसद भवन के बाहर से अन्दर तक पहुंच गया है. हॉस्टल में फ़ीस वृद्धि के बजरिए यह विवाद अब कई व्यवस्थागत विषयों को हमारे सामने खड़ा कर रहा है, तथा मानव संसाधन मंत्रालय की शैक्षिक नीति पर सवाल उठा रहा है.
1986 की शिक्षा नीति के समय से ही यह मांग लगातार उठ रही हैं की शैक्षणिक संस्थानों को राजनीतिक और वाह्य हस्तक्षेपों से मुक्त किया जाय. उसके बाद से तमाम शिक्षाविद् और आयोगों ने विश्वविद्यालयों को अधिक से अधिक स्वायत्ताता देने और उनको राजनीतिक हस्तक्षेपों से मुक्त करने की मांग की है. ऐसा माना जा रहा है कि राजनीतिक और बाहरी हस्तक्षेप विश्वविद्यालय के कार्यपद्धति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं और इससे शैक्षणिक गुणवत्ता प्रभावित होती है.
इसी क्रम में जब नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट सामने आया तो विश्वविद्यालयों को यूजीसी और मंत्रालय से मुक्त करने की सिफारिश भी की गई, मगर हाल के जेएनयू आंदोलन ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं की वह विश्वविद्यालयों को स्वायत्ता देने के प्रति कितनी ईमानदार है. फ़ीस बढ़ोतरी का फ़ैसला विश्वविद्यालय ने अपनी बैठक में लिया जिस पर सभी प्रशासनिक अधिकारियों के हस्ताक्षर थे.
छात्रों का विरोध तब तक वाजिब था जब तक वह इस विषय को उठा रहे थे की फ़ीस में वृद्धि पर फ़ैसला उनकी जानकारी के बग़ैर लिया गया जबकि विश्वविद्यालय व्यवस्था का अंग होने के नाते छात्रों से पूछना आवश्यक था, जो की नहीं किया गया. मगर जब उन्होंने बलपूर्वक प्राध्यापकों से इस्तीफ़े पर हस्ताक्षर कराना आरम्भ किया तो यह साफ़ हो गया छात्रों द्वारा उनकी मांगों को मनवाने का तरीका कहीं ना कहीं आलोकतंत्रिक हैं. यद्यपि उनकी फीस वृद्धि के तर्कों को सुनने की फिर भी आवश्यकता है.
विश्वविद्यालय की स्वायत्ताता पर पहला हमला हुआ तब जब छात्रों ने यूजीसी का घेराव किया जिसका कार्य सिर्फ रेगुलेशन करना है. उसने खुद यह नियम बनाया है की विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में दख़ल नहीं देना चाहिए. उससे यह मांग की जा रही है की वह विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली में दखल न दे. इसमें कोई संदेह नहीं हैं की यूजीसी लगातार विश्वविद्यालयों के फण्ड में कटौती कर रहा हैं और विश्वविद्यालयों से अपने संसाधन खुद ही जुटाने को कह रहा है. यह चिंता का विषय है.
उसके बाद उसी दिन मानव संसाधन मंत्रालय के उच्च शिक्षा सचिव ने यह घोषणा की जेएनयू ने आंशिक तौर फ़ीस वृद्धि को वापस ले लिया हैं जबकि वास्तव में इसकी घोषणा विश्वविद्यालय को करनी थी. एक बार फिर से विश्वविद्यालय गलत साइड में खड़ा था. उच्च शिक्षा सचिव की इस पूरी प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं थी. शिक्षा के क्षेत्र में लगातार बाबुशाही का बढ़ना कम से कम शिक्षा के लिए हितकर नहीं हैं. यह उस समझ और विचार पर एक आघात है जो विश्वविद्यालयों को एक स्वायत्त इकाई मानता है.
17 नवम्बर को मानव संसाधन मंत्रालय ने एक और विशेष अधिकार प्राप्त समिति का गठन किया जिसका कार्य छात्रों से बात करके विवाद को शांत करना था मगर आश्चर्यजनक रूप से इस समिति में न तो कोई जेएनयू प्रशासन का कोई प्रतिनिधित्व है ना ही विद्यार्थियों का.
यानि फिर से बाबुओं की समिति कोई निर्णय लेगी और उस निर्णय को मानने के लिए विश्वविद्यालय को बाध्य करेगी. इस प्रकार की स्थिति शैक्षणिक वातावरण के लिए बेहद हानिकारक है. यह बाह्य प्रशासनिक और राजनीतिक हस्तक्षेपों को बढ़ावा देगा.
शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों और छात्रों की भूमिका होनी चाहिए, लगातार यह मांग की जाती रही है की ऐसे अधिकारी तैयार किये जाएं जो शिक्षा को समझते हों और जिनकी शिक्षा में रुचि हो. इसमें एक सुझाव विदेश और पुलिस सेवा की तर्ज पर शैक्षणिक सेवा के लिए भी कैडर तैयार करना था जिसमें शिक्षकों की पर्याप्त भागीदारी हो.
मगर अंतर्निहित स्वार्थों और प्रभुता कायम रखने की भावना के कारण इस प्रकार की मांगों को सदैव नजरअंदाज किया गया. वास्तव में नौकरशाह और राजनीतिक लोग शिक्षा अपने प्रभाव से मुक्त नहीं करने देना चाहते. शिक्षा एकाधिकार कायम करने और उसे बनाये रखने का एक शक्तिशाली माध्यम है. इसके कारण तमाम चर्चाओं और आंदोलनों के बावजूद भी यह अभी तक नौकशाही और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाई है.
मोदी सरकार ने आईआईएम और आईआईटी को बाह्य प्रभाव से मुक्त करने का प्रयास अवश्य किया मगर जेएनयू के विषय में लिए गए निर्णय मोदी सरकार की नीतियों के अनुरूप नहीं हैं जो की शिक्षा, छात्र और शिक्षक को स्वायत्तता देने की बात करता है. भारत के बहुतायत विद्यार्थी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ते हैं जिनको बाह्य राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना अत्यंत आवश्यक है.
(लेखक नई शिक्षा नीति में सलाहकार रहे हैं, फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय, शिक्षा संकाय में शोध छात्र हैं तथा सेंटर ऑफ़ पालिसी रिसर्च एंड गवर्नेंस के निदेशक हैं.)
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