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पार्ट 2: पराली दहन की जड़ें हरित क्रांति से हैं जुड़ी
भारत में हुई हरित क्रांति का सबसे ज्यादा फायदा जिन दो राज्यों को हुआ, वे थे पंजाब और हरियाणा. हरित क्रांति से पंजाब की खेती का मशीनीकरण हुआ. हाई यील्ड वैराइटी (उच्च उपज वाली किस्म) के बीज, रसायनिक खाद और उवर्रकों का इस्तेमाल खेती में बढ़ता चला गया. फसलों की उपज बढ़ी और किसानों को तात्कालिक लाभ भी मिला. लेकिन हरित क्रांति के दीर्घकालिक असर को लेकर स्वामिनाथन और वंदना शिवा जैसे कृषि विशेषज्ञों जिस तरह की आशंकाएं जताई थी, वही अब पंजाब में होता दिख रहा है.
खेती विरासत मंच के उमेंद्र दत्त बताते हैं, “हरित क्रांति में जिन चीज़ों को लाभ के तौर पर पेश किया गया, वे सभी आज नुकसान का कारण बन गए हैं.”
वे उदाहरण सहित बताते हैं, “हरित क्रांति का नतीज़ा था कि रसायनिक खादों का अत्याधिक उपयोग बढ़ा. उससे उपज में तात्कालिक बढ़ोतरी हुई लेकिन आज पंजाब की ज्यादातर मिट्टी या तो बंजर होने के कगार पर है या अत्यधिक केमिकल से अशुद्ध हो चुकी है. मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता बहुत कम हो चुकी है. सरकार ने धान की खेती को प्रोत्साहित किया. धान की फसल काटने के लिए मशीनें आ गईं. हार्वेस्टर और बोरवेल- दो ऐसे साधन पंजाब की खेती में आए जिससे पंजाब की खेती का समावेशी विकास संभव नहीं हो सकता.”
जब धान की फसल हार्वेस्टर के उपयोग से कटती है तो ऊपर का अनाज वाला हिस्सा काट लिया जाता है जबकि नीचे का एक से डेढ़ फीट हिस्सा मिट्टी में छूट जाता है. चूंकि धान के कटने और गेहूं की बुवाई में बहुत कम दिनों का अंतर रहता है लिहाजा किसानों के लिए फसल अवशेष (पराली) जलाना ही एकमात्र आसान तरीका बचता है. पंजाब और हरियाणा सरकारों के नए कानून के कारण पराली जलाने के समय में बदलाव की चर्चा न्यूज़लॉन्ड्री ने पहले भाग में की थी.
दूसरी ओर बोरवेल के इस्तेमाल से भूमिगत जल के स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ा. अगर पंजाब के ही मालवा क्षेत्र की बात करें तो यहां तकरीबन 200 से 400 फीट की गहराई पर बोरिंग आम बात हो गई है. जमीन के नीचे की एक सीमा से नीचे जाने पर प्राकृतिक तौर पर पानी में रसायनिक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है. चूंकि खेतों में रसायनों का अत्याधिक इस्तेमाल हो रहा है तो जब बोरवेल एक खास प्रेशर के साथ पानी खिंचता है तो वह सक्शन के कारण पानी की टॉक्सिसिटी (रसायनिकता) को और ज्यादा बढ़ा देता है. यह खेतों के साथ-साथ पीने के लिए भी हानिकारक है. लोगों का दावा है कि मालवा क्षेत्र में कैंसर के प्रमुख कारणों में से एक पानी है. हालांकि लोगों के दावे की पुष्टि के लिए फिलहाल कोई वैज्ञानिक शोध उपलब्ध नहीं है जिससे दूषित पानी से कैंसर का संबंध स्थापित होता हो.
हरित क्रांति का दुष्च्रक
पंजाब का नाम पंजाब इसीलिए पड़ा क्योंकि पांच नदियां यहां से गुजरती थी. पंज (पांच) और आब (नदी). भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद चेनाब और झेलम नदियों का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के हिस्से चला गया. वर्तमान पंजाब में सतलज, व्यास और रावी नदी का उपयोग सिंचाई के लिए हो पाता है. हालांकि इन नदियों की स्थिति दयनीय है. जल स्तर में गिरावट तो है ही. खेती में इस्तेमाल हो रहे रासायनिक खाद, औद्योगिक कचरे और नाले से बहकर पानी इन नदियों में धड़ल्ले से गिर रहा है.
1970 और 1980 के दशक में हुई हरित क्रांति ने पंजाब और हरियाणा को “फूड बाउल ऑफ इंडिया” का दर्जा दिया. लेकिन अब पंजाब के किसानों को इस ‘प्रशस्ति पत्र’ का तनिक भी गुमान नहीं है.
पंजाब में पहले मक्का, बाजरा, दाल और तिलहन की खेती प्रमुख रूप से होती थी. हरित क्रांति का असर रहा कि पंजाब में धान और गेहूं का फसल चक्र शुरू हो गया. कहा गया कि पंजाब और हरियाणा देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे. 1979 में पहली दफ़ा पंजाब सरकार की एक रिपोर्ट में पंजाब के गिरते जलस्तर पर चिंता व्यक्त की गई थी. लेकिन 1988 में पंजाब में आई भीषण बाढ़ से जलस्तर वापस अपने सही स्तर पर पहुंच गया.
1993-1994 में सरकार ने धान की एक नई हाईब्रिड वैराइटी को प्रोत्साहित किया. इसका नाम था “गोविंदा”. “गोविंदा” की बदौलत किसान एक खरीफ सीजन (अप्रैल से अक्टूबर) में दो बार धान की फसल कर लेते थे. चूंकि वे एक सीजन में दो बार “गोविंदा” की फसल कर पाते थे, इसे किसान “साथी” कहा करते. इसमें अत्याधिक पानी का इस्तेमाल होता था. अच्छी उपज और सरकार के प्रोत्साहन से धान की खेती को बढ़ावा मिलता गया.
वर्ष 2002-2003 में सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड ने पंजाब सरकार को गिरते भूमिगत जलस्तर पर चेताया. रिपोर्ट में बताया गया कि प्रति किलो गोविंदा चावल उपजाने में 4500 लिटर पानी लगता है. बोरवेल का चलन भी इसी दौर में बढ़ा. सरकार ने बिजली सब्सिडी मुहैया करवाई. भूमितगत जल के अत्याधिक इस्तेमाल और विदेशी लॉबिइंग के दबाव का नतीजा रहा कि दोनों राज्यों में प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉइल वॉटर एक्ट की नींव रखी गई.
कृषि विशेषज्ञ बलविंदर सिंह सिद्धू पंजाब की स्थिति को भयावह बताते हैं. वह कहते हैं, “मैं वर्षों से एक ही बात कह रहा हूं कि पंजाब को धान और गेहूं के फसल चक्र से बाहर निकालो. पंजाब और हरियाणा के किसानों को इस दबाव से मुक्त करो कि वे ही सिर्फ भारत को खाद्य सुरक्षा मुहैया करवा सकते हैं.”
“आज के दिन में पंजाब के किसानों के लिए धान और गेहूं भी फायदे का सौदा नहीं रहा. संसाधन ज्यादा लग रहे हैं और उपज उस मुकाबले हो नहीं रही. सरकार को ऐसा माहौल तैयार करने की जरूरत है ताकि पंजाब की खेती में विवधता आ सके. आप देखेंगे, समूचे मालवा क्षेत्र में बीटी-कॉटन की खेती हो रही है. अत्याधिक रसायनिक खाद के इस्तेमाल से कॉटन की गुणवत्ता खत्म हो गई है. लेकिन सरकार उसे ही प्रोत्साहित कर रही है,” सिद्धू कहते हैं.
बठिण्डा में काउनी (कौनी) गांव के बूटा सिंह बताते हैं, “देश में पंजाब के किसानों की एक छवि बना दी गई है कि वे खुशहाल हैं. समृद्ध हैं. दूसरे प्रदेशों के किसान भाइयों को भी लगता है कि पंजाब के किसान अच्छे खुशहाल स्थिति में हैं. मैं उनकी (दूसरे प्रदेश के किसानों) बातचीत से महसूस करता हूं कि वे भी पंजाब का अनुसरण करना चाहते हैं और अपने राज्य सरकारों से पंजाब जैसी सुविधाएं मांगते हैं. जबकि आज की हकीकत हैं कि पंजाब के किसान अंधकार में हैं.”
बूटा के साथी किसान भी उनकी बातों से सहमति जताते हैं. उनका भी मानना है कि पंजाब को जितना खुशहाल बताने की कोशिश होती है, दरअसल, वह बाकी प्रदेशों के किसानों को बरगलाने और झूठी तस्वीर पेश करने की कोशिश है. वे पराली की समस्या के इतर पंजाब के कृषि संकट के संदर्भ में विस्तार से मीडिया में चर्चा चाहते हैं.
“पराली की समस्या समूचे पंजाब में कृषि संकट का महज एक छोटा-सा हिस्सा है. पराली सीजनल समस्या है. पंजाब के किसानों की बाकी समस्याओं का अगर सरकार नीतिगत सामाधन कर दे तो पराली की समस्या अपने-आप खत्म हो जाएगी,” कहते हुए बूटा सिंह के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच जाती हैं.
सरकारी दोष किसान के माथे
वर्ष 2019-20 के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने धान की न्यूनतम सर्मथन मूल्य (एमएसपी) में 3.7% की बढ़ोतरी की घोषणा की. मतलब प्रति क्विंटल धान पर 65 रुपये की वृद्धि. इस वृद्धि से धान की एमएसपी हो गई 1,815 रूपये प्रति क्विंटल. पिछले वर्ष पंजाब में बासमती चावल की एमएसपी तकरीबन 3,400 से 3,800 प्रति क्विंटल थी. इस वर्ष चूंकि बासमती की उपज कम हुई है, सरकार ने एमएसपी 2,400 से 2,700 रूपये प्रति क्विंटल कर दी है.
“पंजाब के किसानों के लिए सरकार ने धान बोने का समय निर्धारित कर दिया, राजी-खुशी हमने मान भी लिया. भू-जल को संरक्षित करने के लिए किसानों ने अपने समय और आमदानी से समझौता भी कर लिया. हम यह सरकार से पूछते हैं कि बताओ भूमिगत जल का अत्याधिक इस्तेमाल किसने किया? क्या प्रदूषित नदी, नहरों के लिए हम किसान जिम्मेदार हैं?” हैप्पी बराड़ पूछते हैं.
हैप्पी पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के छात्र हैं. दिवाली की छुट्टियों में वे घर आए हुए हैं. छुट्टियों के समय में वे खेती के कामकाज में भी हाथ बंटाते हैं.
हैप्पी आगे पूछते हैं, “सरकार ने ही हमें धान-गेहूं का फॉर्मूला दिया. हमारा फसल चक्र बदलवा दिया. रसायनिक खादों और बिजली पर सब्सिडी दी. अब जब हम उनके अनुसार ही चल रहे हैं तो भी वो हमें ही दोषी बता रहे हैं. पराली से धुंए की समस्या तो ये उनकी (सरकार) ही पैदा की हुई है. अब हमारे खिलाफ ही अखबारों में इश्तेहार छाप रहे हैं?”
हैप्पी पानी की समस्या से संबंधित बुनियादी प्रश्न पूछते हैं, “क्या सरकार के पास कोई आंकलन है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कितने पानी का कौन इस्तेमाल करता है? शहरों में डीप बोरवेल खुदे हैं. औद्योगिक कचरे, कारखानों का धुंआ, कोयला चिमनियों, गाड़ियों का धुंआ और आधुनिक शहरी जीवनयापन से जल, हवा और मौसम चक्र प्रभावित है. वैज्ञानिक इस बात की लगातार पुष्टि कर रहे हैं. वैज्ञानिक ये भी बता रहे हैं कि किसान और हाशिये का समाज इससे सबसे ज्यादा त्रस्त है. लेकिन सरकारें कार्रवाई किसे केंद्र में रखकर कर रही हैं?”
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व कार्यकर्ता और लोक गायक बादला हैप्पी की बात को आगे बढ़ाते हुए पूछते हैं, “सरकार ने कोयला प्लांटों, उद्योगों या गाड़ी बनाने वाली कंपनियों के खिलाफ क्या एक्शन लिया है. क्यों नहीं सरकार शहरों में घर-घर बोरिंग की जगह सामुदायिक बोरिंग जैसी व्यवस्था कर देती है. क्योंकि किसान को दबाना आसान है इसीलिए सरकार के सारे तिकड़म हमारे लिए ही होते हैं.”
वर्ष 2018 में नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलप्मेंट (नाबार्ड) ने अपने शोध में स्पष्ट रूप से पंजाब और हरियाणा को रेखांकित करते हुए बताया कि दोनों राज्यों में धान और गेहूं की खेती को बढ़ावा नहीं देना चाहिए. दोनों राज्यों में धान की खेती समावेशी सिंचाई नीतियों के लिहाज से भी बेहतर नहीं है.
किसानों, कृषि विशेषज्ञों और तमाम शोध पत्रों (जिनका जिक्र हमने स्टोरी में किया है) से एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि नवंबर के महीने में दिल्ली और उत्तर भारत में धुंए की समस्या सिर्फ पराली जलाने से नहीं है. पराली जलाने के पीछे का एक पूरा बैकग्राउंड है जिसे दरकिनार कर समाधान पर बात नहीं की जा सकती. जिस हरित क्रांति से पंजाब और हरियाणा लाभांवित हुए, आज उसी हरित क्रांति के दुष्चक्र में किसान उलझ चुके हैं.
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