Newslaundry Hindi
तकता है तेरी सूरत हर एक तमाशाई…
‘शोहरत और दौलत तेरी बांदी बनकर रहेगी और सारी दुनिया तेरे पीछे दीवानों की तरह पागल होगी.’ दस-ग्यारह साल की अख़्तरी को दी गयी बरेली शरीफ़ के पीर की इस दुआ के बारे में यतींद्र मिश्र को बताते हुए बेगम अख़्तर की शागिर्द रीता गांगुली आह भरती हैं- काश! पीर साहब ने शोहरत और दौलत की दुआ के साथ थोड़ी ख़ुशियां भी अख़्तरी की झोली में डाल दी होतीं.’
अपनी उस्ताद को याद करते हुए गांगुली ने एक किताब ‘ऐ मोहब्बत…’ लिखी है. उसमें वे कहती हैं कि उनकी नज़र में बेगम अख़्तर को उन्हीं की गायी एक ग़ज़ल- ख़ुशी ने मुझको ठुकराया है, दर्दे-ग़म ने पाला है- से सबसे अच्छी तरह से समझा जा सकता है. उनकी ज़िंदगी में जो उदासी और दुख का पहलू है, उसे उनके बेहद क़रीब रहे लोग ही जान सकते थे. गांगुली लिखती हैं कि उन्होंने सिर्फ़ एक शागिर्द की तरह ही अपनी उस्ताद को नहीं देखा था, बल्कि एक औरत की नज़र से भी एक औरत की ज़िंदगी को इतने नज़दीक से देखा था. इस तरह बेगम अख़्तर को जानने का एक रास्ता उनकी ज़ाती ज़िंदगी के मार्फ़त हो सकता है.
रेख़्ता के साथ एक बातचीत में उनकी शागिर्द रेखा सूर्य कहती हैं कि एक मुलाक़ात में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने बेगम अख़्तर से अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए उनके ‘पर्सनल चार्म’ की दाद दी थी. दूरदर्शन की एक रिकॉर्डिंग है. बेगम भी हैं और कैफ़ी आज़मी भी. कैफ़ी साहब कहते हैं कि वे ग़ज़लें इसलिए लिखते हैं कि ग़ज़ल यानी बेगम के क़रीब हो सकें. उस्ताद बिस्मिल्ला खां यतींद्र मिश्र को बताते हैं- ‘वो जो दुगुन-तिगुन के वक़्त आवाज़ लहरा के भारी हो जाती थी, वही तो कमाल का था बेगम अख़्तर में.’ इस सिलसिले में आप उन बेशुमार रसिकों, नामचीन फ़नकारों, शागिर्दों व साज़िदों और उनकी सोहबत से नवाज़े गये लोगों की बातों को जोड़े जा सकते हैं. तो, बज़रिया फ़न- जिसमें थियेटर भी है, सिनेमा भी है, गायकी तो है ही- अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी की शख़्सियत से पहचान करने का दूसरा, शायद सबसे अहम, सिरा खुलता है.
इन दो राहों के साथ बैठकों, महफ़िलों और यारबाशी के उनके क़िस्सों को चस्पा करते जायें, कितना कमाया, उड़ाया, लुटाया, तो न जाने कितनी मसनवियां बन सकती हैं! अबरार अहमद से मिसरे लेकर बेगम अख़्तर के बारे कहना चाहूंगा-
‘हर रुख़ है कहीं अपने ख़द-ओ-ख़ाल से बाहर
हर लफ़्ज़ है कुछ अपने मआनी से ज़ियादा
वो हुस्न है कुछ हुस्न के आज़ार से बढ़कर
वो रंग है कुछ अपनी निशानी से ज़ियादा’
बेगम अख़्तर के इस ‘ज़ियादा’ को मश्शाक़, मुसन्निफ़ और अदीब यतींद्र मिश्र ने ‘अख़्तरीः सोज़ और साज़ का अफ़साना’ में समझने-समझाने की एक शानदार कोशिश की है. इस मजमुआ में उन्हें जाननेवालों, शागिर्दों, फ़नकारों और पसंद करनेवालों की तीन पुश्तों की यादें और कमेंटरी हैं. कुछ अहम नाम गिनाता हूं- बिस्मिल्ला खां, लता मंगेशकर, शिवानी, सलीम किदवई, शांती हीरानंद, रीता गांगुली, शीला धर, शुभा मुद्गल, ममता कालिया, रख़्शंदा जलील… साल 1970 में रिकॉर्ड हुई आचार्य बृहस्पति और बेगम अख़्तर की तवील बातचीत भी इसमें है. कुल जमा पचास छोटे-बड़े इंदिराज हैं इस दस्तावेज़ी किताब में. इनमें साठ साल की बेमिसाल ज़िंदगी के सब रंग बिखरे-निखरे हैं.
शुरुआत में यतींद्र मिश्र ने सही ही लिखा है कि बेगम अख़्तर को ठीक से समझने के लिए बड़े पैमाने पर और गंभीरता से काम करने की दरकार है. यह मजमुआ ऐसे किसी काम के लिए एक मजबूत बुनियाद देता है. बेगम की ज़िंदगी और उनके फ़न में आम दिलचस्पी रखनेवाले के लिए तो यह किताब बहुत है. जो आगे कुछ खोजना-जानना चाहते हैं, वे यहाँ से अपनी पसंद से सिरा चुन सकते हैं. कई लेख और किताबें तो उनके थियेटर के और सिनेमाई हिस्से पर ही लिखे जा सकते हैं.
मौसीक़ी पर तो क्या ही कहना! शुभा मुद्गल का मज़मून तो गाने का फ़न सिखनेवालों के लिए मील का पत्थर ही है. अलग-अलग लेखों में फ़िल्मों और ड्रामों की और आख़िर में रिकॉर्डों की फ़ेहरिस्त भी दी गयी है.
यह भी एक अचरज ही है कि बीसवीं सदी में पचास दहाइयों तक हिंदुस्तानी तहज़ीब की इमारत खड़ी करने और उसे सजाने-संवारने में जुटी रहीं बेगम अख़्तर पर ज़्यादातर मज़मून और किताबें अंग्रेज़ी में हैं. ऐसे में हिंदी में यह मजमुआ लाकर यतींद्र मिश्र ने इस ज़ुबान के पब्लिक स्फ़ीयर को धनी बनाया है. यह बेगम अख़्तर पर ‘प्राइमर’ भी है और ‘रीडर’ भी. उम्मीद है कि ऐसा ही कुछ उर्दू में भी होगा, जिसे बेगम ने तक़रीबन अपना सब-कुछ दिया था.
यतींद्र मिश्र ने इस किताब के तमाम हिस्सेदारों के साथ मजमुआ की शक्ल में अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी का जो आलीशान मुजस्समा बनाया है, वह बीसवीं सदी में बन रहे हिंदुस्तान के एक अज़ीम सक़ाफ़ती आईनासाज़ का है. ज़रा सोचा जाये, जब पारसी थियेटर अपने उरूज़ पर है, तब बेगम स्टेज पर हैं. जब बोलती फ़िल्मों का दौर आया, तो उसमें बेगम की शिरकत है. मौसीक़ी और अदब की जुगलबंदी को परवान चढ़ाने में उनका कोई जोड़ कहां है! ग़ज़ल को गायिकी में उनसे पहले ऐसे कब ढाला गया था कि हर शायर बस यही चाहे कि उनका लिखा भी बेगम गा दें!
फ़न की हालिया तारीख़ में ऐसी मौजूदगी किसकी रही कि बिस्मिल्ला ख़ान जैसा उस्ताद भी फ़िदा हो और अंग्रेज़ी में शायरी करनेवाला नौजवान कश्मीरी आग़ा शाहिद अली भी. रवायती ढब बन चुके इस असर को इस मजमुआ में देखा जा सकता है, जहां बेगम के इंतकाल के बाद पैदा हुए लोग भी उनके मुरीद हैं. मृत्युंजय ‘बेगम के ग़ालिब’ के बारे में बताते हुए कहते हैं- ‘बेगम अख़्तर ने अपने ग़ालिब को खोजा. ग़ज़लों व शेरों के इंतख़ाब के ज़रिये हमारा इस ग़ालिब से तआर्रुफ़ होता है.’ डॉ प्रवीण झा ‘बेगम की आवाज़’ पर ‘संगीत-विज्ञान’ के हवाले से बात करते हुए बदन की बनावट और रियाज़ का चर्चा करते हैं. ऐसे कई चाहनेवाले नौजवान इस किताब में मौजूद हैं. बहरहाल, दिल लगाने, टूटने, फिर लगाने, फिर टूटने के सिलसिले से दर्द पैदा होने की कीमिया को आवाज़ के लिए काम की बात बताने का नुस्ख़ा बताकर बेगम अख़्तर को रुख़सत हुए इस साल अक्टूबर में पैंतालिस साल हो जायेंगे. शुऐब शाहिद के दिलफ़रेब कवर डिज़ाइन और वाणी प्रकाशन की अच्छी छपाई के साथ यतींद्र मिश्र की यह सुंदर किताब उनके सोज़ और साज़ को बेहतरीन ख़िराज-ए-अक़ीदत है.
Also Read
-
TV Newsance 323 | Distraction Files: India is choking. But TV news is distracting
-
‘Talks without him not acceptable to Ladakh’: Sonam Wangchuk’s wife on reality of normalcy in Ladakh
-
When media ‘solves’ terror cases, Kashmiris are collateral damage
-
Public money skewing the news ecosystem? Delhi’s English dailies bag lion’s share of govt print ads
-
Month after govt’s Chhath ‘clean-up’ claims, Yamuna is toxic white again