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ख़रामा ख़रामा हिंदी से हिंग्लिश होती हिंदी फिल्मों की संस्कृति
बीते हफ्ते हिंदी दिवस था. मीडिया और सोशल मीडिया में हिंदी दिवस की चर्चा रही. देश के गृहमंत्री ने ‘एक राष्ट्र, एक भाषा’ का संदेश दिया और कहा कि गांधी और पटेल के सपनों को इसी के जरिए पूरा किया जा सकता है. उनके इस आह्वान से हिंदी समाज की हिंदीभाषी आबादी गदगद है. उन्हें यकीन है कि परिणाम की परवाह किए बिना गृहमंत्री अपने वादे को पूरा करेंगे. इस मौके पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के संदर्भ में हिंदी और फिल्मों के संबंध की स्थिति और भविष्य को लेकर चर्चाएं हुईं. यह समाप्त चर्चा है.
हर साल हिंदी की चिंता में कुछ नए पहलू जुड़ते हैं और कुछ अनिश्चय के साथ पहले की तरह चलते रहते हैं. हिंदी समाज का एक तबका आवश्यक रूप से फिल्मी हस्तियों की निंदा में तल्लीन रहता है. वह हमेशा यही कहता और लिखता रहता है कि ‘खाते-कमाते हैं हिंदी से, लेकिन बोलते-लिखते हैं अंग्रेजी में’. उनके निशाने पर हिंदी फिल्मों के स्टार रहते हैं, जो सार्वजनिक मंच और इंटरव्यू में सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी बोलते नजर आते हैं, कोई यह गौर नहीं करता है कि हिंदी में कितने ऐसे प्लेटफॉर्म बचे हैं, जहां हिंदी में बातचीत या प्रोग्राम होते हैं? कितने चैनल, वेब पोर्टल हैं, जिनके पास हिंदीभाषी लेखक और पत्रकार हैं? वैकल्पिक मीडिया के तौर पर आये प्लेटफॉर्म अंग्रेजी अनुवाद से काम चलाते रहते हैं. फिल्मों के हिंदी समीक्षकों कि प्रजाती विलुप्त हो रही है.
भीतरी और ऊपरी तौर पर संकट गहरा है. जीवन के हर क्षेत्र की तरह फिल्म इंडस्ट्री में भी कामकाज की भाषा अंग्रेजी हो चुकी है. परस्पर कम्युनिकेशन अंग्रेजी में ही होता है. चिट्ठी-पत्री से लेकर बहस, विवाद, विमर्श, निर्देश और कार्य अंग्रेजी में होते हैं. अंतिम उत्पाद (प्रदर्शित फिल्म) में केवल संवाद और गाने हिंदी में रखे जाते हैं और हां सेंसर सर्टिफिकेट पर भाषा की जगह पर ‘हिंदी’ लिखी रहती है.
इन दिनों तो फिल्मों के संवाद में अंग्रेजी का अनुपात लगातार बढ़ता जा रहा है. गत शुक्रवार को रिलीज हुई अजय बहल की फिल्म ‘सेक्शन 375’ में 25 से 30 प्रतिशत संवाद अंग्रेजी में थे. उन्हें हिंदी में बताने या दोहराने की जरूरत नहीं समझी गई. याद करें तो पांचवें से सातवें दशक की हिंदी फिल्मों में अगर कोई पात्र अंग्रेजी में बोलता था तो उसी दृश्य में मौजूद दूसरा पात्र उसे हिंदी में बता देता था. फिल्मों के दृश्य विधान में ही दुभाषिये की व्यवस्था रहती. धीरे-धीरे देश अंग्रेजी मीडियम में पारंगत हुआ और दर्शकों को अलग से हिंदी में समझाने की जरूरत नहीं रह गई.
अब तो फिल्मों के महत्वपूर्ण दृश्यों में प्रयुक्त अंग्रेजी के संवाद धड़ल्ले से इस्तेमाल होते हैं. धारणा बना दी गई है कि मल्टीप्लेक्स के दर्शक अच्छी तरह अंग्रेजी समझते हैं. कहीं ना कहीं वे फिल्मों को ऐसी भाषा पसंद करते हैं, क्योंकि घर की हिंदी और स्कूल की अंग्रेजी के मिश्रित प्रभाव में उन्होंने हिंग्लिश सीख ली है. उनकी दैनिक ज़रूरतें इसी भाषा से पूरी होती हैं. मनोरंजन के लिए भी यह भाषा मुफीद है.
हिंदी सिनेमा में हिंदी के घटते महत्व और प्रभाव का एक बड़ा कारण हिंदी प्रदेशों के कस्बों और शहरों में थिएटर में जाकर फिल्म देखने वाले दर्शकों का लगातार कम होना है. इसके बरक्स मेट्रो शहरों (मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु) में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है. इन मेट्रो शहरों की भाषा हिंग्लिश हो चुकी है.
हिंदी फिल्मों के व्यवसाय का आंकड़ा देखें तो वीकेंड कलेक्शन में क्रमशः मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु का योगदान रहता है. तीनों मेट्रो शहरों से ही लगभग 70 प्रतिशत कलेक्शन आ जाता है, निर्माता-निर्देशक इन्हीं दर्शकों को ध्यान में रखकर फिल्मों के संवाद की भाषा तय कर रहे हैं. यह किसी योजना के तहत नहीं हो रहा है. दूसरी तरफ हॉलीवुड और दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्में हिंदी में डब होकर रिलीज और सफल हो रही हैं.
हिंदी फिल्मों में संवादों के अलावा गीतों में हिंदी का उपयोग होता रहा है. उर्दू मिश्रित गीतों में अब बेशुमार अंग्रेजी के शब्द मिलते हैं. गीत का शिल्प बदला है. लहजे और शैली में भी बदलाव आया है. पिछले दशक में टी-सीरीज के वर्चस्व और दबाव में पंजाबी भाषा और लहजे के गीतों की अनिवार्यता बढ़ गई है. ‘हिंदी मीडियम’ जैसी फिल्मों में भी ‘दिल सूट सूट करता’ जैसे बोल रखे जाते हैं’. हद तो तब होती है, जब बनारस, इलाहाबाद और पटना की पृष्ठभूमि की फिल्मों में पंजाबी बोल के गाने लोकप्रियता के नाम से ठूंसे जाते हैं.
सब कुछ फैशन के हिसाब से ही होता है. अगर आप पांचवे-छठे दशक की फिल्मों के हिंदी गाने सुनें तो पाएंगे कि उन दिनों पुरबिया बोली के शब्द हिंदी गीतों में मधुर और सहज लगते थे. राजेंद्र कृष्णा से लेकर शैलेन्द्र तक इन शब्दों का भरपूर इस्तेमाल करते थे. मुमकिन ही कि आज छिटपुट रूप से हिंदी गीतों में आ रहे अंग्रेजी शब्द पूरे वाक्य और संपूर्ण गीत में तब्दील हो जायें. सब कुछ दर्शकों की मांग और चलन के नाम पर होगा.
इधर आपने गौर किया होगा कि हिंदी फिल्मों के पोस्टर पर फिल्मों के नाम हिंदी (देवनागरी लिपि) में नहीं लिखे जाते. फर्स्ट लुक पोस्टर अंग्रेजी में ही जारी किए जाते हैं. नतीजा यह होता है कि इस सदी में रिलीज हिंदी फिल्मों के पोस्टर इंटरनेट पर खोजें तो इंटरनेट केवल अंग्रेजी पोस्टर ही उपलब्ध करवाता है.
हिंदी के पोस्टर फिल्मों के रिलीज के समय उत्तर भारत के सिनेमाघरों के लिए सीमित संख्या में जारी किए जाते हैं. आगे की जिम्मेदारी पर वितरकों और प्रदर्शकों की होती है. आप देखते होंगे कि कस्बों और छोटे शहरों में आज भी लिथो प्रिंट में लाल, नीली और काली स्याही में सफेद पेपर पर छपे पोस्टर दीवारों और दुकानों पर चिपके मिलते हैं.
उन पोस्टरों की हिंदी में अशुद्धियां रहती हैं, क्योंकि उन्हें किसी मराठी अनुवादक या लिप्यांतरक से सस्ते में लिखवा लिया जाता है. रणवीर सिंह रणवीर सिंग और रणबीर कपूर रणबिर कपुर हो जाते हैं. सोशल मीडिया पर हिंदी पोस्टर की मांग और शोर-शराबे के बावजूद निर्माताओं का ध्यान इधर नहीं जाता है. एक पब्लिसिटी डिजाइनर ने इस लापरवाही और जहालत की वजह बताई. उनके अनुसार कंप्यूटर के चलन में आने के बाद हिंदी फॉन्ट की कमी के कारण पोस्टरों में हिंदी छोड़ी गयी. साथ-साथ अंग्रेजी की स्वीकृति से निर्माताओं का मनोबल बढ़ा. त्रिभाषी और द्विभाषी पोस्टर की प्रथा खत्म हुई. पहले उर्दू गायब हुई और फिर हिंदी.
हाल ही में पहले ‘साहो’ और बाद में ‘दबंग 3’ के पोस्टर हिंदी, तेलुगू, तमिल और मलयाली दर्शकों के लिए रिलीज हुआ. हिंदी दर्शकों के लिए पोस्टर रोमन में थे, जबकि तमिल, तेलुगू और मलयालम के लिए उनकी भाषा की लिपि में, ‘दबंग 3’ के पोस्टर पर भाषा और फिल्म का नाम रोमन में ही लिखा गया.
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कामकाज और दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ा है. आप किसी भी प्रोडक्शन के दफ्तर या सेट पर पहुंचकर देख ले. यूनिट के अधिकांश सदस्य अंग्रेजी बोलते नजर आएंगे. केवल सिक्योरिटी, स्पॉट और लाइट बॉय हिंदी बोलते हैं या उनसे हिंदी बोली जाती है, यूनिट में मजदूर तबके के ये सदस्य कम पढ़े-लिखे होते हैं.
यूनिट के तकनीशियन और लेखन-निर्देशन टीम के सदस्यों के संपर्क और कार्यभाषा अंग्रेजी है. पिछले दिनों एक हिंदीभाषी वरिष्ठ निर्देशक ने बताया कि ‘मैं जब भी कोई बात हिंदी में शुरू करता हूं तो निर्माता के प्रतिनिधि और मेरे युवा सहायक बहस को चाहे-अनचाहे अंग्रेजी में बदल देते हैं. वे हिंदी में बातें नहीं कर सकते. मजबूरी में मुझे भी अंग्रेजी में शिफ्ट होना पड़ता है.’
10-15 साल पहले तक ऐसी स्थिति नहीं थी. दरअसल, फिल्मों में मुख्य रूप से शहरी उच्च वर्ग और उच्च मध्यवर्ग के बच्चे आ रहे हैं. बचपन से उनकी परवरिश और शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी माध्यम में होती है. जाहिर सी बात है कि पारिभाषिक, और दार्शनिक शब्दावली के लिए वे अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, कथ्य, संवेदना, भाव, भावना जैसे शब्द भी उनके लिए समझना और बोलना मुश्किल होता है.
हिंदी फिल्मों की स्क्रिप्ट रोमन में लिखे जाने के बात आम हो चुकी है. हिंदी फिल्मों की यह दशा खास दिक्कत से बढ़ी है. फिल्म लेखन के सॉफ्टवेयर हिंदी में विकसित नहीं हो पाए हैं. लेखकों को तकनीकी सहूलियत के लिए अपनी भाषा बदलनी पड़ती है. किसी भी स्क्रिप्ट में निर्देश अंग्रेजी में ही लिखे जाते हैं. तकनीशियनों की सुविधा के लिए यह जरूरी हो जाता है. हां, संवाद हिंदी में लिखने पड़ते हैं. उसके लिए भी अब रोमन आम हो चुका है.
अमिताभ बच्चन, मनोज बाजपेयी और पंकज त्रिपाठी जैसे कुछ स्टार ही हिंदी (देवनागरी लिपि) में संवादों की मांग करते हैं. रोमन संवादों की वजह से उच्चारण की अशुद्धियां बढ़ती जा रही हैं. हिंदी का प्रशिक्षण और अभ्यास नहीं होने से रोमन में लिखी गई ‘BANTI” कभी ‘बनती’ तो कभी ‘बान्टी’ बोली जाती है. ‘AANKHEN’ बोलते समय ‘आन्खें’ हो जाती है. आज के कलाकारों के संवाद ध्यान से सुने उच्चारण में मात्रालोप के उदहारण मिलेंगे.
विडंबना तो यह है कि एनएफडीसी और फिल्म बाजार जैसी संस्थाएं लेखकों से अंग्रेजी में स्क्रिप्ट मांगती हैं. किसी भारतीय भाषा में लिखी स्क्रिप्ट के साथ उसका अंग्रेजी अनुवाद भी जमा करना होता है. इस पृष्ठभूमि और परिस्थिति में हिंदी फिल्मों के स्टार का अंग्रेजी बोलना एक स्वाभाविक लक्षण है. जानकार बताते हैं की हॉलीवुड की सेंधमार और दक्षिण भारतीय फिल्मों के प्रसार और स्वीकार के बावजूद हिंदी फिल्मों में हिंदी का व्यवहार बना रहेगा. दर्शक आज भी हिंदी फ़िल्में देख रहे हैं. उन्हें क्या पता कि उन तक आ रही हिंदी फ़िल्में अंग्रेजी के प्रभाव से ग्रस्त हैं. हिंदी के मौलिक लेखकों और कलाकारों की संभावनाएं कम हो रही हैं. संवादों के लायक हिंदी स्टारों को सिखा दी जाती है.
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