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मैंने अपने वक़्त में जो बात कही वो आज भी रेलीवेंट है: गुलज़ार
दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर का सभागार पूरी तरह भरा हुआ था. साइड स्क्रीन पर कुछ फ़िल्मों के दृश्य आ जा रहे थे. कुछ ही देर में मंच पर गुलज़ार आए और पूरा सभागार उनके इस्तक़बाल में खड़ा हो गया. मौक़ा था गुलज़ार की तीन फ़िल्मों (आंधी,अंगूर और इजाज़त) पर लिखी गई किताबों पर बातचीत का.
हार्परकॉलिंस से आई इन तीन किताबों के बहाने गुलज़ार की फ़िल्मों पर बातचीत शुरू हुई तो पुरानी फ़िल्मों और उसके इर्द-गिर्द बने नोस्टेल्ज़िया की दुनिया का एक दरवाज़ा सा खुल गया.
हार्परकॉलिंस के प्रकाशक उदयन मित्रा के संचालन में बातचीत के लिए लेखिकाएं सत्या सरन और सबा बशीर भी मंच पर मौजूद थीं. तीसरी किताब की लेखिका मीरा हाशमी कार्यक्रम में नहीं आ सकीं. उन्होंने एक वीडियो के ज़रिए लाहौर (पाकिस्तान) से अपना संदेश भेजा,जिसे बाद में सुनाया गया.
गुलज़ार का परिचय कराते हुए उदयन मित्रा ने उन्हें मौजूदा वक़्त में ‘वन ऑफ़ दी मोस्ट फ़ेमस कल्चरल फ़िगर’ यानी दुनिया के सबसे मशहूर सांस्कृतिक चेहरों में शुमार किया. उन्होंने बताया कि ऑस्कर और ग्रामी से लेकर दादा साहब फ़ाल्के जैसे पुरस्कारों से नवाज़े गए गुलज़ार की सबसे बड़ी पहचान एक कवि के रूप में है.
बेहतरीन नज़्में लिखने वाले गुलज़ार के भीतर का गीतकार उनके अंदर के कहानीकार और फ़िल्म निर्देशक पर हमेशा हावी रहा. उन्होंने आंधी, अंगूर, इजाज़त के अलावा माचिस, नमकीन और हूतूतू सहित क़रीब सत्रह फ़िल्मों का निर्देशन किया. इसके अलावा रावी पार, मीर्ज़ा ग़ालिब और दो लोग जैसी किताबों ने उन्हें एक कहानीकार और उपन्यासकार के तौर पर भी स्थापित किया.
गुलज़ार की तीन क्लासिक फ़िल्मों पर लिखी गयी किताबों के बारे में बात आगे बढ़ाते हुए उदयन मित्रा ने पूछा “आपने आंधी को किताब के लिए क्यों चुना?”.
इस सवाल पर गुलज़ार की नज़्मों पर आधारित किताब ‘आई स्वैलोड दी मून- द पोइट्री ऑफ़ गुलज़ार’ की लेखिका सबा बशीर ने बताया -“शुरू में मैं आंधी पर नहीं लिखना चाहती थी. मैं नमकीन पर लिखना चाहती थी. उसे कम लोगों ने देखा है. आंधी के बारे में लोगों को गुमान रहता है कि ये एक पॉलिटिकल फ़िल्म है लेकिन मेरे लिए ये एक बेहद रोमेंटिक फ़िल्म है. इसका एक गाना है जो मुझे कभी समझ नहीं आया- ‘तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई सिकवा तो नहीं’. उस गाने में कुछ छुपा है, हर बार सुनने पर एक नयी परत खुलती है.”
ये कहते हुए सबा ने गुलज़ार साहब से गुज़ारिश की कि वो एक बार फिर उन्हें इस गाने के मानी समझा दें. गुलज़ार ने चुटकी लेते हुए कहा – “(फ़िल्म में) गाना (अदाकारों के) लिप्स पर नहीं है यानी कोई कह नहीं रहा. दरअसल ये एक ख़ामोश बात है, जो दिमाग़ में चल रही है.अपने-अपने तजुर्बे हैं. मैं आशा करता हूं कि आपको इस तरह के हिज़्र का तजुर्बा न करना पड़े कि गाना आपको समझ आ जाए.”
आंधी फ़िल्म अपने समय की मशहूर फ़िल्म रही. 1975 में जब वो रिलीज़ हुई, उसके कुछ समय बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया. फ़िल्म को इस बिनाह पर बैन कर दिया गया कि ये इंदिरा गांधी पर आधारित फ़िल्म है. इस सिलसिले में सबा बताती हैं – “1975 में मशहूर हिंदी फ़िल्मों की एक बाढ़ सी आई. शोले, दीवार, जय संतोषी मां, अमानुष जैसी सुपर हिट फ़िल्में इस दौर में आई और इसी साल देश में इमरजेंसी भी लगी. आंधी बिना वजह लपेटे में आ गई. वो वैसे ही हिट फ़िल्म थी. 23 हफ़्ते चल चुकी थी.फिर पता लगा कि उसे बैन कर दिया गया है. फ़िल्म से दो सीन डिलीट करने पड़े और एक सीन उसमें जोड़ना पड़ा.एक दृश्य में पीछे इंदिरा गांधी की तस्वीर लगवा दी गई और डायलॉग जोड़ा गया – ये हमारी आइडियल हैं.”
गुलज़ार इस वाक़ये को कुछ और तफशील से बताते हैं- “आंधी को ये कहके बैन किया गया कि ये मिस गांधी की लाइफ़ पर है. जो सही नहीं है. हर राइटर अपने सामने एक मॉडल रखता है. ऐसा पहली बार हो रहा था कि मैं एक लेडी पॉलिटिशियन पर फ़िल्म बना रहा था. उस समय इंदिरा गांधी ही अकेली प्रभावशाली पॉलिटिशियन थी. तो उनका मॉडल (संदर्भ) मेरे सामने आना ही था.”
गुलज़ार आगे कहते हैं – “मैंने तीन चार चीज़ें ब्रेक की इस फ़िल्म में. इस वक़्त तक हिंदी फ़िल्मों में एक रवायत चली आ रही थी कि जो लड़की सिगरेट पीती है वो वैंप है. सिगरेट पीने का एक्शन बुरा माना जाता है. वो हमारे कल्चर का हिस्सा नहीं माना जाता. हम बाप के सामने ड्रिंक भले ही कर लें पर सिगरेट नहीं पीते. फ़िल्म में एक दृश्य है जहां ऐश ट्रे में सिगरेट रखी है. बग़ल में बैठी वो (नायिका) कुछ लिख रही है. वो देखती है कि वो (नायिका के पिता) आ रहे हैं तो उसने उसे किनारे रख दिया. न डर था. न कोई नाराज़गी थी. ये बस एक तहज़ीबवाली बात थी. पॉलिटिक्स में एक लड़की एकदम एक आदमी की तरह व्यवहार क्यों नहीं कर सकती? मैं कोई नारा लगाए बिना ये साबित कर रहा था.”
इसी संदर्भ में एक श्रोता ने इजाज़त फ़िल्म के एक दृश्य का ज़िक्र करते हुए सवाल किया “फ़िल्म के आंखरी दृश्य में जब सुधा महेंद्र को छोड़ के जाती है तो वो उसके पांव छूकर जाती है. हम एक तरफ़ आदमी और औरत की समानता की बात करते हैं तो औरत का, आदमी के पांव छूना क्यों ज़रूरी था.” इस सवाल के जवाब में गुलज़ार में समझाया कि भले ही फ़िल्म के किरदार प्रगतिशील सोच के रहे हों, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति के तरीके तो उसी दौर के हो सकते हैं- “ये दृश्य आज के ज़माने में लिखा गया होता तो वो जाते हुए शायद हाथ मिलाती.”
अपनी फ़िल्मों में अपने समाज की बात करने को लेकर गुलज़ार ने कहा – “इस फ़िल्म में मैंने एक गाना लिखा था. ‘सलाम कीजिए आली जनाब आए हैं, ये पांच सालों का देने हिसाब आए हैं’. क्या आज भी ये ऐको नहीं करता? मेरे अपने फ़िल्म के इस गाने को ले लीजिए – ‘हालचाल ठीक-ठाक हैं. बीए किया है एमए किया है, लगता है वो भी एवें किया है. काम नहीं है वरना यहां आपकी दुआ से सब ठीक-ठाक है.’ सत्तर साल बाद आज भी वो रेलीवेंट है, तो ज़ाहिर है मैंने कुछ तो कहा होगा अपनी फ़िल्मों में. उस वक़्त फ़िल्म बनाने के बाद मैं उतना ख़ुश नहीं हुआ, जितनी ख़ुशी आज़ हो रही है. काश जैसे आज ये हॉल भरा है वैसे ही तब मेरी फ़िल्मों के हाल ऐसे ही भरे होते. इस बात की तसल्ली हो रही है कि मैंने अपने वक़्त में जो बात कही वो आज भी रेलीवेंट है. आप जो बोल रहे हैं वो बस आपस में ही नहीं बोल रहे. ये ज़रूरी है कि आप अपने दौर की बात कर रहे हैं और उसे दर्ज करते चले जा रहे हैं.”
लेखिका सत्या सरन ने अंगूर फ़िल्म से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा सुनाया. उन्होंने बताया कि ये फ़िल्म दरसल ‘दो दूनी चार’ का रीमेक थी, जो ख़ुद बंगाली फ़िल्म भ्रांतिविलास की रीमेक थी. शेक्सपियर के ‘कॉमेडी ऑफ़ एरर’ से प्रेरित इस फ़िल्म को बनाने को कोई प्रोड्यूसर तैयार नहीं था. मशहूर प्रोड्यूसर यश जौहर ने तो यहां तक कहा – “हिट फ़िल्म का रीमेक तो सब बनाते हैं लेकिन फ़्लॉप फ़िल्म का रीमेक भला कौन बनाता है?”
बाद में अंगूर फ़िल्म बनी और काफ़ी सराही गयी. गुलज़ार ने अंगूर में संजीव कुमार के अभिनय की तारीफ़ करते हुए कहा – “फ़िल्म का एक-एक दृश्य स्क्रिप्टेड था. लेकिन संजीव कुमार के हाव-भाव इतने बेहतरीन थे कि लगता था कि वो इम्प्रोवाइज़ कर रहे हैं”.
अपने दौर की फ़िल्मों के क़िस्से सुनाने के बाद गुलज़ार ने मौजूदा दौर के फ़िल्मकारों और सिनेमा जगत पर भी टिप्पणी की. उन्होंने कहा – “सिनेमैटिकली लोग आज मुझसे अच्छी फ़िल्में बना रहे हैं. मैं अच्छा कहानीकार था. फ़िल्म मेकिंग में नयी जेनरेशन मुझसे काफ़ी आगे है. मैं सिनेमैटिकली पीछे रह गया तो मैंने नज़्में लिखनी शुरू कर दी.” चुटकी लेते हुए उन्होंने आगे कहा- “आप मेरी तरह गाना लिखके बताइए. मैं ‘मोरा गोरा रंग लई ले’ पे रुका नहीं हूं. अगर आप नए ढंग से बात करेंगे तो हम भी ‘जिगर से बीड़ी जला लेंगे’. पर बात वही कहेंगे जोअपने अंदर है. हां ज़रा सा कुरेदेंगे तो आपको बड़े गहरे मानी नज़र आ जाएंगे.”
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