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पार्ट 2: विवेकशील जनसमूह को अस्तित्व में लाना
सेकेण्ड्री स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा को लेकर भी हमारी कोई तैयारी नहीं है, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की तो बात छोड़ ही दी जाये. कैसे सूचना संगृहीत की जाये और ज्ञान को कैसे समझा जाये, इसको लेकर हमारी कोई तैयारी नहीं है. फिर भी हम ज़्यादा आईआईटी, आईआईएम या केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोलते जा रहे हैं. निश्चित ही यह शिक्षा को कमजोर कर देगी, जहां यह शिक्षा निम्नतम सामान्य संख्या तक अर्थहीन हो जायेगी और इसीलिए इसे ‘एलसीडी शिक्षा’ (Lowest Common denominator education) कहा जा सकता है.
उच्च शैक्षणिक संस्थान इस बात की शिकायत करते हैं कि उन्हें ऐसे अधकचरे स्नातकों को प्रवेश देना पड़ता है जिन्हें स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम से पूर्व बेसिक ट्रेनिंग देनी पड़ती है. विश्वविद्यालय वे स्थल हैं जहां वर्तमान ज्ञान का मूल्यांकन होता है और आवश्यकतानुसार उसमें बढ़ोत्तरी, सुधार व संशोधन करके उसे समयानुकूल अधुनातन बनाया जाता है और नये ज्ञान का सृजन किया जाता है. हम शिक्षा से सम्बन्धित वर्तमान संसाधनों को विस्तृत करने या उन्हें सुधारने की अपेक्षा नष्ट करने लगे हैं.
आज तक यह प्रस्ताव चल रहा है कि एक नये अधिनियम द्वारा सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में- पचास के लगभग – एक समान पाठ्यक्रम होगा जो एक केन्द्रीय व्यवस्था से नियन्त्रित होगा, विद्यार्थियों को प्रवेश भी एक केन्द्रीय प्रवेश-परीक्षा द्वारा दिया जायेगा और इन पाठ्यक्रमों को पढ़ाने के लिए अध्यापकों का चयन भी एक केन्द्रीय संस्था द्वारा किया जायेगा. उन्हें फिर विभिन्न विश्वविद्यालयों को आवंटित कर दिया जायेगा. इस प्रकार की केन्द्रीयकृत नियन्त्रण वाली डिग्री अभी तक सर्वाधिकारी समाजों में ही दी जाती रही है और ऐसे समाजों में भी अन्ततः कुछ-न-कुछ विविधता को स्वीकार करना ही पड़ता था. इस कदम से यह बात तय हो जाएगी कि नए प्रयोग के लिए कोई स्थान न रहे, अलग-अलग आयामों पर प्रयोग न हो या फिर इन प्रयोगों का स्थानीय सन्दर्भों से कोई जुड़ाव न हो.
पार्ट 1 यहां पढ़ें: विवेकशील जनसमूह को अस्तित्व में लाना
यह कदम सभी को सूचना के एक समान अनुपालन के लिए बाध्य करेगा. तय है कि यह राजनेताओं या नौकरशाही द्वारा संचालित होगा जिन्हें कोई विशेष ज्ञान नहीं है. यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इस सूचना या ज्ञान का प्रकार क्या होगा? जो ज्ञानवान हैं वे जानते हैं कि ज्ञान को समय-समय पर मूल्यांकित किया जाते रहना चाहिए और जो व्यावसायिक रूप से ऐसे ज्ञान की रचना और संग्रहण से जुड़े हैं, उनके द्वारा उसकी समीक्षा होती रहनी चाहिए. ये लोग नौकरशाह या राजनेता नहीं होते थे. वे लगभग हमेशा शिक्षक और अनुसन्धानकर्ता होते थे जो ज्ञान की अपनी शाखा में कार्यरत रहते थे. परन्तु नई प्रस्तावित व्यवस्था में शिक्षा की विषयवस्तु और शिक्षण प्रणाली पर बहस और निर्णय पेशेवर लोग नहीं बल्कि वो करेंगे जो किसी भी विषय की सीमाओं से सुपरिचित नहीं हैं.
हम ऐसे आलोचनात्मक प्रश्नों से बचना चाहते हैं जो केवल शिक्षा ही नहीं हमारी सोच को भी प्रभावित करते हैं. कोई भाषा उस समाज को व्यक्त करती है, जहां वह प्रयुक्त होती है. हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रयोग सफल नहीं हुआ. आज के युवा अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में ज़्यादा सहजता महसूस करते हैं और ये भाषाएं सभी राज्यों में शिक्षा का माध्यम भी बन गयी हैं. परन्तु संकट यह है कि जब तक वे अंग्रेज़ी नहीं जानते, उनकी सूचना और ज्ञान पुराना ही पड़ा रहता है. नये अनुसन्धानों का उनकी भाषाओं में पर्याप्त अनुवाद नहीं हुआ है या हुआ है तो ठीक से नहीं हुआ है और स्नातक शिक्षा में अनुवादित पुस्तकें ही पर्याप्त नहीं हैं. उन्हें ज्ञान के मूल्यांकन में भी कठिनाई आती है क्योंकि मूल्यांकन के लिए ज़रूरी है कि गैर-भारतीय स्रोतों के अलावा भी जो ज्ञान है, उससे तुलना की जा सके.
प्राचीन विद्या के एक पक्ष का जापान द्वारा अध्ययन समान अधिकारों से सम्बन्धित है. उदाहरण के लिए, कुछ जापानी विद्वानों ने संस्कृत ग्रन्थों का गहराई से अध्ययन किया है और अंग्रेज़ी और जापानी भाषा में वे छपे भी हैं. अंग्रेज़ी में प्रकाशन का उद्देश्य है कि उनके कार्यों को जापान के बाहर भी लोग पढ़ सकें. इससे वे जापान में संस्कृत अध्ययन की अपनी प्रशंसनीय परम्परा से विमुख नहीं हो जाते.
तकनीकी पेशों में प्रशिक्षण के लिए न्यूनतम स्वीकार्य से अधिक अंग्रेज़ी के ज्ञान की आवश्यकता होती है. तो अनुवादों पर भरोसा करना, जैसा कि हम सब जानते हैं, हमें कहीं नहीं ले जाता क्योंकि आजकल प्रचलित पुस्तकों का आधे दर्जन या अधिक भारतीय भाषाओं में अनुवाद असम्भव है. फिर अनुवाद में विश्वसनीयता की भी समस्या है क्योंकि अनुवाद के लिए दोनों भाषाओं में उच्च कोटि की दक्षता आवश्यक है. किसी बहुभाषी देश में भाषा और संवाद तथा उच्चकोटि की तकनीकी कुशलता सभी के लिए एक समान अवसरों की उपलब्धता के लिए आवश्यक है कि क्षेत्रीय भाषाएं शिक्षा का माध्यम हों, साथ ही एक सर्व-सामान्य भाषा हो जिससे क्षेत्र-पारीय संवाद की सुविधा सुलभ हो.
पूरे भारतीय परिदृश्य में अधिकाधिक इस दृष्टि से जो दो भाषाएं सोची जा सकती हैं, वे हैं क्षेत्रीय भाषा और इंग्लिश. गैर-हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी का विरोध होगा. उनकी दृष्टि से उन पर हिन्दी थोपना उनके लिए प्रतिकूल होगा. अंग्रेज़ी सभी के लिए ज़्यादा निरपेक्ष होगी और फिर अंग्रेज़ी आज विश्व की भाषा है. इसके अलावा विज्ञान या सामाजिक विज्ञान में किसी भी प्रकार के शोध के लिए हर हाल में अंग्रेज़ी सीखना अनिवार्य है.
राष्ट्रीय भावनाएं अंग्रेज़ी को स्वीकारने में आड़े आती हैं, फिर भी इसकी मांग काफ़ी है और फिर हमने इसे एक भारतीय शैली की अपनी विशिष्ट अंग्रेज़ी में ढाल लिया है तो हम क्यों न द्विभाषिकता के बारे में विचार करें– क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेज़ी भाषा. अंग्रेज़ी का (समुचित) ज्ञान हमें स्कूली शिक्षा से आगे जाने पर भी लाभप्रद होगा. इसके अतिरिक्त द्विभाषिकता में एक भाषा दूसरी भाषा के प्रति अनुकूलता प्रदर्शित करती है और धारणाओं का परस्पर विनिमय करती है जिससे दोनों ही भाषाएं समृद्ध होती हैं. यह कोई सर्वथा अपरिचित अनुभव नहीं होगा क्योंकि बृहत्तर सम्बोधन के लिए पुराने समय से हमारे समाज में भाषाएं द्विभाषिक स्थिति से सरल से क्रमशः जटिल की ओर विकसित हुई हैं.
(आज की) शिक्षा व्यवस्था ने जिज्ञासु मन के लिए जिस प्रकार की चिन्तन व्यवस्था बनाई है, उसने ज़्यादातर नौजवानों के लिए और चिन्तनशील नागरिकों तथा लोकहित बुद्धिजीवियों के अनुवाद में रोड़ा ही अटकाया है. हमें धन्यवाद देना चाहिए कि कुछ लोग तो हैं जो इस व्यवस्था के बावजूद स्वतन्त्र होकर सोचते हैं और रचनाशील हैं. परन्तु हमें जितने चिन्तनशील समूह की आवश्यकता है, उनकी गिनती नगण्य है. हमें सोचना चाहिए कि यदि हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था को पनपने दें जो विचारों को उत्तेजित कर सके, समस्या पर विचार कर सके तो कितना शक्तिशाली विचारशील समाज हम बना सकेंगे.
सुविचारित निष्कर्ष के रूप में हम पूछ सकते हैं कि समसामयिक जनहित बुद्धिजीवी को कौन से मुद्दे उठाने चाहिए. ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर विचार किया जा सकता है- हमारा ऐसी दफ़्तरशाही से चिपके रहना जो असंगत है और मानो बहुत थकी हुई और उस औपनिवेशिक प्रशिक्षण से मुक्त नहीं हो पायी है, जहां ऊपर से प्राप्त आदेशों का पालन ही नौकरशाही का काम रह गया है.
नौकरशाही को नागरिकों की सहायता करनी चाहिए, उन्हें संरक्षण देना चाहिए. परन्तु ऐसा शायद ही कभी होता हो. इसमें भ्रष्टाचार के रूप में एक समानान्तर व्यवस्था जुड़ गयी है जिसे सामान्य और अनिवार्य मान लिया गया है. राष्ट्रीय सम्पदा का अनुचित बंटवारा और अनिवार्य क्षेत्रों में विकास की कमी के कारण ज़्यादा प्रतिशत लोग ग़रीबी की रेखा के नीचे जी रहे हैं.
औपनिवेशिक नीति ने जाति और धर्म की प्रमुखता की जिन कोटियों को बनाया था, वे आज भी विद्यमान हैं, उन क्षेत्रों में भी जहां उसे अनुपयुक्त करार दिया जा चुका है. जनगणना के आंकड़ों द्वारा औपनिवेशिक प्रशासन ने बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदायों को ईजाद किया और धर्म के आधार पर पहचान की राजनीति को बढ़ावा दिया. पहचान की यह राजनीति जाति को समेटे है. अब ये कोटियां स्थायी हो गयी हैं और इस कारण प्रजातन्त्र ठीक से काम नहीं कर पाता. किसी प्रजातन्त्र में जो बहुसंख्यक होते हैं, उनकी श्रेणी स्थायी नहीं होती. उन्हें किसी एक कोटि से इंगित नही किया जा सकता, वो विषय-विषय के अनुसार बदलते रहते हैं.
(यह लेख वाणी प्रकाशन की अनुमति से प्रकाशित)
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