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क्या चीन ने आरसीईपी के जरिए भारत को चारो तरफ से घेर लिया है?
इस सप्ताह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दूसरे अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के लिए भारत आना है. हालांकि एक हफ्ते से भी कम समय शेष रह गया है लेकिन तारिखों का औपचारिक ऐलान अभी नहीं हुआ है. द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा इस बैठक में कश्मीर मसले तथा क्षेत्रीय व्यापार समझौते पर चर्चा होनी है. लेकिन ऐसे भी संकेत मिल रहे हैं कि राष्ट्रपति जिनपिंग शायद कुछ समय के लिए इस दौरे को टाल दें.
कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि ऐसा अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के हिमविजय सैन्य अभ्यास पर चीन की आपत्ति के कारण हो सकता है. भारत का कहना है कि इस अभ्यास का चीनी राष्ट्रपति के दौरे से कोई मतलब नहीं है. इसी बीच पाकिस्तान में चीन के राजदूत याओ जिंग ने बयान दिया है कि चीन कश्मीर विवाद के हल में और क्षेत्रीय शांति व स्थिरता के लिए पाकिस्तान के साथ खड़ा है. उन्होंने यह भी कहा है कि कश्मीरियों के मौलिक अधिकारों और उनके साथ न्याय के लिए उनका देश प्रयासरत है.
इस बयान पर भारत ने चीन से स्पष्टीकरण मांगा है क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर पर चीन के रवैए से विमुख होने वाला बयान है. अब तक चीन यह कहता रहा था कि कश्मीर का मसला भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला है तथा उन्हें परस्पर बातचीत से इसे सुलझाना चाहिए. उल्लेखनीय है कि जिनपिंग के भारत आने से दो दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान उनसे मिलेंगे. प्रधानमंत्री बनने के बाद से इमरान खान की यह तीसरी चीन यात्रा होगी.
यदि चीनी राष्ट्रपति का दौरा रद्द होता है, तो ऊपर उल्लिखित कारकों का उसमें कोई योगदान नहीं होगा. अगर यह बैठक तय समय पर होती है या फिर कुछ दिनों के बाद होती है, तो इसका सबसे महत्वपूर्ण विषय है- रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) यानी व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक भागीदारी. यह पार्टनरशिप समझौता 16 देशों के बीच मुक्त व्यापार व्यवस्था बनाने के लिए हो रहा है. इसमें भारत के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड तथा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के समूह आसियान के दस सदस्य- ब्रूनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फ़िलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम- हैं. छह देशों का आसियान के साथ मुक्त व्यापार समझौता पहले से ही है. भारत का आसियान के अलावा जापान और दक्षिण कोरिया के साथ भी ऐसा समझौता है.
यदि इन 16 देशों के बीच नवंबर में थाईलैंड में होने वाली बैठक में समझौते पर सहमति बन जाती है, तो इसके दायरे में दुनिया के क़रीब साढ़े तीन अरब लोग यानी 45 फ़ीसदी आबादी होगी तथा वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 40 फ़ीसदी हिस्सा इस समझौते के दायरे में होगा. ऐसे में यह दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक समूह बन जायेगा. आकलनों के मुताबिक आगामी तीन दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था का आधा भाग इस समझौते के अंतर्गत आ जायेगा.
बीते सात सालों में कई बैठकों के बाद इसके नियमन का प्रस्ताव तैयार हो गया है, लेकिन भारत अपनी चिंताओं के कारण इस पर सहमति जताने में हिचक रहा है. समझौते में शामिल कुछ देशों ने सीधे या परोक्ष तौर पर यहां तक कह दिया है कि भारत के बिना भी इसे अंतिम रूप दिया जाना चाहिए. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पियूष गोयल ने बार-बार कहा है कि देश के आर्थिक हितों को दरकिनार कर समझौते को मानना संभव नहीं होगा.
भारत के पक्ष को अंतिम रूप देने के लिए कुछ दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, विदेश मंत्री एस जयशंकर और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पियूष गोयल की बैठक हो चुकी है. इस बैठक में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के राज्य मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी उपस्थित थे. इस बैठक में लिए गए निर्णयों के बारे में बाद में पता चल सकेगा. या तो चीनी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री की बैठक के बाद इस संबंध में संकेत मिलेंगे या फिर अगले महीने थाईलैंड में कोई जानकारी सामने आएगी.
ऐसा कहा जा सकता है कि अगर भारत समझौते के प्रस्तावित शर्तों को नहीं मानता है, तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने दौरे को स्थगित कर सकते हैं या फिर यह अनौपचारिक शिखर सम्मेलन सचमुच में अनौपचारिक मुलाक़ात भर बन कर रह जाए. एक पहलू यह भी हो सकता है कि भारत की चिंताओं पर चीन कुछ नरमी दिखाते हुए शर्तों में ढील देने पर तैयार हो जाए. अगर ऐसी गुंजाइश बची हुई है, तो फिर जिनपिंग का दौरा टलने की संभावना न के बराबर है. हां, यह ज़रूर हो सकता है कि बैठक रद्द होने की स्थिति में यह बात ज़ोर-शोर से फैलायी जाए कि अरुणाचल प्रदेश में दोनों देशों की नियंत्रण रेखा के लगभग सौ किलोमीटर दूर भारतीय युद्धाभ्यास के कारण जिनपिंग ने दौरा टाल दिया. संभव है कि हमारे कई टिप्पणीकार कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ चीन के होने के पहलू पर ज़ोर देकर प्रकरण से अपने एजेंडे को साधने की कोशिश करें. ऐसी कोशिशें शुरू भी हो चुकी हैं.
इस समझौते पर भारत की सबसे बड़ी चिंता व्यापार घाटे के बढ़ने तथा घरेलू उद्योग धंधों के नुकसान को लेकर है. चीन, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया समेत समझौते में शामिल 11 देशों से भारत निर्यात की तुलना में आयात अधिक करता है यानी व्यापार संतुलन इन देशों के पक्ष में है. चीन के साथ हमारा घाटा तो 55-60 अरब डॉलर सालाना के हिसाब में है. समझौते के प्रस्तावों के अनुसार भारत को चीन से आयात होनेवाले 74 से 80 फीसदी, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से 86 फीसदी तथा जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान देशों की 80 फीसदी वस्तुओं पर से आयात शुल्क हटाना होगा या उसमें कमी लानी होगी. इसके लिए अलग-अलग वस्तुओं के लिए पांच से पच्चीस साल की अवधि तय की गयी है. हालांकि प्रस्तावों में भारत के लिए यह प्रावधान भी है कि वह किन्हीं वस्तुओं के अत्यधिक आयात की स्थिति में अपने घरेलू उद्योग को संरक्षण देने के लिए शुल्कों में बढ़ोतरी कर सकता है, लेकिन ऐसा करना आसान नहीं होता है. मुक्त व्यापार की स्थिति में कई वस्तुओं के मामले में हमारे उद्योगों को गुणवत्ता और मूल्य को लेकर कठोर प्रतिस्पर्धा करने की नौबत भी आ सकती है.
समझौते के पक्षधरों का कहना है कि यह स्थिति हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी होगी क्योंकि वे बेहतर उत्पाद देने के लिए प्रेरित होंगे और निवेश व रोज़गार में बढ़ोत्तरी होगी. लेकिन अब तक के अनुभवों तथा हमारी आर्थिकी की प्रकृति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि प्रतिस्पर्धा में टिकने लायक न तो हमारी तैयारी है और न ही उसके लिए पर्याप्त वित्तीय व मानव संसाधन हैं. प्रशासन और प्रबंधन की दशा भी ठीक नहीं है.
महीने में पांच बार इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस और पांच ट्रिलियन इकोनॉमी का राग अलापकर न तो चीन, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ प्रतिस्पर्धा की जा सकती है न ही अन्य सदस्य देशों के बाज़ार का फ़ायदा उठाया जा सकता है. इस समझौते में शामिल आसियान और अन्य कुछ देशों के साथ हमारे मुक्त व्यापार समझौतों का कितना नफ़ा-नुकसान हुआ है, उसका भी हिसाब लगाया जाना चाहिए. यही कारण है कि विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों ने सरकार से वर्तमान प्रस्तावों को न मानने का आग्रह किया है. विभिन्न कामगार संगठनों ने भी सवाल उठाए हैं.
सत्तारूढ़ भाजपा के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिकी साझा करने वाले स्वदेशी जागरण मंच ने भी समझौते का विरोध किया है. कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि सरकार के भीतर भी इस मसले पर मतभेद हैं.
इस मसले पर इस बात का संज्ञान भी लेना चाहिए कि चीन ने अपने को एशिया में एक बड़ी आर्थिक ताक़त के तौर पर स्थापित कर लिया है. भले ही सरकार के कुछ वाचाल मंत्री और सत्ताधारी नेता चीन से आगे निकलने की डींग हांकें, पर सच यह है कि जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय में चीन हमसे लगभग पांच गुना आगे है. वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से चीन दुनिया की आर्थिक वृद्धि में सबसे अधिक योगदान करने वाला देश है. आमदनी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में हमारी उससे कोई तुलना ही नहीं है. इसी तरह से समझौते में शामिल अनेक अर्थव्यवस्थाएं विभिन्न मामलों में हमसे आगे हैं.
आज जब भारत बेरोज़गारी और विषमता के हिसाब से बड़े संकट से गुज़र रहा है, शुल्कों को घटाकर आयात बढ़ाने का निर्णय आत्मघाती हो सकता है. अगर सरकार 25 फ़ीसदी आयात से शुल्कों में कटौती के साथ इस समझौते में शामिल होती है तथा अन्य आयातों पर निर्णय के लिए अधिक समय मांगती है, जैसा कि कुछ रिपोर्टों में कहा गया है, तब भी बहुत घाटा हो जायेगा. एक सवाल यह भी है कि इसी हिसाब से अन्य देश भी भारतीय उत्पादों को छूट देना चाहते हैं. विश्व व्यापार संगठन में कृषि उत्पादों और डिजिटल वाणिज्य को लेकर अनेक मामले चल रहे हैं. उनमें भारत को बहुत कुछ लाभ होने की आशा नहीं है. एक तो उस संगठन में शामिल होने के नुकसान को झेलना मुश्किल है, ऊपर से 16 देशों के समझौते में शामिल होकर दीर्घकालिक घाटे में चले जाने की इच्छा आत्मघाती ही है.
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