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योगी आदित्यनाथ और खाकीवर्दी की धुन पर नाच रही है यूपी की व्यवस्था
तीनों पत्रकारों की गिरफ्तारियों में कानून को जैसे ताक पर रख दिया गया हो और संविधान को भूसा भरकर बखार में डाल दिया गया हो. और पूरी व्यवस्था योगी आदित्यनाथ और खाकीवर्दी की मर्जी पर चल रही हो. गिरफ्तारी से पहले न्यूनतम जो औपचारिकताएं हैं उन्हें भी पूरा नहीं किया गया. फ्रीलांस जर्नलिस्ट प्रशांत कन्नौजिया को पुलिस के जवान सादी वर्दी में गिरफ्तार करने जाते हैं. न तो उनके पास गिरफ्तारी वारंट होता है और न ही उसकी कोई परमीशन. अमूमन तो दिल्ली पुलिस की उसे परमीशन लेना चाहिए था. और साथ ही इस तरह के किसी मौके पर सबसे पहले वारंट दिखाना पड़ता है. उसके साथ ही आरोपी को अपने वकील को सूचना देने और उसे बुलाने तक का मौका दिया जाता है. उसके बाद ही औपचारिक तौर पर किसी की गिरफ्तारी की कार्रवाई में जाया जा सकता है. लेकिन यहां इन औपचारिकताओं को भी पूरा करने की जरूरत नहीं समझी गयी. सचाई यह है कि यहां गिरफ्तार करने आए पुलिसकर्मियों पर अपरहण का केस चलना चाहिए.
दूसरी तरफ पत्रकार अनुज शुक्ला और इशिता सिंह की गिरफ्तारी रात में की जाती है और इसके साथ ही नोएडा प्रशासन द्वारा उनके चैनल को सील कर दिया जाता है. और उसका तर्क यह दिया जाता है कि बीजेपी के कार्यकर्ता बेहद गुस्से में हैं. लिहाजा किसी अनहोनी से बचने के लिए ऐसा किया गया है. अब मजिस्ट्रेट से कोई यह पूछे कि इस तरह के गुस्से को काबू करने और ऐसे हालातों से निपटने के लिए ही तो पुलिस और फौज-फाटक को बनाया गया है. उसकी बिना पर कोई चैनल कैसे बंद कर सकता है. चैनल बाकायदा एक कानून के तहत चल रहा है. उसने लाइसेंस ले रखा है और उसकी अनुमति देने वाली एक दूसरी बाडी है. बजाय उसकी सुरक्षा करने और उसके अधिकारों को संरक्षित करने के अराजक तत्वों का बहाना बनाकर उसे बंद कर दे रहे हैं. कल तो फिर यह किसी भी चैलन के साथ हो सकता है. और इस बिना पर तो सेक्टर-16 में स्थित सभी राष्ट्रीय चैनल कभी भी इस ‘नियम’ के शिकार हो सकते हैं.
इस पूरे मामले में पूरे विवाद की जड़ महिला से न तो कोई पूछताछ हो रही है और न ही उसकी कोई कोशिश की गयी. उल्टा उसे पुलिस ने उसके घर पर संरक्षण दिया हुआ है. इंडियन एक्सप्रेस की मानें तो उसके कमरे में एक इंटेलिजेंस की महिला और नीचे एक पुलिस का गार्ड जरूर तैनात कर दिया गया है. अगर वह गलत है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो. लेकिन पुलिस हर तरीके से उसे डिफेंड कर रही है. महिला का कहना है कि शिकायत करने की कड़ी में उसकी पहली मुलाकात योगी आदित्यनाथ से गोरखपुर में हुई थी उसके बाद होली पर वह लखनऊ में उनसे मिली थी. और फिर वीडियो चैटिंग का हवाला दे रही है. एकबारगी मान लें कि वह मानसिक रूप से विक्षिप्त है तो भी उसके इलाज की जिम्मेदारी सरकार की बन जाती है. वह उसे कहीं भर्ती करा सकती है. लेकिन यह सब करने की जगह जो लोग भी इस मसले पर अपनी राय जाहिर कर रहे हैं. उन्हें यूपी की पुलिस पकड़ने पहुंच जा रही है.
ताजा मामला फतेहपुर का है. जिसमें वहां के रहने वाले एक शख्स ने इस पर अपनी टिप्पणी कर दी है. उसके गांव के ही एक शख्स की शिकायत पर पुलिस उसको गिरफ्तार करने उसके घर पहुंच गयी. वहां जाने पर उसे पता चला कि वह तो मुंबई में रहता है और वहीं नौकरी करता है.
ऊपर के तीनों प्रकरण में सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि उसमें पीड़ित या प्रभावित लोगों की तरफ से कोई शिकायत नहीं की गयी. पुलिस ने स्वत: संज्ञान लेकर मामले को दर्ज किया है. जिसमें पुलिस के एक अफसर की तरफ से एफआईआर दर्ज करायी गयी है. क्या इस तरह के किसी मामले में पुलिस कोई पार्टी बन सकती है? फिर ऐसी पुलिस पर कोई भरोसा क्यों करेगा. यह योगी सरकार द्वारा कानून का बेजा इस्तेमाल नहीं तो और क्या है.
पत्रकारों के उत्पीड़न की घटना केवल यूपी में ही नहीं बल्कि दूसरे सूबों में भी शुरू हो गयी है. झारखंड में फ्रीलांस जर्नलिस्ट रुपेश कुमार सिंह और सामाजिक कार्यकर्ता और एडवोकेट मिथिलेश कुमार सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार किया हुआ है. इनकी गिरफ्तारी नक्सली होने के आरोप में की गयी है. ये सारी गिरफ्तारियां अभी लिटमस टेस्ट हैं. और छोटे स्तर पर ऐसे लोगों के साथ आजमाया जा रहा है जो सीधे किसी बड़े संस्थान से नहीं जुड़े हैं या फिर उनका कोई बड़ा वजूद नहीं है. अगर यह सफल रहा तो आने वाले दिनों में बड़े स्तर पर बड़े पत्रकारों और बुद्धिजीवियों पर भी यह गाज गिरनी तय है. पीएम मोदी के दूसरे कार्यकाल का यही एजेंडा है.
दरअसल पिछले कार्यकाल में विपक्षी राजनीतिक पार्टियां चुप थीं, लेकिन यही तबका ऐसा था जो सबसे ज्यादा मुखर था और एक तरह से विपक्ष की भूमिका निभा रहा था. यह बात अलग है कि मुख्यधारा का मीडिया सरकार की गोद में बैठा रहा, लेकिन सोशल मीडिया पर उसके समानांतर एक ऐसी जमात खड़ी हो गयी थी जिसने सरकार और उसके समर्थकों की नाक में दम कर दिया था. यही हिस्सा देश की सिविल सोसाइटी के साथ मिलकर समय-समय पर सड़कों पर भी उतरता रहा. लिहाजा अभी भी सरकार के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है. ऐसे में केंद्र सरकार को इस बात का एहसास है कि उसके निर्बाध शासन के रास्ते में यह तबका सबसे बड़ी बाधा है. लिहाजा आने वाले दिनों में अगर बड़े स्तर पर कुछ नामचीन पत्रकारों, उनसे जुड़े संस्थानों और बुद्धिजीवियों के खिलाफ कार्रवाई हो तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए. क्विंट के राघव बहल के खिलाफ ईडी का मामला दर्ज होने को इसी के एक हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है.
[ जनचौक से साभार ]
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