Newslaundry Hindi
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में आख़िर क्यों सड़क पर उतर रहे हैं छात्र?
नेता जी को पलायन भी रोकना है
नेता जी को शिक्षा व्यवस्था भी सुधारनी है
नेता जी को विकास भी करना है
पर नेता जी पुस्तकालयों में किताबें नहीं दे सकते!
बच्चों को शिक्षक भी नहीं दे सकते !
ऐसे कैसे चलेगा नेताजी?
हाथों में ये तख्ती लिए छात्र उत्तराखंड की सरकार और सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से सवाल पूछ रहे हैं. पिछले महीने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन अब लगभग पूरे उत्तराखंड में फ़ैल चुका है. वहीं दिल्ली में भी उन छात्रों के समर्थन में प्रदर्शन का आयोजन किया गया.
आखिर क्यों खफ़ा हैं छात्र?
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में छात्र ‘शिक्षक-पुस्तक आंदोलन’ कर रहे हैं. इस आंदोलन को छात्रों के परिजनों का भी समर्थन मिला है. पिथौरागढ़ के लक्ष्मण सिंह मेहर महाविद्यालय के छात्र सेमेस्टर परीक्षा के बीच में ही आंदोलन करने को मज़बूर है. कुमाऊं यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले इस कॉलेज का निर्माण साल 1963 में हुआ. तब ये कॉलेज आगरा यूनिवर्सिटी के अंतर्गत था, लेकिन 1973 में ये कुमाऊं यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आ गया.
लक्ष्मण सिंह मेहर महाविद्यालय से पासआउट हुए छात्र शिवम पांडेय न्यूज़लॉन्ड्री से बताते हैं, ”पिछले साल छात्र संघ का चुनाव कॉलेज में शिक्षकों और किताबों की कमी के मुद्दे पर लड़ा गया था. जब छात्र संघ का गठन हुआ तो वादे के मुताबिक विजेता छात्रों ने कॉलेज में शिक्षकों और पुस्तकों की कमी को तत्काल दूर करने की मांग शुरू की. इसके लिए एक अक्टूबर 2018 को पहली बार उच्च शिक्षा निदेशालय और शिक्षा मंत्री को ज्ञापन सौंपा गया. इसका कोई जवाब नहीं मिला है. इसके बाद भी कोई तीन से चार दफ़ा अधिकारीयों को ज्ञापन दिया गया. हमारे किसी भी ज्ञापन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही थी. कोई जवाब नहीं आ रहा था.’’
शिवम पांडेय आगे बताते हैं, ‘’हमने कुछ दिन इंतज़ार किया और फिर इस साल जून महीने में जिलाधिकारी को एक ज्ञापन सौपा गया. जिसमें हमने मांग की कि इस पर सात दिन के अंदर जवाब दिया जाये. एक सप्ताह के अंदर जब ज्ञापन पर कोई जवाब नहीं आया तो छात्र 17 जून से धरने पर बैठ गये. छह सात दिन लगातार धरना चला. सेमेस्टर का एग्जाम चल रहा था तो छात्र पढ़ाई भी कर रहे थे और आंदोलन में भी शामिल हो रहे थे. हम धरने पर बैठे रहे, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था. जिला प्रशासन हो या कॉलेज प्रशासन किसी ने हमसे बात तक नहीं की. फिर हम छात्रों ने शहर में मौन रैली निकाली. हमने कॉलेज कैम्पस से जिलाधिकारी के आवास तक शांति मार्च किये. इसके बाद भी प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की. इसके बाद छात्रों के समर्थन में उनके परिजन भी शामिल हो गये. परिजन हाथ में पोस्ट लेकर सड़कों पर उतर गये. परिजनों के साथ-साथ स्थानीय लोगों ने हमारी इस मांग का समर्थन किया. परिजनों ने भी जिलाधिकारी को इसको लेकर ज्ञापन सौंपा. परिजनों के ज्ञापन सौंपने के बाद प्रशासन की तरफ से जवाब आया. जिसमें लिखा था कि कतिपय कारणों से आंदोलन चल रहा है. इससे छात्र और नाराज़ हो गये. कई दफा हमने ज्ञापन देकर अपनी परेशानियों का ज़िक्र किया था, लेकिन प्रशासन को आंदोलन का मकसद ही नहीं पता. इसके बाद इस आंदोलन का असर ये हुआ कि प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में भी छात्र अपनी परेशानियों को लेकर प्रदर्शन करने लगे हैं.”
क्या है कॉलेज में शिक्षकों और किताबों की स्थिति?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे पिथौरागढ़ के रहने वाले विपुल कहते हैं, ”मैं उत्तराखंड में ही रहकर पढ़ाई करता, लेकिन वहां कॉलेजों की जो स्थिति है, उस वजह से मुझे दिल्ली आकर पढ़ना पड़ रहा है. सिर्फ लक्ष्मण सिंह मेहर कॉलेज की स्थिति बदहाल नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के लगभग सभी कॉलेजों की यही हालत है. लक्ष्मण सिंह मेहर कॉलेज की लाइब्रेरी में उपलब्ध किताबों में तो अभी भी उत्तराखंड का निर्माण नहीं हुआ है. अभी भी सोवियत संघ टूटा नहीं है.”
विपुल न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए मांगों की लिस्ट सौंपते हैं, जिसके लिए छात्र आंदोलन करने को मज़बूर हैं.
तकरीबन सात हजार की छात्र संख्या वाले इस महाविद्यालय में वर्तमान में शिक्षकों के 120 पद सृजित हैं. इन 120 सृजित पदों में से वर्तमान में 63 पद पर ही पूर्णकालिक शिक्षक नियुक्त हैं, जबकि 21 पद रिक्त हैं. वहीं, सिर्फ महाविद्यालय की छात्रसंख्या के लिहाज से भी कुल सृजित पद भी अपर्याप्त साबित होते हैं. यूजीसी के मानकों के अनुसार जहां स्नातक स्तर पर पच्चीस विद्यार्थियों पर एक शिक्षक और स्नातकोत्तर स्तर पर पंद्रह विद्यार्थियों पर एक शिक्षक की व्यवस्था को आदर्श माना गया है. इन मानकों को ध्यान में रखते हुए महाविद्यालय की आवश्यकतानुसार बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद सृजन किये जाने की अत्यधिक आवश्यकता है.
इसलिए पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति पर हमारी सीधी और स्पष्ट मांग है कि रिक्त पदों पर नियुक्ति करने के साथ-साथ नये पदों का सृजन करना ही शिक्षकों की कमी से निपटने का एकमात्र तरीका है.
पर्याप्त शिक्षकों के साथ-साथ जो दूसरी मांग रही है, वो है बेहतर पुस्तकों की आपूर्ति की. महाविद्यालय में न केवल किताबों की भारी कमी है, बल्कि सवाल किताबों की गुणवत्ता का भी है. वर्तमान में जहां महाविद्यालय के पुस्तकालय में आधिकारिक रूप से किताबों की संख्या 1,11,308 है, लेकिन इनमें से तकरीबन 15,000 किताबें ही उपयोग लायक हैं. इस ही वजह से हर एक छात्र-छात्रा को पुस्तकालय से सालाना केवल दो ही पुस्तकें उपलब्ध हो पाती हैं. शेष किताबों में से बहुसंख्या में किताबें दशकों पुरानी हैं व कटी-फटी, दीमक लगी होने के चलते उपयोग में लाये जाने योग्य नहीं हैं. सेमेस्टर प्रणाली लागू हो जाने के बाद बड़ी संख्या में कुछ विषयों की किताबें नये पाठ्यक्रम की दृष्टि से अनुपयोगी हो चुकी हैं.
इस तरह से वर्तमान में महाविद्यालय को सत्तर हज़ार से अधिक गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों की तत्काल आवश्यकता है. साथ ही हर साल लाइब्रेरी के लिए एक सालाना बजट की व्यवस्था किये जाने की भी ज़रूरत है. यह आश्चर्य की बात है कि महाविद्यालय में पुस्तकालय के लिए फीस के रूप में ली जाने वाली छोटी-सी धनराशि के अलावा किसी भी तरह के बजट की कोई व्यवस्था नहीं है. ऐसी व्यवस्था न होने के चलते ही पुस्तकों की खरीद के लिए निर्भरता सांसद निधि या विधायक निधि जैसे फंडों पर ही है. पुस्तकालय के लिए फीस के रूप में ली जाने वाली धनराशि से हर वित्तीय वर्ष में होने वाली खरीद महाविद्यालय के लिए अपर्याप्त ही साबित होती है. उदाहरण के लिए, पिछले तीन वित्तीय वर्षों में 3688 पुस्तकों की ही खरीद महाविद्यालय के लिए हो पायी है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही छात्रा कृति कहती हैं, ”उत्तराखंड में बेहतर शिक्षा का इंतज़ाम नहीं है जिस वजह से मुझे दिल्ली पढ़ने आना पड़ा है. अगर वहां शिक्षक होते तो हम आराम से अपने प्रदेश में ही रहकर पढ़ाई करते. हमें दिल्ली आकर पढ़ाई करने की ज़रूरत नहीं. पढ़ाई के दौरान मैंने रिसर्च किया जिसमें सामने आया कि सिर्फ रोजगार के लिए ही नहीं, बल्कि शिक्षा के लिए भी उत्तराखंड से लगातार पलायन जारी है. मैं पिथौरागढ़ की रहने वाली हूं. वहां के लक्ष्मण सिंह मेहर कॉलेज के छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन लगभग हर कॉलेज की यही स्थिति है. कहीं भी छात्रों की संख्या के बराबर शिक्षक नहीं है, किताबें नहीं हैं. जब बच्चों के पास किताबें और शिक्षक ही नहीं होंगे तो आखिर छात्र क्या पढ़ाई करेंगे.”
शिवम पांडेय बताते हैं कि कॉलेज में शिक्षकों की बेहद कमी है. इतिहास विभाग में सिर्फ चार शिक्षक हैं, वहीं गृह विज्ञान में कोई शिक्षक ही नहीं है. यहां छात्र साल भर में सिर्फ चार किताबें ले सकते हैं. सेमेस्टर सिस्टम होने के बाद किताबों की संख्या बढ़ानी चाहिए थी, लेकिन कॉलेज प्रशासन ने ऐसा नहीं किया. तीन साल पहले यहां सेमेस्टर सिस्टम शुरू हुआ. उसके बाद इस कॉलेज में 3,600 नयी किताबें आई है, जबकि छात्र सात हज़ार है. अगर कॉलेज में 1 लाख दस हज़ार किताबें हैं तो आखिरी छात्रों को साल भर में ज़्यादा किताबें क्यों नहीं दी जा रही हैं? ”
छात्रों के आरोप और चलाये जा रहे आंदोलन पर कॉलेज के प्रिंसिपल देवराज सिंह पांगेती न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, ”यहां पर छात्रों की संख्या ज़्यादा है. कुछ साल पहले ही यहां सेमेस्टर सिस्टम लागू हुआ है, जिसके बाद से शिक्षकों की कमी नज़र आ रही है. हमारे यहां 110 शिक्षकों में 103 शिक्षक हैं. जिसमें से लगभग 70 शिक्षक स्थायी हैं, बाक़ी गेस्ट टीचर रखा है. धीरे-धीरे स्थायी शिक्षकों की भर्ती चल रही है. यह पहाड़ी इलाका है फिर भी शासन ने हमेंं गेस्ट टीचर देकर हमारी थोड़ी-सी परेशानियों का समाधान किया है. जहां तक बात है गृह विज्ञान की तो उसमें कुछ दिन पहले तक स्थायी शिक्षक थे, लेकिन अभी गेस्ट टीचर ही पढ़ा रहे हैं.”
हैरान करने वाली बात ये है कि गृह विज्ञान में सौ छात्रों को पढ़ाने के लिए महज दो शिक्षक मौजूद हैं. ये दोनों शिक्षक भी गेस्ट टीचर हैं.
कॉलेज में किताबों की कमी पर देवराज सिंह कहते हैं, ”हमारे महाविधालय में लगभग 1 लाख दस हज़ार किताबें हैं. छात्रों का आरोप पर है कि 2010 से किताबें नहीं खरीदी गयी हैं, लेकिन साल 2014 से मैं यहां पर हूं. इस दौरान अब तक 16 लाख रुपये की किताबें खरीदी गयी हैं. अभी आगे भी काफी संख्या में किताबों की खरीदारी करने वाले हैं.”
अगर आपके पास पर्याप्त किताबें हैं, तो छात्रों को साल भर में महज चार किताबें ही क्यों दी जाती हैं. इस सवाल के जवाब में देवराज सिंह पांगेती कहते हैं, ‘यहां कॉलेज में लाइब्रेरियन नहीं है. अस्सिटेंट लाइब्रेरियन है. छात्रों की संख्या ज़्यादा है जिस कारण से हम अभी छात्रों को चार किताबें ही उपलब्ध करा पा रहे हैं. वैसे चार किताबें देने की परंपरा पहले से बना हुई है. हालांकि हम इसमें बदलाव करने वाले हैं.’
जारी रहेगा आंदोलन
लक्ष्मण सिंह मेहर कॉलेज के छात्र संघ के अध्यक्ष राकेश जोशी ने न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में बताया कि छात्र किताबों और शिक्षकों की कमी पर उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धनसिंह रावत ने कहा है कि कॉलेज में शिक्षक और किताबें मौजूद हैं. छात्र शायद बाहरी लोगों के दबाव में आंदोलन कर रहे हैं. इसकी हम जांच करायेंगे. दरअसल शिक्षा मंत्री हो या कोई भी नेता इनकी प्राथमिकता में छात्र है ही नहीं. हमारी मांग जब तक नहीं मानी जाती है, हम आंदोलन जारी रखेंगे.’
हालांकि दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षकों की संख्या को लेकर एनएसयूआई द्वारा किये गये प्रदर्शन के बाद उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धनसिंह रावत ने आश्वासन दिया है कि एक अगस्त तक सभी महाविद्यालयों में शिक्षकों की कमी दूर कर दी जायेगी. इस बारे में उच्च शिक्षा निदेशालय में रिक्त शिक्षकों के पदों की रिपोर्ट तैयार है और उनमें भर्ती प्रक्रिया चल रही है.
हमने भी धनसिंह रावत से बात करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पायी है.
अधूरा है अब भी बेहतर उत्तराखंड का सपना
उत्तर प्रदेश के साथ होने के कारण उत्तराखंड सालों उपेक्षा का शिकार रहा. जिसको लेकर यहां लंबे समय तक आंदोलन हुआ, जिसके बाद साल 2000 में अलग उत्तराखंड का निर्माण हुआ. लेकिन उत्तराखंड राज्य आंदोलन से जुड़े रहे नंद सिंह रावत न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, ‘जिस मकसद को ध्यान में रखकर सैकड़ों की संख्या में लोगों ने अलग राज्य की मांग की लड़ाई लड़ी और वह भी अधूरा है. मुझे लगता है कि ये तब तक अधूरा रहेगा, जब तक पहाड़ पर प्रदेश की राजधानी नहीं बन जाती है. इसकी लड़ाई हम अभी भी लड़ रहे हैं. यहां की सरकारों का ध्यान शिक्षा की तरफ कम, खनन और शराब की तरफ ज़्यादा है. कॉलेज में शिक्षक नहीं हैं, किताबे नहीं हैं. बच्चे पढ़ने के लिए पलायन नहीं करेंगे तो क्या करेंगे? आज उत्तराखंड में शिक्षा और रोजगार के लिए लगातार पलायन जारी है. कोई सुनने वाला नहीं है.’’
नंद सिंह रावत कहते हैं कि ये अच्छी बात है कि नौजवान पीढ़ी शिक्षा के लिए आंदोलन कर रही हैं.
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