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जल-क्रांति की परंपरा
आज की हमारी बातचीत के बाद आपको महसूस होगा कि आपकी उम्र हो चली है क्यूंकि हम पहले भी आज के मुद्दे पर बात कर चुके हैं. जब मैं अपने शहरों और गांवों में पानी की कमी की समस्या के समाधान के रूप में वर्षा जल संचयन की उपयोगिता के बारे में चल रही बहस को सुनती हूं तो मुझे वैसा ही लगता है.
छतों और पहाड़ी कैचमेंट से बारिश के संचयन और इसे भूमिगत जलाशयों, एक्वीफर, झीलों और तालाबों में रखने के महत्व से हम सालों से वाकिफ हैं. फिर हमने इस तकनीक को क्यों नहीं अपनाया? हम इस ज्ञान का उपयोग करने में क्यों असफल रहे हैं? यह सवाल हमें स्वयं से पूछना चाहिए.
मैं आपको बताती हूं कि मैंने वर्षा जल संचयन के बारे में कैसे सीखा. यह 1990 के दशक की बात है, जब सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरनमेंट के तत्कालीन निदेशक अनिल अग्रवाल अपनी नई नवेली, लाल रंग की मारुति-800 चलाया करते थे. हम बीकानेर में चारागाह भूमि का उत्थान देखने जा रहे थे. अचानक हमें जमीन पर कुछ अलग सा दिखा. अनिल ने कार रोक दी. वह जानना चाहते थे कि आखिर उनके सामने वह चीज क्या थी.
यह एक उड़न तश्तरी या पक्की जमीन पर रखे एक उलटे प्याले के आकार में था. हम गाड़ी से उतरे, बस्ती के पास गए और पूछा, “यह क्या है?” जैसा कि भारत में अक्सर होता है, शहर के लोगों के ऐसे बेवकूफी भरे सवालों का बहुत धैर्य से जवाब मिलता है. “यह हमारी पानी की व्यवस्था है, हमारी कुंडी है.” हमारी समझ में कुछ नहीं आया. उन्होंने समझाया. “देखिए, हम जमीन को चूने से ढक देते हैं और उसे ऐसी ढाल देते हैं कि पानी बहकर बीच में जमा हो. फिर जब भी बारिश होती है, चाहे कितनी ही कम क्यों न हो, सारा पानी संचित होकर कुएं में चला जाता है. कुएं को प्रदूषण से बचाने के लिए उसे ढककर रखा जाता है.”
इस छोटी सी जानकारी ने सही मायनों में हमारी जिंदगी बदल दी. अनिल की गणना के मुताबिक उस संरचना में बहुत संभावना थी. महज 100 मिलीमीटर (मिमी) बारिश में- जितनी औसतन एक रेगिस्तानी इलाके में होती है, एक हेक्टेयर भूमि से दस लाख लीटर पानी संचित किया जा सकता है. यह कोई छोटी मात्रा नहीं है. 5 सदस्यों के एक परिवार को पीने और खाना पकाने के लिए एक दिन में 10-15 लीटर से अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होगी. यह एक वर्ष में 4,000-5,000 लीटर तक आता है. इसका मतलब है कि एक हेक्टेयर में 200-300 परिवारों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पानी इकठ्ठा किया जा सकता है.
बाद में, कुछ और अनुभवों ने वर्षा जल संचयन की क्षमता को लेकर मेरी समझ को आकार दिया और हमारे जीवन के अन्य पहलुओं से इसके संबंध को दर्शाया. हम चेरापूंजी में थे, जहां पूरे विश्व में सबसे अधिक बारिश होती है. कम से कम स्कूल में तो मैंने यही पढ़ा था. वहां एक छोटे से सरकारी गेस्टहाउस में मैंने एक बड़ा संदेश लिखा देखा- पानी कीमती है, कृपया इसे सावधानी से इस्तेमाल करें.
आश्चर्यजनक! एक ऐसी जगह जहां 14,000 मिमी (एक ऊंची छतवाले स्टेडियम को भरने के लिए पर्याप्त) बारिश होती है, वहां भी पानी की कमी है! अनिल और मैं कुछ समय पहले ही जैसलमेर से लौटे थे. एक ऐसा शहर जिसने केवल 50-100 मिमी बारिश के बावजूद एक समृद्ध सभ्यता और पीले बलुआ पत्थरों का एक शानदार किला बनाया था.
हमें जो जवाब मिला वह शहर के निर्माण के तरीके में छुपा था. चाहे छत हो या तालाब, हर जगह वर्षा जल संचयन की मुकम्मल व्यवस्था थी, जिससे एक जल-संपन्न और सुरक्षित भविष्य का निर्माण संभव हुआ.
अनिल इस सीख से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने जीवन के अगले कुछ वर्ष भारतीयों को वर्षा की बूंद-बूंद का मोल सिखाने में लगा दिए. देश के हर क्षेत्र में वर्षा के संचयन, भंडारण और फिर उसका उपयोग करने का अपना अनूठा तरीका था. प्रत्येक प्रणाली प्रदेश विशेष की पारिस्थितिक ज़रूरतों के हिसाब से विकसित की गई थी. इसके बावजूद हर प्रणाली एक इंजीनियरिंग चमत्कार थी जो उस प्रदेश की वर्षा जल संचयन के हिसाब से बनी थी.
फिर आखिर यह तकनीक लुप्त क्यों हो गई? सर्वप्रथम सरकार पानी की प्रदाता एवं आपूर्तिकर्ता बन गई. यह नियंत्रण पहले समुदायों या घरों के पास होता था. इसका मतलब यह था कि वर्षा जल संचयन अब प्राथमिकता नहीं रही. दूसरा, स्थानीय भूजल, जो वर्षा जल के माध्यम से रिचार्ज होता था, का इस्तेमाल बंद करके सतह के जल को प्राथमिकता दी गई. यह जल भी अक्सर दूर से नहरों के माध्यम से लाया जाता. यही कारण है कि वर्षा जल संचयन एक ऐसा विचार बनकर रह गया है जिसका समय अभी नहीं आया है.
वर्षा जल का संचय सरकार द्वारा संभव नहीं है, इसमें आम जनता की भागीदारी भी आवश्यक है. इसे हर घर, कॉलोनी, गांव एवं कैचमेंट में किए जाने की आवश्यकता है. ऐसा करने का प्रोत्साहन तभी मिलता है, जब हम अपनी जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर होते हैं. यदि शहरों और यहां तक कि गांवों में भी पाइप से पानी मिलेगा तो आखिर कौन बारिश के जल का संचयन करेगा और क्यों?
दूसरी समस्या यह है कि हम भूजल संचयन की कला और उसके पीछे के विज्ञान को पूरी तरह से समझ पाने में असफल साबित हुए हैं. इसलिए कैचमेंट (वह जमीन जहां बारिश का पानी गिरता) या तो अतिक्रमण का शिकार हैं या फिर भूमि-सुधार के नाम पर वितरित कर दिए जाते हैं. भूमिगत जल भंडारण के लिए बारिश को चैनलाइज करने वाले नाले या तो नष्ट हो चुके हैं या उन पर नया निर्माण किया जा चुका है. ऐसी हालत में वर्षा जल संचयन कैसे संभव होगा? हम नहीं कर सकते और हम नहीं करेंगे. यही कारण है कि सूखे और बाढ़ का चक्र जारी रहेगा और समस्या और भी भयावह हो जाएगी. तो आइए हम उस ज्ञान से सीखें, जिसकी हम अब तक अनदेखी करते आए हैं.
( डाउन टू अर्थ पत्रिका से साभार )
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