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एनजीटी के चाबुक से बेहाल अर्थला झील के 500 परिवार

गाज़ियाबाद के बालाजी विहार में रहने वाले सैकड़ों लोगों की रातों की नींद उड़ी हुई है. नगर निगम की गाड़ी जब यहां पहुंचकर जल्द से जल्द घर खाली करने की चेतावनी जारी करती है तो लोगों की नाराज़गी और चिंता एक साथ बढ़ जाती है.

दरअसल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद की अर्थला झील पर अवैध रूप से बने 500 से ज़्यादा घरों को ढहाने का आदेश दिया है. इस दायरे में 5 मंदिर और 2 मस्जिद भी आते हैं, जिन्हें तोड़ा जाना है. कुछ घरों को पिछले दिनों प्रशासन ने तोड़ भी दिया, लेकिन लोगों के भारी विरोध को देखते हुए प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को रोक दिया. लेकिन स्थानीय प्रशासन ने सभी घरों के ऊपर लाल रंग से क्रॉस का निशान लगा दिया है.

अपने घर पर लगे क्रॉस निशान को दिखाते हुए चालीस वर्षीय वाहिद कहते हैं, “ये क्रॉस का निशान दीवारों पर नहीं हमारे जेहन पर लगा है. बाहर आते-जाते जब भी हमारी नज़र इस पर पड़ती है तो हमें अपने बर्बाद होने का ख्याल आता है.”

अर्थला झील के किनारे बना वाहिद का घर प्रधानमंत्री आवास योजना के सहयोग से बन रहा है. अभी योजना की पहली किस्त 50 हज़ार ही उन्हें मिल पायी है.

वाहिद की पत्नी रिहाना प्रशासन पर गुस्सा जताते हुए कहती हैं, ”हमने ज़िंदगी भर कमाकर जो कुछ जमा किया था उसे खर्च करके ये ज़मीन खरीदी थी. 80 गज की इस ज़मीन के लिए हमने सात लाख रुपये दिये थे. पहले हम झुग्गी डालकर रहते थे. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हमें घर बनाने के लिए पहली किस्त के रूप में पचास हज़ार रुपये मिले तो हमने कुछ अपने पास से लगाकर यह घर बनाना शुरू किया. ये अभी आधा-अधूरा ही बना है कि निगम वाले इसे तोड़ने आ गये. अगर ये घर टूट जायेगा तो हम बर्बाद हो जायेंगे.”

प्रशासन से खफ़ा रिहाना कहती हैं, ”ज़मीन रजिस्ट्री कराते वक़्त क्या प्रशासन को नहीं पता था कि ये अवैध जमीन है. जब प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सहायता दी गयी, तब तो सारे कागज़ात देखे गये थे. तब भी उन्हें पता नहीं चला कि ये अवैध जगह पर बसा हुआ है. यहां 20-30 लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सहायता मिली हुई है. किसी-किसी को पूरे पैसे मिल गये हैं तो कुछ की एकाध किस्त आयी है. सरकार अगर हमारा घर तोड़ती है तो हम इसी झील में अपनी जान दे देंगे.”

एनजीटी ने क्यों लिया ये फैसला

गाज़ियाबाद की अर्थला झील करीब 2.5 लाख वर्गमीटर में फैली हुई है. डेढ़ दशक पहले तक यह शहर के लोगों के पर्यटन का केंद्र हुआ करती थी. इसमें बोटिंग होती थी, लोग जन्मदिन, पिकनिक मनाने के लिए यहां आया करते थे. 2000 के बाद से धीरे-धीरे झील के किनारे वाले क्षेत्रों में अवैध कब्जा होने लगा. प्रशासन के साथ मिलीभगत करके भू माफियाओं ने अवैध तरीके से यहां प्लॉट बेचना शुरू कर दिया. आज हालात ये है कि झील के चारों तरफ घनी आबादी बस गयी है और झील गंदगी का अंबार बन चुकी है.

गाजियाबाद में पर्यावरण के लिए काम करने वाले पूर्व पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुशील राघव ने झील की बर्बादी को देखकर 2015 में एनजीटी का दरवाजा खटखटाया. उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने 20 सितंबर, 2016 को झील के इर्द-गिर्द बने सभी अवैध कब्जे को छह महीने में हटाने के निर्देश दिया था. लेकिन प्रशासन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं किया.

2017 में सुशील राघव एक बार फिर से एनजीटी पहुंचे. सुशील कहते हैं, “इस बार सुनवाई के दौरान एनजीटी ने अवैध कब्जा हटाने के लिए जिम्मेदार गाजियाबाद जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को जमकर फटकार लगायी.” इसी बीच एक और गैर सरकारी संस्था सोसाइटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ इन्वायरमेंट एंड बायोडायवर्सिटी (स्पेनबायो) ने भी साल 2017 में अर्थला झील को लेकर एनजीटी में याचिका दायर की. स्पेनबायो से जुड़े आकाश वशिष्ठ बताते हैं कि याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने कहा कि अर्थला झील को लेकर पहले ही आदेश जारी किया जा चुका है, उसे जल्द से जल्द लागू किया जाये.

सुशील की ही याचिका पर कोर्ट ने 31 मई, 2019 को सख्त होकर आदेश दिया कि 10 जुलाई, 2019 तक इस मामले में क्या एक्शन लिया गया इसकी रिपोर्ट गाजियाबाद जिलाधिकारी एनजीटी को दें. जिसके बाद से प्रशासन एक्शन लेना शुरू किया. बालाजी विहार में कुछ मकान तोड़ भी दिये गये हैं और बाकियों को 10 जुलाई से पहले तोड़ने के लिए प्रशासन कमर कस चुका है.

पिछले दिनों प्रशासन ने कुछ घर तोड़ दिये. इसमें से एक घर बिहार के छपरा जिले के रहने वाली खुश्बू का भी है. मकान टूटने के बाद खुश्बू अपने पति असरफ़ और तीन बच्चों के साथ टूटे छप्पर के नीचे रहने को मज़बूर हैं. न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए खुश्बू रोने लगती है. घर के कागज़ात दिखाते हुए वो कहती हैं, ”हमने पाई-पाई जोड़कर 60 गज ज़मीन खरीदी थी. हमने ज़मीन शहनवाज़ से खरीदी ली. शहनवाज़ ने ये ज़मीन किसी ठेकेदार से खरीदी थी. ज़मीन लेते वक़्त हमने कागज़ भी बनवाये थे, लेकिन आज हम बेघर हो चुके हैं. तीन बच्चे हैं. हमारे पास सब कागज़ हैं. हम वोट भी देते हैं. गैस का कनेक्शन लिया है. अगर यहां से हमें हटाया गया तो हम सड़क पर आ जायेंगे.”

यहां जिन घरों को तोड़ा जाना है उसमें से ज़्यादातर लोग बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आकर यहां बसे हुए हैं. ज़्यादातर लोग छोटे-मोटे काम-धंधे या फिर फैक्ट्रियों में काम करते हैं.

कैसे हुए झील पर कब्जा 

2.50 लाख वर्ग मीटर में फैली अर्थला झील का लगभग एक लाख वर्ग मीटर का हिस्सा फिलहाल अवैध कब्जे की चपेट में है. स्थानीय पार्षद दिलशाद मलिक न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, “मेरी उम्र 28 साल है. मैंने जबसे होश संभाला है तब से यहां पर अवैध कब्जा हो रहा है. लोगों को गलत तरीके से ज़मीन बेची गयी. लोग शहर के बीच में इतने सस्ते दाम में मिल रही ज़मीन के लालच में आते गये और भू-माफियाओं के चंगुल में फंसते गये. उन्होंने एक बार भी ज़मीन के बारे में तहकीकात नहीं की. अब जब बस गये हैं तो उनके प्रतिनिधि होने के नाते मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्टे लेने की कोशिश कर रहा हूं ताकि इनकी मदद हो सके.”

दिलशाद मलिक भू-माफियाओं का नाम बताने से बचते नज़र आते हैं, लेकिन उनके बगल ही बैठे रईसुद्दीन बातचीत के दौरान थोड़ा दबाव डालने पर इस इलाके के कुछ प्रमुख भू-माफियाओं के नाम बताने लगते हैं. रईसुद्दीन ही इस मामले को लेकर हाईकोर्ट गये हैं. रईसुद्दीन कहते हैं, “यहां सबसे ज़्यादा जमीन रवि दत्त ने लोगों को बेची है. उसके अलावा पूर्व पार्षद और सपा नेता संजू चौधरी, अली राजा, बीएस राणा, राजू पहलवान और खुद को लोक जनशक्ति पार्टी का नेता कहने वाला साधू राम आदि प्रमुख हैं. साधु राम ने तो अवैध कॉलोनी बसाकर उसका नाम अपने ही नाम पर रख लिया है. रवि दत्त ने यहां अपना एक स्कूल भी खोल लिया था. इसके अलावा और भी कई लोगों ने बहती गंगा में हाथ साफ़ किया है.”

रईसुद्दीन बताते हैं, “यहां ज़्यादातर लोगों को ज़मीन पर रजिस्ट्री के ज़रिये पावर ऑफ़ अटॉर्नी दिया गया है. पावर ऑफ़ अटॉर्नी रजिस्ट्रार ऑफिस से मिलता है तो क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी. प्रशासन के लोगों ने भी दबाकर पैसे खाये हैं. अब इनका घर तोड़ा जा रहा है. दिखावे के लिए कुछ भू-माफियाओं पर एफआईआर दर्ज़ हुआ है, लेकिन उनका कुछ नहीं होगा.”

एनजीटी में अवैध कब्जा हटाने के लिए याचिका डालने वाले सुशील राघव एक दिलचस्प जानकारी देते हैं, “झील की ज़मीन पर भू-माफियाओं ने ही कब्जा नहीं किया है. बल्कि प्रशासन द्वारा भी यहां कुछ खसरों पर अवैध कब्जा किया गया है. इसकी जानकारी खुद गाजियाबाद प्रशासन ने एनजीटी कोर्ट में दिया है. झील के पास में ही बनी पुलिस चौकी और पानी की टंकी का निर्माण झील के ही जमीन पर हुआ है.”

पूर्व पार्षद संजू चोधरी के छोटे भाई तुषार चौधरी इसे विपक्षियों की साजिश बताते हैं. तुषार कहते हैं, ”अगर मेरा भाई ज़मीन कब्जा करने में शामिल होता तो उस पर पुलिस कार्रवाई करती. पुलिस ने कुछ भू-माफियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज़ किया है जिसमें मेरे भाई का नाम तक नहीं शामिल है.”

एक सच यह भी है कि संजू चौधरी के पार्षद रहते हुए यहां ज़मीनों पर कब्जा होता रहा, इसकी सूचना उन्होंने प्रशासन को दी क्या? इस सवाल पर तुषार कहते हैं, “हमने शायद लिखित में कोई शिकायत नहीं की है, लेकिन मौखिक रूप से हमारी तरफ से कई दफा सूचना दी गयी है.” यह ऐसा दावा है जिसकी पुष्टि नहीं की जा सकती.

हमने रवि दत्त से भी मिलने की कोशिश की लेकिन प्रशासन द्वारा भू-माफियाओं के ख़िलाफ़ मामला दर्ज होने के बाद से रवि दत्त फरार है.

हाईकोर्ट पहुंचे पीड़ित 

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता रईसुद्दीन कुछ पीड़ितों के साथ एनजीटी के फैसले पर रोक लगाने की मांग के साथ इलाहबाद हाईकोर्ट पहुंचे हैं. रईसुद्दीन बताते हैं, “29 मई, 2009 को उत्तर प्रदेश के राजस्व विभाग के आयुक्त और सचिव संजीव दुबे ने सभी जिलाधिकारियों को पत्र लिखा था. जिसका विषय था, तालाबों, पोखरों, झील, कुआं, जनप्रणालियों, नदी का जल एवं रिजरवायर्स से अवैध कब्जा हटाये जाने संबंधी. जिसमें लिखा गया है कि अवैध कब्जा करने वालों को पहले हटाने की कोशिश की जाये और अगर इसमें कोई दिक्कत आती है तो उसी बराबर तालाब कहीं और खुदवाया जाये और उसका खर्च उन्हीं लोगों से वसूला जाये.

रईसुद्दीन कहते हैं, “संजीव दुबे के इसी पत्र के आधार पर फतेहपुर जिले के विजयीपुर गांव में एक तालाब का निर्माण कराया गया. हम कोर्ट से यही मांग रखेंगे कि यहां से लोगों को हटाना ग़लत होगा. लोग सालों से यहां रह रहे हैं. ज़्यादातर लोग बेहद गरीब है. यहां से हटाये जाने के बाद इनके पास रहने को घर नहीं होगा. सरकार एक तरफ सबको घर देने का वादा कर रही है वहीं कुछ लोगों को बेघर किया जा रहा है. अवैध कब्जा हुआ है, लेकिन अवैध कब्जा करने वाला कोई और है. इन्होने तो यहां ज़मीन खरीदी है. इनको सज़ा मिलनी चाहिए और इनसे हर्जाना लिया जाये.”

एनजीटी में याचिका डालने वाले सुशील राघव कहते हैं, “एनजीटी के फैसले के ख़िलाफ़ पहले भी ये लोग हाईकोर्ट गये थे, लेकिन इन्हें कोई फायदा नहीं हुआ. इस बार भी बहुत मुमकिन है कि इनकी याचिका रद्द हो जाये, क्योंकि एनजीटी ने इस बार काफी सख्ती के साथ अवैध कब्जा हटाने के आदेश दिया है.”

किसी भी हालत में हटाएंगे अवैध कब्जा 

प्रशासन अवैध कब्जा हटाने के लिए पूरी तरह तैयार है. गाजियाबाद डीएम कार्यालय के बाहर पत्रकार आपस में चर्चा करते हुए नज़र आते हैं हटाने के लिए पड़ोसी जिलों से भी पुलिस बुलायी जाने वाली है. प्रशासन ने अवैध कब्जा हटवाने की जिम्मेदारी एडीएम सिटी शैलेन्द्र सिंह को दिया है. शैलेन्द्र सिंह न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, “इन लोगों को हटाने के लिए गाजियाबाद में पर्याप्त पुलिसकर्मी हैं. हमें बाहर से पुलिसकर्मी बुलाने के ज़रूरत नहीं पड़ने वाली है.”

जिन लोगों के घर तोड़े जाने हैं, वे लोग पुलिस पर हमले की बात करते नज़र आते हैं. नाराज़ लोग कहते हैं कि यहां से मरकर ही जायेंगे क्योंकि अपनी सारी कमाई यहां लगा दिये है. यहां से हटाया गया तो बर्बाद हो जायेंगे.

लोगों के इस रुख पर एडीएम शैलेन्द्र सिंह कहते हैं, ”पुलिस पर हमले का मतलब समझते हैं आप. ये तालिबान नहीं है. पुलिस पर हमले की हिम्मत तो अभी किसी में नहीं है. जब झील पर घर बना रहे थे तब उनको समझ नहीं थी. 2015 में मैं एडीएम सदर था तो 49 घर अर्थला झील के पास से हटाये थे. अब जब एनजीटी ने फैसला दिया है तो इन्होंने हमसे दस से पंद्रह दिन का समय मांगा कि हम एनजीटी के फैसले पर स्टे लायेंगे. हमने इसके लिए उन्हें पर्याप्त समय दिया है. हम पहले ही इस पर कार्रवाई करने वाले थे, लेकिन यहां 263 घर मुस्लिम समुदाय के हैं. रमजान का महीना चल रहा था जिस वजह से हमने कार्रवाई रोक दी. उसी दौरान लोकसभा चुनाव भी था, लेकिन अब तो एक्शन लेना होगा. अगर इनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी माली हालत बेहद खराब है तो उनका इंतजाम जिला प्रशासन करेगा, लेकिन हटना तो होगा ही. 10 जुलाई से पहले किसी भी तरह से हटायेंगे.”

यहां अवैध निर्माण में नगर निगम के अधिकारियों पर भी आरोप लग रहे हैं. पीड़ितों का कहना है कि घर बनाने के लिए एक भी ईंट यहां आती थी तो निगम के लोगों और पुलिस वालों को पैसा देना पड़ता था. हर कदम पर हमसे रिश्वत ली गयी. तो क्या निगम के तत्कालीन अधिकारियों और रिश्वत लेने वाले पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई होगी. यह सवाल जब हमने गाजियाबाद के नगर आयुक्त दिनेश चंद्र से पूछा तो वे नाराज़ हो गये. वे कहने लगे, “सार्वजनिक उपयोग की भूमि है उस पर अतिक्रमण हुआ है. एनजीटी के आदेश के आधार पर उसे हटाया जायेगा. जिन्होंने गलत तरीके से ज़मीन पर कब्जा किया है उन पर भी कार्रवाई होगी. हमारे भी जिन अधिकारियों ने पूर्व में अवैध कब्जे को शह दी है, उसकी पुष्टि कर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे.”

क्या कर रहा हैं एंटी भू-माफिया सेल 

प्रशासन किसी भी कीमत पर अवैध कब्जा हटाने की बात कर रहा है. वहीं लोगों के सामने संकट अपना घर उजड़ जाने का है. इस बीच में एक सवाल बार-बार सिर उठाता है कि जब यहां अवैध निर्माण हो रहा था तब प्रशासन के लोग कहां थे. निगम के वे लोग जिनकी अनुमति के बिना एक ईंट नहीं रखी जा सकती, उनकी नाक के नीचे यहां पांच सौ से ज्यादा घर बन गये, बिजली पहुंच गयी, पानी पहुंच गया, लोगों का आधार कार्ड बन गया, गैस कनेक्शन मिल गया और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनाने के लिए पैसे भी जारी हो गये.

गाजियाबाद के पर्यावरण कार्यकर्ता विजयपाल सिंह कहते हैं, ”देखिये पुलिस और निगम के अधिकारियों की मिलीभगत के बगैर एक इंच ज़मीन पर कोई कब्जा नहीं हो सकता है. गाजियाबाद में जो प्रशासन और निगम अवैध कब्जे हटाने के लिए आतुर दिख रहा है, उसी ने खुद कई जगहों पर अवैध कब्जा किया हुआ है. गाजियाबाद में 49 तालाब और झील थे जिसमें से अब सिर्फ 26 बचे हुए हैं बाकि कब्जे की भेंट चढ़ गये.”

आकाश वशिष्ठ आगे जोड़ते हैं, ”जब ज़मीन पर कब्जा हुआ तब प्रदेश में सपा-बसपा की सरकारें थीं. अब योगी आदित्यनाथ की सरकार है. सत्ता में आने के बाद योगी आदित्यनाथ ने एंटी भू-माफिया सेल का निर्माण किया है. एंटी-भू-माफिया सेल इस मामले की तहकीकात करे और जो भी इस ज़मीन को बेचने में शामिल रहे हैं उन पर मामला दर्ज़ करके जेल में डाला जाये. सबसे पहले अवैध कब्जा कराने वाले पुलिस अधिकारियों और निगम के लोगों पर मामले दर्ज़ होने चाहिए.”